लेखक परिचय

संजीव कुमार सिन्‍हा

संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

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-संजीव कुमार सिन्हा

इन दिनों देश के कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव हो रहे हैं। लेकिन अभी भी अधिकांश विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनावों पर रोक लगी है। ‘शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ के चुनाव होने चाहिए या नहीं’ यह बहस बहुत पुरानी है और आज भी इस पर जोरदार बहस चलती रहती है।

हम गर्व के साथ कहते हैं कि भारत को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त है लेकिन लोकतंत्र की पहली सीढ़ी को ही हम बाधित करने पर तुले हुए हैं। इसमें कोई दोमत नहीं कि छात्र संघ लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करता है क्योंकि इससे जनता का राजनीतिक प्रशिक्षण सुनिश्चित होता है और नेतृत्व क्षमता विकसित होती है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज देश के करीब तीन सौ विश्वविद्यालयों और पन्द्रह हजार कॉलेजों में से 80 फीसदी विश्वविद्यालयों में छात्र संघ नहीं है। अनेक राज्यों ने छात्रसंघों के चुनाव पर प्रतिबंध लगा दिए है। यह छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार पर हमला है। यह अपने आप में विरोधाभासी प्रतीत होता है कि एक तरफ तो आप 18 वर्ष की उम्र के छात्र-युवकों को जन-प्रतिनिधि चुनने हेतु वोट देने का अधिकार देते हैं और वहीं दूसरी ओर छात्र संघ चुनाव पर रोक लगा दी जाती हैं। यह कहां का न्याय है कि देश का छात्र संसद और लोकसभा के लिए जन-प्रतिनिधि चुन सकता है लेकिन अपने कॉलेज में छात्र-प्रतिनिधि नहीं चुन सकता।

छात्र संघ चुनाव के विरोध में सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से आरोप लगाए जाते हैं कि इसमें धनबल और बाहुबल का बोलबाला हो गया है तथा इससे पढ़ाई का माहौल दूषित होता है। यहां प्रश्न उठता है कि बिहार में लगभग पच्चीस वर्षों से छात्र संघ चुनाव नहीं हुए तो क्या यहां के परिसर हिंसामुक्त हो गए और दिल्ली विश्वविद्यालय जहां प्रतिवर्ष छात्र संघ चुनाव होते हैं, वहां की शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई? बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पिछले पन्द्रह सालों से प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव पर रोक लगी है। सर्वोच्च न्यायालय ने छात्र संघ चुनाव में सुधार को लेकर लिंग्दोह समिति का गठन किया था, जिसकी सिफारिशें छात्र संघ चुनाव के लिए अनिवार्य हो गई है। इस समिति के मुताबिक एक प्रत्याशी केवल पांच हजार रुपए ही खर्च कर सकता है, वह दुबारा चुनाव नहीं लड़ सकता, उसकी उम्र 25 वर्ष तक होनी चाहिए, यदि शोध छात्र हों तो 28 वर्ष तक, मुद्रित पोस्टर पर रोक लगे, इत्यादि। ध्यान से देखें तो इस समिति की सिफारिशें अव्यावहारिक ही नजर आती है। जेएनयू एक कॉम्पैक्ट कैम्पस है इसलिए वहां पांच हजार रुपए में प्रचार हो सकता है लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय, जिसके छात्र संघ से संबंधित 51 कॉलेज दिल्ली भर में फैले हैं, क्या महज पांच हजार रुपए में सप्ताह भर में प्रचार हो सकते हैं? लिंग्दोह की सिफारिश की विडंबना देखिए कि लगभग चार दशकों तक नियमित रूप से संपन्न हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र संघ चुनाव, जहां समूचे चुनाव का प्रबंधन छात्रों के हाथों में ही होता है और जिसे आदर्श छात्र संघ माना जाता है, इस समिति की सिफारिशों के चलते ही स्थगित है। जेएनयू मूलत: एक शोध संस्थान है। वहां जेनुइन छात्र ही प्रवेश लेते हैं लेकिन 28 वर्ष की उम्र सीमा का बैरियर लगाकर क्यों छात्रों को लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है?

भारत में छात्र आंदोलनों का एक गौरवमयी इतिहास है। छात्रों ने हमेशा समाज-परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गौरतलब है कि स्वतंत्रता आन्दोलन में छात्रों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। महात्मा गांधी के आह्वान पर लाखों छात्रों ने अपने कैरियर को दांव पर लगाते हुए स्कूल और कॉलेजों का बहिष्कार किया। वर्ष 1973 में गुजरात विश्वविद्यालय में मेस खर्च की राशि बढ़ाए जाने के विरोध में छात्र आंदोलन हुआ और अगले साल 1974 में बिहार में शुल्क वृद्धि के खिलाफ छात्रों ने आंदोलन प्रारंभ किया। बाद में यह राष्ट्रीयव्यापी आंदोलन हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गए आपातकाल को इसी आंदोलन के बूते चुनौती दी गई और व्यवस्था परिवर्तन साकार हुआ। केन्द्र में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। गौरतलब है कि छात्र संघ से निकले अनेक नेता राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में अन्य की अपेक्षा अच्छी भूमिका निभा रहे हैं-अरुण जेटली, सुशील कुमार मोदी, रविशंकर प्रसाद, विजय गोयल, शरद यादव, नितीश कुमार, प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, अजय माकन आदि। असम में छात्र आंदोलन से निकले लोगों ने ही सरकार चलाई। छात्र नेता प्रफुल्ल महंत मुख्यमंत्री बने। नब्बे के दशक के प्रारंभ में मंडल आयोग की सिफारिशों के विरोध में छात्रों ने आरक्षण विरोधी आंदोलन को परवान चढ़ाया। लेकिन कैम्पसों में सक्रिय देश के प्रमुख छात्र संगठनों ने आरक्षण का समर्थन कर देश को झुलसने से बचा लिया। सन् 1988 में बोफोर्स कांड को लेकर भ्रष्टाचार के विरोध में देश भर में छात्र संगठनों द्वारा संघर्ष चलाया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की पहल पर विश्वनाथ प्रताप सिंह की विशाल आम सभा दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई। नब्बे के दशक में शिक्षा के व्यावसायीकरण के विरोध में छात्रों ने कैम्पसों में अभियान चलाया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में निजीकरण के खिलाफ सशक्त आंदोलन खड़ा हुआ। इस सदी के प्रारंभ में सन् 2002 में शिक्षा और रोजगार के सवाल को लेकर विद्यार्थी परिषद् के बैनर तले 75,000 छात्रों ने संसद के सामने दस्तक दी।

आज विश्वविद्यालयों में शिक्षा का व्यावसायीकरण जोरों पर है। शुल्क में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। शिक्षा के मंदिर दुकान में तब्दील हो गए हैं। अयोग्य छात्र भी पैसे के बूते डिग्रियां खरीद रहा है जबकि प्रतिभाशाली छात्र पैसे के अभाव में उच्च शिक्षा से वंचित हो रहा है। वास्तव में, शिक्षा आम आदमी की पहुंच से दूर हो गया है। प्रतिभाशाली छात्र असमानता का शिकार हो रहा है। शिक्षण संस्थानों का उद्देश्य शैक्षिक गुणवत्ता के बजाय धन कमाना हो गया है। सवाल है कि ऐसी परिस्थितियों में विश्वविद्यालय प्रशासन की मनमानी के खिलाफ कौन आवाज बुलंद करेगा? एक आम छात्र के हक के लिए कौन सामने आएगा? जाहिर है छात्रों को ही अपने अधिकार के लिए एकजुट होना होगा।

आज जब समाज-जीवन और राष्ट्रीय राजनीति में भी विकृतियां दिखाई दे रही है तो उसका प्रतिबिम्ब छात्र राजनीति पर भी पड़ना स्वाभाविक है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि कई शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ चुनाव में अपराधीकरण की प्रवृति व्याप्त है। यह सचमुच चिंता का विषय है लेकिन रोग को दूर करने के बजाए रोगी को मारना, यह कैसा न्याय है? यहां सवाल उठता है कि क्या लोकसभा और विधानसभा चुनाव में हिंसा नहीं होती? तो फिर छात्र संघ चुनाव पर ही क्यों रोक लगाए जाते हैं? कारण साफ है कि छात्र समुदाय स्वभाव से ही सत्ता और व्यवस्था विरोधी होता है। यदि छात्र एकजुट हो गए तो सरकार और प्रशासन की मनमानी कैसे चलेगी?

15 Responses to “मजबूत लोकतंत्र के लिए छात्र संघ जरूरी”

  1. CHANCHAL Kumar

    The so called politician of #Bihar afraid from losing there #throne it is very well know to them if #student #election happen new youth come out and play a lead role in politics of Bihar it may possible if they later on fight MLA or MP election they got elected and the new #kamar pulled them from there #Rajjgaddi

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  2. प्रेम सिल्ही

    पंडित जी कैसे नहीं समझे? अनिल सहगल की टिपण्णी में सीता-राम छोलेवाले ने, उसके तमाम रिश्तेदारों, दोस्तों और उन लाखों लोगों ने जिन्हें सीता-राम जानते भी न थे पंडित जी को उनके मरने तक प्रधान मंत्री बनाए रखा| अब तो सीता-राम छोलेवाले के बच्चों, उनके स्वयं के बच्चों व उन करोड़ों लोगों में जिन्हें बच्चे जानते ही नहीं पंडित जी के परिवार के लिए इतना प्रेम भर गया है कि परिवार में कोई ऐरा गैरा भी प्रधान मंत्री बन सकता है| हाँ, नाश्ते में अखबारी लिफाफे में एक लड्डू, एक मट्ठी, एक केला और एक संतरा अवश्य मिला होगा जिसे खा कोई भी सीता-राम छोलेवाले के संग खडा हो गया होगा| पंडित जी को सब मालुम था|

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  3. sunil patel

    श्री संजीव जी ने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है.

    वाकई छात्र संघ चुनाव होने चहिये. युवाओं में शुरू से ही नेतृत्व की भावना जरूरी है. हमारे देश में सामान्तया, औसतन ३० से ३५ साल का बाद ही युवा स्वंत्र निर्णय लेने का काबिल हो जाता है. क्योंकि हमारे देश में युवा नौकरी, शादी का बाद भले ही अलग माता पिता से अलग रहे पर लगभग हर निर्णय अपने बुजुर्गो से विचार विमर्श के बाद ही करते है और बहुत हद तक बिलकुल सही है. कारन हमारी अनुशाषित और संगठित परिवार व्यवस्था.

    छात्र बहुत से आन्दोलन में भाग लेते है किन्तु बहुत से बल्कि कहे की लगभग सभी राजनीती से प्ररित और पूर्ण पोषित होते है. कई ऐसे मुद्दे होते है जिनके मूल तो मूल सामान्य (वास्तविक) जानकारी भी छात्रों को नहीं होती है फिर भी आन्दोलन में जमकर भाग लेते है.

    छात्र संघ आज की तारीख में बहुत जरुरी है किन्तु उन्हें राजनीती से प्रेरित नहीं होना चाहिए. छात्र / युवा नेतृत्व और शक्ति का प्रतीक है. किन्तु जब वे राजनितिक दलों के जी हुजूरी करने लगते है तो वह शक्ति दिशाहीन हो जाती है. जरुरी है की योग्य, सुसंस्कृत छात्रों को ही छात्र अपने नेता चुने.

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  4. rajeevkumar905

    राजीव

    छात्र् संघ के राजनीति से छात्र् को अपने देश के बारे में सोचने कुछ करने की ललक शुरू से ही हो जाती है, छात्र् संघ देश के लिए विशेष उपयोगी है मगर यह ध्‍यान रखना चाहिए कि छात्र् सफलता के लिए अपराध की तरफ न मुड़ने पाये.

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  5. संजीव कुमार सिन्‍हा

    संजीव कुमार सिन्‍हा

    पंकजजी, आप तो पलायनवाद के गीत गा रहे हैं। देश को ऐसे भी छात्र चाहिए जो देश व समाज को अपना कैरियर माने न कि सवालों से मुंह चुराकर केवल रोजी-रोटी की खोज में निकल पड़े।

    मुझे याद आ रहा है आप ही के विश्‍वविद्यालय की एक घटना। विवि से संबद्ध अध्ययन केन्द्रों में जब बड़े पैमाने पर गोरखधंधे का पता चला तो उसके बाद ही विवि कम्प्यूटर सेंटर में अचानक आग लग गई और 150 कंप्‍यूटर सहित अनेक दस्तावेज जल गए। क्‍या छात्रों को इतनी बड़ी घटना से निरपेक्ष होना चाहिए? छात्र कौन होता है, जो प्रश्‍न खड़े करता है।

    आपने लड़ाई, झगड़े के आधार पर छात्र राजनीति को खारिज करने की बात की है, तो लड़ाई, झगड़े हर क्षेत्र की सच्‍चाई है। फिर तो आप इसी आधार पर गांव के पंचायत से लेकर देश के सर्वोच्‍च पंचायत को भी खारिज करने का सुर अलापेंगे।

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  6. विकास आनन्द

    Vijay

    Pankaj ji jaise log hi vote karne nahi jate hai. sochate hai ki kya line me lagana hai utana der dukan khula rakhenge to kuch kama lenge. aise hi log lok tantra ko kamjor karte hai.loktantra me marpit ho jati hai iska malab ki loktantra ko tilanjali de de. MLA, Mp panchyat ke chunao me to aisi incidents hote rahte hai jab tak ki hamara lok tantra mature na ho jata. is tarah se patience loose nahi karana chahie. samay ayega jab hanara lok tantra majbut hoga is tarah ki aprie ghatnaye nahi hogi. pankaj ji jaise logo ko patience rakhana hoga.

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  7. पंकज झा

    पंकज झा.

    बिना किसी टिप्पणी के एक छोटी सी कहानी बताता हूं संजीव जी. हमलोग माखनलाल विश्‍वविद्यालय के छात्र थे. वहां हर क्लास के लिए एक-एक छात्र प्रतिनिधि चुने जाने निर्णय लिया गया जो प्रशासन तक छात्रों की बात पहुचाता. बात अच्छी थी लेकिन मात्र 25 छात्रों के क्लास का ही माहौल ऐसा हो गया मानो विधानसभा के चुनाव हो रहे हो. एक-दो छात्रों के सर फटे, एक निष्काषित भी हुए, और अखाड़ा बन गया क्लास.

    अपन जैसे ‘अराजनीतिक’ छात्र क्षुब्द्ध थे कि आखिर समय निकला जा रहा है 2 साल पढ़ कर नौकरी भी करनी है, यह हो क्या रहा है. अंततः विभागाध्यक्ष को अपन ने क्लास में यह आग्रह किया कि हम सब लोग वयस्क हैं जो भी कहना होगा आपको खुद ही कह देंगे. प्लीज़ हमें पढ़ने दिया जाय और कोई प्रतिनिधि नहीं चाहिए. ‘सर’ को सुझाव अच्छा लगा. सद्भावना और पढ़ाई का माहौल कायम हुआ. सभी प्रतिद्वंदी आराम से पढ़ाई पूरी कर अपने-अपने क्षेत्र में रोजी-रोटी कमाने निकल पड़े.

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  8. विकास आनन्द

    Vijay

    Pankaj ji ke comment pathane per pata chalta hai ki ye lok tantra me Rajtantra ke supporter hai.ye kewal prince and pricess ko hi rajniti me ane dena chahate hai.parivaravad ke samarthak lagate hai.Jiske family ka koi rajniti me na ho to inke anusar wah person rajniti me nahi ayega. sayad unke ye nhai malum hai ki college university ke duara hi hum jaise logo ko political partis aur leaders ke sampark me aane ka muka milta hai.chatra rajniti laboratory ki tarah hota hai. jaha humara sahi loktantrickaran hota hai. Chatra rajniti nahi ho to kewal rahul gandhi, jyotiraditya sindhia,hudda na jane kitane parivarvad ke example hai ayenge.Chandrashekhar, vajpayee, J.p jaise log chtra rajniti ke dura hi to aye hai.

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  9. संजीव कुमार सिन्‍हा

    संजीव कुमार सिन्‍हा

    पंकज झा की टिप्‍पणी मूलत: छात्रविरोधी है। छात्रों को अराजनीतिक बनाने के षड्यंत्र का हिस्‍सा है। क्‍या आज देश में चुनौतियां कम हैं? शुल्‍कों में लगातार वृद्धि होती जा रही है। शिक्षा के मंदिर दुकानों में तब्‍दील होते जा रहे हैं। छात्रों में राजनीतिक चेतना का अभाव दिख रहा है। कैम्‍पस में नक्‍सली गतिविधियां जोरों पर है। इस्‍लामिक आतंकवादी कैम्‍पसों में सक्रिय है। इन सबको चुनौती देना छात्र समुदाय का दायित्‍व है। छात्र समुदाय भी समाज का महत्‍वपूर्ण घटक है। इसलिए देश और समाज की चिंता करना उसका भी कर्तव्‍य है। आजादी के बाद जब इंदिरा गांधी ने देश को आपातकाल की ओर धकेला तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं ने ही सशक्‍त प्रतिरोध किया। ऐसा इसलिए हो पाया कि छात्र समुदाय अपने चरित्र में ही परिवर्तनकारी होता है। वह स्‍वार्थ से परे होता है। छात्र राजनीति के कारण पढ़ाई द्वितीयक नहीं होती है। ऐसा होता तो, जैसा कि मैंने अपने लेख में कहा है, देश के सर्वोच्‍च शैक्षिक संस्‍थान जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, जहां जमकर छात्र राजनीति होती हैं, देश के सबसे फिसड्डी विश्‍वविद्यालय साबित होते। कैम्‍पसों में महापुरूषों की जयंतियां मनाने, पत्रिका निकालने, महत्‍वपूर्ण मुद्दों पर स्‍वाध्‍याय मंडल आयोजित करने, प्रशासन की मनमानी को रोकने से छात्र समुदाय का हित संवंर्धित होता है। आज जिस तरह से अशिक्षित और अपराधी प्रवृति वाले नेताओं की राजनीति में बहुतायत है ऐसे में हर शैक्षिक संस्‍थान में छात्र संघ अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए ताकि देश को शिक्षित और प्रशिक्षित नेता मिले।

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  10. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    संजीवकुमार सिन्हा ने मजबूत लोकतंत्र के लिए छात्र राजनीति की प्रासंगिकता पर
    महत्वपूर्ण आलेख प्रस्तुत किया है .जे एन यु की आदर्श चुनाव पद्धति से में सहमत हूँ .लिंगदोह कमिटी की रिपोर्ट लागू होना चाहिए .किन्तु उससे पूर्व सभी मान्यता प्राप्त संघों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व की साझा सहमती उन सुधारों के बरक्स्स जरुरी है जिनका उलेख संजीव जी ने किया है .

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  11. पंकज झा

    पंकज झा.

    1947 में या ऐसे किसी चुनौतियों के समय ना केवल छात्र अपितु समाज का हर अनुषंग आंदोलनों में भागीदारी करता है. यह कुछ-कुछ उसी तरह है जैसे किसी प्रतिकूल परिस्थिति में देश के हर युवा अपना सबकुछ छोड़ सेना में शामिल होने कूद पड़ते हैं. इसका यह मतलब नहीं कि आम दिनों में भी सबको सैनिक ही बने रहना चाहिए. सीधी सी बात यह है कि शैक्षिक परिसर को बिल्कुल ही राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाया जाना चाहिए. वहां छात्र पढ़ाई करें और शिक्षा पूरी कर लेने पर अपनी रूचि के अनुसार क्षेत्र चुन लें जिसमें राजनीति भी एक हो सकता है. आज जिस तरह केम्पस को राजनीति के नाम पर असामाजिक तत्वों का अड्डा बना दिया गया है उस माहौल में मूल काम ‘पढ़ाई’ ही द्वितीयक होता जाता है. अतः निश्चय ही सरकारों को चाहिए कि वह छात्र संघ की किसी भी राजनीति को हतोत्साहित करे.

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  12. Anil Sehgal

    “मजबूत लोकतंत्र के लिए छात्र संघ जरूरी” – by – संजीव कुमार सिन्हा

    मैं १३ वर्ष की आयु में वर्ष १९५४ में दयानंद अंग्लो-वेदिक (DAV) स्कूल, पहाड गंज दिल्ली, में आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था. स्कूल १ से ११ क्लास तक का था.

    प. जवाहर लाल नेहरु जी ने, प्रयोग के लिए, दिल्ली के तीन स्कूलों में direct इलेक्शन द्वारा स्कूल पार्लियामेंट का चुनाव करवाया. हर कक्षा से संसद का एक सदस्य गया. सभी पार्लियामेंट सदस्यों ने सीधे चुनाव से प्रधान मंत्री का चुनाव किया. मुझे प्रधान मंत्री चुना गया यद्यपि मैं आठवीं का ही विद्यार्थी था.

    पंडित नेहरु जी ने मेरी कैबिनेट को तीन-मूर्ति नाश्ते पर बुलाया. उस समय इंदिरा जी भी थी.

    पूछा कि स्कूल में क्या सुधार किया है? यह भी पूछा कि क्या संसद भवन देखा है ?

    निर्देश दिया कि हमें तुरंत संसद की दोनों लोक और राज्य सभा ले जाया जाये.

    पंडित जी ने चुनाव में हेरा-फेरी के बारे में भी जाना.

    प्रधान मंत्री जी को, स्कूल- प्रधान मंत्री के चुनाव के समय, सांसदों के लिए जो सामान सीता-राम छोले वाले से आया था, सत्य बता दिया; पर संभवता पंडित जी यह बात समझ नहीं आयी.

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  13. सुमित कर्ण

    सुमित कर्ण

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि छात्रसंघ कि राजनीति हमारे मजबूत लोकतंत्र के लिए अतिआवश्यक है परन्तु आज छात्रसंघ कि राजनीति में कई तरह कि बुराइयों का समावेश हो गया है, आज हमें यह सोचने की जरूरत है कि छात्र संघों की राजनीति को कैसे सुधारा जाए? एक तो लिंगदोह की सिफारिशों की पालना जरूरी है। छात्र राजनीति कमजोर वर्ग के लिए होनी चाहिए। उस वर्ग के लिए होनी चाहिए,जो छात्र राजनीति के मायने समझ सके छात्रों की आवाज बुलंद कर सके. जरूरी है कि छात्र नेता अच्छों को साथ रखें और अपना आचरण तय करें।

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