समाज

भीड़ नियंत्रण की संवैधानिक कसौटी

कुमार कृष्णन

लोकतंत्र की शक्ति उसकी राज्यसत्ता में नहीं बल्कि असहमति को स्वीकार करने की क्षमता में निहित होती है। चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था को वैधता अवश्य देते हैं, किंतु उसकी वास्तविक परिपक्वता इस बात से मापी जाती है कि वह विरोध, प्रतिरोध और नागरिक असहमति के साथ कैसा व्यवहार करता है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में धरना, प्रदर्शन, रैली और जनसभा केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होते; वे नागरिकों और राज्य के बीच संवाद के संवैधानिक माध्यम हैं। इसलिए जब किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए राज्य बल प्रयोग करता है, तब प्रश्न केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और संविधान की आत्मा से जुड़ जाता है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित “चलो संसद” प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के कथित उपयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका ने इसी मूल प्रश्न को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी और खुफिया ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक यशोवर्धन आजाद सहित याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शनकारियों पर बिना पर्याप्त चेतावनी ऐसे प्रक्षेपास्त्रों का प्रयोग किया गया जिससे अनेक लोग घायल हुए। याचिका में नागरिक प्रदर्शनों के दौरान धातुयुक्त पैलेट के प्रयोग पर रोक, घायलों के उपचार, पुनर्वास और मुआवजे की मांग की गई है।

दूसरी ओर, रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ.) ने इन आरोपों का सार्वजनिक रूप से खंडन करते हुए कहा है कि भीड़ नियंत्रण के लिए केवल स्वीकृत गैर-घातक साधनों का उपयोग किया गया। इन परस्पर विरोधी दावों के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने न तो किसी पक्ष को दोषी ठहराया है और न ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी दिखाई है। न्यायालय ने केवल केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है तथा उपलब्ध अभिलेखों और प्रयुक्त सामग्री को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। यही संवैधानिक न्यायशास्त्र की पहचान है—निर्णय आरोपों या जनभावना से नहीं, बल्कि साक्ष्य और विधि के आधार पर दिए जाते हैं।

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सर्वोच्च न्यायालय वस्तुतः केवल एक उपकरण की वैधता पर विचार नहीं कर रहा बल्कि उस व्यापक संवैधानिक प्रश्न पर भी विचार कर रहा है कि लोकतांत्रिक राज्य अपने नागरिकों के साथ बल प्रयोग की सीमा कहाँ तक निर्धारित कर सकता है। यह प्रश्न नया नहीं है। भारतीय संविधान की रचना के समय से ही यह स्वीकार किया गया था कि राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार होगा किंतु यह अधिकार निरंकुश नहीं होगा।संविधान ने शक्ति और स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लोकतांत्रिक शासन का मूल सिद्धांत बनाया है।

  अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक और निःशस्त्र सभा करने का अधिकार सुनिश्चित करता है। इन अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, परंतु वे प्रतिबंध राज्य की सुविधा से नहीं, बल्कि संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं से संचालित होते हैं। इसका अर्थ यह है कि राज्य कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं कर सकता। लोकतंत्र में व्यवस्था की रक्षा और स्वतंत्रता की सुरक्षा—दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।

  यही कारण है कि आधुनिक लोकतंत्रों में भीड़ नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत ‘न्यूनतम आवश्यक बल’ माना जाता है। इसका आशय यह है कि राज्य केवल उतनी ही शक्ति का प्रयोग करे, जितनी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अपरिहार्य हो। यदि संवाद, चेतावनी, मध्यस्थता या अन्य कम जोखिम वाले उपाय उपलब्ध हों, तो अधिक हानिकारक साधनों का प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए। बल प्रयोग का औचित्य उसकी मात्रा से नहीं, बल्कि उसकी आवश्यकता, अनुपातिकता और जवाबदेही से तय होता है।

 पूर्व पुलिस आयुक्त किरण बेदी की यह टिप्पणी इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है कि प्रत्येक विरोध प्रदर्शन का उत्तर बल प्रयोग नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक पुलिसिंग का आधार संवाद, विश्वास और मध्यस्थता होना चाहिए। यदि किसी स्थिति में बल प्रयोग अपरिहार्य हो भी जाए, तो उसका प्रत्येक चरण स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया के अधीन होना चाहिए और बाद में उसकी स्वतंत्र समीक्षा भी संभव होनी चाहिए। आधुनिक पुलिस व्यवस्था की विश्वसनीयता उसकी कठोरता से नहीं, बल्कि उसके संयम से बनती है।

पैलेट गन को मूलतः अपेक्षाकृत कम घातक भीड़ नियंत्रण उपकरण के रूप में विकसित किया गया था। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की जान लेना नहीं, बल्कि हिंसक भीड़ को तितर-बितर करना है। किंतु किसी भी सुरक्षा उपकरण की स्वीकार्यता उसके घोषित उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक प्रभाव से निर्धारित होती है। यदि उसके प्रयोग से स्थायी दृष्टिहानि, गंभीर शारीरिक विकलांगता या अपूरणीय स्वास्थ्य क्षति की आशंका बनी रहती हो, तो उसे केवल “कम घातक” कह देना पर्याप्त नहीं हो सकता।

 भारत में इस विषय पर सबसे गंभीर बहस जम्मू-कश्मीर में पैलेट गन के व्यापक उपयोग के बाद सामने आई थी। अनेक लोगों की आंखों की रोशनी चली गई, बड़ी संख्या में नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए और चिकित्सकों ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा मानवाधिकार—दोनों की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय बताया। उसी अनुभव की पृष्ठभूमि में जंतर-मंतर की घटना ने यह प्रश्न पुनः खड़ा किया है कि क्या ऐसा उपकरण, जिसकी दिशा और प्रभाव पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता, नागरिक प्रदर्शनों में स्वीकार्य भीड़ नियंत्रण साधन माना जा सकता है।

 याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पैलेट गन की सबसे बड़ी तकनीकी सीमा उसकी अनिश्चितता है। ट्रिगर दबते ही अनेक धातु कण अलग-अलग दिशाओं में फैल जाते हैं, जिससे यह सुनिश्चित करना लगभग असंभव हो जाता है कि वे किस व्यक्ति को, शरीर के किस हिस्से पर और कितनी तीव्रता से चोट पहुँचाएँगे। ऐसी स्थिति में केवल प्रदर्शनकारी ही नहीं बल्कि पत्रकार, राहगीर और अन्य निर्दोष नागरिक भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। यदि ऐसा है, तो प्रश्न केवल एक हथियार का नहीं, बल्कि राज्य द्वारा अपनाई गई भीड़ नियंत्रण नीति की संवैधानिक वैधता का बन जाता है।

 दरअसल, लोकतंत्र का संकट तब नहीं पैदा होता जब नागरिक विरोध करते हैं; संकट तब पैदा होता है जब राज्य विरोध को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने लगता है। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवनशक्ति है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक शासन की पहली प्रतिक्रिया संवाद होनी चाहिए, दमन नहीं; संवैधानिक धैर्य होना चाहिए, शक्ति का प्रदर्शन नहीं। यही वह कसौटी है जिस पर जंतर-मंतर का विवाद भारतीय लोकतंत्र और उसकी पुलिस व्यवस्था—दोनों को परखने का अवसर प्रदान करता है।

 चिकित्सकीय विशेषज्ञ लंबे समय से पैलेट गन जैसे उपकरणों के जोखिम की ओर ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञों और ट्रॉमा सर्जनों का अनुभव बताता है कि निकट दूरी से छोड़े गए पैलेट आंखों, मस्तिष्क, रीढ़ और प्रमुख रक्त वाहिकाओं को अपूरणीय क्षति पहुँचा सकते हैं। अनेक मामलों में यह क्षति जीवनभर की विकलांगता का कारण बनती है। इसलिए चिकित्सा समुदाय का आग्रह रहा है कि यदि ऐसे उपकरणों का प्रयोग कभी अपरिहार्य हो भी, तो उसके लिए अत्यंत कठोर मानक संचालन प्रक्रिया, विशेष प्रशिक्षण और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। लोकतांत्रिक शासन में किसी भी सुरक्षा उपाय की सफलता केवल भीड़ को नियंत्रित करने से नहीं, बल्कि नागरिक जीवन और गरिमा की रक्षा से भी मापी जाती है।

 यही दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों में भी दिखाई देता है। संयुक्त राष्ट्र के बेसिक प्रिंसिपल्स ऑन द यूज़ ऑफ फोर्स एंड फायरआर्म्स बाय लॉ एनफोर्समेंट ऑफिशियल्स स्पष्ट करते हैं कि बल प्रयोग वैधता, आवश्यकता, अनुपातिकता, सावधानी और जवाबदेही के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। किसी भी स्थिति में कम हानिकारक विकल्प उपलब्ध होने पर अधिक जोखिम वाले साधनों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। बल का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि न्यूनतम क्षति के साथ सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करना होना चाहिए। यही सिद्धांत लोकतांत्रिक पुलिसिंग को दमनकारी पुलिस व्यवस्था से अलग पहचान देते हैं।

 विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों ने पिछले दो दशकों में भीड़ प्रबंधन की अपनी रणनीति में उल्लेखनीय परिवर्तन किए हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा और कई यूरोपीय देशों में पुलिस की पहली जिम्मेदारी भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि तनाव को कम करना मानी जाती है। प्रदर्शन से पहले आयोजकों के साथ संवाद, प्रशिक्षित वार्ताकारों की नियुक्ति, चरणबद्ध चेतावनी, जोखिम का वैज्ञानिक आकलन, बॉडी कैमरों और वीडियो रिकॉर्डिंग का उपयोग तथा प्रत्येक कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा वहाँ की पुलिस व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। इन देशों में पुलिस की सफलता इस बात से नहीं आँकी जाती कि उसने कितनी तेजी से भीड़ हटाई, बल्कि इस बात से कि उसने नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हुए कानून-व्यवस्था कैसे बनाए रखी।

 भारत के संदर्भ में यह बहस पुलिस सुधार के लंबे समय से लंबित प्रश्न से भी जुड़ती है। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) के ऐतिहासिक निर्णय में पुलिस को अधिक पेशेवर, जवाबदेह और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त बनाने के लिए कई संस्थागत सुधारों का निर्देश दिया था। राज्य सुरक्षा आयोगों की स्थापना, पुलिस स्थापना बोर्ड, निश्चित कार्यकाल और शिकायत प्राधिकरण जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य पुलिस को केवल शासन का औजार नहीं, बल्कि संविधान के प्रति उत्तरदायी संस्था बनाना था। दुर्भाग्य से अधिकांश राज्यों में इन सुधारों का पूर्ण क्रियान्वयन आज भी अधूरा है। परिणामस्वरूप मानवाधिकार-आधारित पुलिसिंग और आधुनिक भीड़ प्रबंधन की संस्कृति अपेक्षित स्तर तक विकसित नहीं हो सकी है।

 हालाँकि इस बहस का दूसरा पक्ष भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। पुलिस और अर्धसैनिक बल अनेक बार अत्यंत तनावपूर्ण परिस्थितियों में कार्य करते हैं। उन्हें हिंसक भीड़, पथराव, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति के विनाश और अपने ऊपर होने वाले हमलों का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेना सरल नहीं होता। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक विमर्श को सुरक्षा बलों की वास्तविक चुनौतियों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। आवश्यकता पुलिस की शक्तियाँ घटाने की नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, मनोवैज्ञानिक तैयारी और स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रियाएँ उपलब्ध कराने की है। लोकतंत्र में प्रभावी पुलिसिंग और नागरिक स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक मूल्य हैं।

 इस पूरे घटनाक्रम में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। न्यायालय ने न तो किसी पक्ष के आरोपों को अंतिम सत्य माना है और न ही सुरक्षा एजेंसियों के दावों को अंतिम निष्कर्ष। उसने केवल इतना सुनिश्चित किया है कि कथित रूप से प्रयुक्त सामग्री, उपलब्ध रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्य सुरक्षित रहें तथा न्यायिक परीक्षण निष्पक्ष ढंग से हो सके। यही विधि के शासन का सार है। लोकतंत्र में निर्णय राजनीतिक आग्रहों या भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और संवैधानिक कसौटियों से दिए जाते हैं।

 रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा धातुयुक्त पैलेट के उपयोग से इनकार और याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों के बीच सत्य का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया ही करेगी। यदि सुरक्षा बलों ने निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया का पालन किया है, तो निष्पक्ष जांच वही स्थापित करेगी। यदि कहीं प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता इसी में है कि जवाबदेही भी सुनिश्चित हो। कानून का शासन किसी एक पक्ष के समर्थन का नहीं, बल्कि निष्पक्ष परीक्षण का नाम है।

 यह पूरा विवाद एक व्यापक सुधार की आवश्यकता की ओर संकेत करता है। भारत को भीड़ नियंत्रण की अपनी नीति और मानक संचालन प्रक्रियाओं की समग्र समीक्षा करनी चाहिए। संवाद-आधारित पुलिसिंग, प्रशिक्षित वार्ताकारों की व्यवस्था, चरणबद्ध चेतावनी, सुरक्षित निकासी मार्ग, बॉडी कैमरों का अनिवार्य उपयोग, प्रत्येक कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग तथा स्वतंत्र पर्यवेक्षण जैसी व्यवस्थाओं को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए। इससे न केवल पुलिस की कार्यवाही अधिक पारदर्शी होगी, बल्कि अनावश्यक विवादों और अविश्वास में भी कमी आएगी।

 इसके समानांतर नागरिक समाज और प्रदर्शनकारी समूहों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति का विनाश और सुरक्षा बलों पर हमला किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करते हैं। अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। संविधान नागरिकों और राज्य—दोनों से संयम और संवेदनशीलता की अपेक्षा करता है।

दरअसल, जंतर-मंतर का विवाद केवल पैलेट गन के कथित उपयोग का विवाद नहीं है। यह उस मूल प्रश्न का प्रतीक है कि भारत अपनी लोकतांत्रिक यात्रा को किस दिशा में ले जाना चाहता है। क्या राज्य असहमति को सुरक्षा की समस्या मानकर उसका उत्तर मुख्यतः बल प्रयोग में खोजेगा, या उसे लोकतांत्रिक संवाद का स्वाभाविक अंग मानकर अधिक संवेदनशील और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाएगा? यह प्रश्न किसी एक सरकार या एक घटना से कहीं बड़ा है। इसका संबंध भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत परिपक्वता से है।

 इतिहास बताता है कि लोकतंत्र की स्थिरता केवल शक्तिशाली राज्य से नहीं, बल्कि विश्वसनीय संस्थाओं से बनती है। नागरिक तब तक कानून का सम्मान करते हैं, जब तक उन्हें विश्वास रहता है कि राज्य भी संविधान की सीमाओं के भीतर कार्य कर रहा है। पुलिस की वर्दी कानून की शक्ति का प्रतीक अवश्य है, लेकिन उसकी नैतिक वैधता नागरिकों के विश्वास से ही आती है। वही विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूँजी है।

अंततः, सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन यह मामला केवल एक याचिका का निर्णय नहीं होगा। यह भविष्य में भीड़ नियंत्रण, पुलिस जवाबदेही और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन के संबंध में महत्त्वपूर्ण संवैधानिक मानदंड स्थापित कर सकता है। इससे भी अधिक आवश्यक यह है कि भारत इस अवसर को व्यापक पुलिस सुधार और लोकतांत्रिक प्रशासन की पुनर्समीक्षा के रूप में देखे। औपनिवेशिक पुलिसिंग की विरासत से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसकी पहली प्रवृत्ति बल प्रयोग नहीं, बल्कि संवाद; दमन नहीं, बल्कि संयम; और नियंत्रण नहीं, बल्कि संवैधानिक उत्तरदायित्व हो।

 लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात से नहीं आँकी जाती कि राज्य विरोध को कितनी कठोरता से नियंत्रित कर सकता है, बल्कि इससे कि वह असहमति के बीच भी नागरिक गरिमा, कानून के शासन और संविधान के मूल्यों की रक्षा कितनी निष्पक्षता, पारदर्शिता और धैर्य के साथ करता है। किसी भी गणराज्य की प्रतिष्ठा उसके शस्त्रागार से नहीं, बल्कि उसकी संवैधानिक संस्कृति से निर्मित होती है। जंतर-मंतर का यह विवाद अंततः उसी संस्कृति की परीक्षा है—और शायद भारतीय लोकतंत्र की भी।