लेखक परिचय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मीणा-आदिवासी परिवार में जन्म। तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष बाल-मजदूर एवं बाल-कृषक। निर्दोष होकर भी 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे। जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! 20 वर्ष 09 माह 05 दिन रेलवे में मजदूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, नक्सलवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म, दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक उत्पीड़न सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्लेषक, टिप्पणीकार, कवि, शायर और शोधार्थी! छोटे बच्चों, वंचित वर्गों और औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (BAAS), राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स एसोसिएशन (JMWA), पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा/जजा संगठनों का अ.भा. परिसंघ, पूर्व अध्यक्ष-अ.भा. भील-मीणा संघर्ष मोर्चा एवं पूर्व प्रकाशक तथा सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)।

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

केरल तिरूअनंतपुर से एक खास खबर है, कि ‘‘दलित रिटायर हुआ तो रूम को गोमूत्र से धोया’’ जिसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिण्ट मीडिया ने दबा दिया और इसे प्रमुखता से प्रकाशित या प्रसारित करने लायक ही नहीं समझा| कारण कोई भी समझ सकता है| मीडिया बिकाऊ और ऐसी खबरों को ही महत्व देता है, जो उसके हितों के अनुकूल हों| दलितों के अपमान की खबर के प्रकाशन या प्रसारण से मीडिया को क्या मिलने वाला है? इसलिये मीडिया ने इसे दबा दिया या बहुत ही हल्के से प्रकाशित या प्रसारित करके अपने फर्ज की अदायगी करली, लेकिन यह मामला दबने वाला नहीं है| खबर क्या है पाठक स्वयं पढकर समझें|

खबर यह है कि देश के सामाजिक दृष्टि से पिछड़े माने जाने वाले राज्यों में किसी दलित अधिकारी का अपमान हो जाए तो यह लोगों को चौंकाता नहीं है, लेकिन सबसे शिक्षित और विकसित केरल राज्य में ऐसा होना हैरान करता है| यह सोचने को विवश करता है कि सर्वाधिक शिक्षित राज्य के लोगों को प्रदान की गयी शिक्षा कितनी सही है?

खबर है कि केरल राज्य के तिरूअनंतपुरम में एक दलित अधिकारी के सेवानिवृत्त होने के बाद उसकी जगह आए उच्च जातीय अधिकारी ने उसके कक्ष और फर्नीचर को शुद्ध करने के लिए गोमूत्र का छिड़काव करवाया| दलित वर्ग के ए. के. रामकृष्णन 31 मार्च को पंजीयन महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे| उन्होंने उक्त बातों का पता लगने पर मानव अधिकार आयोग को लिखी अपनी शिकायत में कहा है कि उनके पूर्ववर्ती कार्यालय के कुछ कर्मचारियों ने मेज, कुर्सी और यहां तक कि कार्यालय की कार के अंदर गोमूत्र छिड़का है| इस घटना की जांच की मांग करते हुए उन्होंने मानव अधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया है|

रामकृष्णन ने कहा कि ‘‘कार्यालय और कार का शुद्धिकरण इसलिए किया गया, क्योंकि वह अनुसूचित जाति (दलित वर्ग) से हैं और यह उच्च जातीय व्यक्ति द्वारा जानबूझकर किया गया उनके मानव अधिकार एवं नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों का खुला उल्लंघन है|’’

दलित वर्ग के ए. के. रामकृष्णन की याचिका के आधार पर मानव अधिकार आयोग ने मामला दर्ज कर राज्य सरकार के कर-सचिव को नोटिस भेजा है| इसका जवाब सात मई तक देना है|

दलित वर्ग के ए. के. रामकृष्णन का कहना है कि ‘‘मैं इस मामले को सिर्फ व्यक्तिगत अपमान के तौर पर नहीं ले रहा हूँ| यह सामाजिक रूप से वंचित समूचे तबके का अपमान है| यदि एक सरकारी विभाग में शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है तो निचले पायदान पर रहने वाले आम लोगों की क्या हालत होगी?’’ उन्होंने बताया कि ‘‘पंजीयन महानिदेशक के पर पर पिछले पांच साल का उनका अनुभव बहुत खराब रहा है|’’

इस मामले में सबसे बड़ा और अहम सवाल तो यह है कि नये पदस्थ उच्च जातीय अधिकारी को गौ-मूत्र ये कार्यालय की सफाई करने के लिये कितना जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्योंकि उन्होंने तो वही किया तो उन्हें उसके धर्म-उपदेशकों ने सिखाया या उन्हें जो संस्कार प्रदान किये गये| ऐसे में केवल ऐसे अधिकारी के खिलाफ जॉंच करने, नोटिस देने या उसे दोषी पाये जाने पर दण्डित करने या सजा देने से भी बात बनने वाली नहीं है|

सबसे बड़ी जरूरत तो उस कुसंस्कृति, रुग्ण मानसिकता एवं मानव-मानव में भेद पैदा करने वाली धर्म-नीति को प्रतिबन्धित करने की है, जो गौ-मूत्र को दलित से अधिक पवित्र मानना सिखाती है और गौ-मूत्र के जरिये सम्पूर्ण दलित वर्ग को अपमानित करने में अपने आप को सर्वोच्च मानती है| इस प्रकार की नीति को रोके बिना कोई भी राज्य कितना भी शिक्षित क्यों न हो, अशिक्षित, हिंसक और अमानवीय लोगों का आदिम राज्य ही कहलायेगा|

26 Responses to “ये है हमारे देश का धार्मिक चरित्र-दलित रिटायर हुआ तो रूम को गोमूत्र से धोया!”

  1. uday sagar

    मधूसुदन जी अगर मेरे बेटे की शादी आपकी बेटी से हो जाये तो तो क्या बच्चे पैदा नहीं होंगे मैं दलित हूँ और एक ब्राहमण की बेटी से शादी की थी आज मेरे चार बच्चे हैं जहाँ से आप खाते और हगते है वहीँ से मैं और मेरे बच्चे खाते हगते हैं और ऐसा कौन सा काम है जो आप कर सकते हैं और मैं नहीं कर सकता हूँ मैं दावे के साथ कह रहा आपसे एक काम ज्यादा कर सकता हूँ आपके अनुसार गीता रामायण हिन्दुओं के पवित्र ग्रन्थ हैं उनमे कहीं भी नहीं लिखा है की मानव मानव से जातिवाद का भेदभाव करे उनको आप पड़ते तो हैं पर पालन नहीं करते उनमे भगवानों के आदेश लिखे हैं लेकिन आप गीता रामायण को मानते तो हैं पर अमल नहीं करते यानी आप अपने धर्म का पालन भी नहीं करते यदि जो आप कहरहे हैं की यही सच है तो तो आपसे ज्यादा नीच और दलिद्र कोई नहीं हो सकता आपको भारत तो क्या इस संसार में भी रहने की जगह नहीं मिलनी चाहिए क्यों की संसार के किसी भी देश में भारत को छोड़कर कहीं भी जातिवाद नहीं है मुझे आप पर तरस आरहा है भगवान् आपको सदबुध्धि दे

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  2. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    are-are purohit jee aap to naaraz ho gaye..kintu jara apni tippdiyon par gaur kariye ki baamsef au apni ginaai kitaabon ke maarfat jaatiwaad ko is maamle men ghusaane ki shuruwaat kisne ki thi………….

    dil pe mat liya kariye …kaun padhta hi hai hamaare-aapke is bilawajah ke kramshah tark au rastha ko……..shukr hai logon ko aur bhi kaam hai….meri tarah log khalihar nahi…..

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  3. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    अनर्गल प्रलाप करने से बेहतर है की आप तथ्याताम्क बात रखे अखिल साहब ,जातिवादी सोच का जो कीड़ा आपके दिमाग में घुसा हुवा है उसके कारन अप हर जगह जातिवाद ही नजर आता है आपके पास कोई ज्यादा जानकरी हो तो देदेवे न की मेरी जाती के बारे में निर्णय करे ………………तथ्य,तर्क व् भावना तनो के साथ बात करे न की सिर्फ अपनी ग्रिनास्पद भावना जो “पुरोहित” के खिलाफ आपके मन में नजर आते है……………

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  4. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    वाह रे अभिषेक पुरोहित साहब, आप जैसे ही लोगों के बारे में किसी विद्वान् की उक्ति है की ”कट्टरपंथी एक आदमी होता है जिसके दो ही आँखें और दो ही पैर होते हैं लेकिन वो देखता पीछे (अतीत) की ओर और चतला उलटे पांव है” सब घटना हो गई लेकिन हम मानेंगे नहीं…..ये तो कुछ-कुछ वैसी बात हुई की ”पंचों का फैसला सर-माथे पर लेकिन खूंटा वही गड़ेगा”…..माना की सत्य अप्रिय होता है, किन्तु कब तक इस सच्चाई से मुह छुपाइयेगा पुरोहित जी….खैर आपकी भी क्या गलती…..आप तो ”पुरोहित जी” मानेंगे नहीं….पुरोहित जो ठहरे…

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  5. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    ये बम सेफ व् कम्युनिस्ट व् ईसाई लोग योजना से भ्रम फैला कर ब्राहमण समाज को विदेशी आर्य सिद्ध करने को तुले है इनके ग्रंथो में भयंकर व् बहुत ही भद्दी टिप्पणीया ब्राहमण समाज व् राम कृष व् दत्तात्रेय पर होती है अत्यंत की lajjaspd किताबे ये लोग अपने अनुयायियों में बताते है पूरी तरीके से फर्जी इतिहास को बाते जाता है
    मेरा प्रश्न आदरणीय पुरुषोतम जी मीणा से है की
    वो क्या “देवता,झूठे देवता ,शुद्र ओउर अछूत” पुस्तक भाग प्रथम लेखक स्वपन कुमार विस्वास प्रकाशक मूलनिवासी पब्लिकेशन ट्रस्ट नै दिल्ली ,अनुवाद माम चन्द गौतम {वरिष्ट कर्य्कातर बामसेफ} सम्स्क्रिन द्व्तित २००८ के पृष्ठ १५-१६ पर मत्स्य भगवान पर की गयी टिपण्णी से सहमत है क्या??
    जवाब देना या न देना आपकी इच्छा पर निर्भर है agar aapake paas पुस्तक nahi है yaa apane nahi padhi है पर जवाब देना chahenge to mai us टिपण्णी को yaha पर likh bhi dunga.मेरा puchane ka udhdheshy keval iatana है की matshy bhagavan को jo बामसेफ की पुस्तक manati है vaisa ap bhi manate है क्या??
    shubhakamao के sath

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  6. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    अरे इतना बड़ा कमेन्ट लिखा वो कहा गया??संपादक जी अपने हटा दिया या मेरे नेट में problam की vajah se prakashit na हो paya??कृपया पता हो तो जरुर बताये ,ताकि मुझे पता चले की कही मेरे नेट में समस्या तो नहीं है ,अपोको उचित नहीं लगा तो कोई बात नहीं…………..

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  7. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    पहले हम यह देखते है की इस घटित कथित घटना के स्त्रोत कहा कहा पर व् किन की के पास है
    १.http://pakistan33.blogspot.com/2011/04/india-car-of-retired-dalit-officer.हटमल

    २.http://atrocitynews.wordpress.com/2011/04/10/2500-years-of-curruption-cow-urine-cleans-it-where-is-that-damm-indian-where-is-anna-hazare/

    ३.http://trendsupdate.com/2011/04/07/dalit-officers-urine-splashed-purified-cell/

    ४.http://www.allvoices.com/s/event-8731927/aHR0cDovL3Njc3RlbXBsb3llZXMuYmxvZ3Nwb3QuY29tLzIwMTEvMDQvc2Mtb2ZmaWNlci1yb29tLWNsZWFuc2VkLWJ5LWNvdy1kdW5nLmh0bWw=

    ५.http://navbharattimes.indiatimes.com/opinions/7899715.कम्स

    ६.http://sdpi.in/portal/story/kerala-retired-dalit-officers-room-and-vehicle-cleansed-cow-dung-वाटर

    ७.http://newspolitan.com/forum/art/india/thiruvananthapuram/GI4DQMR2HA4ECVCL

    ८.http://www.bihardays.com/6nation/india-shining-india-corroding-dalit-officials-furniture-ritually-cleansed-after-retirement/
    ९.http://www.popularfrontindia.org/pp/story/kerala-retired-dalit-officers-room-and-vehicle-cleansed-cow-dung-वाटर
    १०.http://www.indianexpress.com/news/retired-dalit-officers-car-and-furniture-cleansed/773288/
    ११.http://furniture.seafar.com/office-furniture/2011/04/retired-dalit-officers-car-and-furniture-cleansed/
    १२.http://www.expressindia.com/latest-news/Retired-Dalit-officers-car-and-furniture-cleansed/773288/
    १३.http://www.manoramaonline.com/cgi-bin/mmonline.dll/portal/ep/contentView.do?contentId=9118719&programId=1080132912&channelId=&BV_ID=@@@
    १४.http://www.rediff.com/news/report/retired-dalits-office-cleansed-with-cowdung-water/20110407.htm
    १५.http://www.khaleejtimes.com/displayarticle.asp?xfile=data/international/2011/April/international_April404.xml&section=international&col=

    मेने ये सारे लिंक इस लिए दिए है की आप लोगो इस खबर के बारे में कुछ ज्यादा बता सकू लेकिन बहुत ज्यादा धुन्धने के बाद भी मुझे लगभग सभी स्टोरी एक जैसी ही नहीं एक जैसे शब्दों की मिली मेने सोच शायद मेरा भ्रम हो इस लिए बार बार पढ़ा ,क्या कोई मुझे बताएगा किसी भी खबर को सरे अखबार या सरे मिडिया के सोर्स एक ही शब्श: भाषा में छापते है??
    अब आप पूछा सकते है उससे क्या साबित होता है??
    कोई शाजू फिलिम नाम के एक क्रिशाचन व् टी वि देवसिया नाम के खलीज टेम्स में लिखने वाले पत्रकार बंधू के है jisame शाजू साहब तो खुले आम अपने क्रिश्चन बिरादरी के समर्थन में लिखने वाले है ओउर देवसिया साहब की भी विचारधारा ये ही लगाती है इससे इस खबर की तथ्यात्मक सत्यता व् सके पीछे के षडयंत्र को आसानी से समझा जा सकता है |

    १.मै अपने घर में अपनी कार में क्या करता हु उसका बहार वाले को क्या मतलब??क्या देश में तानाशाही है क्या जो मुझे बाध्य करेगी की में अपने घर में ये ये करू??

    २.ये साहब कहते है की मुझे बहुत अपमानित होना पड़ा ,क्यों मजाक करते हो??सरकार में साहब क्या चीज होती है ये भी शायद बताना पड़ेगा?? कहने का मतलब यह है की किसी अदने से कर्मचारी की क्या ओकात की साहब के शान में गुस्ताखी करे ????अधिकारी अधिकारी होता है usake पास बहुत takat होती है जरा से vyavahar में dosh hone पर vah किसी भी कर्मचारी को nilambit karane की sifarish कर सकता है

    ३.अगर कोई भी अधिकारी achchha vyavahar करता है तो उसके matahat karmchari भी tarif करते है उसके jane के बाद भी,इस घटना जो घटित huyi या नहीं pata नहीं पर अगर घटित huyi भी है तो उसमे chote स्तर के karmchariyo की साहब के prati grina ज्यादा jhalakati है जो उनके sc होने के कारन नहीं उनके ख़राब vyvahar के कारन huyi लगती है ,जिसे ये साहब अपनी राजनीति chamakane में lagana chahate है .

    ४.अगर किसी ने बामसेफ अदि संघटनो के बारे में थोडा भी पढ़ा है तो उसे जानकारी हो jayegi की कैसे अरक्षित वर्ग के बंधुओ को सामान्य वर्ग के बंधुओ के khilaf golbandh karane का प्रयास हो raha है उसके के boudhik तर्क jutane में इसी वास्तविक या काल्पनिक घटनाये बहुत ज्यादा maddagar रहती है उसके पीछे के तथ्य या वास्तविकता क्या है उसे janane की जरुरत na होकर एक प्रकार के कालपनिक अत्याचारों का खाका khicha जाता है ताकि अपनी दुकान या कहे राजनीती चल सके ,उससे samgr समाज को कितना nukasan होता hia isaka akalan karane की jahamat kon uathaye ,हमें तो बस अपनी राजनीतक दुकान चलानी है.

    ५.सबसे ज्यादा durbhagy purn pahalu यह है की क्रिशाचन मिशनरिया इस काम में इसे भ्रमित बंधुओ को “तर्क,तथ्य,paisa,सत्ता की पावर,फर्जी इतिहास अदि मुहय्या कराती है जबकि krsichan बन चुके लोगो का जीवन स्तर अभी कैसा है इसे छुपाया जाता है

    ६.इस प्रकार के लोगो का यह प्रयास रहता है की कैसे भी हो सरकारी दफ्तरों का माहोल जातिवादी सोच से ख़राब हो जाये ,ताकि जाती के सम्मान्न या प्रतिष्ठा के आड़ में बुधि के तर्क शून्य हो जाये ,कानूनन बात लुप्त हो जाये ओउर कोई राजनेता अपने फायदे में उसका इस्तेमाल कर सके.
    ७.अपने राजस्थान में भी धीरे धीरे एसा माहोल बनाने की कोशिश हो रही है ,सामान्य obisi के मिशन-७२ व् आरक्षित बंधुओ के संघटनो ने अपनी अपनी जोर अज्मयिश शरु कर दी है जबकि कानून क्या कहता है संविधान क्या कहता है किसे सुनना है??यहाँ तो अपनी सख्या बल के दुरूपयोग में कानून भी बदल सकता है |
    ८.फर्जी विवाद भी बनाया जा रहा है ताकि कुछ लोगो को राजनीति में पैठ बनाना असं हो सके |
    ९,किसी भी कोण से यह लेख ,इस घटना व् इसे दायर करने वाले साहब रामजी कोई सामाजिक सुधारक नहीं balki एक कुशल राजनेता नजर आते है जिनका तात्कालिक मकसद भले ही कयुनिस्तो को या कोंग्रेस को फायदा पहुचना हो वहा पर {वहा की स्थानीय राजनीति के अनुसार} पर लम्बे समय में अपनी गोटिया राजनीति में फिक्स करना है इस खबर को लोग भूल जायेंगे कुछ साल बाद एक नए “सामाजिक न्याय” के महँ नेता का नाम होगा ओउर वे ये राम जी होंगे
    हमारी शुभकामनाये इन रामजी के साथ है …………………….आखिर राम व् कृष्ण हमारे अराध्य जो है…………..ये भारत है यहाँ सब चलता है ………….

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  8. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    डॉक्टर मीणा जी, बिंदुओं पर टिक कर कुछ विचार किया जा सकता है। बात क्रियान्वयन की है, दर्शन शास्त्र की नहीं।मेरे प्रश्न फिरसे दोहराता हूं।

    मीणा जी आप कहते हैं, कि====> “और मैं अन्त में यही कहना चाहूँगा कि हमें यथार्थ को स्वीकार करके सच्चाई का साथ देना चाहिये| तब ही हम कुछ हासिल कर सकते हैं और देश का उत्थान कर सकते हैं|” <====
    प्रश्न(१) : तो मीणा जी मैं जानना चाहता हूं, कि यथार्थ को स्वीकार करके, सच्चाई को साथ देने के बाद आपका अगला चरण क्या होगा?
    प्रश्न (२) "कुछ" हासिल करने की विधि-प्रक्रिया-प्रणाली क्या होगी? आपने इन प्रश्नों के विषय में क्या सोचा है?
    कोइ प्रक्रिया, सोची गई है?
    (३) मैं मानकर चलता हूं, कि संघकी प्रक्रिया का क्रियान्वयन आपके कथनानुसार
    पूर्ण रूपसे हो नहीं रहा। आपके पास कौनसा मार्ग है? जो आपकी दृष्टिमें संघके मार्गसे अधिक अच्छा है। वह मार्ग कहीं पर अपनाया गया है?
    आपकी सोच जानने की इच्छासे ही लिखा है।
    मेरे प्रश्नों को उद्धरित कर के उत्तर की उचित अपेक्षा है।

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  9. Indian

    दिनेश जी, ये अत्यधिक आश्चर्यजनक सत्य है, कि इंसान से अधिक मान्यता गाय के मूत्र से अधिक है! और ये अत्यंत क्षोभनीय है कि किसी दलित के कमरे को पवित्र करने के लिए मूत्र का उपयोग किया गया! ये जाति प्रथा सदियों से भारत का अभिन्न अंग रही है! यदि ऐसा न होता तो सूर्य पुत्र होने के बाद भी कर्ण को सूत पुत्र न कहा गया होता! एकलव्य को भील जाति का होने के कारण शिक्षा से वंचित न किया गया होता! और युधिष्टिर तो युवराज पद के लिए अयोग्य मान लिए जाते यदि उन्होंने परीक्षा के तौर पर हस्तिनापुर महासभा में एक ही व्यक्ति की हत्या के लिए अलग अलग जातियों के ४ व्यक्तियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) को अलग अलग दंड न दिया होता! आप के विचार संघ के अनुसार है! क्या आप ये बताएँगे की देवदासी प्रथा और सती प्रथा शुरू करने में किस अँगरेज़ या मुग़ल शासक का हाथ था? संघ आज से नहीं मौजूद है बल्कि ये अत्यंत प्राचीन काल से भारतीय समाज में मौजूद है! पौराणिक काल में मनु और अन्य ब्रह्मण के रूप में, जब नीची जातियों के व्यक्तियों को शिक्षा देना गलत था! प्राचीन भारत में धूर्त ब्राह्मणों के रूप में जब जाति प्रथा चरम पर थी और आधुनिक काल में संघ के रूप में! इतने रूप बदलने के एक ही कारण थे और वो है सत्ता! क्योंकि अब संघ को वापस सत्ता में आना है और उसे सवर्णों का समर्थन पर्याप्त नहीं पड़ रहा है इसलिए वो दलितों के साथ होने का ढोंग कर रहा है! भारतीय समाज के इसी अतीत के कारण ही भारत पहले मुगलों के फिर अंग्रेजो के अधीन हुआ! यदि अतीत इतना ही स्वस्थ और प्रबल होता तो भारत गुलाम न बनता! जब तक भारत का अतीत प्रबल था तब तक भारत को शक और हूण जैसे आक्रमणकारी गुलाम नहीं बना पाए!

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  10. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी,
    सादर प्रणाम|

    आप से निवेदन है कि “आर एस एस” की मानव मानव में विभेद करने वाली विचार-विभ्रमता और कथित हिंदुत्व के जन्मजात वैचारिक मोहपाश से बाहर निकलकर और बिना पूर्वाग्रह के भारत को और भारतीयों के, बल्कि इससे भी आगे मानवता के हालातों को देखें! भारत में मात्र दस फीसदी आर्यों के नजरिये से नहीं, बल्कि अनार्यों के नजरिये से भी (बल्कि ही) देखें, आपको सब कुछ अपने आप स्वत: ही दिखेगा, कद कदम दिखने लगेगा और यदि आप अनार्यों के नजरिये से देखने में सक्षम नहीं हैं (यह मेरा केवल काल्पनिक सवाल है) तो मेरा आपके द्वारा उठाये सवालों के बारे में, प्रतिउत्तर स्वरुप विस्तार से लिखने का कोई औचित्य नहीं है.

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, वैसे आप जैसे मनीषी को यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि मनोविज्ञानीयों और मानव-व्यवहार-शास्त्रियों ने हर देश में अनेकों बार इस बात को सिध्द किया है कि सामान्यत: किसी भी सामान्य व्यक्ति को वही दिखाई देता है, जो कि वह वास्तव में देखना चाहता है! क्योकि सामान्य व्यक्ति के विचारों की लगाम जन्म से, परिवार से और विरासत से संस्कारित अपने अवचेतन मन के नियंत्रण में होती है. ये सब बातें मेरे ऊपर और हर एक के ऊपर सामान रूप से लागू होती हैं!

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, इस अवचेतन मन को निरपेक्ष मानवीय और नैसर्गिक दिशा में परवर्तित करके बदल देने में सक्षम कुछेक ऐसे मनीषी भी संसार में होते हैं जो सच्चाई का न मात्र शोधन और अवलोकन करते हैं, बल्कि साथ ही साथ सच्चाई का हर दशा में समर्थन भी करते है! महादेव शिव, महात्मा बुध्द, नटवर नागर कृष्ण, महावीर स्वामी, परम हंस, स्वामी दयानंद, ओशो रजनीश चन्द्र जैसे अनेक महामानव इस सच्चाई को साकार करके और अपने आचरण तथा व्यवहार से प्रमाणित करके संसार को नया और सच्चा रास्ता दिखाते रहे हैं!

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, इसके आलावा मेरा यह भी निवेदन है कि जिस पवित्र भाव से आपने पूछा है, मेरे लिखे को (प्रतिउत्तर को) प्रवक्ता के मंच पर, उसी पवित्र और निरपेक्ष भाव से स्वीकार करके चिंतन, मनन और शोधन करने वाले कितने हैं? इसलिए इस विषय पर यहाँ अधिक लिखना समीचीन और युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता है. वैसे आप मुझे कई महीनों से पढ़ रहे हैं, जहाँ तक मुझे याद है, आप अनेक बातों पर मुझसे सहमत भी रहे हैं, फिर भी आप आज भी उसी विचार को सर्वोत्तम मानते हैं, जो सम्पूर्ण भारतीयों (90 फीसदी से अधिक) की दुर्दशा का हजारों सालों से असली कारण रहा है!

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त एकान्तता (अनुच्छेद-21) एवं धर्मनिरपेक्षता (अनुच्छेद-25) के मूल अधिकार के तहत आप और मैं अपने विचारों के अनुसार जीवन जीने, अपने विश्वास को आस्था में परिवर्तित करने और उन्हें फ़ैलाने के लिए उतने ही आज़ाद और स्वतंत्र हैं, जितने कि सभी भारतीय, लेकिन सर्वशक्तिमान, संसार के नियंता के संविधान में चालकी, चतुराई और कूटनीति को कोई स्थान नहीं है. उसकी अदालत में हर किसी को एक ही तराजू में तुलना होगा? लेकिन तब कुछ भी करने (सुधारने) को शेष नहीं रहने वाला. अभी समय है, जब हम स्वयं को अपनी अंतर-आत्मा के दर्पण में देखकर, अपने चेहरे पर लगे सांसारिक कर्मों के दागों को धो सकते हैं. रास्ता एक ही है-नैसर्गिक! सर्वशक्तिमान के यहाँ पर हर प्रजाति में केवल दो जातियां हैं-“नर” और “मादा”! इन्हें हिन्दू, इस्लाम, ईसाई आदि में बांटकर लड़ाने वाले पंडित, पुरोहित, मौलवी, पादरी सारी समस्याओं की असली जड़ हैं, जिनसे लड़कर इनके व्यभिचारों का निराकरण करने कि लिए इस धरती पर महा मानव जन्म लेते हैं. जिन्हें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपना परिवार नज़र आता है.
    शुभकामनाओं सहित
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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  11. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    मीणा जी आप कहते हैं, कि====> “और मैं अन्त में यही कहना चाहूँगा कि हमें यथार्थ को स्वीकार करके सच्चाई का साथ देना चाहिये| तब ही हम कुछ हासिल कर सकते हैं और देश का उत्थान कर सकते हैं|” <====
    प्रश्न(१) : तो मीणा जी मैं जानना चाहता हूं, कि यथार्थ को स्वीकार करके, सच्चाई को साथ देने के बाद आपका अगला चरण क्या होगा?
    प्रश्न (२) "कुछ" हासिल करने की विधि-प्रक्रिया-प्रणाली क्या होगी? आपने इन प्रश्नों के विषय में क्या सोचा है?
    कोइ प्रक्रिया, सोची गई है?
    ==========================================
    मैं मानकर चलता हूं, कि संघकी प्रक्रिया का क्रियान्वयन आपके कथनानुसार
    पूर्ण रूपसे हो नहीं रहा। आपके पास कौनसा मार्ग है? जो आपकी दृष्टिमें संघके मार्गसे अधिक अच्छा है। वह मार्ग कहीं पर अपनाया गया है?
    आपकी सोच जानने की इच्छासे ही लिखा है।

    Reply
  12. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    भाई अखिल जी बस यही फर्क है आप जैसों में और हम जैसों में| आप तकरार की बात करते हैं और हम परस्पर मैत्री,प्रेम और सद्भावना की| मै यह नहीं कह रहा की निश्चित रूप से उस अधिकारी ने केवल स्वच्छता व पवित्रता के लिए ऐसा किया किन्तु निश्चित रूप से मै यह भी नहीं कैसा सकता उसने एक क्षुद्र का अपमान करने के लिए ऐसा कर्म किया| मैंने एक संभावना को देखा और उस पर विचार किया किन्तु आपने एक संभावना को सत्य घोषित कर एक कलह को जन्म दिया है| मै मानता हूँ की आज कल समाज में छुआछूत जैसी बुराइयां है किन्तु इसे आप या मीणा जी प्राचीन भारत की नीतियों या संघ से क्यों जोड़ देते हैं| आप मुझे बताएं की यदि एक जाती विशेष का व्यक्ति मुझे परेशान करे, मेरा अपमान करे, मुझे मार डाले तो क्या मै उसकी पूरी जाती को गालियाँ देने का अधिकारी हो गया? यह तो वही बात हो गयी की कोई भी दुर्घटना घटे तो संघियों पर, मनुवाद पर, ब्राह्मणवाद पर या समस्त हिन्दू समाज पर आरोप मढ़ दो| आप मुझे बताएं की यदि भारत में हज़ारों वर्षों से यही छोट छुअछोत को लेकर संघर्ष चलता रहा तो भारत तो हज़ारों वर्षों पहले ही ख़त्म हो जाना चाहिए था, फिर यही भारत विश्वगुरु कैसे बन गया, यही भारत सोने की चिड़िया कैसे बन गया?
    मेरे भाई बात दरअसल यह है की अंग्रेज जानते थे की किसी भी सभ्यता को नष्ट करना हो तो उसके मूल को नष्ट कर दो, बाकी काम अपने आप हो जाएगा| जिस प्रकार इसाइयत में पादरी, इस्लाम में मौलवी अपने अपने धर्म के पैरोकार हैं, धर्म गुरु हैं| वैसे ही ब्राह्मण भी हिन्दू समाज का धर्म गुरु ही रहा है| मैकॉले ने जब यह देखा की भारत में एक भी घर में ताला नहीं है, लोगों का चरित्र बड़ा बलवान है, लोगों में आपसी प्रेम है तो क्यों की वे ब्राह्मणों की नीतियों पर चलते थे ( और कोई भी धर्म हो अपने धर्मगुरुओं के कहे अनुसार चलता है, इस्लाम में फतवा निकल जाए तो किसी देश का संविधान भी कुछ नहीं कर सकता, किन्तु भारत में ऐसी हरकतें नहीं होती थी) तो उसने हिन्दुओं में आपस में फूट दाल दी और कारण बताया ब्राह्मणों को| जिसे ले क्र हम आज तक लड़ते आ रहे हैं|
    भाई थोड़ी तो अक्ल लगाओ, विश्व गुरु कहलाने वाला भारत क्या इस प्रकार के घटिया कर्मों से विश्व गुरु बना था?

    Reply
  13. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी,
    सादर प्रणाम|

    मैं आपका हृदय से सम्मान करता हूँ और आप जैसे लोगों की शुभाकांक्षा की अपेक्षाएँ भी रखता हूँ| इस आलेख में, मैं आरएसएस, ब्राह्मणवाद या मनुवाद की बात अपनी ओर से प्रारम्भ करने का कतई भी इच्छुक नहीं था, लेकिन एक तो प्रिय अनुज दिवस दिनेश गौर ने इस विषय को छेड़ दिया है और आपने तो सीधे-सीधे मुझे आरएसएस में शामिल होने के लिये आमन्त्रित ही कर लिया है| साथ ही साथ आपने भरोसा भी दिलाया है कि संघ में शामिल होने से सारी समस्याओं का समधान सम्भव है| ऐसे में आपके इस प्रस्ताव को बिना कोई कारण बताये ठुकराना आपको अपमान करना होगा| अत: मुझे आरएसएस में शामिल नहीं हो सकने के कारण तो आपको बताने ही होंगे|

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, मैं आपको और आरएसएस के प्रति निष्ठा रखने वाले सभी मित्रों की आस्था एवं विश्‍वास को पूर्ण सम्मान देते हुए, लिखने को विवश हूँ कि आप शायद आरएसएस की उच्चकोटि (यदि कोई है तो) की अपनी निष्ठा को ही आरएसएस का अन्तिम सत्य मान बैठे हैं| जमीनी हकीकत और आप जैसों के विचारों में धरती-आसमान का अन्तर है|

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, मैं आपको एक सत्य घटना के बारे में जानकारी देना चाहूँगा, जो अधिक पुरानी नहीं है| राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में दलित वर्ग की बलाई जाति के एक युवा ने संघ की गतिविधियों में बढचढकर भाग लिया और अपने क्षेत्र में खूब नाम कमाया| उसने अपनी जवानी के अनमोल वर्ष संघ के लिये समर्पित कर दिये| बदले में संघ के प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक के पदाधिकारियों ने संघ के अनेक कार्यक्रमों में उसे खूब सम्मानित भी किया| एक प्रकार से उसे ब्राण्ड बनाकर पेश किया गया कि दलित का संघ में कितना सम्मान होता है| मैं इससे सहमत नहीं कि संघ में बताया नहीं जाता कि कौन दलित है और कौन नहीं? वैसे भी व्यक्ति के सरनैम से सबुकछ पता चल ही जाता है| उक्त दलित संघी को संघ के कार्यक्रमों में यह कहकर खूब सम्मान दिया जाता था कि श्री…. को दलित होने के उपरान्त भी संघ में पूर्ण सम्मान प्रदान किया जा रहा है|

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, कई वर्षों के बाद एक दिन राष्ट्रीय एवं प्रदेश स्तर के कुछ संघ पदाधिकारियों का भीलवाड़ा में आगमन हुआ| उक्त दलित वर्ग के संघी ने, अपने वरिष्ठ संघियों की आवभगत हेतु अपने घर पर शुद्ध देशी घी में खाना बनवाया| विशेष रूप से स्थानीय पण्डित को बुलवाकर खाने बनाने की व्यवस्था की गयी| खाना बनाने के लिये उसने पड़ौसी से कुछ रुपये उधार भी लिये| जब सभी वरिष्ठ संघ प्रतिनिधि उक्त दलित संघी कार्यकर्ता के घर पहुँचे और वहाूं पहुँचने पर जैसे ही उन्हें ज्ञात हुआ कि भोजन की व्यवस्था की गयी है तो तत्काल उक्त दलित संघी को कहा गया कि-

    ‘‘एक जरूरी सन्देश प्राप्त हुआ है, हमें तत्काल जयपुर के रवाना होना होगा| आप भोजन को पैक करवा दें| रास्ते में खा लेंगे|’’

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, इस बात को जानकर उक्त दलित संघी कार्यकर्ता की सारी खुशी काफूर हो गयी, लेकिन उसने भोजन को पैक करके अपने वरिष्ठों की कार में रखवा दिया और सभी के चरणस्पर्श करके उनस भी का आशीर्वाद अवश्य लिया|

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, कुछ समय बाद किसी काम से उसे साईकल से अपने गॉंव से उसी रास्ते से जाना पड़ा, जिस रास्ते से वरिष्ठ संघ पदाधिकारियों की कारें गयी थी| उसे अपने गॉंव से कुछ किलोमीटर की दूरी पर पहुँचकर यह देखकर गहरा सदमा लगा कि सड़क के किनारे दलित संघी के घर का बना शुद्ध देशी घी का खाना ज्यों का त्यों पैक्ड ही फैंक दिया गया था| बाद में चर्चा करने पर उसे ये कहकर दिलासी दी गयी कि सार्वजनिक मंच पर एक साथ बैठना ओर बात है और आपके (दलित के) घर का बना खाना, आपके घर पर ही बैठकर खाना ओर बात है! इतना सुधार होने में अभी सैकड़ों वर्ष लग जायेंगे|

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, उसी समय से वह दलित युवा संघ को छोड़ चुका है और अपना पूरा जीवन संघ की असलियत उजागर करने में लगा रहा है|

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, मैं आपको सिर्फ विश्‍वास ही दिला सकता हूँ कि आप उक्त घटना की सच्चाई पर विश्‍वास कर सकें तो मैं समझूँगा कि आपको मेरी सत्यनिष्ठा के प्रति आस्था है!

    आदरणीय और श्रृद्धेय श्री मधुसूदन जी, ऐसे हालात में आपका आरएसएस में शामिल होने का आमन्त्रण स्वीकार करना मेरे जैसे व्यक्ति के लिये कितना कठिन निर्णय होगा| आशा है कि आप अपने प्रस्ताव को वापस ले लेंगे और मुझे आपके सम्मान एवं संघ के वास्तविक घिनौने चेहरे के बीच एक का चुनाव करने को विवश नहीं करेंगे| आज भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेड़कर जी की जयन्ति के दिन आप सच्चाई को स्वीकार करने का प्रयास करेंगे| और मैं अन्त में यही कहना चाहूँगा कि हमें यथार्थ को स्वीकार करके सच्चाई का साथ देना चाहिये| तब ही हम कुछ हासिल कर सकते हैं और देश का उत्थान कर सकते हैं|

    शुभाकांक्षी
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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  14. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय मीणा जी मै इस लेख में ऐसा लखे होने का नहीं कह रहा| इस लेख के सन्दर्भ में आपके विचार जो हम आपके अन्य कई लेखों में पढ़ चुके हैं वही bata रहा हूँ| आपने कई बार यह लिखा है “बदबूदार एवं सडांध भरा ब्राह्मणवाद एवं मनुवाद”
    “आर्य तो विदेशी हैं, उन्होंने भारत के मूल द्रविड़ों को दक्षिण तक खदेड़ कर समस्त भारत पर अपना कब्ज़ा जमा लिया” आदि आदि…
    आप भी स्वयं जानते ही हैं कि मै क्या कह रहा हूँ| मेरी टिप्पणी आपके इस लेख तक सीमित नहीं थी| जब आप जैसे अनुभवशाली एवं उम्रदराज व्यक्ति को इस प्रकार की ग़लतफ़हमी में देखता हूँ तो कष्ट होता है| मैकॉले की शिक्षा का असर यदि मुझ जैसे युवा पर होता तो बात समझ में भी आती कि आजकी पीढ़ी है इसे समझ कहाँ, किन्तु आप ऐसा कैसे कह सकते हैं|
    विचार करें शायद आपको हल मिल जाए|
    सादर
    दिवस

    Reply
  15. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    dekh rahe han na PURUSHOTTAM sir , kaise-kaise BHRANT TARKON ka jaal racha ja raha hai us anaitik ghatna ke paksha men….VEDON tak ko khangala ja raha hai….vahan kamra GO-MUTR se dhoya gaya ye to samajh men aata hai, kursi, mej aur adhikari ki kaar bhi dhoi gai…use bhi sanghee SHUDDHIKARAN hi kahenge…
    kabilegaur ye hai ki kisi tathakathit aur swayam-ghoshit DWIZ warn wale ke retire hone par bhi aisa hua ho iske pramaan khojne par bhi nahi milenge….
    isi tarah M.P. ke shahdol jile men 6 months pahle ek shudr ke ghar ki roti khane wale kutte ko uske malik ne ghar se bahar nikal kar us shudr se 1500 rupye lene ke lie dabaw banaya tha qki TATHAKATHIT AGUWA WARG ki nazar men unka kutta bhi shoodr ho gaya tha….shayad aapko wo khabar yaad aa rahi ho.

    Reply
  16. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    मीणा जी धन्यवाद।
    सामाजिक रूढियों में परिवर्तन इधर बटन दबाया, और उधर प्रकाश फैला, ऐसा शीघ्र नहीं होता।
    मेरे दादा, पिता, मैं, और मेरे बच्चे; इन चार पीढियों में भी बहुत बहुत अंतर देखता हूं।
    संघ वालो नें ही, तथाकथित दलित बन्धुओं को गांव के कारंज पर पानी भरने खींच-खींचकर लाया था, और सभी तथा कथित उच्च जातियों के मध्य पानी भरवाया था। इस घटना को भी वर्ष बीत गए। बहुत सारे संघ स्वयंसेवक तथा कथित उच्च वर्ण-जातियों के (और ब्राह्मण भी) थे।
    पुरानी पीढी के विरोध उपरान्त यह रूढी जा ही रही है। चली जाएगी। संघ को बढावा दीजिए, उसमें सम्मिलित होइए। एक अच्छा कार्य चला हुआ है। किनारे बैठकर-राजनीति करने से बचा जाए।
    साथ दीजिए। जाकर संघमें अपनी बात रखिए। भारत हम सभीका है। संघ तो मुसलमानों को भी खुला हुआ है। अपना देश है, हम सभी मिलकर उसकी सेवा करें। केवल अधिकार की भाषा ना हो। स्वयंसेवक कर्तव्य भावसे काम करता है, अधिकार भावसे नहीं।

    Reply
  17. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    प्रिय Er. दिवस दिनेश गौर जी,
    सदा खुश रहो और प्रगति पथ पर आगे बढ़ते रहो!

    अनेक मीतों के साथ साथ आपने भी मेरे लेख पर टिप्पणी करके मेरे लेखन को सम्मान दिया इसके लिए मैं सभी का आभारी हूँ. ये टिप्पणी केवल आपको ही संबोधित है क्योंकि आपने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि ————-

    ” ………….तो ऐसे में आपका यह कह देना कि भारत में सवर्णों द्वारा दलितों पर अत्याचार ब्राह्मणवाद व मनुवाद की देन है तो यह सरासर गलत है|….”

    प्रिय Er. दिवस दिनेश गौर जी, कृपा करके प्रवक्ता के संपादक को, अन्य पाठकों को और मुझे भी अवगत करने का कष्ट करेंगे कि मेरे उक्त आलेख के किस पैरा से आपने मुझे उध्दरित किया है?

    आपका उत्तर मिलने के बाद जरूरी हुआ तो आगे संवाद होगा.
    शुभाकांक्षी

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    Reply
  18. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    मैंने इस लेख पर पहले एक कमेन्ट दिया था जो शायद कही गम हो गया है आदरणीय श्री पुरुषोतम जी के mujh पर उसे dene के अनुग्रह के फलस्वरूप मई उसे punh likhane के shrm से bach गया v उसे vaps copi kar raha hu yaha पर………..

    “अगर आपने इस खबर पर नवभारत टाईम्स पर कमेँट करने वालो के कमेट पढ़े हो तो उसमेँ एक ने लिखा है कि वो काफी समय से बँद था फिर जब छोड ही दिया तो अब क्या करना?
    इस खबर को इस तरीके से पेश किया गया है कि ये उच्च-नीच का संघर्ष लगे और इसका सीधा फायदा केरल के र्किश्चन लाँबी को हो चुनाव नजदीक है ही।किसे बेवकुफ बना रहे हो साहब?खबर से धोने वाले का पक्ष कहाँ गया?सीधा धर्म पर ही आक्रमण?
    बामसेफ वालोँ की किसी “स्वरुप कुमार विस्वास IAS” की “देवता,अछुत,शुद्र” किताब पढ़ कर आपके लगभग सारे पुराने तर्क उसमें मिल गये,ये घटना भी उसी दुष्प्रचार का एक अंग है ।
    आपकी जान�
    ��ारी के लिए बता दु किसी भी चीज को काम मेँ लेने से पहले उसे पवित्र किया जाता है गंगा जल से गौ मुत्र से कभी सुना नहीँ,इस बात से ज्यादा फर्क नहीँ पडता कि कौन जाती का काम मेँ लिया।
    मामला गौ माँस से जुड़ा लगता है पुर्व अधिकारी सहाब ने बीफ उडायी हो केरल मेँ तो बहुत फेमस है ही नये वाले सहाब निरामिष हो,पर इतना कौन देखता है अनेकोँ फर्जी केस चलते ही है।
    वैसे अधिकारी का अपमान करने का सामर्थय नही ह�
    �� छोटे स्तर के अधिकारी मेँ व वो भी जब “दलित” हो तो मन मेँ खराब विचार हो तो भी कानुन के डर से नहीँ करते।
    बहुत कारण है शराब का सेवन किया हो नये वाले ना करते हो,माँस मच्छी ना खाते हो,बाहरी शुद्दता का बहुत ध्यान रखते हो,वल्लभपुर के हो,उनकी मर्जी कोई जबर्दस्ती है क्या?
    जातीवाद के आगे और कुछ सुझता ही नहीँ क्या?
    और ये सब कारण ना होकर केवल जाती के कारण किया हो तो अमानवीय है व हिन्दु के लिए बहुत खत��
    �नाक भी है।

    Reply
  19. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय पुरुषोत्तम जी यह बात सही है कि एक व्यक्ति द्वारा दुसरे का अपमान नैतिक नहीं है| मानव द्वारा मानव पर अत्याचार रोकना ही चाहिए| कोई भी जाती, धर्म, वर्ण, सम्प्रदाय अन्य से उच्च कदापि नहीं होता, यही हमारा मानना है और यही भारतीय मान्यता भी है| हमारे वेदों में भी यही कहा गया है| भाई अभिषेक जी ने एकदम सटीक टिप्पणी की है| हिन्दू समाज में गौमूत्र को पवित्र माना जाता है किन्तु यह कहा सिद्ध हुआ कि इसका उपयोग यहाँ दलित के अपमान में हुआ था| हमारे पूजा पाठ में इसका उपयोग होता रहता है| नया घर, नयी दूकान, नया कार्यालय इसके द्वारा शुद्ध किये जाते हैं, फिर हमसे पहले वहां कोई भी बैठा हो इससे हमें क्या फर्क पड़ता है?
    मै आपसे विनती करता हूँ कि मैकॉले रचित इतिहास को साईड में रखकर एक बार भारतीय इतिहास को पढ़ें, आपको उत्तर मिल जाएगा कि यहाँ कभी भी जाती व धर्म के आधार पर कोई छुआछूत नहीं रही है| आचार्य विष्णु गुप्त (चाणक्य) ने एक भेड़ बकरिया चराने वाले लड़के चन्द्रगुप्त को शिक्षा देकर उसे भारत का सम्राट बनाया था| यहाँ उन्होंने उसकी जाती को नहीं देखा, उसकी योग्यता के आधार पर ही उसे हमारा राजा बनाया और आज हमें चन्द्रगुप्त मौर्य पर गर्व है| आपको याद होगा जब सिकंदर का भारत पर आक्रमण हुआ था उस समय समस्त राजाओं ने मिलकर प्रयास किया होता तो सिकंदर कभी भारत में अपने पाँव नहीं जमा पाता| ऐसे में गुरुकुल ने अपनी सेना खड़ी की और उसका सेनापति बनाया चन्द्रगुप्त मौर्य को| वही समाज जिसे आप बदबूदार व सडांध भरा कहते हैं| आचार्य का यह युद्ध केवल ब्राहमणों की रक्षा के लिए नहीं अपितु समस्त भारतीयों की रक्षा के लिए था जिसमे सभी जातियां सम्मिलित हैं| चन्द्रगुप्त की इस सेना में सभी आदिवासियों ने उसका साथ दिया और सूत्रधार चाणक्य की एक आज्ञा पर सभी मर मिटने को तैयार थे|
    तो ऐसे में आपका यह कह देना कि भारत में सवर्णों द्वारा दलितों पर अत्याचार ब्राह्मणवाद व मनुवाद की देन है तो यह सरासर गलत है| हमारे धर्मगुरुओं ने कभी भी यह नहीं सिखाया कि ईश्वर की एक संतान द्वारा दूसरी संतान के अधिकारों का हरण नैतिक है|
    आपसे विनती है कि कृपया पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर ध्यान से सोचें कि इसी प्रकार भारत में आंतरिक कलह चलती रहती तो भारत तो हज़ारों वर्ष पहले ही ख़त्म हो गया होता| फिर भारत विश्वगुरु व सोने की चिड़िया कैसे बनता?
    कृपया विचार करें
    सादर
    दिवस…

    Reply
  20. संजीव कुमार सिन्‍हा

    संजीव कुमार सिन्‍हा, संपादक, प्रवक्‍ता

    @डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ । 12-13 अप्रैल को प्रवक्‍ता पर तकनीकी काम चल रहा था। इसी क्रम में कुछ लेख तकनीकी प्रमुख से डिलीट हो गए थे, जिसका उन्‍हें ध्‍यान नहीं रहा। आपके द्वारा मेरी जानकारी में लाने से थोड़ी ही देर बाद इसे पुन: अपलोड कर दिया गया। चूंकि लेख का मूल पाठ मेरे मेल में सुरक्षित था, इसलिए इसे पुन: प्रकाशित कर दिया गया, परन्‍तु टिप्‍पणियां डिलीट हो गई। वैसे लेख के पुन: प्रकाशन से पहले ही अधिक टिप्‍पणियां आ रही हैं।

    Reply
  21. शैलेन्‍द्र कुमार

    shailendra kumar

    मैं स्वयं एक अति पिछड़ा वर्ग से आता हूँ अपनी जाति नहीं लिखता मेरे खानदान में कोई नहीं लिखता, जातिगत समस्याओं को समाज में देखता हूँ, हालाँकि मुझे अपने जीवन के ३४ वर्ष बीत जाने के बाद भी ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ है, जैसे समाज में अपने आप को कुछ उच्च कुलीन मानने वाले लोग है और कुछ अपने आप को निम्न जाति के शोषित मानने वाले लोग है, एक दुसरे के प्रति कट्टर भाव रखने वाले ये लोग समाज में सदा रहेंगे जब तक इनके बीच समरसता और सौहार्द्य बढाने वाले लोग या संगठन आगे नहीं आते, दुर्भाग्य से अपने आपको दलित चिन्तक कहने वाले और देश के वामपंथी संगठन इनके बीच कट्टरता को बढाने का कार्य कर रहे है
    वामपंथियों ने सदैव समाज में नफरत फैलाई और उसका राजनीतिक लाभ उठाया चाहे मामला मजदूर और व्यापारी का हो, चाहे किसान और जमीदारी का हो, चाहे उच्च और निम्न जाति का हो, चाहे कर्मचारी और सरकार का हो
    जो वामपंथी सदैव नफरत फ़ैलाने का कार्य करते है वो किसी और पर नफ़रत फ़ैलाने का आरोप कैसे लगा सकते है

    Reply
  22. SAJID

    ये अत्यधिक आश्चर्यजनक सत्य है, कि इंसान से अधिक मान्यता गाय के मूत्र से अधिक है! और ये अत्यंत क्षोभनीय है कि किसी दलित के कमरे को पवित्र करने के लिए मूत्र का उपयोग किया गया! ये जाति प्रथा सदियों से भारत का अभिन्न अंग रही है! यदि ऐसा न होता तो सूर्य पुत्र होने के बाद भी कर्ण को सूत पुत्र न कहा गया होता! एकलव्य को भील जाति का होने के कारण शिक्षा से वंचित न किया गया होता! और युधिष्टिर तो युवराज पद के लिए अयोग्य मान लिए जाते यदि उन्होंने परीक्षा के तौर पर हस्तिनापुर महासभा में एक ही व्यक्ति की हत्या के लिए अलग अलग जातियों के ४ व्यक्तियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) को अलग अलग दंड न दिया होता! प्रवक्ता पर किस तरह के लोगो का अधिक प्रभाव अथवा मान्यता है इसे आप साईट के दाहिने तरफ दिए गए “ज़रूर पढ़े” कॉलम में देख सकते है! भले ही अन्य लोगो के लेखो की भाषा और विषय अधिक अच्छे हो, पर अगर वे संघ या भा ज पा की विचारधारा से अलग है तो उन्हें इस “ज़रूर पढ़े” कॉलम में स्थान मिलना असंभव है!

    Reply
  23. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    बहुत बहुत धन्यवाद श्री पुर्शोतम जी………………….ये कमेण्त शायद हटा दिया है,पर मै अभी इस खबर के बारे मे ज्यादा सर्च कर रहा हुँ,मानव मात्र मे किसी प्रकार के भेद का समर्थन मैं नही करता ना विश्वास रखिये कि हिन्दु धर्म शास्त्र भी नही रखते हैं स्मॄतियां कालबाह्य है विवेकानन्द जी व आचार्य शंकर के अनुसार श्रुती विरुध स्मॄति त्याज्य है,शुद्र या ब्राहम्ण कोयी “जाती” नही वर्ण था पर उसमे भी छुआछुत या भेदभाव का कही स्थान नही था वरना वाल्मिकि ब्रहॠषी कैसे हो जाते??रैक्व के उपदेश बृह्दारण्य उपनिष्द मे कैसे आ जाते??सत्यकाम जाबाल के सुक्त कैसे वेद मे होते??शास्त्र दॄष्टि से व संविधान दॄष्टि से मानव मात्र समान है उसमे किसी भी भेद को बडावा देना अपराध है,रही बात इस घट्ना की बिना पुरी जानकारी एक्त्र करे मै ये नही कह सकता कि सहाब का अपमान किया गया था या नही किया गया,मैं बस कयास लगा सकता हुँ।

    Reply
  24. Harendra

    यहाँ पर कोई कमेन्ट नहीं , और क्यूँ हो से सब हुआ भी तो एक दलित के साथ है अब कोई कुछ नहीं बोलेगा , आज का समाज हिन्दू – मुस्लिम एकता की तो बात करता है , पर दलितों के बारे मैं कुछ भी बोलने से परहेज़ करता है , आज भी दलितों के छुआ छत का वव्हार होता है सवर्णों की मानसिकता वाही है जो पहले थी…………….शर्मा की बात है………

    Reply
  25. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    श्री संजीव जी,
    आशा है कि आप कुशल होंगे|
    आज १३.०४.११ को मेरी जानकारी के अनुसार प्रवक्ता पर से निम्न दो लेख न जाने क्यों हटा दिए गए :-
    १-अन्ना हजारे तुम इतने टेढ़े क्यों हो ?
    २-ये है हमारे देश का धार्मिक चरित्र-दलित रिटायर हुआ तो रूम को गोमूत्र से धोया!
    इनके बारे में मैंने आपको फोन किया और एक पाठक ने टिप्पणी भी की हैं, इसके बाद आपने दोनों लेख तो प्रदर्शित कर दिए लेकिन इन लेखों पर की गयी महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ अभी भी नदारद हैं| कृपया उन्हें भी दिखावें|
    आपका शुभाकांक्षी
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    Reply

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