-अशोक “प्रवृद्ध”
यह कोई सामान्य चुनावी विश्लेषण नहीं है, यह उस हुल्लफाड़ सच का नंगा प्रदर्शन है जिसे देखकर कोलकाता के नबान्न (सचिवालय) में बैठी ममता दीदी की चूलें हिल गई हैं। बंगाल की धरती, जो कभी ज्ञान और अध्यात्म की गंगोत्री थी, उसे जिस तरह से मजहबी तुष्टिकरण और पिशाची राजनीति का चारागाह बनाया गया, अब उसका हिसाब होने का वक्त आ गया है। 2026 के विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा बंगाल आज जिस ज्वालामुखी पर बैठा है, वह फटने को तैयार है। ममता बनर्जी ने अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए जिस वोट बैंक की खेती की, अब वही तुष्टिकरण का पिशाच उनके लिए भस्मासुर साबित हो रहा है। हम पूछते हैं, क्या किसी ने सोचा था कि रवींद्र संगीत की धुन वाले बंगाल में बमों के धमाके और मजहबी चीखें इतनी आम हो जाएंगी? पिशाचों के दम पर हिन्दुओं पर जो कहर ढाया गया, उसकी गूंज अब गांवों के चौपालों तक पहुंच गई है। संदेशखाली जैसी घटनाओं ने हिन्दू समाज की सोई हुई चेतना को झकझोर दिया है। अपनी दुर्गति साफ देख अब हिन्दू समाज ध्रुवीकृत हो रहा है और यही दीदी की सबसे बड़ी हार की आहट है।
हम तो कहेंगे, बंगाल अब लाल और हरे के चंगुल से निकलकर भगवा होने को छटपटा रहा है। भाजपा आज बंगाल में सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि एक विचारधारा बनकर उभरी है। सुवेंदु अधिकारी जैसे जुझारू नेताओं के नेतृत्व में जो दक्षिणपंथी लहर उठी है, उसने ममता के अजेय होने के भ्रम को चकनाचूर कर दिया है। दक्षिणपंथ का ज्वार और भगवा हुंकार ने दीदी को डरा दिया है। ओपिनियन पोल दिखा रहे हैं कि भाजपा 145 से160 सीटों के जादुई आंकड़े को छूने की ओर अग्रसर है। यह बहादुरी की नई इबारत है, जो शोनार बांग्ला के पुनरुद्धार की पटकथा लिख रही है।
ममता दीदी आज ईवीएम पर सवाल उठा रही हैं, मतदाताओं को बदला लेने के लिए उकसा रही हैं, पर हुल्लफाड़ सच तो यह है कि वे खुद अपने बुने जाल में फंस गई हैं। बंगाल का भद्रलोक, जो कभी भगवा राजनीति से कतराता था, आज कानून व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त होने और घुसपैठियों के बढ़ते हौसलों से डरा हुआ है। जब घर के आंगन तक पिशाचों की साया पहूंच जाए, तो इंसान विचारधारा नहीं, अस्तित्व चुनता है। और बंगाल ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए भगवा ध्वज थाम लिया है। हम तो कहेंगे, ममता बनर्जी के दिन अब लद चुके हैं। वह मां-माटी-मानुष का नारा अब सिर्फ कागजों पर रह गया है, धरातल पर तो सिर्फ भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण का तांडव है। 4 मई 2026 को जब नतीजे आएंगे, तो बंगाल एक नई सुबह देखेगा- एक ऐसी सुबह जहां मजहबी पिशाचों का आतंक नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का गौरव गूंजेगा। भाजपा का विजयी होना अब महज एक संभावना नहीं, बल्कि बंगाल की नियति है।
हुल्लफाड़ सच है- ममता का विसर्जन और बंगाल में जय श्री राम का अट्टहास!
हम तो कहेंगे, यह कोई चुनावी हार-जीत का सामान्य किस्सा नहीं है, यह उस पिशाची तंत्र के ढहने की दास्तान है जिसने बंगाल की भद्रलोक संस्कृति को जिहादी तुष्टिकरण की मंडी बना दिया था। कोलकाता के कालीघाट से लेकर नबान्न के गलियारों तक आज जो सन्नाटा है, वह बता रहा है कि ममता बनर्जी के दिन अब लद चुके हैं। हुल्लफाड़ सच तो यह है कि दीदी ने सत्ता के मोह में जिन मजहबी भेड़ियों को पाल-पोसकर बड़ा किया, आज वही उनके राजनीतिक वजूद को लीलने पर आमादा हैं। ममता ने सोचा था कि घुसपैठियों और कट्टरपंथियों के दम पर वह बंगाल को अपनी जागीर बना लेंगी। लेकिन उन्होंने हिन्दू समाज की उस खामोश चीख को अनसुना कर दिया जो संदेशखाली से लेकर बीरभूम तक गूंज रही थी। हम पूछते हैं, क्या किसी ने सोचा था कि महाप्रभु चैतन्य और विवेकानंद की धरती पर हिन्दुओं को अपने त्योहार मनाने के लिए अदालत की चौखट चूमनी पड़ेगी? पिशाचों के तांडव को जब सरकारी संरक्षण मिलने लगे, तो जनता बदला नहीं, बदलाव ढूंढती है। और बंगाल का वह बदलाव अब भगवा रंग में रंगा जा चुका है।
हम तो कहेंगे, बंगाल का हिन्दू अब सेकुलरिज्म की अफीम चाटना बंद कर चुका है। अपनी दुर्गति को साक्षात आंखों से देख, वह अब ध्रुवीकृत होकर चट्टान की तरह खड़ा है। भाजपा ने यहां सिर्फ राजनीति नहीं की, बल्कि सोए हुए सांस्कृतिक गौरव को जगाया है। सुवेंदु अधिकारी की आक्रामक शैली और अमित शाह की व्यूह रचना ने ममता के उस वोट बैंक के तिलस्म को तोड़ दिया है। जब घर की बहू-बेटियों की अस्मत और घर की जमीन पर पिशाचों की नजर पड़े, तो इंसान विचारधारा की नहीं, सुरक्षा की बात करता है। यही वह टर्निंग पॉइंट है जहां भाजपा ने बाजी मार ली है।
हुल्लफाड़ विश्लेषण यह है कि बंगाल अब वामपंथ के लाल और तृणमूल के हरे के बीच नहीं, बल्कि अपनी सनातन पहचान के लिए लड़ रहा है। भाजपा की जीत के आसार इसलिए प्रबल हैं क्योंकि बंगाल का मध्यमवर्ग और ग्रामीण हिन्दू अब यह समझ चुका है कि ममता राज में उसका भविष्य दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रहने में है। ओपिनियन पोल्स का जो आंकड़ा 145-160 सीटों के बीच भाजपा को दिखा रहा है, वह सिर्फ नंबर नहीं है, वह दीदी के अहंकार का डेथ वारंट है। हुल्लफाड़ तो कहेगा, 2026 का चुनाव बंगाल के लिए दूसरा प्लासी का युद्ध है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार गद्दार नहीं, बल्कि घरवापसी करने वाले योद्धा मैदान में हैं। ममता बनर्जी की विदाई का मुहूर्त निकल चुका है। पिशाचों के दम पर हिन्दुओं को डराने वाली राजनीति अब खुद डर रही है। याद रखिए, जब बंगाल बदलता है, तो इतिहास बदलता है। और इस बार इतिहास जय श्री राम के उद्घोष के साथ लिखा जाएगा।
हुल्लफाड़ सच है- दीदी के अभेद्य किलों में भगवा सेंध और बंगाल का नया भूगोल!
हम तो कहेंगे, यह कोई हवा-हवाई बात नहीं है, यह उन पॉकेट जोन्स का कच्चा चिट्ठा है, जहां ममता बनर्जी का मजहबी और बाहुबली तिलस्म तार-तार हो रहा है। बंगाल का भूगोल अब बदल रहा है और इस बदलाव की गूंज नबान्न की दीवारों को कंपा रही है। हुल्लफाड़ सच तो यह है कि भाजपा ने इस बार बिहारी मॉडल की तर्ज पर बंगाल को 5 विशिष्ट जोन में बांटकर ऐसी घेराबंदी की है कि दीदी को अपनी जमीन बचाना भारी पड़ रहा है। उत्तर बंगाल, मतुआ बेल्ट और सीमावर्ती इलाके, जंगलमहल और पश्चिमी मेदिनीपुर, कोलकाता के अर्बन पॉकेट, पानीहाटी और चौरंगी आदि ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पिशाचों का राज खत्म होने और दक्षिणपंथ के हावी होने की पटकथा लिखी जा चुकी है। हुल्लफाड़ सच तो यह है कि इस बार लड़ाई सिर्फ रैलियों की नहीं, बल्कि एक-एक बूथ पर संगठनात्मक सर्जिकल स्ट्राइक की है। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 6 प्रमुख चेहरों के साथ 5 रणनीतिक जोन में संगठन को बस्तर मॉडल तर्ज पर मजबूत कर टीएमसी के बाहुबल, सी ए ए, और शहरी असंतोष को मुख्य हथियार बनाया है। पवन राणा, सी.टी. रवि, सुरेश राणा, अनंत मिश्रा जैसे नेता ग्रामीण पैठ और मतुआ वोट बैंक साधने में जुटे हैं।
हम तो कहेंगे, दीदी की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण यह है कि उन्होंने पिशाचों को संरक्षण देकर बंगाल के हिन्दू मानस को जगा दिया है। यह कोई सतही चुनावी तैयारी नहीं है, यह तो बंगाल की दीदी को उन्हीं के घर में घेरने का वो चक्रव्यूह है जिसकी काट फिलहाल नबान्न के पास भी नहीं है। राज्यों से बुलाये गए ये कद्दावर सिपहसालार अब चुनाव तक वहीं डेरा जमाए बैठे हैं। हुल्लफाड़ तो कहेगा, भाजपा ने इस बार 160+ सीटों का लक्ष्य लेकर जिस तरह बाहरी रणनीतिकारों और स्थानीय लड़ाकों का तालमेल बैठाया है, वह ममता बनर्जी के लिए बड़ी चुनौती है। 5 अप्रैल 2026 से ही पीएम मोदी ने कूचबिहार से इस हाई-वोल्टेज अभियान का शंखनाद कर दिया है। जब रक्षक ही पिशाचों का साथी बन जाए, तो जनता ऐसी ही घेराबंदी का इंतजार करती है।