धर्म-अध्यात्म

दिव्य जीवन की साधना : अध्याय 6

सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्ति की साधना

अग्ने नय सुपथा रायेऽअस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युथोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ॥
यजु० 40 । 16 ॥

(अग्ने अस्मान् राये सुपथा नय) हे ज्ञानस्वरूप प्रभो हमें ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये अच्छे मार्ग से ले चलिये (देव) हे दिव्यगुणों के दाता प्रकाशस्वरूप परमात्म देव ( विश्वानि वयुनानि विद्वान् ) आप सम्पूर्ण कर्मों के जानने वाले हैं (अस्मज्जुहुराणम् एनः युयोधि) हमारे कुटिलाचरण पाप को नष्ट कर दीजिये (ते भूयिष्ठां नम उक्तिं विधेम) हम तुम्हारी बारंबार स्तुति करते हैं।
सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए मन में सकारात्मकता के संग, हर पल शुभता का अहसास करते रहिए। यही विचार मनुष्य को सन्मार्ग पर ले जाता है। सन्मार्गगामी बनने से हमें शाश्वत सुखानुभूति होती रहती है, इसके साथ ही दुख की निवृत्ति होती रहती है। इसी प्रकार की जीवन शैली को तपश्चर्या कहते हैं। सुखानुभूति और दुख की निवृत्ति एक साथ होने से जीवन कुंदन बनता जाता है। तप की भट्टी में तपते तपते निखरता जाता है। परिणामस्वरूप जीवन से भटकाव समाप्त हो जाता है। चित्त में स्थिरता आती है।
ठोकर खाने का दौर समाप्त होता है और जीवन उन्नति में ढलता जाता है। हर व्यक्ति अपने कर्तव्य पालन को ही अपना धर्म मानने लगता है।
वेद के उपरोक्त मंत्र में हमने सुपथ पर चलने की प्रार्थना परमपिता परमेश्वर से की है। परमपिता परमेश्वर ने चराचर जगत की रचना की है। इसके बारे में वह सब कुछ जानता है। इसका ज्ञान विज्ञान,दृश्य -अदृश्य कुछ भी उससे अछूता नहीं है। इसीलिए वह ज्ञानस्वरूप कहलाता है। उसको बनाने का भी ज्ञान है, चलाने का भी ज्ञान है और अंत में संहार करने का भी ज्ञान है । उस ज्ञानस्वरूप परमपिता परमेश्वर ने मनुष्य को वेद ज्ञान दिया। जिससे वह भी ज्ञानवान बन सके और अपने जीवन का उद्धार कर सके।
सदविद्या ही मनुष्य का सबसे सुंदर ऐश्वर्य है। सबसे मूल्यवान आभूषण है। जो सब कुछ जानता हो- वही हमें ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए सन्मार्ग दिखा सकता है। जो स्वयं ही रास्ता नहीं जानता हो वह दूसरों को क्या रास्ता दिखाएगा ? जो स्वयं ऐश्वर्य संपन्न है, वही आपको ऐश्वर्य संपन्न कर सकता है। जो स्वयं दरिद्र है, वह दूसरों को ऐश्वर्य संपन्न नहीं कर सकता। इसलिए उससे ही मांगना चाहिए जो देने में सक्षम हो, समर्थ हो।
इस मंत्र में परमपिता परमेश्वर से ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए अच्छे मार्ग से ले चलने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि आप ही समस्त कर्मों के ज्ञाता है। हम आपकी बारंबार स्तुत्ति करते हुए प्रार्थना करते हैं कि आप हमें पथभ्रष्ट करने वाले कुटिलाचरण रूपी पाप से मुक्त होने के लिये उसे भस्मसात् कर दीजिये।
जब कुटिलाचरण रूपी पाप भस्म हो जाएगा तो उसके उपजने की सारी संभावनाएं क्षीण हो जाएंगी। परमेश्वर हमारा अग्रगन्ता नायक है। हमको सदा ध्यान रखना चाहिए कि उस परमपिता परमेश्वर के नायकत्व में ही हम आगे बढ़ रहे हैं। वह नायक इसीलिए है कि वह हमको अर्थात अपने अनुयायियों को सुपथ पर ले चलने की क्षमता रखता है। समाज, किसी संगठन या किसी राष्ट्र का नायक भी वही हो सकता है जो अपने समाज या अपने संगठन के लोगों को अथवा अपने राष्ट्रवासियों को सुपथ पर लेकर चलने की क्षमता रखता हो। यदि वह स्वयं पथ भ्रष्ट है तो वह नायक के गुणों से शून्य है।
परमपिता परमेश्वर हमारे कल्याण में रत रहते हैं। उन्होंने सृष्टि तक की रचना हमारे कल्याण के लिए की है। चौबीसों घंटे उसके हृदय में हमारे कल्याण की योजनाएं आकार लेती रहती हैं । इसीलिए वह हमारा नायक होने की क्षमता रखता है। लौकिक जगत में भी वही व्यक्ति नायक हो सकता है जो अपने संगठन, अपने समाज, अपने राष्ट्र और अपने अनुयायियों के कल्याण की योजनाओं में लगा रहता है। यदि नायक आग लगाने वाला है, विखंडनवादी है, संकीर्ण मानसिकता का है तो वह समाज, राष्ट्र या किसी संगठन का नेतृत्व करने की क्षमता नहीं रखता। यदि संयोग से उसे नेतृत्व करने का अवसर मिल भी जाता है तो वह ऐसे समाज, संगठन या राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध होता है। तिकड़मों से नेता बनने वाले लोग राष्ट्र का विखंडन करा देते हैं। क्योंकि तिकड़म अपने आप में एक ऐसा शब्द है जो विखंडन की ओर संकेत करता है।
मंत्र के भाव पर यदि विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि जिन सन्मार्ग के कार्यों से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है उनका हमारे नायक को ज्ञान होना चाहिये। नेता का यह गुण उसके चिंतन की व्यापकता को स्पष्ट करता है। उसके चिंतन में किसी प्रकार की संकीर्णता नहीं होनी चाहिए। हमारे देश के विभाजन के लिए मोहम्मद अली जिन्ना की संकीर्ण सोच जिम्मेदार रही। जिसके चलते वह कभी संपूर्ण भारत और भारतवासियों को अपना नहीं मान सका।
नेता के लिए यह भी आवश्यक है कि वह कुमार्ग से हटाने की सामर्थ्य वाला होना चाहिए। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह परिवार में कभी एक दूसरे के प्रति निंदा चुगली करके जहर नहीं फैलाएगा। संगठन के लोगों में भी एक दूसरे के प्रति जहर घोलने का प्रयास नहीं करेगा। समाज और राष्ट्र के लोगों को भी जहर घोलने की प्रवृत्तियों से बचा कर रखेगा। जैसे परम पिता परमेश्वर हमें सन्मार्ग पर लेकर चलता है और कुमार्ग से हमें बचाता है वैसे ही हमारा लौकिक नायक भी हमें सन्मार्ग पर लेकर चलेगा और कुमार्ग से बचाएगा। जहां परिवार समाज राष्ट्र के लोग अपेक्षा करते हैं कि आप वहां उपस्थित होने चाहिए, वहां अवश्य उपस्थित होने का प्रयास कीजिए और जहां आप आवश्यक समझते हैं कि लोगों की छोटी-मोटी बातों की उपेक्षा की जाए वहां उनकी उपेक्षा करिए। अपेक्षा और उपेक्षा दोनों का सदा ध्यान रखकर आगे बढ़िए।
गम्भीरता पूर्वक विचार करने से ज्ञात होता है कि ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ही हमारे वास्तविक और स्वाभाविक नायक हैं। उसके पास अनन्त ज्ञान बल क्रियारूपी सामर्थ्य स्वाभाविक रूप से उपलब्ध है। उसकी प्रेरक शक्ति हमें प्रत्येक प्रकार के दुख दारिद्र्य से बचाती है। संपूर्ण दुर्गुणों और दुर्व्यसनों से बचाती है। वह हमारे हृदय में विराजमान होकर हमारा नेतृत्व करता रहता है। किस मार्ग पर चलने से हमारा कल्याण हो सकता है ? किस मार्ग पर चलने से हमारा विनाश हो सकता है ? इस बात का सही-सही अवलोकन करता रहता है और हमें साथ ही साथ संकेत भी देता रहता है। जिन लोगों के हृदय में भक्ति के भाव हैं और श्रद्धा विराजमान है, वे परमपिता परमेश्वर के संकेतों को समझते रहते हैं और उसी के अनुसार अपना आचरण बना लेते हैं।
उनके लिए संकेत ही पर्याप्त होता है। संकेत के आधार पर ही वह अपने जीवन पथ का निर्धारण कर लेते हैं। कुछ समय में उन संकेतों को सुनने के वे इतने अधिक अभ्यासी हो जाते हैं कि उन्हें हर कदम पर मिलने वाले संकेत अपने लिए देवदूत दिखाई देने लगते हैं।
जिन लोगों के भीतर श्रद्धा नहीं होती उन्हें परमपिता परमेश्वर के ये सारे संकेत कभी दिखाई नहीं देते। श्रद्धावान को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है अर्थात उसे इस बात का बोध होता है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह परमपिता परमेश्वर की असीम अनुकम्पा के चलते हो रहा है। करने वाला मैं नहीं हूं । करने वाला कोई और है। मैं तो उसके संकेत पर कठपुतली की भांति मात्र नाचने का काम कर रहा हूं। यदि जीवन में वह कुछ मुझसे शुभ करवा रहा है अर्थात कुछ ऐसा करवा रहा है जिसे ‘ बड़ा ‘ कहा जा सकता है तो यह उसकी कृपा का ही परिणाम है कि उसने इस शुभ के लिए मेरा चयन किया है। इस चयन के लिए भी उसका धन्यवाद ज्ञापित करो।
वह दयालु – कृपालु परमपिता परमेश्वर हमारे हृदय में विराजमान हैं । हृदय में विराजमान रहकर वह दयानिधान सदा ही सुपथ पर बढ़ने एवं कुमार्ग से हटने की प्रेरणा करते रहते हैं। यदि हम उसकी प्रेरणा को सुन नहीं पाते अथवा उसके अनुसार अपना जीवन आचरण नहीं कर पाते तो इसमें दोष उसका नहीं है बल्कि हमारा है।
वैदिक विद्वानों की मान्यता है कि ” जैसे अग्नि अपने सांसारिक कार्यों के निष्पादन सम्पादन में अग्रणी होता है और विधि पूर्वक उसका अनुष्ठान करने से वह रत्नादि अनेक उत्तमोत्तम पदार्थों का देने वाला होता है। श्रुति ने तो उसे प्राणि-मात्र की भलाई के श्रेष्ठतम कार्य यज्ञ का पुरोहित ही कहा है। वैसे ही आध्यात्मिक सुपथ पर बढ़ाने के लिये अग्निदेव परमेश्वर ही हमारे अग्रणी हैं जो कि हमारे हृदय में सदा विराजमान हैं। हमें उनके ही आदेशानुसार सदा चलना चाहिये । परन्तु भौतिकोत्थान के लिये अभिदेव के उपर्युक्त गुणों से युक्त साथी को ही अपना अग्रणी (नेता) मान श्रद्धा के साथ उसके द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण करना चाहिये। मन्त्र में निर्दिष्ट तीनों बातें तो नेता में होनी ही चाहिये। यदि नेता में अपने अनुयायियों को कुमार्ग से हटाकर सुपथ पर चलाने की सामर्थ्य नहीं है तो उसे अपने को नेता न समझना चाहिये और न ऐसे व्यक्ति को कभी अपना नेता ही बनाना चाहिये । लक्ष्य की सिद्धि प्राप्त करने एवं कराने के लिये सही नेतृत्व की आवश्यकता है।”
इस मंत्र के माध्यम से परमपिता परमेश्वर हमको इसी बात का संदेश दे रहे हैं कि जैसे मेरे नेतृत्व में संसार सही-सही गति को प्राप्त हो रहा है वैसे ही संसार में नायकों के नेतृत्व में मेरी व्यवस्था को आगे बढ़ाया जाता है। उस व्यवस्था को आगे बढ़ाने वाला मेरे ही समान गुणों वाला होना चाहिए। यदि उसके भीतर दिव्यता नहीं है ,दिव्य गुणों के प्रति श्रद्धा नहीं है, न्यायप्रियता से उसे किसी प्रकार का लगाव नहीं है, यदि उसके हृदय में पक्षपात है तो वह परमपिता परमेश्वर की व्यवस्था में नायक नहीं हो सकता। परमेश्वर के दिव्य गुणों को धारण करने वाला ही नायक हो सकता है। राजा हो सकता है। समाज का मार्गदर्शक हो सकता है।
12 नवम्बर 2022 को दैनिक जागरण में प्रकाशित एक लेख के अनुसार चाणक्य ने भी नेता के कुछ गुणों का वर्णन किया है।
चाणक्य कहते हैं कि किसी भी नेता को अपने कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए धैर्य रखना बहुत आवश्यक है। इसलिए दल के अन्य लोगों से अधिक नायक को धैर्य रखना चाहिए। जल्दबाजी में किए गए काम में लापरवाही का खतरा निरंतर बना रहता है। जिससे कड़ी मेहनत पर चंद मिनटों में ही पानी फैल सकता है। इसलिए धैर्य व संयम का साथ कभी ना छोड़ें।
एक अच्छा नायक अपने प्रतिद्वंदियों के सामने अपनी योजनाओं का खुलासा कभी नहीं करता है। योजनाओं की चर्चा करने से पराजय का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अपने दल के अलावा किसी अन्य के साथ महत्वपूर्ण जानकारी न बाटें। साथ ही इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपके दल से भी कोई ऐसा न करे। इसलिए पूरी तरह सचेत रहें।
जब तक कोई काम सफलतापूर्वक पूरा न हो जाए तब तक एक कुशल नायक को हर समय सतर्कता बरतनी चाहिए। इसके साथ ही उसे दल के हर एक सदस्य से सुझाव भी लेना चाहिए। ऐसा करने से कार्य में रचनात्मकता आती है और सफलता के नए अवसर प्राप्त होते हैं।”
यजुर्वेद (अध्याय 36, मंत्र 18) के अनुसार:-

दृते दृंह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् ।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे ।मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ॥
अर्थात’ हे दुःख विनाशक परमेश्वर मुझे बढ़ाइये । मुझको मित्र की दृष्टि से सब प्राणी देखें। मैं मित्र की दृष्टि से सब प्राणियों को देखूं । हम सब मित्र की दृष्टि से देखें।’
इस मंत्र में मित्रता का विस्तार किया गया है। उसको इतनी ऊंचाई दी गई है कि सर्वत्र मित्रता का ही मधुरस टपकता हुआ दिखाई देता है। कितनी पवित्र भावना से प्रार्थना की गई है कि मैं सबको मित्र की भावना से देखूं। सब मुझे मित्र की भावना से देखें और हम सब मिलकर एक दूसरे को मित्र की भावना से देखने वाले बनें। सर्वत्र मित्रता ही मित्रता दिखाई दे। शत्रुता कहीं लेशमात्र के लिए भी न हो। जब इस प्रकार की प्रार्थना हृदय से निकलती है तो प्रत्येक प्रकार का संप्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद ,प्रांतवाद ,भाषावाद भी दुम दबाकर भाग लेता है। क्योंकि मित्रता के विस्तार में उनके लिए कहीं कोई स्थान नहीं होता।

विस्तार कर तू मित्रता का
नाश कर तू शत्रुता का,
मित्रबोध से हृदय भरकर
नवाचार कर तू मित्रता का।।

तू शुद्ध है – तू बुद्ध है
तू निर्मल और निर्विकार है।
तू नवगीत है मित्रता का
इसी का हो रहा संचार है।।

तेरी दिव्यता की साधना में
है मित्रता सहभागिनी।
हृदय बसा तू भाव इसका
है यही प्रेम की अर्धांगिनी।।

जीवन में आगे बढ़ते रहो और मित्रता के विस्तार के लिए प्रेम की सृष्टि करते रहो। प्रेम की ही वृष्टि करते रहो। जीवन में आगे बढ़ने के लिए तुम्हें दूसरों की मित्रता की आवश्यकता है तो दूसरों को तुम्हारी मित्रता की आवश्यकता है। जितनी आवश्यकता आपको है उतनी ही दूसरी ओर से भी आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जब दोनों एक दूसरे के पूरक हैं तो फिर तकरार क्यों ? तकरार कभी आगे नहीं बढ़ने देती, इसलिए तकरार के रास्ते को मत अपनाओ। स्नेह भरी दृष्टि से मित्र खोजते रहो और मित्रों की संख्या बढ़ाते रहो।
मित्रों का उत्साहवर्धन जीवन पथ को सरल कर देता है। जीवन की यात्रा को सुगम कर देता है। जीवन पथ पर तभी आगे बढ़ा जा सकता है जब आपके चारों ओर शांति का परिवेश होगा और शांति का परिवेश होना तभी संभव है जब चारों ओर आपके मित्रों का वास हो। जैसे एक छोटी सी तिल्ली बड़े से बड़े जंगल को जला डालती है वैसे ही हमारे किसी भी प्रकार के प्रमाद के कारण यदि कोई छोटा सा भी शत्रु हमारे आसपास रहता है तो वह भी हमारे लिए कई बार बड़े विषम संकट खड़े कर डालता है। इसीलिए हमारे ऋषियों का चिंतन रहा कि मित्र भाव से ही सबको देखते रहो। हमारी अपनी उन्नति तभी संभव है जब हमारे चारों ओर हमारे मित्रों का वास हो और दूसरों की भी उन्नति तभी संभव है जब उनके भी चारों ओर मित्र वास करते हों।
‘स्वाध्याय और प्रवचन’ नामक पुस्तक के लेखक रामेश्वर शास्त्री सिद्धांत शिरोमणि मुख्याध्यापक गुरुकुल विश्वविद्यालय वृंदावन मथुरा लिखते हैं :-
” वैदिक संस्कृति को प्राय: आर्य संस्कृति या भारतीय संस्कृति के नाम से पुकारते हैं । क्योंकि सर्वप्रथम यहां के ऋषियों ने वेदों के पवित्र ज्ञान को प्राप्त कर और तदनुकूल आचरण करते हुए इस संस्कृति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति का साधन समझा और उसका जनकल्याणार्थ सर्वत्र प्रसार किया। श्रेष्ठ कर्तव्य परायण ,साधु ,सज्जन, सभ्य परमात्मभक्त पुरुषों को आर्य कहते हैं । आर्यों द्वारा सामूहिक रूप में अपनाए जाने से इस संस्कृति को आर्य संस्कृति कहा गया और इस संस्कृति के उपासकों का वैदिक नारा सारे संसार को आर्य बनाओ प्रारंभ से चला आ रहा है। सभी विद्वानों ने ऋग्वेद को सबसे प्राचीन पुस्तक माना है। इसलिए इससे विकसित हुई संस्कृति सबसे प्राचीन और मानव मात्र को पवित्र करने वाली आदि संस्कृति है और निसंदेह ऐसा ही समझना चाहिए।
मनुष्य का विश्लेषण करते हुए हमें ज्ञात होता है कि त्रिविध शरीर युक्त अर्थात कारण , सूक्ष्म और स्थूल शरीर से युक्त जीवात्मा जो मननपूर्वक कार्य करता है, वह मनुष्य है । अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य की श्रेष्ठता मनन के कारण ही है। मनुष्य ज्ञानपूर्वक कार्य करने वाला प्राणी है, जो अपने ज्ञान और कर्मों से अपना सम्यक विकास करके प्रभु के अमूल्य गुणों को अपने में धारण कर स्वयं सुसंस्कृत हो अपना तथा दूसरों का कल्याण कर सकता है।”
जब प्रत्येक कार्य मननपूर्वक किया जाने लगता है तो उसमें आनंद अनुभव होने लगता है। क्योंकि इस प्रकार किया जाने वाला कार्य शुभ और पवित्र मनोयोग के साथ संपन्न होता है। जिसमें सर्व कल्याण की भावना अंतर्निहित होती है। मनुष्य स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ के लिए कार्य करता है। उसके भीतर यह भाव विकसित होने लगता है कि मेरा प्रत्येक कार्य समाज, संसार और राष्ट्र के लिए होना चाहिए । प्राणी मात्र के लिए होना चाहिए। यही भाव मनुष्य को मनुष्य बनाता है और यही भाव मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। यही भाव मित्रता का आधार हो सकता है।
आज हमें राष्ट्र के लिए सोचते हुए अपने बिछुड़े हुए मित्रों की ओर भी देखना चाहिए, जो कभी सनातन का ही एक अटूट अंग हुआ करते थे। परंतु आज अपने आप को इस्लाम या ईसाई मत का अनुयाई मानते हैं। उनको हमने अपने आप से दूर किया और गले लगाना उचित नहीं माना। दूरियां इतनी बढ़ गईं कि इतिहास की उस सच्चाई पर भी लोगों को विश्वास नहीं होता जो हमको बार-बार बताती है कि हम सब एक थे। हमारे पूर्वज एक हैं, हमारा इतिहास एक है, हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक मान्यताएं एक हैं। यहां तक कि हमारा पिता भी एक है। दूरियों के बढ़ जाने के कारण हमारे विरोधियों और शत्रुओं की संख्या बढ़ती चली गई। अब इतिहास के इस भूत से हमें पिंड छुड़ाना चाहिए और अपनी मित्रता को विस्तार देते हुए उनकी घर वापसी का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। वेद ज्ञान केवल आदर्शवाद नहीं है। इसका व्यावहारिक पक्ष लोक कल्याण है। इस लोक कल्याण की साधना करने के लिए मानवतावाद का प्रचार करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब हम अपनी मित्रता को विस्तार देंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य