दुर्गेश्वर राय
असम में एक बार फिर प्रकृति ने अपना विकराल रूप दिखाया है लेकिन अब धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे हैं और जीवन अपनी पुरानी पटरी पर लौटने का कठिन संघर्ष कर रहा है। बाढ़ का प्रकोप अब कम हो रहा है और राज्य में सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या घटकर केवल छह रह गई है, जिनमें शिवसागर, गोलाघाट, चराइदेव, जोरहाट, नागांव और कामरूप महानगरपालिका शामिल हैं। फिर भी, इक्कीस राजस्व सर्किलों के अंतर्गत आने वाले लगभग छह सौ इकतीस गाँवो में चार लाख पैंतालीस हजार से अधिक लोग अभी भी इस जल-प्रलय के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव का सामना कर रहे हैं यद्यपि राज्य के अधिकांश हिस्सों में बाढ़ का पानी कम होने लगा है तथा प्रशासन और अधिकारी प्रभावित क्षेत्रों में राहत तथा पुनर्स्थापन कार्यों में पूरे मनोयोग से जुटे हुए हैं।
शिवसागर जैसे ऐतिहासिक शहर में, जहां दारिका और दिखौ नदियों का पानी अब उतर चुका है, सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। हालांकि शहर के कुछ वार्डों से पानी पूरी तरह नहीं निकला है, फिर भी अधिकांश हिस्सों में बिजली आपूर्ति का बहाल होना एक सकारात्मक और उम्मीद जगाने वाला संकेत है। राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल की मुस्तैदी से आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ प्रभावित लोगों के बीच राहत सामग्री का वितरण निरंतर और पूरी गति से जारी है। इस गंभीर परिस्थिति को संज्ञान में लेते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी असम के सांसदों के साथ उच्च स्तरीय चर्चा की है और केंद्र सरकार की ओर से प्रभावित लोगों की सहायता के लिए राज्य सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने का आश्वासन दिया गया है।
इन बाढ़ों में सिर्फ राहत-बचाव-मुआवजा से कम नहीं चलने वाला है। इस बात पर विचार करने की जरुरत हैं कि आखिर यह जल-प्रलय इतनी तीव्र और विनाशकारी क्यों थी। यह मुख्य रूप से उच्च तीव्रता वाली लगातार बारिश का नतीजा थी, जहां छह सौ पचास मिलीमीटर तक की भारी जलवृष्टि दर्ज की गई। 19 जुलाई के आसपास जब पानी का स्तर अचानक तेजी से बढ़ना शुरू हुआ, तो शिवसागर, चराईदेव और जोरहाट जैसे जिले सबसे पहले इसकी भयानक चपेट में आ गए। इसके पीछे एक बड़ा कारण ऊपरी ब्रह्मपुत्र और उसकी प्रमुख सहायक नदियों में आया अप्रत्याशित उफान था। नागालैंड की नागा पहाड़ियों से निकलकर शिवसागर में मिलने वाली दिखौ नदी हो, या पटकाई बूम से निकलकर ब्रह्मपुत्र में समाहित होने वाली दिसांग नदी, और बराइल पहाड़ियों से बहकर आने वाली धनसिरी नदी, इन सभी ने अपने जलग्रहण क्षेत्रों में हुई मूसलाधार बारिश के कारण विकराल रूप धारण कर लिया। जब ये नदियाँ तेज बहाव युक्त पानी लेकर ब्रह्मपुत्र नदी में मिलने को पहुँची तो बह्मपुत्र का जलस्तर पहले ही काफी बढ़ा था। फिर क्या था इन्होने असम के मैदानी इलाकों को जलमग्न कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप शुरुआती दौर में बारह जिलों के आठ सौ छप्पन गांवों के लगभग दो लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए, पचास हजार से अधिक लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी और 75 से अधिक लोगों को अपनी बहुमूल्य जान गंवानी पड़ी।
नदियां प्राकृतिक रूप से ही उग्र नहीं होतीं। इस विभीषिका के पीछे मानवीय हस्तक्षेप और हमारी व्यवस्थागत त्रुटियों की भूमिका बेहद चिंताजनक रही है। बाढ़ के इन मूल कारणों की गहराई में जाने पर हम पाते हैं कि अंधाधुंध अवैध खनन और वनों की अनियंत्रित कटाई ने इस समस्या को कई गुना अधिक भयंकर बना दिया है। जंगल और पेड़ प्राकृतिक रूप से वर्षा के पानी को सोखने और उसके तेज बहाव को धीमा करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं, लेकिन जिस निर्ममता से इन हरे आवरणों को नष्ट किया गया है, उसने पहाड़ों और मैदानी इलाकों की इस प्राकृतिक रक्षा ढाल को बेहद कमजोर कर दिया है। इसके समानांतर, नदियों के किनारों और उनके बेसिन क्षेत्रों में होने वाले बेतहाशा अवैध खनन से भारी मात्रा में मिट्टी का कटाव हुआ है। यह कटी हुई मिट्टी और गाद बहकर नदियों के तल में जमा हो गई है, जिससे नदियां लगातार उथली होती जा रही हैं। जब नदियों की गहराई और उनकी जल धारण क्षमता कम हो जाती है, तो थोड़ी सी भी अतिरिक्त बारिश होने पर पानी किनारों को तोड़कर आसपास की बस्तियों और खेतों में घुस जाता है। यह स्थिति इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि हमारे पारिस्थितिक तंत्र के साथ किए गए निरंतर और अमानवीय खिलवाड़ का एक दुखद परिणाम है।
जलभराव की इस विशाल त्रासदी ने कई ऐसी गंभीर चिंताओं को जन्म दिया है, जो केवल नदियों का पानी उतरने के साथ खत्म नहीं होने वाली हैं। सबसे बड़ी और तात्कालिक चुनौती प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँच की रही है, जिसके कारण कई दुर्गम स्थानों पर राहत कार्यों में अवांछित देरी का सामना करना पड़ा। जब संपर्क मार्ग, सड़कें और पुल पानी में डूब जाते हैं या टूट जाते हैं, तो अंतिम व्यक्ति तक मदद पहुंचाना प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ी और जटिल परीक्षा बन जाती है। इसके अलावा, बाढ़ का पानी कम होने के बाद प्रभावित इलाकों में महामारियों और जलजनित बीमारियों के फैलने का खतरा काफी बढ़ जाता है, जिससे आम जनमानस के स्वास्थ्य की सुरक्षा एक प्रमुख चिंता बनकर उभरती है। प्रभावित परिवारों, विशेषकर बच्चों और महिलाओं में कुपोषण की आशंका भी एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों की खेती और घरों में रखे खाद्य भंडार पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। इन सभी जमीनी चुनौतियों के बीच, नीतिगत विफलताओं पर भी एक ईमानदार विमर्श आवश्यक हो जाता है कि आखिर दशकों से हर साल आने वाली इस आपदा के स्थायी समाधान के लिए हम एक सुदृढ़, वैज्ञानिक और दूरदर्शी नीति का निर्माण करने में क्यों पीछे रह जाते हैं।
इस समस्या से मुक्ति पाने और राज्य के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए अब हमें केवल तात्कालिक राहत उपायों से आगे बढ़कर दीर्घकालीन और ठोस कदम उठाने की नितांत आवश्यकता है। इसके लिए सबसे पहली और अनिवार्य शर्त वृहद रूप से वनीकरण अभियान चलाने की है। नदियों के नाजुक पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए हर प्रकार के अवैध खनन पर पूर्ण और अत्यंत सख्त रोक लगानी होगी। इसके साथ ही, नदियों के पुनरुद्धार की व्यापक और वैज्ञानिक योजनाएं बनानी होंगी, जिनमें उनकी गाद निकालने और उनके प्राकृतिक प्रवाह को अतिक्रमण से मुक्त करने पर विशेष जोर दिया जाए। नदी के ऊपरी क्षेत्रों में स्थापित विभिन्न जल-विद्युत परियोजनाओं और बांधों का समुचित प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है, ताकि मानसून के दौरान पानी छोड़े जाने की प्रक्रिया नियंत्रित हो और निचले इलाकों में अचानक बाढ़ का खतरा न मंडराए।
हमें दीर्घकालीन शहरी नियोजन की दिशा में गंभीरता से विचार करना होगा, जहां बस्तियों, सड़कों और बुनियादी ढांचे का निर्माण नदियों के प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्रों का सम्मान करते हुए किया जाए। इन सभी बहुआयामी और समग्र दृष्टिकोणों को अपनाकर ही हम असम को इस वार्षिक जल-त्रासदी के दुष्चक्र से बाहर निकाल सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित तथा आनंदमयी कल की मजबूत नींव रख सकते हैं।