भारत के मार्क्सवादी इतिहासकारों के बौद्धिक घोटाले अर्थात इतिहास की हत्या, भाग – 3

हिंदू लोग, विशेषकर हिंदू बुद्धिजीवी वर्ग, अपने पर हो रहे चहुंमुखी बौद्धिक हमलों के विरुद्ध किसी ठोस वैचारिक अभियान चलाने या बौद्धिक हमलों का बौद्धिक प्रत्युत्तर देने में प्रायः निष्क्रिय रहा है.

स्वयं के विरुद्ध किए गए किसी के मनगढंत दावे, विवरण या सफेद जूठ को देखकर भी उसे हल्के में लेकर इग्नोर कर देता है. इसका एक ज्वलंत उदाहरण है केंद्रिय या राज्य शिक्षा संस्थानों द्वारा प्रकाशित-प्रचारित और स्कूल-कोलेजों के पाठ्यक्रम में समाविष्ट वे मार्क्सवादी इतिहास पुस्तकें, जिनमें संदिग्ध संदर्भों के आधार पर लिखे गए हिंदू-विरोधी जूठ से लेकर सफेद जूठ तक सब कुछ परोसा जाता रहा है. यह बात भी नहीं है कि उन पुस्तकों के दोष राष्ट्रवादीयों, गैर-मार्क्सवादीयों और हिंदू धर्मवादीयों को मालूम न हो, किंतु उन्होंने इस प्रवृत्ति के विरुद्ध वह बौद्धिक अभियान कभी नहीं चलाया जो मार्क्सवादी इतिहासकारों ने उन किताबों के बदले में दूसरी किताबें लिखवाने के निर्णय मात्र के विरुद्ध चलाया. फिर भी, ऐसा भी नहीं है कि “हिंदू राजाओं द्वारा बौद्ध-जैन मंदिरों के ध्वंस” के मुद्दे पर रोमिला थापर एण्ड कम्पनी को कोई चुनौती नहीं मिली. शुरुआत में आर.सी. मजूमदार, के.एम. पणिक्कर जैसे बुजुर्ग इतिहासकारों ने उभरती मार्क्सवादी इतिहासकारों की फसल को इतिहास विकृतिकरण के विरुद्ध चेतावनी दी थी. बाद में सीताराम गोयल की ओर से भी चेतावनी दी गई थी, लेकिन एक ओर जहाँ उस समय विश्व राजनीति में मार्क्सवाद का दबदबा अभी कायम था, तो दूसरी ओर सीताराम गोयल जैसे विद्वान किसी सत्ता-सम्पन्न पार्टी या सरकारी अकादमिक संस्थाओं से जुडी व्यक्ति नहीं थे. इसलिए “conspiracy of silence” की तकनीक का इस्तेमाल कर उनकी उपेक्षा करके उनके लेखन और विचारों को दबा दिया गया, किंतु जब १९९८ में श्री अरुण शौरी ने ग्राउन्ड-ब्रेकिंग पुस्तक “Eminent Historians” लिखकर मार्क्सवादी इतिहासकारों के लिखे “इतिहास” का ही नहीं, उनके अन्य फ्रोड का भी भाण्डाफोड कर दिया तब बात दबी न रह सकी. इसके दो प्रमुख कारण थे. एक तो प्रामाणिक लेखन में श्री अरुण शौरी का नाम देश-विदेश में स्थापित हो चुका था. दूसरे, दुनिया में मार्क्सवाद का सितारा गर्दिश में पहुंच चुका था. टेलीविजन की बदौलत कोई भी व्यक्ति पुस्तक पढे बिना भी रूस, चीन आदि कम्युनिस्ट स्वर्गों की वास्तविक स्थिति जान सकता था. ऐसी स्थिति में हमारे मार्क्सवादी इतिहासकार भी बचाव मुद्रा (डिफेंसिव मोड) में आने की जरूरत महसूस कर रहे थे. जहाँ पहले मार्क्सवादी लोग अपने आप को “मार्क्सवादी” कहने और कहलाने में गर्व महसूस कर रहे थे, उन्होंनें अब बदलती परिस्थितियों में अपने आप को “सेक्युलर / secular” कहना शुरु कर दिया और अपने मार्क्सवाद को छिपाना-सा शुरु कर दिया! यह इस बात का प्रमाण है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों का इतिहास-लेखन तथ्यों पर आधारित न होकर पार्टी-लाईन पर लिखा गया था.

जब श्री अरुण शौरी की पुस्तक “Eminent Historians” ने भारत के बौद्धिक जगत में तहलका मचाना शुरु कर दिया तब पहले तो इन मार्क्सवादी इतिहासकारों ने वही पुराना अहंकारी और पाखंडी रुख अपनाया कि “यह शौरी कौन है? उसको गंभीरता से लेने का क्या मतलब? वह कोई प्रोफेशनल इतिहासकार तो है नहीं! वह इतिहास लेखन की बारीकियां क्या समझेगा!!” लेकिन उपर उपर से यह कहने वाले, लेकिन अंदर से भयभीत “जानेमाने इतिहासकार” निरंतर मिडिया जगत पर नजर गडाये रहते थे कि शौरी के प्रहार से कोई तो उनका बचाव करने के लिए मैदान में उतरें!! यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि देश का कोई और इतिहासकार अरुण शौरी की पुस्तक के विरुद्ध मार्क्सवादी इतिहासकारों का बचाव करने को खडा न हो सका. इसका कारण बिलकुल सीधा और स्पष्ट है: श्री अरुण शौरी की सभी आलोचनाएं प्रामाणिक, तथ्यों पर आधारीत और बिलकुल सही थी. मार्क्सवादी इतिहासकार निरुत्तर थे.

इतिहास के क्षेत्र में रुचि रखने वालों से अनुरोध है कि वे मार्क्सवादी इतिहासकारों के लेखन और दावों को प्रामाणिकता कि कसौटी पर परख कर देखें. संबंधित विवादास्पद मुद्दों पर पहले के और बाद के इतिहासकारों के ग्रंथों का भी स्व-विवेक से अध्ययन करें. तभी हम हमारे इतिहास के बारे में जाने-अनजाने में फैलाए गए भ्रमों से मुक्त हो सकते है.

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