लेखक परिचय

रवि श्रीवास्तव

रवि श्रीवास्तव

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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railway

रेलवे में खाने पीने की व्यवस्था को लेकर हमेशा सवाल उठते आए हैं। कभी खाने में कुछ कमी तो कभी पीने के पानी में। आज हम आप के सामने एक ऐसी तश्र्वीर ला रहे हैं। जिसका नाता रेल विभाग से नही पर यात्रियों के लिए ख़तरनाक जरूर है। कैसे पीने के पानी का गोरखधंधा चलता है। कैसे पीने के पानी की बोतल को एक टेप के जरिए दोबारा से सील किया जा रहा है।

रेलवे स्टेशन पर गाड़ी के पहुंचते ही ठण्डे पानी की बोतल को लेकर दौड़ते लोगों के हाथ कितना शुद्ध पानी है। इसकी जानकारी आप को ये फोटो बता रही है। जिसे देखकर एक बार आप दंग रह जाएगें। ये फोटो नवाबों के शहर कहे जाने वाले लखनऊ की है। चारबाग रेलवे स्टेशन की। स्टेशन के बाहर निकलते ही बाएं तरफ के टिकट काउंटर के पास से सी गई ये तश्र्वीर चीखकर कह रही है रेलवे स्टेशन पर पानी बेच रहे लोगों या दुकानों पर कितना शुद्ध पानी होगा ?

किस तरह से स्टेशन पर बैठ ये लड़का बिना किसी खौफ के पानी की बोतल को टेप से सीलकर दोबारा बेचने के लिए तैयार कर रहा है। आते जाते यात्रियों की नज़र उसपर पड़ रही है। यहां तक रेलवे सुरक्षाकर्मी के निगाहें भी पड़ी। लेकिन उसपर इस बात का कोई फर्क नही पड़ा। किसी पुलिस वाले ने पूंछा की ये क्या कर रहे हो ? निडरता उस लड़के की इतनी की फोटो खीचनें पर कहता है और खींच लो इतने में क्या होगा ?

दो लड़को के इस ग्रुप ने कई बोरी को ले जाकर किसी दूसरे स्थान पर रख दिया। जब लोगों की ज्यादा भीड़ शुरू होने लगी तो दोनों धीरे-धीरे चंपत हो गए। ये एक स्टेशन की बात है। ऐसे न जाने कितनी जगहों पर होता होगा। जरूरी नही सिर्फ पानी का ये गोरखधंधा रेलवे स्टेशन पर ही चलता हो। बस स्टेशनों और कई दुकानों पर हो सकता है। गर्मी के इस तेज धूप में अपनी प्यास बुझाने से पहले बोतल खरीदते समय ठीक से देख ले कहीं प्रयोग की गई बोतल तो नही खरीद रहे हैं।

शुद्ध पानी के नाम पर पूरा पैसा लेकर आप को कैसा पानी मिल रहा है इसकी जांच खुद करें। बोतल पर लिखा रेल नीर को देखकर भरोसा न करें। ये जरूर देखें कि बोतल को दोबारा से किसी टेप आदि के जरिए पैक तो नही किया गया। उस लड़के के पास कई कम्पनियों की बोतल पड़ी थी। जिसमें उसने पानी भर रखा था। साथ ही दोबारा से बोतल को रिफल कर रहा था। आप के जेब से बोतल पर लिखा प्रिंट का मूल्य देना पड़ता है।

लेकिन ये महाशय पानी कहा से भरकर लाए और कितना शुद्ध फिल्टर किया हुआ है इसका कोई पता नही। इस पूरी बात को पूंछे जाने पर अपना ताम-झाम उठाया और चलते बने। आप को बता दे ये वो पानी की बोतल है जिसे हम प्रयोग कर सही सलामत फेंक देते हैं। जो इनके लिए दोबारा से गोरखधंधे को चलाने का काम करती है। उसी बोतल को उठाकर धुलते हुए पानी भरकर बेचते हैं। जिसे हम शौक से पीते है। हमें पता है कि हमने फिल्टर का पानी पिया है।

बोतल का प्रयोग कर उसे तोड़कर फेके। जिससे उसका दोबारा से इस्तेमाल न किया जा सके। थोड़ी खुद सावधानी बरतें। नही तो ये पानी कही बन न जाए आप की परेशानी?

रवि श्रीवास्तव

One Response to “ये पानी कहीं बन न जाए परेशानी ?”

  1. Anil Gupta

    पिछले दिनों किसी ने सुझाव दिया था की प्रत्येक रेलवे स्टेशन पर केवल कुछ लाख रुपये की लागत से ‘आर ओ’ सिस्टम लगाया जा सकता है जिससे कोई भी यात्री शुद्ध पेय जल केवल एक या दो रूपये में एक बोतल ले सकता है.केवल कुछ दिनों में ही प्लांट की लागत वसूल हो जाएगी! लेकिन ऐसा न करके यात्रियों को या तो नकली ‘शुद्ध’ जल की बोतल खरीदने को विवश किया जाता है या ‘रेल नीर’ के नाम से ऊँचे मूल्य पर जल बेचा जाता है!

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