भारत क्यों दबे अमेरिका से ?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मेटिस और विदेश मंत्री माइक पोंपियो अभी पिछले हफ्ते ही भारत होकर गए हैं। फिर क्या वजह है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोभाल को वाशिंगटन जाना पड़ा है ? दोभाल तो वास्तविक उप-प्रधानमंत्री ही माने जाते हैं। हमारी रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री से भी ज्यादा महत्व उनका है ? उन्हें वाशिंगटन दौड़ना पड़ गया, यह चिंता का विषय है। अखबार कहते हैं कि वे दोनों देशों के मंत्रियों की वार्ता को आगे बढ़ाने गए हैं। दोनों देशों के मंत्रियों ने अपनी बातचीत के बाद दिल्ली में यह प्रभाव छोड़ा था कि ईरान और रुस के मामले में अमेरिका भारत को छूट दे देगा। भारत पर अमेरिका यह दबाव नहीं डालेगा कि वह ईरान से तेल और रुस से शस्त्रास्त्र न खरीदे लेकिन लगता यह है कि वाशिंगटन पहुंचते ही डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दोनों मंत्रियों की परेड ले ली है। इसीलिए अमेरिकी सरकार की एक उप-मंत्री ने दो-तीन दिन पहले एक बयान में दो-टूक शब्दों में कहा कि अमेरिका ऐसे किसी भी देश को बख्शनेवाला नहीं है, जो ईरान से तेल खरीदना बंद नहीं करेगा। उसने यह बात चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप का नाम लेकर कही है। दूसरे शब्दों में मेटिस और पोंपियो की भारत-यात्रा खाली झुनझुना सिद्ध हो गई है। वे भारत के साथ सामरिक संचार का समझौता कर गए और अपना माल बेचने की हवा बना गए। भारत को क्या मिला ? भारत का कौनसा फायदा हुआ ? यह स्पष्ट है कि यदि भारत ईरान से तेल खरीदना बंद कर देगा तो उसे काफी मंहगे भाव पर अन्य सुदूर देशों से मंगाना होगा। तेल की कीमतें बढ़ेंगी और उसके साथ-साथ सरकार का सिरदर्द भी। अमेरिका ने ईरान के साथ हुए परमाणु-सौदे को रद्द कर दिया है और वह उसे दंडवत करवाना चाहता है। उसे इसकी परवाह नहीं है कि इस कारण भारत का दम फूल सकता है। इस संबंध में भारत को जरा सख्ती से पेश आना चाहिए। अमेरिकी दबाव के आगे बिल्कुल नहीं झुकना चाहिए और यदि अमेरिका निवेदन करे तो ईरान और उसके बीच वह मध्यस्थता भी कर सकता है।

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  1. सितम्बर माह में इस लेख विशेषकर शीर्षक में भारत और संयुक्त राष्ट्र अमरीका के संबंधों पर लेखक द्वारा प्रस्तुत नकारात्मक विचार अगले वर्ष निर्वाचनों के पूर्व सरलमति लोगों में युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शासन की ओर शंका व भय उत्पन्न करने का प्रयास है|

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