अस्तित्व के संकट से जुझ रहे विश्व को संबल देता है गांधी दर्शन

गांधी जयंती (2 अक्‍टूबर) पर विशेष

समन्वय नंद

विश्व आज अनेक समस्याओं से दो- चार हो रहा है, और इनके कारण उनके अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं । तापमान बढने व ओजोन में छेद होने के कारण इस प्लैनेट पर जीवन के अस्तित्व ही खतरे में पड गया है अब ऐसा माने जाने लगा है कि इसका मूल कारण असीमित उपभोग है जिसके कारण असीमित उत्पादन की जरुरत पडती है । जाहिर है इस उत्पादन के लिए प्रौद्यगिकी की अनिवार्यता बनती है । कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कुछ प्रतिशत लोगों की जीवन शैली ने धरती के शत प्रतिशत जीवन को खतरे में डाल दिया है । देश- विदेश में इस बात पर चर्चा हो रही है कि इस खतरे से कैसे उभरा जाए । इससे दुखद आश्चर्य ही कहना चाहिए कि ऐसी चर्चा करने वालों का ध्यान 21वीं शताब्दी में महात्मा गांधी की ओर जा रहा है । इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने गांधी जी के हिन्द स्वराज को उनके शुरुआती दिनों में ही खारिज कर दिया था ।

महात्मा गांधी ने 1927 में यंग इंडिया में लिखा था – “समय आ रहा है कि जो लोग आज अपनी आवश्यकताओं को अधांधूंध बढा रहे हैं और समझ रहे हैं कि इसी में जीवन का सच्चा सार है और विश्व का सच्चा ज्ञान है, वे अपने कदम को लौटाएंगे और पूछेंगेः हमारी उपलब्धि क्या है ।’”

महात्मा गांधी द्वारा यह बात आज भी यक्ष प्रश्न बन कर विश्व के सामने खडा है । उनके द्वारा कहे गये इस बात की प्रासंगिकता आज सबसे अधिक है । आज समुचा विश्व पर्य़ावरणीय संकट व ग्लोबल वार्मिंग जैसे गंभीर समस्य़ाओं से जकडा हुआ है और इन समस्याओं से निजात पाने के लिए छटपटा रहा है और ,ऐसे में गांधी जी द्वारा लगभग 9 दशक पूर्व इस बात की भविष्यवाणी कर दी थी ।

वास्तव में गांधी जी एक भविष्य़ द्रष्टा थे । गांधी जी ने जो बातें कहीं हैं वह सभी सच साबित हो रही हैं । उस समय उनके आलोचक उन पर दकियानुसी होने का व न जाने कितने आरोप लगाते थे । लेकिन 2010 के आते आते वह सभी बातें सत्य साबित हो रही हैं।

गांधी जी भारत की उस महान सनातन परंपरा के वाहक थे जिसका मानना है मनुष्य के भोग के पीछे भागना नहीं चाहिए और उसे त्यागपूर्वक जीवन निर्वाह करना चाहिए । तथाकथित आधुनिक सभ्यता का वह आलोचक थे । वह इसे शैतानी सभ्यता बताते थे । गांधी जी ने ‘हिन्द स्वराज’’ में एक जगह लिखा है ”पैसा मनुष्य लो लाचार बना देता है। ऐसी दूसरी च़ीज विषय-भोग है। ये दोनों विषय विषमय हैं। उनका डंक साँप के डंक से ज्यादा ज़हरीला है। जब साँप काटता है तो हमारा शरीर लेकर हमें छोड़ देता हे। जब पैसा या विषय काटता है, तब वह शरीर, प्राण, मन (देह, मन और आत्मा) सब कुछ ले लेता है; तब भी हमारा छुटकारा नहीं होता।’’

गांधी जी उद्योगीकरण व यंत्रवाद के सख्त खिलाफ थे । उद्योगीकरण को वह एक अभिशाप मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि उद्योगीकरण व यंत्रवाद में पूंजी की भूख सदा बनी रहती है । इसमें मानव व मानवीयता पूरी तरह छूट जाता है और प्रकृति का नाश हो जाता है ।

गांधी जी श्रमिकों को विस्थापित कर बेरोजगार बना देने वाली मशीनों के विरोधी थे । हिंद स्वराज के प्रस्तावना में गांधी जी के घनिष्ठ सहयोगी रहे महादेव देसाई ने अपनी प्रस्तावना में गांधी जी का रामचन्द्रन नामक कार्यकर्ता के साथ जो वार्ता हुई थी उसका ब्योरा दिया है । रामचन्द्रन द्वारा गांधी जी से यह पूछे जाने पर कि क्या आप तमाम यत्रों के खिलाफ हैं के जवाब में गांधी जी ने कहा कि ” मेरा विरोध यंत्रों के लिए नहीं है बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है उसके लिए है । उनसे मेहनत जरुर बचती है लेकिन लाखों लोग बेकार हो कर भूखों मरते हुए रास्तों पर भटकते हैं । ”

उन्होंने कहा कि ” समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूं परंतु वह किसी खास वर्ग की नहीं बल्कि सारी मानव जाति की होनी चाहिए । आज तो करोडों की गरदन पर कुछ लोगों के सवार हो जाने में यंत्र मददगार हो रहे हैं । यंत्रों के उपयोग के पीछे प्रेरक कारण है वह श्रम की बचत नहीं है बल्कि धन का लोभ है । आज के इस चालु अर्थ व्यवस्था के खिलाफ मैं अपनी तमाम ताकत लगा कर युद्ध चला रहा हूं । ”

‘हिन्द स्वराज’ में एक अन्य जगह अपनी बात को स्पष्ट करते हुए गाँधी लिखते हैं, ”मशीनें यूरोप को उजाडने में लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिन्दुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी है और वह महापाप है, ऐसा तो मैं साफ देख सकता हूँ।’’

गांधी जी ने यंत्रवाद व उद्योगीकरण का तार्किक विरोध किया था । आज हम इतने वर्षों बाद इसे स्पष्ट अनुभव कर पा रहे हैं । हम देख रहे है कि बडे बडे उद्योग काफी अधिक मात्रा में ऊर्जाभक्षी होते हैं । ऊर्जा के लिए बडे बडे बांध बनाने या फिर थर्मल बिजली या फिर अन्य उपायों की आवश्यकता होती है । इसके कारण लोगों को विस्थापित होना पडता है । पर्यावरण के मूल्य पर हम बडे बडे उद्योग स्थापित करते हैं । इसके कारण प्रकृति का संतुलन बिगडा है प्रदूषण खतरनाक स्थिति में पहुंचा है । मानवता त्राही त्राही कर रही है । यंत्रवाद व उद्योगीकरण के कारण फसल भी जहरीला हो रहा है । शुद्ध जल, हवा मिट्टी आदि दुर्लभ होते जा रहे हैं ।

गांधी जी का मानना था कि यंत्रवाद व उद्योगीकरण के कारण समाज में विषमता पैदा होगी । इससे विशाल पैमाने में उत्पादन होगा । विशाल पैमाने के उत्पादन से संकट पैदा होगें । स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप स्थानीय इलाके में उत्पादन वितरण करने से इस तरह के समस्या का समाधान हो सकता है ।

उन्होंने कहा कि ” मैं पक्के तौर पर अपनी राय जाहिर करना चाहुंगा कि विशाल पैमाने के उत्पादन का उन्माद विश्व संकट के लिए उत्तरदायी है । एक क्षण के लिए अगर मान भी लें कि मशीनें मानवजाति की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है तो भी इनका कार्य उत्पादन के विशिष्ट क्षेत्रों पर ही केन्द्रित होगा । और आपको वितरण का नियमन करने के लिए एक जटिल व्यवस्था अलग से करनी होगी । इसके विपरीत, जिस क्षेत्र में जिस वस्तु की आवश्यकता है अगर वही उसका उत्पादन और वितरण दोनों किये जाएं तो इनका नियमन स्वयंमेव हो जाता है और उसमें धोखाधडी की गुंजाइश कम रहती है और सट्टेबाजी की तो बिल्कुल नहीं ” (हरिजन 2.1.1934)

उन्होंने कहा कि ” जब उत्पादन और उपभोग दोनों स्थानीकृत होते हैं तो उत्पादन में अंधाधुंध और किसी भी कीमत पर बृद्धि करने की लालच समाप्त हो जाता है । तब हमारे वर्तमान अर्थ तंत्र की सभी अनंत कठिनाइयां और समस्याए समाप्त हो जाएगीं । ”

समस्या का समाधान प्रकृति से सामंजस्य बिठाने में है न कि इससे भिडने में । विश्व के समक्ष खडी संकट के समाधान के लिए जीव और प्रकृति के संबंधों को उसी तरह पुनः परिभाषित करना होगा जैसा कि भारत में हजारों साल से किया जा रहा है । खंड- खंड दृष्टि जीवन को भी खंडित करती है और दुःखों का भी मूल है । महात्मा गांधी का दर्शन वह एकात्म दर्शन है जो मनुष्ट को सुखी बनाता है और प्रकृति का संरक्षण करता है।

1 thought on “अस्तित्व के संकट से जुझ रहे विश्व को संबल देता है गांधी दर्शन

  1. महात्मा गाँधी ने कहा था धरती के पास प्राणियों के आवश्यकता के लिए पर्याप्त है,पर उसके लालच केलिए नहीं. इस सदर्भ को आगे बढाते हुए यह कहना पड़ता है की जहां गाँधी दर्शन का अनुशरण करते हुए हम विश्व को मार्ग दिखा सकते थे,वहीं उससे अलग हट कर हम हमेशा के लिए पीछ्लाग्गु बन गए.गांधी ने कहा था की भारत के उत्थान के उदगम यहाँ के गाँव होने चाहिए.उन्होंने यह भी कहा था की वे मशीन के विरुद्ध नहीं हैं,पर मशीनीकरण के विरुद्ध अवश्य हैं उन्होंने कहा था की मशीनों को अपने पर हावी मत होने दो. पर हमारे संविधान निर्माताओं ने जिसमे सबसे प्रमुख नाम आताहै,डाक्टर अम्वेद्कर और पंडित नेहरू का,गाँधी के विचारों को दकियानुशी करार दिया और उसे भारत की उन्नति में बाधक माना.पर आज जब सिंहावलोकन कर रहे हैं तो लेखक श्री नन्द के साथ सहमत होना पड़ता है,और हमारे उन नेताओं की अदुर्दर्शिता सामने आ जाती है जिनके कन्धों पर भारत को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कराने का दायित्व था

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