श्रेय मार्ग का पथिक बन आगे बढ़ते रहिए
मित्र और शत्रु हमारे भीतर बैठे होते हैं। कौन मित्र है और कौन शत्रु है- यह देखना हमारा काम है। इन दोनों के बारे में यह भी सत्य है कि इनको पालने वाले भी हम ही होते हैं। इस प्रकार यह भी हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किसे मित्र बनाकर भीतर बैठाते हैं और किसको शत्रु बनाकर भीतर बैठाते हैं ?
संसार के अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जिनके द्वारा वेदों का अध्ययन तो कर लिया जाता है परंतु वेद उनके भीतर नहीं आ पाए। वेदों का अध्ययन कर लिया परंतु वेदों को आचरण में नहीं ला पाए तो सब व्यर्थ चला गया। क्या लाभ हुआ इस परिश्रम और पुरुषार्थ का ? ध्यान रहे कि रावण वेदों का विद्वान था ,परंतु आचरणहीन था। वेदों का अध्ययन कर लिया परंतु वेद उसके आचरण में नहीं उतर पाए। आदि शंकराचार्य जी लिखते हैं:-
षडंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या
कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति ।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।
” यदि किसी व्यक्ति के मुख पर छह अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष) सहित वेद और समस्त शास्त्र-विद्या कंठस्थ हो, जो उत्कृष्ट गद्य और सुंदर पद्य (कविताएँ) रचने की कला में निपुण हो, किंतु यदि उसका मन गुरु के चरण-कमलों में नहीं लगा है तो इन सब योग्यताओं और विद्याओं का क्या लाभ, क्या लाभ, क्या लाभ, क्या लाभ ? अर्थात् वे सब व्यर्थ हैं।”
विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः
सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः ।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।४।।
” यदि किसी व्यक्ति का विदेशों में बहुत आदर-सम्मान होता हो, अपने देश में जिसे धन्य (प्रशंसित/कृर्तकृत्य) माना जाता हो, और सदाचार तथा श्रेष्ठ आचरण में मुझसे बढ़कर कोई दूसरा न हो (यानी जो अपने आपको सबसे श्रेष्ठ सदाचारी मानता हो)—किंतु यदि उसका मन गुरु के चरण-कमलों में नहीं लगा है, तो इन सबका क्या लाभ, क्या लाभ, क्या लाभ, क्या लाभ? अर्थात् गुरु-भक्ति और गुरु चरणों में मन का समर्पण न होने पर ये सारे मान-सम्मान और सद्गुण व्यर्थ हैं।”
रावण की भांति ही यदि आप वेदों को पढ़कर भी दूसरों को अपमानित करते रहे, क्रोध में भरकर अपने बने बनाए महल को अपने आप ही मिटाते रहे तो क्या लाभ हुआ ? ध्यान रखो कि :-
प्रीत प्रियतम से करो ध्यान करो सुबह शाम।
उसके सिमरन से बनें बिगड़े सारे काम।।
कितने ही बड़े यज्ञ करो, कितने ही ग्रंथ पढ़ो ,कितने ही शास्त्र पढ़ो, जब तक आचरणशील नहीं हो तब तक उसका कोई लाभ नहीं।
कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा।
अक्लेशजानानं प्रोक्तं त्वहिंसा परमर्षिभिः।।
अर्थात ऋषियों द्वारा सिखाई गई सच्ची अहिंसा यह है कि किसी भी जीवित प्राणी के प्रति कर्म, विचार या शब्द से कभी भी कष्ट न पहुँचाया जाए।
कुल मिलाकर संकेत यही है कि आचरणशील बनना बहुत आवश्यक है।
अपनी गतिविधियों पर ध्यान दीजिए। मन की उन सूक्ष्म गतिविधियों पर ध्यान दीजिए जिनमें वह चौबीसों घंटे लगा रहता है। उसकी गतिविधियों का हमारे जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है यदि मन कुकृत्य करने में लगा हुआ है तो हमारा जीवन वैसा ही बन जाता है और यदि वह सत्कृत्य करने में लगा रहता है तो जीवन वैसा बन जाता है। कुकृत्य करने पर लगोगे तो जीवन हेय बन जाएगा। सुकृत्य करने पर लगोगे तो जीवन श्रेय मार्ग का पथिक बन जाएगा।
बुरे काम करने वालों के लिए चारों ओर से भर्त्सना बरसती है जबकि अच्छे काम करने वालों के लिए चारों ओर से आनंद की वर्षा होती है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने सत्कृत्य करने पर बल दिया है। यदि अपने ऊपर फूलों की वर्षा चाहते हो तो फूलों की वर्षा करवाने वाले ही सत्कृत्य करते रहिए। कृति में सुंदरता लाइए। परंतु यह तभी संभव है जब चित्ति अर्थात मन और उक्ति अर्थात वचन में भी समरूपता होगी।
अपने ही किए गए कृत्य अर्थात कर्म प्रतिफल के रूप में हमारे पास लौटते रहते हैं। संसार में कुछ भी मिटता नहीं है। जो जा रहा है, वही आ रहा है और जो आ रहा है वही कल जाएगा भी। कर्म भी जैसा कर दिया गया है वैसा ही लौट कर आएगा। जो कुछ भी हमको मिल रहा है वह अपने कर्मों के फल के रूप में मिल रहा है। हम यह सोचकर की अमुक परिणाम मुझे अमुक व्यक्ति के कारण मिला है, व्यर्थ ही किसी अन्य को दोष देते हैं। ग्रह, दशा, देवी, देवता, भाग्य विधाता सभी निर्दोष हैं। इनको दोष देना व्यर्थ है। अपनी समीक्षा अपने आप करो। अपने कार्यों की समीक्षा करो। अपने व्यवहार और अपने आचरण की समीक्षा करो। यदि ईमानदारी से देखा जाएगा तो पता चल जाएगा कि जो कुछ भी मेरे चारों ओर घटित हो रहा है या जो कुछ भी मेरे जीवन में मुझे मिलता जा रहा है उसके पीछे मेरे अपने कर्म हैं।
विदुर नीति में महात्मा विदुर हमें बताते हैं कि व्यक्ति की बुद्धि उसके कर्मों के अनुसार ही काम करती है। जो व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, उसकी बुद्धि सात्विक और सही दिशा में चलती है। वहीं, बुरे कर्म करने वाले की बुद्धि नष्ट हो जाती है और वह अपने विनाश का कारण स्वयं बनता है।
विदुर नीति के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अधर्म या पाप की कमाई से धन एकत्र करता है, तो उसका फल न केवल उसे बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ता है। अधर्म से कमाया हुआ धन अंततः विनाश ही लाता है।
मृत्यु के बाद धन, संपत्ति, परिवार और मित्र सब यहीं छूट जाते हैं। केवल मनुष्य के द्वारा किए गए अच्छे और बुरे कर्म ही लोक-परलोक में उसके साथ जाते हैं। इसलिए व्यक्ति को हमेशा धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।
साथ न कुछ भी जाएगा धन पड़ा रह जाय।
मीत है सच्चा धर्म ही परलोक में जाता साथ।।
यह हमारी भूल है
दुनिया में कोई किसी का नहीं, यह कहना हमारी भूल है। सोचना चाहिए कि हम किसके अपने हैं ? जिसके आप अपने हो उधर से आपको अपनत्व मिलना निश्चित है। हम अपने आप किसी के नहीं हो पाए,यही हमारे दुखों का कारण है। हमने दूसरों को अपना बनाया नहीं तो दूसरे हमारे बनते क्यों ? हमने एक दूरी बना कर रखी। उस दूरी में बेगानापन था, परायापन था। दूरियों को मिटाया नहीं बल्कि दूरियों को बढ़ाते रहे। चुगली निंदा करते रहे। घर में भी माहौल को बोझिल बनाए रहे। यदि शांति चाहते हो और जीवन में दिव्यता चाहते हो तो संसार में अपनत्व का विस्तार करने के लिए बाँहों को खोल दीजिए। स्मरण रखिए कि प्रेम की पराकाष्ठा ही धर्म है। प्रेम की पराकाष्ठा पर हम पहुंचे नहीं, बहुत नीचे रहकर ही हम प्रेम का प्रतिफल पाने की इच्छा पाल बैठे। यही हमारी भूल रही। भूल के शूल हमको मारते रहे और हम फूल की कामना करते रहे।
हम यह भूल गए कि वातावरण और परिस्थितियों के निर्माता हम स्वयं होते हैं। ये दोनों हमारे पास नहीं आते हम ही इनको बना लेते हैं। अपने द्वारा बोए गए झाड़ और कांटों से ही हम यह कह कर भागते हैं कि यह तो चुभते हैं। हम यह भूल जाते हैं की चुभना तो इनका स्वभाव है। परन्तु इनको बोना तुम्हारा स्वभाव नहीं था। तुमने ही अपने स्वभाव के विपरीत कार्य किया। तब इनको दोष क्यों देते हो ? उद्यान में गुबरीला भी रहता है और भौंरे भी रहते हैं। भौंरे फूलों पर बैठते हैं और मकरंद पान करते हैं जबकि गुबरीला गंदगी तलाश करता है।दूसरों के व्यक्तित्व की सुगंध ढूंढो। भौंरे बन जाओगे। दूसरों के व्यक्तित्व की दुर्गंध ढूंढोगे तो गुबरीला बन जाओगे। हमसे गलती यही होती है कि हम गुबरीला का काम करते रहते हैं।
चिंतन जिसका निम्न हो उसका निम्न नसीब ।
दुनिया का समझो उसे सबसे बड़ा गरीब।।
एक ही सांचे में ढाली गई ईंटों को देखिए। कोई मंदिर में काम आती है तो कोई गंदी नाली में काम आती है। ईंट बन गई तो एक का चिंतन सात्विक हो गया और मंदिर में जा लगी जबकि दूसरी का चिंतन ज्यों का त्यों ही रहा तो गंदी नाली में जा लगी। एक ही खान के पत्थर को देखिए कोई मंदिर की मूर्ति में काम आता है तो कोई शौचालय में प्रयोग होता है। एक ही गुरु के शिष्यों को देखिए एक वेदों का विद्वान बन जाता है तो एक डकैत, बलात्कारी, हत्यारा अर्थात अपराधी बन जाता है। इसमें प्रारब्ध भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। श्री कृष्ण जी गीता में कहते हैं :-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थात तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। तुम अपने कर्मों के फल के कारण मत बनो और तुम्हारी रुचि काम न करने (अकर्मण्यता) में भी न हो।
इस बात को सदा ध्यान रखो कि भगवान किसी का प्रारब्ध (भाग्य) अपनी इच्छा से नहीं बनाते। प्राणी जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल (प्रारब्ध) भोगता है।
अपनी दिशा का निर्धारण अपने आप कीजिए। अपने उद्धारक अपने आप बनो। जिस दिशा में चल पड़ोगे, उसी दिशा के साथी मिलते चले जाएंगे। चोर को चोर मिलते जाएंगे और संत को संत मिलते चले जाएंगे। जीवन में संतों की खोज करते रहो। अच्छे लोगों की संगति की खोज करते रहो। पवित्र ह्रदय बनाकर पवित्र ह्रदय वालों को खोजने के अभियान पर निकल जाओ । पवित्रता का विस्तार करते रहो। पवित्रता को विस्तार देने के लिए अपने आप को समर्पित कर दो। उजड़ जाओ । बिखर जाओ। अच्छाई के विस्तार के लिए एक जगह बैठे मत रहो। यदि एक जगह बैठे रह गये तो अच्छाई और सच्चाई सिमट कर रह जाएगी। उसको विस्तार देने के लिए अपने आप को विस्तार दो।
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि
अपनी आंखें सही हैं तो सारा संसार सही दिखाई देता है। आंखों में दोष है तो यह संसार भी दोषों से भरा दिखाई देता है। जैसी नजर होती है वैसा ही नजरिया हो जाता है। जैसी दृष्टि होती है वैसा ही दृष्टिकोण हो जाता है। अपने स्वयं के जीवन के बारे में सात्विक दृष्टिकोण रखो। सकारात्मक चिंतन रखो।
महात्मा बुद्ध राजमहल छोड़कर आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए वन में चले गए। अंतर्मुखी होकर अपने भीतर छिपी हुई महान सत्ता और महत्ता के दर्शन किए, इतना होते ही वह राजकुमार से बदलकर ‘भगवान ‘ अर्थात महामानव हो गए।
बालक मूल शंकर सच्चे शिव की खोज में निकल पड़ा । छोटी सी घटना मात्र थी जिसने जीवन बदल दिया । बालक मूल शंकर मूल शंकर से दयानंद हो गया। स्वामी हो गया। सरस्वती हो गया। एक छोटा सा काम किया था उन्होंने कि अपने चारों ओर के परिवेश को चुनौती दे डाली थी, इस चुनौती ने उनको ‘दयानंद ‘ बना दिया।
संसार में जितने भर भी महात्मा महापुरुष हुए हैं ,उन सबने वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना के लिए कार्य किया है। महात्मा बुद्ध ने भी अपने मौलिक चिंतन में वेद को पुनर्स्थापित करने के लिए संघर्ष किया। आगे चलकर ईसा मसीह ने भी यही किया, यहां तक कि मोहम्मद साहब ने भी यही किया। यह अलग बात है कि वेदों का तात्विक ज्ञान न होने के कारण उनका ज्ञान दूसरी दिशा में बह गया। जो कालांतर में वैदिक धर्म का ही शत्रु हो गया।
अधूरा ज्ञान बड़ा घातक होता है। जिसका ज्ञान अधूरा होता है, वह संसार के लिए कल्याणकारक नहीं होता। नदी जहां सबसे अधिक गहरी होती है , वहां उसके पानी का कोलाहल रुक जाता है। जहां नदी उथलेपन में बहती है वहीं पर अधिक शोर करती है। थोथा चना बाजे घना।
जिसका ज्ञान गहराई वाला नहीं होता, वह दूसरों को चैलेंज करता फिरता है। दूसरों के सामने जंघा में हाथ मारता है। जिसके ज्ञान में गहराई है,गंभीरता है,वह दूसरों को चुनौती नहीं देता बल्कि दूसरों पर कृपा करता है, दूसरों का हाथ पकड़ता है और साथ लेकर चल पड़ता है। उन्नति की ओर… प्रगति की ओर… महान लक्ष्य को पाने के लिए।
अपने आप को पहचानो। अपने स्वरूप को पहचानो। जो लोग अपने आप को नहीं पहचान पाए वही हेय जीवन जीते हैं। दुष्प्रवृत्तियों में लिपटे हुए नरक भोगते रहते हैं। अपने आप को ईश्वर का युवराज समझो।
‘ अहम् ब्रह्मास्मि ‘ का अर्थ अहंकार शून्य हृदय को प्राप्त कर लेना है। ऐसी अवस्था में साधक जानता है कि मैं ब्रह्म नहीं हूं। पर वह ब्रह्म के आनंद को प्राप्त करके अपने आप को उस आनंद में लीन कर लेता है। तब उस अहंकारशून्य हृदय से यह पवित्र शब्द निकलता है – अहं ब्रह्मास्मि।
जो अपने आप को ईश्वर का युवराज मान लेता है वह अपने व्यक्तित्व को देवों के समान गढ़ने लगता है। वह पशु पक्षियों की तरह पेट प्रजनन तक सीमित नहीं रहता, वह विश्व उद्यान को समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने में लग जाता है। उसकी दृष्टि का विस्तार हो जाता है। उसके दृष्टिकोण का विस्तार हो जाता है। उसकी नजर बदल जाती है और उसका नजरिया बदल जाता है।
तुच्छ से महान, लघु से विभु और नर से नारायण बनने की साधना करो। अभी हमने महान बनने की साधना नहीं की है।साधना नहीं की है तो लोगों की भावना भी हमारे साथ जुड़ी नहीं है। भावना नहीं जुड़ी है तो भगवान ने प्रार्थना सुनी नहीं है। अभी हम स्वयं एक प्रक्रिया में पड़े हुए हैं। उस प्रक्रिया से बाहर नहीं निकले हैं या कहिए कि हमने उस प्रक्रिया को पूर्ण नहीं किया है।
मनुष्य पता नहीं क्या-क्या खोज कर रहा है? परंतु अपने आप को नहीं खोज रहा, अतीत में वह जो कुछ था वह आज नहीं है और जो आज है वह आने वाले कल में नहीं रहेगा। जिसे वह प्रगति कह रहा है वह उसकी प्रगति नहीं दुर्गति है।
हम मस्तिष्क को उज्जवल ,हृदय को विशाल और दिनों को शुभ बनाते चलें और लोकहित में काम करते रहें तभी हमारी महानता की साधना प्रबल होगी।
किसी की आलोचना से विचलित मत होइए। न्याय के पथ पर आगे बढ़ते जाइए। समय का मूल्य समझिए। आपके पास समय थोड़ा है, काम अधिक है। जो लोग आप पर भोंकते हैं, वह अपने व्यक्तित्व का अपने आप परिचय देते हैं। हो सकता है अपने बनाए हुए महल का अपने आप विध्वंस कर रहे हों। उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करो कि उन्हें ईश्वर सद्बुद्धि प्रदान करें। अपने लक्ष्य पर निशाना साधिए और उसी की तरफ आगे बढ़ते रहिए।
डॉ राकेश कुमार आर्य