पर्यावरण लेख

मछलियों में ’’कोकीन’’ की लत, प्रकृति को तबाह तो नहीं कर देगी?


रामस्वरूप रावतसरे


  नशीली दवाओं की लत अब केवल इंसानों तक ही सीमित नहीं रही है. स्वीडन के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा खुलासा किया है जो सोचने पर मजबूर कर देगा. हाल ही में हुए एक शोध में पता चला है कि नदियों में घुल रही ’’कोकीन’’ की वजह से सैल्मन मछलियां  नशे की गिरफ्त में आ गई हैं लेकिन चौंकाने वाली बात सिर्फ यह नहीं है कि वे नशा कर रही हैं बल्कि यह है कि इस नशे के बाद उनका व्यवहार पूरी तरह बदल गया है। वे पहले से कहीं ज्यादा फुर्तीली और ’’हाई’’ नजर आ रही हैं जो सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन पर्यावरण के लिए एक खतरे की घंटी बताई जा  रही है।


 मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में पर्यावरण विषविज्ञानी जैक ब्रांड ने स्वीडन में मछलियों पर एक खास रिसर्च शुरू की। उन्होंने यह देखने के लिए कि अवैध दवाओं का कचरा पानी में रहने वाली मछलियों को कैसे प्रभावित करता है, कई सैल्मन मछलियों को कोकीन की खुराक दी। इसके लिए उन्हें स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। यह शोध ’’करंट बायोलॉजी’’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।


डॉ. ब्रांड और उनकी टीम ने स्वीडन की एक झील ’’वैटर्न’’ में 2 साल की सैल्मन मछलियों को छोड़ा। इन मछलियों के शरीर में छोटे कैप्सूल लगाए गए थे जो धीरे-धीरे कोकीन और उसके उप-उत्पाद ’’बेंजोइलेकगोनिन’’ को रिलीज करते थे। यह मात्रा उतनी ही रखी गई थी जितनी आमतौर पर प्रदूषित नदियों में पाई जाती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि जो मछलियां कोकीन के प्रभाव में थीं, वे सामान्य मछलियों की तुलना में बहुत तेज तैर रही थीं और बहुत अधिक दूरी तय कर रही थीं।
        रिसर्च में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात कोकीन नहीं बल्कि उसका उप-उत्पाद ’’बेंज़ोइलेकगोनिन’’ रहा। यह वह तत्व है जो शरीर में कोकीन के टूटने पर बनता है। रिसर्चर्स ने देखा कि जिन मछलियों को इस तत्व की खुराक मिली, वे शुद्ध कोकीन लेने वाली मछलियों से भी कहीं ज्यादा सक्रिय हो गईं। वे प्रति सप्ताह सामान्य मछलियों की तुलना में लगभग दोगुनी दूरी तय कर रही थीं। इसका मतलब है कि कोकीन का बचा हुआ कचरा असली ड्रग से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है।

       वैज्ञानिक टॉमस ब्रोडिन के अनुसार अगर हम सिर्फ कोकीन पर ध्यान देंगे, तो हम उसके खतरनाक अवशेषों के पारिस्थितिक प्रभावों को नजरअंदाज कर देंगे। यह सिर्फ एक मछली की बात नहीं है। दुनिया भर के जल निकायों में इंसानों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली प्रोजैक, एडविल और बेनिड्रिल जैसी दवाएं पाई जा रही हैं। इससे पहले के एक शोध में पाया गया था कि एंटी-एंजायटी दवाओं के संपर्क में आने वाली मछलियां निडर हो जाती हैं, जिससे शिकारियों द्वारा उन्हें खाए जाने का खतरा बढ़ जाता है।


      विशेषज्ञ जेम्स मीडर के अनुसार, मछलियों के व्यवहार में कोई भी बदलाव उनके लिए हानिकारक होता है। इससे उनकी एनर्जी बेवजह खर्च होती है और पर्यावरण में उनका संतुलन बिगड़ जाता है। अमेरिका जैसे देशों में हर दिन अरबों गैलन वेस्ट वाटर को प्रोसेस किया जाता है लेकिन इन दवाओं को पूरी तरह से हटाना बहुत महंगा और जटिल काम है। हालांकि, वैज्ञानिक इस दिशा में नई तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे हैं ताकि पानी को इन कैमिकल्स से मुक्त किया जा सके।


डॉ. ब्रांड चेतावनी देते हुए कहा कि ’’ये मानव निर्मित रसायन वैश्विक परिवर्तन के अदृश्य एजेंट हैं। वे न केवल मछलियों बल्कि सभी जलीय जीवों के जीवन को बदल रहे हैं। लोग अभी तक इस बात की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं कि हमारी दवाएं और नशे की लत प्रकृति को किस कदर तबाह कर रही है। अगर जल्द ही कचरा प्रबंधन की व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई तो आने वाले समय में नदियों का पूरा इकोसिस्टम बदल सकता है।’’