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    Homeराजनीतिकाला कानून था,विकास प्राधिकरणों की कंपाउडिंग स्कीम

    काला कानून था,विकास प्राधिकरणों की कंपाउडिंग स्कीम

    संजय सक्सेना
        आम जनता के लिए बना कानून कब खास हो जाता है। यह बात हम आप लोगों को भले ही नहीं समझ में आए, लेकिन इससे फायदा उठाने वाले लोग संगठित अपराध की तरह ऐसे कानूनों की आड़ में खूब ‘फलते-फूलते’ हैं। उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों के विकास प्राधिकरण इसका जीता-जागता उदाहरण है। जहां हर तीन-चार साल के पश्चात आने वाली ‘कंपाउडिंग स्कीम’ के नाम पर प्रदेश भर के विभिन्न प्राधिकरणों में कुंडली मार कर बैठे अधिकारियों/कर्मचारियों और बिल्डरों की लाॅबी खूब लूट मचाती थी। यह ऐसा काला कानून था जिसमें कायदे-कानून से नक्शे के अनुसार मकान बनाने वाला अपने आप को ‘ठगा’ महसूस करता था वहीं बिना नक्शा पास कराए बड़ी-बड़ी बिल्डिंग खड़ी कर देने वाले ‘खास’ लोग सांठगांठ करके कंपाउडिंग स्कीम की आड़ मे अपने अवैध  कोठी-बंगले या फिर बिल्डिंग को वैध करा लेते थे। कहने को तो कंपाउडिंग फीस के नाम पर सरकार की भी ‘तिजोरी’ भरती है, लेकिन सरकार की तिजोरी में जाने वाली रकम ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ से अधिक नहीं होती है। बाकी की कमाई का ऊपर से लेकर नीचे तक बंदरबांट हो जाता था। एक तरह से कंपाउडिंग स्कीम का स्वरूप अतिक्रमण को सरकारी मान्यता मिलने से अधिक कुछ नहीं था। यह स्कीम किसी जिले के योजनाबद्व तरीके से हो रहे विकास के मुंह पर ‘तमाचा’ नजर आती है।  
          अच्छा ही हुआ जो इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बंेच ने फीस लेकर किसी भी अवैध निर्माण को नियमित करने की उत्तर प्रदेश सरकार की कंपाउंडिंग स्कीम-2020 को लागू करने पर रोक लगा दी है। 08 अक्टूबर 2020 को अपने महत्वपूर्ण आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और विकास प्राधिकरणोें को इस नई योजना पर अमल न करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह योजना अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट के प्रावधानों का उल्लंधन करते हुए अवैध निर्माणों को नियमित करने के उद्देश्य से बनाई गई है। यी फैसला न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्र ने शाहजहांपुर के मेहर खान अंसारी की याचिका पर दिया। कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव शहरी विकास से इस मामले में 20 अक्टूबर तक हलफनामा मांगा है। कोर्ट ने नाराजगी भरे शब्दों में कहा कि अधिकारियांे से अपेक्षा है कि वे अवैध निर्माणों को रोकेंगे न कि उन्हें बढ़ावा देंगे। ऐसी योजनाएं उन ईमानदार लोगों को हताश करने वाली हैं जो नियमों का पालन करकेे तहत भवन बनवाते है। ऐसे लोगों को नियमों का सख्ती से पालन करनेक के लिए बाध्य भी निर्माण की छूट दी जा रही है। यह आदेश नियम के विपरीत निर्माण करके बाद में कंपाउंडिंग फीस देकर उसे वैध कराने वाले बिल्डरों और भवनों स्वामियों के लिए झटका है।
          विद्वान न्यायाधीश अश्वनी मिश्र की कोर्ट का यह कहना बिल्कुल सही था कि सुनियोजित विकास से सिर्फ इस आधार पर समझौता नहीं किया जा सकता कि अवैध निर्माणों में बड़ी संख्या में प्राइवेट पंूजी का निवेश किया गया है। साथ ही अधिकारी ऐसी योजना नहीं बना सकते, जो एक्ट  के प्रावधनों के विपरीत हों इस नियम को लागू करने की अनुमति  देने से अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट लक्ष्य व उद्देश्य दोनों को नुकसान होगा। कोर्ट का साफ कहना था एक्ट की धारा 32 में कानून के तहत अवैध निर्माणों की कंपाउंडिंग करने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार को एक्ट के दायरे से भी बाहर ले जाने की अनुमति नहीं है। गौरतलब हो, 15 जुलाई 2020 को योगी सरकार द्वारा लागू की नई कंपाउंडिंग योजना-2020 में कहा गया था कि अवैध निर्माणों में काफी प्राइवेट पंूजी का निवेश होता है जिसका ध्वस्तीकरण न तो व्यावहारिक है और न उचित। इस लिए कंपाउंिडंग फीस लेकर अवैध निर्माणों को वैध किया जाना गलत नहीं है।
                 इलाहाबाद हाईकोर्ट के कंपाउडिंग स्कीम पर रोक लगाने से बिल्डर-अभियंता गठजोड़ को बड़ झटका लगा है,अवैध बिल्डिंगों को इस योजना के जरिये वैध करने का जो खेल वर्षो से चल रहा था,उसकी हवा निकल गई है। हाईकोर्ट के आदेश से उन छोटे-छोटे मकान मालिकों में खुशी की लहर दौड़ गई है जो अभियंताओं के भ्रष्टाचार के चलते दर-दर की ठोकरें खा रहे थे। हाईकोर्ट का आदेश आते ही प्रदेश भर के तमाम प्राधिकरणों में कंपाउडिंग स्कीम पर रोक लग गई है। कंपाउडिंग स्कीम पर रोक से पूरे प्रदेश के विकास प्राधिकरणों की बिल्डर-इंजीनियर लाॅबी को करारा झटका लगा है। हाईकोर्ट के आदेश से प्रभावित हुए लोगों का इसका ‘तोड़’ निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की भी संभावना से इंकार नहीं किया जाता सकता है। लखनऊ में ही करीब दो सौ शमन नक्शे की प्रकिया पर रोक लग गई। नक्शे की प्रकिया रूकने के बाद नए नक्शों के आवेदन भी नही लिए जा रहे हैं। बता दें, कंपाउडिंग स्कीम में  नियमोें को तोड-मरोड़ कर अवैध निर्माणों को वैध करने, सील खोलने और नक्शे पास करने का खेल तमाम विकास प्राधिकरणों में पिछले करीब एक माह से जारी था।शासन ने स्वयं शमन के लिए 1,62,184 बिल्डिंग चिन्हित की थी। लखनऊ में अभी तक 183 लोगों ने शमन मानचित्र के लिए 11.50 करोड रुपये जमा किए हैं। आवास विभाग अब 20 अक्तूबर को हाईकोर्ट में जवाब देने के लिए मंथन कर रहा है। शासन ने शमन योजना 2020 तैयार कराने से पहले फरवरी 2020 में आपत्ति व सुझाव मांगे थे। तमाम विकास प्राधिकरणों व बिल्डरों ने आपत्ति व सुझाव दिए थे। सुनवाई के बाद आवास विभाग ने योजना को अंतिम रूप देने के बाद कैबिनेट की मंजूरी कराते हुए आदेश जारी किया था।
        बात कंपाउडिंग स्कीम की आड़ में चल रहे गोरख धंधे की कि जाए तो बिल्डर इस मामले में फायदा उठा रहे थे,जबकि वास्तविकता में यह योजना उन लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए थी, जिनका स्वीकृत मानचित्र से थोड़ा-बहुत विचलन करके निर्माण कर लिया गया था। बात यहीं तक सीमित नहीं थी। एक तरफ विकास प्राधिकरणों का स्टाफ बिल्डरों से मोटी कमाई कर रहा था वहीं  आवास विकास परिषद छोटे-छोटे मकानों को नोटिस देकर नई शमन नीति के तहत कंपाउंडिंग जमा करने के लिए विवश कर रहा था।
        उधर, योगी सरकार ने भी हाईकोर्ट के आदेश पर प्रदेश भर में शमन योजना के तहत अवैध निर्माण को वैध करने की प्रक्रिया पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। विशेष सचिव आवास माला श्रीवास्तव ने सभी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्षों को आदेश जारी करते हुए निर्देश भेज दिया है कि शमन योजना पर विधिक राय लेने के बाद आगे की कार्यवाही की जाएगी। शासनादेश में कहा गया है कि हाईकोर्ट के आदेश पर 15 जुलाई को जारी शमन नीति के आधार पर तात्कालिक प्रभाव से अग्रिम आदेशों तक स्थगित किया जाता है।  लखनऊ में ही करीब 20,000 से ज्यादा लोगों ने अवैध बिल्डिंग बना रखी है। इनमें अभी तक किसी ने शमन नहीं कराया है। 183 लोगों ने शमन मानचित्र और शुल्क जमा कराया है। लेकिन अभी तक इनकी बिल्डिंग भी शमन नहीं हो सकी है। इसमें से करीब 9 हजार बिल्डिंग ही शमन के योग्य है।
      31 दिसम्बर 2019 तक प्रदेश में कुल 3,52,326 लाख अवैध बिल्डिंग चिन्हित की गईं। इनमें से केवल 162184 बिल्डिग ही शमन के योग्य हैं। बाकी बिल्डिंग का शमन नहीं हो सकता। क्योंकि वह भू-उपयोग के विपरीत बनी हैं। जो शमन के मानक पर नहीं थी उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही गयी। लेकिन कुछ नहीं हुआ।  राजधानी में करीब 11 हजार आवासीय भूखण्डों पर दुकानें, शोरूम, रेस्टोरेंट, अस्पताल व स्टोर चल रहे हैं। किसी को भी नहीं तोड़ा गया। हाल यह है कि कंपाउडिंग स्कीम में भी बड़े पैमाने पर खेल होते हैं। जिस बिल्डिंग में पार्किंग नहीं होती उसका भी शमन हो जाता है। नक्शे में पार्किंग दिखाकर शमन कर दिया जाता है। कागजों में शमन के बाद बिल्डिंग नियमित हो जाती है लेकिन मौके पर वह उसी तरह खड़ी रहती है। जबकि शमन के समय अवैध हिस्से को गिराना होता है। जो बिल्डर व व्यवसायी नहीं करते हैं। कुल मिलाकर कमपाउडिंग का मतलब है जोड़ना और इसका दूसरा मतलब है मुनाफे पर मुनाफा कमाना।

    संजय सक्‍सेना
    संजय सक्‍सेना
    मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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