लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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-डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री-   Sonia-Gandhi-and-Manmohan-Singh

नए वर्ष के प्रारंभ में ही 3 जनवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिल्ली में एक प्रेस-वार्ता आयोजित की थी, अपने दस साल के प्रधानमंत्री काल में शायद यह उनकी तीसरी प्रेस वार्ता थी। जैसे कि उन्होंने संकेत दिए हैं, शायद यह प्रधानमंत्री के नाते उनकी अंतिम  प्रेस वार्ता भी थी। इस प्रेस वार्ता में जान-बूझकर या फिर चूक से उन्होंने एक ऐसा रहस्योद्घाटन किया, जो सबको चौंकाने वाला था। प्रधानमंत्री के अनुसार, जिन दिनों परवेज मुर्शरफ पाकिस्तान में सत्ताधारी थे, उन दिनों भारत सरकार का जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के साथ लगभग एक समाधान पर सहमति बन भी गई थी। मनमोहन सिंह की वाणी से लगता था कि उनको इस बात का गहरा दुख था कि पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन हो गया और जम्मू-कश्मीर पर सहमति भी खटाई में पड़ गई। सरकार को पाकिस्तान के साथ या किसी भी दूसरे देश के साथ देश के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए बातचीत करने का अधिकार है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। कई बार महत्वपूर्ण विषय पर दोनों देशों की सरकारें ऐसी बातचीत प्राय: पर्दे के पीछे भी करती है। इस प्रकार की कूटनीति का भी विश्व भर में सामान्य प्रचलन है, लेकिन जम्मू-कश्मीर का प्रश्न केवल देश के राजकीय हितों से ही नहीं जुड़ा है बल्कि उसका संबंध देश की भौगोलिक अखंडता से भी है। भारत के राष्ट्रीय हितों और भारत की भौगोलिक अखंडता के महीन अंतर को सत्ता चला रही पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी न भी समझती हों, मनमोहन सिंह तो अच्छी तरह जानते ही होंगे। क्योंकि वे स्वयं भारत की अखंडता के खंडित हो जाने के राजनैतिक हादसे का शिकार हो चुके हैं। इसलिए भौगोलिक अखंडता का क्या महत्व है, इसे उनसे ज्यादा और कौन जान सकता है। इस पृष्ठभूमि में यह लाजमी हो जाता है कि जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को लेकर जब भारत सरकार किसी दूसरे देश से बात करती है, तो वह देश के तमाम लोगों और राजनैतिक दलों को विश्वास में लें, क्योंकि देश के अखंडता का प्रश्न दलीय प्रश्न नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय प्रश्न है। इस प्रश्न पर भारत की संसद पहले ही एक सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा भारत की स्थिति को स्पष्ट कर चुकी है। इस प्रस्ताव के अनुसार जम्मू-कश्मीर के जिस भाग पर 1947 के युद्ध में पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था, वह सारा क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि इस मुद्दे पर पाकिस्तान से कोई बात होती है तो इस विषय पर हो सकती है कि अवैध रूप से कब्जाए गए इस क्षेत्र को पाकिस्तान कब और कैसे खाली करेगा? पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर का जो हिस्सा कब्जे में किया गया है, उसमें गिलगित, कारगिल तहसील को छोड़कर बाल्तिस्तान, पंजाबी भाषी मुज्जफर्राबाद  और जम्मू संभाग के दो जिलें मीरपुर और पूंछ शामिल है। मनमोहन सिंह की सरकार ने परवेज मुर्शरफ की सरकार के साथ क्या इन इलाकों को वापस लेने के लिए बातचीत की थी, जिसके बारे में स्वयं मनमोहन सिंह का कहना है कि लगभग सहमति बन गई थी।

इस बात पर तो शायद मनमोहन सिंह के समर्थक भी विश्वास नहीं करेंगे कि उन्होंने परवेज मुर्शरफ को वे इलाके वापस करने के लिए तैयार कर लिया था। तब आखिर ऐसा कौन सा समाधान था, जिस पर भारत सरकार और पाकिस्तान सरकार दोनों ही तैयार थे। मनमोहन सिंह इसको अंगेजी में ‘ब्रेक थ्रू’ कह रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं अरसा पहले डिक्शन ने जो सुझाव दिया था और जिसे उस समय भी तुरंत अस्वीकार कर दिया गया था। उसे सोनिया गांधी की सरकार स्वीकार करने का वातावरण बना रही है? इस सुझाव के अनुसार पाकिस्तान के कब्जे में जो क्षेत्र हैं, उसे तो बिना किसी रूकावट के उसी के पास रहने दिया जाए, लेकिन कश्मीर घाटी में जनमत संग्रह करवा लिया जाए। इसकी आशंका इसलिए बढ़ती जा रही है क्योंकि प्रधानमंत्री की प्रेस-कॉन्फ्रेंस के बाद सोनिया कांग्रेस के साथ मिलकर दिल्ली में सरकार चला रही ‘आप’ पार्टी के एक प्रमुख नेता प्रशांत भूषण ने कहा है कि उनकी सरकार यदि सत्ता में आती है तो कश्मीर में जनमत संग्रह करवाएगी। अब इतना तो स्पष्ट है कि दिल्ली में ‘आप’ पार्टी खुद अपने बलबूते तो सत्ता में आई ही नहीं, लेकिन यदि देश में सोनिया-कांग्रेस को अन्य दलों के साथ, जिनमें आप पार्टी भी होगी, मिलकर सरकार बनाने का मौका मिलता है तो वह कश्मीर में जनमत संग्रह करवा सकती है।

प्रशांत भूषण इससे पहले भी कह चुके हैं की कश्मीर पाकिस्तान को दिया जा सकता है। ‘आप’ और सोनिया कांग्रेस ने फिलहाल जो खिचड़ी पक रही है, उसे देखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जम्मू-कश्मीर को लेकर किया गया खुलासा और प्रशांत भूषण का अचानक इस प्रश्न को लेकर सक्रिय हो जाना संदेह उत्पन्न करता है।

इसलिए यह जरूरी है कि सोनिया-कांग्रेस इस प्रश्न पर पूरे देश को विश्वास में लें और परवेज मुर्शरफ के साथ जो बातचीत सरकार की हुई थी, उसका खुलासा करे। यह खुलासा करने में अब कोई नुकसान होने की संभावना भी नहीं है, क्योंकि प्रधानमंत्री खुद ही कह चुके हैं कि पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद वह समाधान खटाई में पड़ चुका है। आखिर देश को भी पता चलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर को लेकर सोनिया-कांग्रेस पाकिस्तान के साथ क्या खिचड़ी पका रही है। सोनिया कांग्रेस के ही एक और सहयोगी नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला कुछ अरसा पहले ही यह कहने लगे हैं कि राज्य का भारत में मर्जर नहीं हुआ है। उमर अब्दुला, मनमोहन सिंह और प्रशांत भूषण इन तीनों के बयानों का यदि एक साथ अध्ययन किया जाए तो शंका पैदा होती है कि कहीं जाते जाते सोनिया कांग्रेस जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान के साथ सौदा तो नहीं कर रही?

One Response to “क्या कश्मीर को लेकर सोनिया-कांग्रेस ने कोई सौदा किया था ?”

  1. DR.S.H.SHARMA

    The Indian National Congress and its leaders like M.K.Gandhi and Jawaharlal Nehru and other congress leaders have failed to secure the territorial integrity and sovereignty of India which resulted in partition /mutilation of the country on 14 Aug 1947 and after that J.L.Nehru lost the northern part of J and K which had joined India according to the act of partition, Int he war in 1947-48 Nehru declared cease fire and this part of India became P.OK. .
    After this in 1962 Nehru gave area of Berubari ,West Bengal to join then East Pakistan now Bangladesh.
    Lal Bahadur Shastri agreed for tribunal and part of J and K and Runn of Kaccha , Gujarat was given to West Pakistan now Pakistan.
    Indira Gandhi gave the Island of KACCHATIBU to Srilanka.
    Later in 1993 Narsimha Rao gave some more part of West Bengal to Bangladesh.
    Now what Sonia and Sardar M.M.Singh had planned to give away more part of Kashmir or whole of J and K we do not know but this must be found out by the opposition leaders.
    I must mention here that even Tibet was lost to CHINA by Nehru under the slogan of HINDI CHINI BHAI BHAI.
    ON Nehru’s birth day on 14 Nov. 1960 Chinease govt. handed over ten bodies of Indian soldiers. on Laddakh China border but Nehru failed to understand the neighbours.
    Nehru was a disaster as a P.M. for India.
    I ask the learned readers to add if I have missed some details of territory lost by Congress leaders so far.
    I warn on behalf of all the people that no more territory loss will be tolerated any
    more.
    Time has come for the end of Congress party with such record and corruptions since 1947 by the policy of divide and rule and destroy the country.

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