दुनियां को महाशक्तियों की नही महावीर की आवश्यकता

डॉ अजय खेमरिया
मप्र में ग्लोबल जैन म्यूजियम बनाने के सरकार के निर्णय का देश भर के जैन सम्प्रदाय में स्वागत हुआ है।रायसेन जिले के सांची बौद्ध स्तूपों के आसपास यह म्यूजियम बनाया जाना है।पूरी दुनिया में यह अकेला ऐसा जैन म्यूजियम होगा जिसमें महावीर स्वामी के इर्दगिर्द इस मत की महत्ता को तो दिखाया ही जायेगा साथ ही धर्म की उत्तपत्ति से अब तक की विकास और विस्तार यात्रा को भी करीने से स्थापित किया जाना जाएगा।मप्र की धरती पर जैन धर्म से जुड़े करीब 122 तीर्थ क्षेत्र है।जैन धर्म के सबसे बड़े मौजूदा सन्त आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने इस म्यूजियम के निर्माण पर अपनी सहमति दे दी है।प्रदेश के बुंदेलखंड, मध्यांचल और महाकौशल में बड़ी संख्या में जैन मतालम्बी निवास करते हैं।चतुर्मास में करीब 100 से अधिक शहर/कस्बों में जैन परिव्राजकों के प्रवास मप्र में प्रतिवर्ष धर्म गंगा प्रवाहित करते  है।जाहिर है देश का ह्रदय प्रदेश जैन मत की गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र है।वस्तुतः भगवान महावीर भारत की लोककल्याण केंद्रित चिरकालिक मत परम्परा के सबसे सशक्त संचारक है।उनके जीवन दर्शन की उपयोगिता मानव जाति की उम्र बढ़ने के समानांतर  दुगने अनुपात में  बढ़ रही है।आज पूरे विश्व के समक्ष कोरोना जैसी त्रासदी खड़ी है जिसने मानवीय अस्तित्व पर इतनी गहरी चोट की है कि तमाम वैज्ञानिक और तकनीकी सम्पन्नता और निपुणता के बाबजूद हम किंकर्तव्यविमूढ़ होकर खड़े है।भौतिकता के ताप से धधकते मानवजीवन के सामने सिर्फ महावीर का दर्शन ही आज कारगर समाधान नजर आता है।”अपरिग्रह”और “अहिंसा”के पथ पर अगर विकास को अबलंबित किया गया होता तो आज दुनियां के सामने मौजूदा समस्याओं का अंबार नही होता।कोरोना एक संकेत है कि हम अपनी समझ को अपरिग्रह की ओर ले चलें क्योंकि दुनियां के धनीमानी यूरोपीय राष्ट्र आज धन,वैभव और तकनीकी के ढेर पर खड़े होकर भी अपने भगनि बन्धुओं को काल कवलित होने से नही बचा पा रहे है।प्रकृति के शोषण की जगह दोहन के जिस सिद्धान्त को भगवान महावीर ने ” अपरिग्रह “का नाम दिया है असल मे वह केवल आर्थिक या निजी आग्रह तक सीमित नही है।अपरिग्रह मानव जीवन का सार रूप है इसकी व्याप्ति चराचर जगत तक है।जरूरत से ज्यादा का भोग और संग्रह बुनियादी रूप से ही प्रकृति के विरूद्ध है।वैश्विक बेरोजगारी, विषमता, और भूख के संकट अपरिग्रह के अबलम्बन से ही दूर किये जा सकते हैं।दुनियां में चारों तरफ फैली हिंसा असल में अपरिग्रही लोकसमझ के अभाव का  नतीजा है।व्यक्ति के रूप में हमारे अस्तित्व और समग्र उत्कर्ष के लिए जितने साधन अनिवार्य है वह प्रकृति ने प्रावधित किये है लेकिन मनुष्य ने अज्ञानता के वशीभूत इन्द्रिय सुख के लिए न केवल प्रकृति बल्कि अपने सहोदरों का शोषण करने के जिस रास्ते को पकड़ लिया है वही सारे क्लेश की बुनियादी जड़ है। सांगोपांग हिंसा के कुचक्र  भी असल मे इसी मानसिकता की उपज है।महावीर और जैन दो ऐसे शब्द है जिनकी वास्तविक समझ मानव ग्रहण कर ले तो यह धरती सभी कष्ट और क्लेशों से निर्मुक्त हो सकती है।जैन को आज एक वर्ग विशेष के उपनाम और जातीय पहचान तक सीमित कर दिया गया।सियासी लालच ने इसे अल्पसंख्यक का तमगा दे डाला।हकीकत यह है जैन शब्द भारत का दुनियां को एक दिग्दर्शन है जो यह समझाने  का प्रयास है कि इस सांसारिक जय विजय से परे भी एक जय है जो इन्द्रियातीत है।मनुष्यता का अंतिम पड़ाव जिस मंजिल पर जाकर  स्थाई विराम पाता है वह जैन हो जाना ही है।यह तथ्य है कि आज जैन मत की पालना अगर ईमानदारी से की जाती तो धरती पर मानवता और प्रकृति के संकट खड़े ही नही होते। जैन शव्द जिन से बना है जिसका मतलब है विजेता।संसार रूपी मोहगढ़ पर विजय पाना। तपस्या और आत्मानुशासन से खुद की वासना इच्छाओं पर विजय पाता उसे जिन कहा गया। इस दर्शन का निष्ठापूर्वक अनुपलित करने वाले जैन कहलाये है।जैन मत का सबसे प्रमुख आधार त्रिरत्न और कषाय है।दोनों का अनुपालन मानव समाज की सभी बुराइयों और कष्टों का समूल नाश कर सकता है।सम्यक ज्ञान सम्यक दर्शन सम्यक चरित्र से मिलकर त्रिरत्न बना। यह तथ्य है कि जैन मत का प्रसार उस गति से नहीं हुआ जितना ये प्राचीन और लोकोपयोगी है। बुद्ध बाद में आये लेकिन पूरी दुनिया में छा गए। श्रीलंका, जापान, चीन कोरिया, कम्बोडिया, ताईवान वर्मा, तक बुद्ध की शिक्षा और दर्शन का प्रसार हुआ। लेकिन जैन मत का प्रसार क्यों नहीं हुआ? इसका जबाब राष्ट्रसंत रहे मुनि तरुणसागर जी खुद देते थे वो कहते रहे कि महावीर को मंदिरो से निकालो ,सोने की मूर्तियों से मुक्त करो।  महावीर को सड़क चौराहे  जेल स्कूल पर लाओ। यानी जैन मत जिस आधार पर खड़ा हुआ था जातिवाद, कर्मकांड ,पुरोहित वाद की जटिलता  के विरोध में जैनियों ने इसे बिसार ही दिया।आज महावीर के अनुयायियों में  जातिवाद, छूआ छुत है।फिजूलख़र्च के आडम्बर है।जड़ता है और एक आवरण है जिसमें किसी गैर जैन की  अघोषित मनाही सी है।कषाय इतना हावी है की हमने त्रिरत्नों को भुला दिया। तरुण सागर जी जीवित रहते तक जिन क्रांतिकारी उपचारों की बात करते रहे वे आज भी समाज मे बहुत दूर नजर आते है। सच तो यह है की  भारतीयता की पुण्यभूमि पर खड़े जैन मत को ही वैश्विक मत होने का अधिकार है।महावीर सा पैगम्बर इस सभ्यता में दूसरा नहीं।लेकिन ये भी उतना ही सच की उनके अनुयायी उतने सफल नहीं हुए जितना बुद्ध औऱ दूसरे मत सम्प्रदाय । यह बात कतिपय अप्रिय लग सकती है तथ्य  यही है कि महावीर का दर्शन भारतीयता का मूल दर्शन है।महावीर का प्रसार भारत की सनातन सभ्यता का प्रसार है।मौजूदा सभी वैश्विक संकट के निदान महावीर में अंतर्निहित है।हिंसा और विषमताओं को जन्म देती आर्थिक नीतियां अहिंसा औऱ अपरिग्रह को भूला देने का नतीजा है।जनांकिकीय दृष्टि से आज भारत में यह वर्ग शून्यता की राह पर है क्योंकि जैन समाज अपनी आर्थिक  सम्पन्नता का प्रयोग मंदिरों औऱ पंचकल्याणक जैसे महंगे उपक्रमों में कर रहा है।जबकि होना यह चाहिए कि महावीर को ज्ञान जगत में स्थापित करने के प्रयास हो जो मंदिरों से बाहर किये जायें।मिशनरीज और तब्लीगी अंदाज में इस मत के मैदानी प्रवर्तन की भी भारत की सनातन परंपरा को आवश्यकता है।इससे कौन इंकार कर सकता है कि जैन संस्कार विशुद्ध रूप से भारतीयता को संपुष्ट करते है।खुद को अलग अल्पसंख्यक मानने की बढ़ती समझ से महावीर वाणी कमजोर ही होगी क्योंकि यह तो सनातन पंथ की बुराइयों के शमन की मानवीय धारा है।

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