लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू हिन्‍दू आबादी कम होने संबंधी एक ट्वीट क्‍या कर दिया, स्‍वयं को सेक्‍युलर कहने वालों की भीड़ एक साथ उनको कठघरे में खड़ा करने में लग गई । उसमें भी आश्‍चर्य तब अधिक हुआ, जब एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन औवेसी जैसे घोर सान्‍प्रदायिक यह कहते हैं कि रिजिजू देश के मंत्री हैं हिंदुओं के नहीं, इसलिए उन्हें ऐसे बयान नहीं देने चाहिए। वस्‍तुत: सच तो यही है कि वे देश के मंत्री हैं इसलिए उन्‍हें सदैव सत्‍य बोलना चाहिए जो उन्‍होंने इस ट्वीट में बोला भी है ।

रिजिजू ने अपने ट्वीट में लिखा है कि ‘‘भारत में हिंदुओं की आबादी कम हो रही है क्योंकि हिंदू कभी लोगों का धर्म परिवर्तन नहीं कराते। लेकिन हमारे आस-पास के कुछ अन्य देशों के विपरीत भारत में अल्पसंख्यक फल-फूल रहे हैं।’’ देखाजाए तो रिजिजू का यह ट्वीट उस कांग्रेसी बयान के विरोध में प्रतिक्रिया स्‍वरूप सामने आया है जिसमें अरुणाचल कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर यह आरोप लगाया था कि वह अरुणाचल प्रदेश को हिंदू राज्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। रिजिजू ने कांग्रेस से ट्वीट कर यही तो पूछा है कि ‘‘क्यों कांग्रेस इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान दे रही है? अरुणाचल प्रदेश के लोग एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्ण तरीके से एकजुट होकर रहते हैं। कांग्रेस को ऐसे उकसाने वाले बयान नहीं देने चाहिये। भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। सभी धार्मिक समूह आजादी से और शांतिपूर्ण तरीके से रहते हैं।’’

फिर भी यदि देश की सेक्‍युलर जमात को लगता है कि रिजिजू ने गलत कहा है तो यह सत्‍य भी सभी को जानना चाहिए । वस्‍तुत: सर्वविदित सत्‍य यही है कि दुनियाभर के कई देशों में ईसाई और इस्‍लाम का परचम धर्म के नाम पर क्रूरता का इतिहास है, जिसके फलस्‍वरूप ही लगातार इन दोनों धर्मों को मानने वालों की तादात में समय के साथ इजाफा होता रहा, जबकि हिन्‍दू धर्म जिसे सनातन धर्म भी कहते हैं, उसका विश्‍वभर में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें कि किसी को बलात अपने धर्म में दीक्षित किया गया हो । उल्‍टे यही शिक्षा दी गई कि जैसे अनेक नदियां भिन्‍न-भिन्‍न रास्‍तों से होकर अंत में समुद्र में समा जाती हैं, ठीक वैसे ही भिन्‍न पूजा पद्धतियां, धर्म-परंपराएं अलग होने के बाद भी उस एक परमात्‍मा की ही उपासना कर रही होती है। धर्म कोई भी हो, उसका उद्देश्‍य ईश्‍वर प्राप्‍ति है और यह किसी भी रास्‍ते से जाकर प्राप्‍त कया जा सकता है, जरूरी नहीं कि इसके लिए आप हिन्‍दू ही बनें रहेंगे तभी आपको भगवान तक पहुंचने का मार्ग मिलेगा।

यही कारण है कि भारत के हिन्‍दू राजाओं ने कभी धर्मांध होकर किसी देश पर आक्रमण नहीं किया और न किसी को व्‍यक्‍तिगत प्रताड़ि‍त किया। जब सनातन धर्म से जैन, बौद्ध, सिख सम्‍प्रदाय वक्‍त के साथ अलग धर्म के रूप में व्‍याख्‍यायित होने लगे तब भी सनातनियों ने इसे सकारात्‍मक रूप से ही लिया। बल्कि जब इस देश में भय एवं लालच में मुस्‍लिम और ईसाई बनाए गए तो अपने उन बन्‍धुओं को भी हिन्‍दुओं ने भ्रातत्‍व भाव से ही अपने साथ जोड़े रखा। न हीं उन्‍होंने धर्म के आधार पर कभी देश तोड़ने का कार्य पाकिस्‍तान जैसा विभाजन कभी मांगा। इसके विपरीत इस्‍लाम के भारत में हुए अत्‍याचार और उसके बनाए गए मुस्‍लिमों से इतिहास भरा पड़ा है। सबसे पहले भारत में सन् 712 से 715 के बीच मुहम्मद बिन कासिम द्वारा भारत के पश्चिमी भागों में चलाये गये जिहाद का विवरण, एक मुस्लिम इतिहासज्ञ अल क्रूफी द्वारा अरबी के ‘चच नामा’ इतिहास प्रलेख में लिखा गया है। इस प्रलेख का अंग्रेजी में अनुवाद एलियट और डाउसन ने किया था।

इसमें बताया गया है कि सिन्ध के कुछ किलों को जीत लेने के बाद बिन कासिम ने ईराक के गर्वनर अपने चाचा हज्जाज को लिखा था- ‘सिवस्तान और सीसाम के किले पहले ही जीत लिये गये हैं। गैर-मुसलमानों का धर्मान्तरण कर दिया गया है या फिर उनका वध कर दिया गया है। मूर्ति वाले मन्दिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी कर दी गई हैं। (चच नामा अल कुफी : एलियट और डाउसन खण्ड 1 पृष्ठ 164) आगे चच नामा का विवरण है कि हज्जाज की बिन कासिम को स्थाई आदेश थे कि हिन्दुओं के प्रति कोई कृपा नहीं की जाए, उनकी गर्दनें काट दी जाएँ और महिलाओं को और बच्चों को कैदी बना लिया जाए’ (उसी पुस्तक में पृष्ठ 173) हज्जाज की ये शर्तें और सूचनाएँ कुरान के आदेशों के पालन के लिए पूर्णतः अनुरूप ही थीं। इस विषय में कुरान का आदेश है-‘जब कभी तुम्हें मिलें, मूर्ति पूजकों का वध कर दो। उन्हें बन्दी बना (गिरफ्तार कर) लो, घेर लो, रोक लो, घात के हर स्थान पर उनकी प्रतीक्षा करो’ (सूरा 9 आयत 5) और ‘उनमें से जिस किसी को तुम्हारा हाथ पकड़ ले उन सब को अल्लाह ने तुम्हें लूट के माल के रूप दिया है।’ (सूरा 33 आयत 58)

चच नामा अल कुफी में यह भी बताया गया है कि जब रेवार की विजय के बाद कासिम वहाँ तीन दिन रुका। तब उसने छः हजार आदमियों का वध किया। उनके अनुयायी, आश्रित, महिलायें और बच्चे सभी गिरफ्तार कर लिये गये। जब कैदियों की गिनती की गई तो वे तीस हजार व्यक्ति निकले जिनमें तीस सरदारों की पुत्रियाँ थीं, उन्हें हज्जाज के पास भेज दिया गया। (वही पुस्तक पृष्ठ 172-173) इसके बाद जब ‘कासिम की सेनायें जैसे ही देवालयपुर (कराची) के किले में पहुँचीं, उन्होंने कत्लेआम, शील भंग, लूटपाट का मदनोत्सव मनाया। यह सब तीन दिन तक चला। सारा किला एक जेल खाना बन गया जहाँ शरण में आये सभी ‘काफिरों’ – सैनिकों और नागरिकों – का कत्ल और अंग भंग कर दिया गया। सभी काफिर महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें मुस्लिम योद्धाओं के मध्य बाँट दिया गया। मुख्‍य मन्दिर को मस्जिद बना दिया गया और उसी सुर्री पर जहाँ भगवा ध्वज फहराता था, वहाँ इस्लाम का हरा झंडा फहराने लगा। ‘काफिरों’ की तीस हजार औरतों को बग़दाद भेज दिया गया।’ (अल-बिदौरी की फुतुह-उल-बुल्दनः अनु. एलियट और डाउसन खण्ड 1) मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार ही अकेले ‘मुहम्मद बिन कासिम ने सभी काफिर सैनिकों का वध कर दिया और उनके अनुयायियों और आश्रितों को बन्दी बना लिया। सभी बन्दियों के मूल्य तय कर दिये गये। एक लाख से भी अधिक ‘काफिरों’ को दास बनाया गया।’ (चचनामा अलकुफी : एलियट और डाउसन खण्ड 1 पृष्ठ179)

मुहम्मद बिन कासिम के बाद भारत में सुबुक्तगीन की धर्मांधता का वर्णन मिलता है और उसके बाद भारत के विरुद्ध सुल्तान महमूद के जिहाद का वर्णन उसके प्रधानमंत्री अल-उत्बी द्वारा बड़ी सूक्ष्म सूचनाओं के साथ भी किया गया है और बाद में एलियट और डाउसन द्वारा अंग्रेजी में अनुवाद करके अपने ग्रन्थ, ‘दी स्टोरी ऑफ इण्डिया एज़ टोल्ड बाइ इट्‌स ओन हिस्टोरियन्स, के खण्ड 2 में उपलब्ध कराया गया है।’ पेशावर जिसका कि प्राचीन नाम पुरुद्गापुर था में जिहाद को लेकर अल-उत्बी ने लिखा- ‘अभी मध्याह भी नहीं हुआ था कि मुसलमानों ने ‘अल्लाह के शत्रु’, हिन्दुओं के विरुद्ध बदला लिया और उनमें से पन्द्रह हजार को काट कर कालीन की भाँति भूमि पर बिछा दिया ताकि शिकारी जंगली जानवर और पक्षी उन्हें अपने भोजन के रूप् मेंखा सकें। अल्लाह ने कृपा कर हमें लूट का इतना माल दिलाया है कि वह गिनती की सभी सीमाओं से परे है यानि कि अनगिनत है जिसमें पाँच लाख दास, सुन्दर पुरुष और महिलायें हैं। यह ‘महान’ और ‘शोभनीय’ कार्य वृहस्पतिवार मुहर्रम की आठवी 392 हिजरी (27.11.1001) को हुआ’ (अल-उत्बी-की तारीख-ई-यामिनी, एलियट और डाउसन खण्ड पृष्ठ 27)

अल-उत्बी थानेश्वर के कत्लेआम के बारे में लिखता है कि थानेश्वर का सरदार अपने अविश्वास में-अल्लाह की अस्वीकृति में-उद्धत था। अतः सुल्तान उसके विरुद्ध अग्रसर हुआ ताकि वह इस्लाम की वास्तविकता का माप दण्ड स्थापित कर सके और मूर्ति पूजा का मूलोच्छेदन कर सके। गैर-मुसलमानों (हिन्दु बौद्ध आदि) का रक्त इस प्रचुरता, आधिक्य व बहुलता से बहा कि नदी के पानी का रंग परिवर्तित हो गया और लोग उसे पी न सके।… अनेकों गैर-मुसलमान बन्दी बना लिये गये और मुसलमानों ने लूट के मालकी तब तक कोई चिन्ता नहीं की जब तक उन्होंने अविश्वासियों, (हिन्दुओं) सूर्य व अग्नि के उपासकों का अनन्त वध करके अपनी भूख पूरी तरह न बुझा ली। लूट का माल खोजने के लिए अल्लाह के मित्रों ने पूरे तीन दिनों तक वध किये हुए अविश्वासियों (हिन्दुओं) के शवों की तलाशी ली… । अल-बरूनी ने लिखा कि ‘महमूद ने भारती की सम्पन्नता को पूरी तरह विध्वस कर दिया। इतना आश्चर्यजनक शोषण व विध्वंस किया था कि हिन्दू धूल के कणों की भाँति चारों ओर बिखर गये थे। उनके बिखरे हुए अवशेष निश्चय ही मुसलमानों की चिरकालीन प्राणलेवा, अधिकतम घृणा को पोषित कर रहे थे।'(अलबरूनी-तारीख-ई-हिन्द अनु. अल्बरुनीज़ इण्डिया, बाई ऐडवर्ड सचाउ, लन्दन, 1910)

आगे सोमनाथ लूट का इतिहास में वर्णन है कि ‘सुल्तान ने मन्दिर में विजयपूर्वक प्रवेश किया, शिवलिंग को टुकड़े-टुकड़े कर तोड़ दिया, शिवलिंग के टुकड़ों को गजनी ले गया, जिन्हें जामी मस्जिद की सीढ़ियों के लिए प्रयोग किया’ (तारीख-ई-जैम-उल-मासीर, दी स्ट्रगिल फौर ऐम्पायर-भारतीय विद्या भवन पृष्ठ 20-21) मुहम्‍मद गजनी के बाद भारत पर मुहम्मद गौरी (1173-1206) के आक्रमणों का वर्णन मिलता है। हसन निज़ामी ने अपने ऐतिहासिक लेख, ‘ताज-उल-मासीर’, में मुहम्मद गौरी के व्यक्तितव और उसके द्वारा भारत के बलात्‌ विजय का विस्तृत वर्णन किया है। वह लिखता है कि मूर्ति पूजकों के सारे विश्व को अपनी अच्छी धार वाली तलवार से काट कर नर्क की अग्नि में झोंक दिया; मन्दिरों, मूर्तियों व आकृतियों के स्थान पर मस्जिदें बना दी।’ (ताज-उल-मासीर : हसन निजामी, अनु. एलियट और डाउसन, खण्ड II पृष्ठ 209) उसने गौरी के अजमेर को इस्‍लाम में बलात् परिवर्तन को विस्‍तार से लिखा है। हसन निजामी ने लिखा, ‘इस्लाम की सेना पूरी तरह विजयी हुई और एक लाख हिन्दू तेजी के साथ नरक की अग्नि में चले गये…जहाँ हमें लूट में इतना माल व सम्पत्ति मिली कि समुद्र के रहस्यमयी कोषागार और पहाड़ एकाकार हो गये। ‘जब तक सुल्तान अजमेर में रहा उसने मन्दिरों का विध्वंस किया और उनके स्थानों पर मस्जिदें बनवाईं।’ (उसी पुस्तक में पृष्ठ 215)। हसन निजामी ने आगे सुल्‍तान के दिल्‍ली में मन्दिरों के ध्वंस का विवरण किया है। ‘शहर और उसके आसपास के क्षेत्रों को मन्दिरों और मूर्तियों से तथा मूर्ति पूजकों से रहित वा मुक्त बना दिया यानि कि सभी का पूर्ण विध्वंस कर दिया। एक अल्लाह के पूजकों (मुसलमानों) ने मन्दिरों के स्थानों पर मस्जिदें खड़ी करवा दीं, बनवादीं।’ (वही, पृष्ठ 222) उसके बाद उसने वाराणसी के विध्वंस के बारे में लिखा है ‘उस स्थान से आगे शाही सेना बनारस की ओर चली जो भारत की आत्मा है और यहाँ उन्होंने एक हजार मन्दिरों का ध्वंस किया तथा उनकी नीवों के स्थानों पर मस्जिदें बनवा दीं; इस्लामी पंथ के केन्द्र की नींव रखी।’ (वही, पृष्ठ 223)

हिन्दुओं के सामूहिक वध के विषय में हसन निजामी आगे लिखता है, ‘तलवार की धार से हिन्दुओं को नर्क की आग में झोंक दिया गया। उनके सिरों से आसमान तक ऊंचे तीन बुर्ज बनाये गये, और उनके शवों को जंगली पशुओं और पक्षियों के भोजन के लिए छोड़ दिया गया।'(वही पुस्तक पृष्ठ 298) इस सम्बन्ध में मिन्हाज़-उज़-सिराज़ ने लिखा था-‘दुर्गरक्षकों में से जो बुद्धिमान एवं कुशाग्र बुद्धि के थे, उन्हें धर्मान्तरण कर मुसलमान बना लिया किन्तु जो अपने पूर्व धर्म पर आरूढ़ रहे, उन्हें वध कर दिया गया।’ (तबाकत-ई-नसीरी-मिन्हाज़, अनु. एलियट और डाउसन, खण्ड II पृष्ठ 228) गुज़रात की विजय के विषय में हसन निजामी ने लिखा- ‘अधिकांश हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया और लगभग पचास हजार को तलवार द्वारा वध कर नर्क भेज दिया गया, और कटे हुए शव इतने थे कि मैदान और पहाड़ियाँ एकाकार हो गईं। बीस हजार से अधिक हिन्दू, जिनमें अधिकांश महिलायें ही थीं, विजेताओं के हाथ दास बन गये। (वही, पृष्ठ230)।

वस्‍तुत: यह अकेले दो आक्रान्‍ताओं की भारत में फैलाई क्रुरता का विवरण है। इसमें भी सबसे बड़ी बात यह है कि यह सभी विवरण किसी हिन्‍दू इतिहासकार ने नहीं लिखे हैं, तत्‍कालीन समय में जो इन आतातायी इस्‍लामिक धर्मांधों के साथ रहे हैं, उन्‍होंने ने ही यह सब विवरण लिखे हैं। इलियट-डाउसन जो अंग्रेजी इतिहासकार थे, उन्‍होंने ऐसे सभी विवरणों को एकत्रकर अपने भारत के मध्‍यकाल के इतिहास में लिखा है और इस इतिहास की महपूर्ण पुस्‍तक का हिन्‍दी अनुवाद कराने का श्रेय देश की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को जाता है। वर्तमान में यह पुस्‍तक प्राय: भारत के सभी शिक्षा केंद्रों से नदारद है। इसी पुस्‍तक को लेकर सर्वप्रथम सीताराम गोयल द्वारा ‘स्टोरी ऑफ इस्लामिक इम्पीरियलिज्म इन इंडिया में उल्‍लेख किया गया, इस पुस्‍तक में इस्‍लामिक धर्मांधता से प्रेरित होकर बहुत व्‍यापक पैमाने पर भारत में चहुंओर हत्‍या और भय का ताण्‍डव मचाये जाने का विस्‍तार से वर्णन है। वस्‍तुत: इतना सब करने के बाद यह संभव हुआ कि भारत में इस्‍लाम इस स्‍थ‍िति में पहुंचा है कि वह वर्तमान में 14 प्रतिशत है। यही बात ईसाइयत पर भी लागू होती है, इन्‍होंने आरंभ में तो ईसाइयत के लिए क्रूरता मचाई लेकिन बाद में ये सेवा के नाम पर गरीबों और भोलेभाले लोगों को अपना शिकार बनाने लगे जोकि आज भी अनवरत जारी है। तब भी वे भारत में 4.2 प्रतिशत ही अपना विस्‍तार वर्तमान तक कर सके हैं, इसका विस्‍तार से उल्‍लेख अन्‍य किसी लेख में होगा।

वस्‍तुत: केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू के हिन्‍दू आबादी कम होने संबंधी ट्वीट पर जो लोग सेक्‍युलरिज्‍म के नाम पर हाय-हाय कर रहे हैं, उनसे यह अपील जरूर हैं कि थोड़ा इतिहास अवश्‍य पढ़ें। सत्‍य का साक्षात्‍कार करें, फिर किसी विषय पर अपनी राय दें। यदि हिन्‍दू भी इस्‍लाम या ईसाइयत की तरह बर्बर होकर दुनिया बदलने के लिए निकला तो आज यह कहने की कोई जरूरत नहीं है कि दुनिया में जो सबसे अधिक ईसाइ और इस्‍लामिक देश् हैं वे क्‍या होते?

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