हवेली को दुख है

विनोद सिल्ला
मेरे पङौस की हवेली
खाली पङी है
अब तो शायद
चूहों ने भी
ठिकाना बदल लिया
कभी यहाँ
चहल-पहल
रहती थी
उत्सव सा
रहता था
लेकिन आज
इसके वारिश
कई हैं
जो आपस में
लङते रहते हैं
संयुक्त परिवार
टूटने का दुख
इस हवेली को भी है

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