समय की मांग है ‘ऑनलाइन वोटिंग’

                       प्रभुनाथ शुक्ल 

ऑनलाइन वोटिंग की व्यवस्था वर्तमान समय की मांग है।  आधुनिक तकनीक और विकास की वजह से वोटिंग के दूसरे तरीके भी अब मौजूद हैं। वैसे इसे हैक की आशंका से खारिज नहीँ किया जा सकता है। वोटरों को सीधे आधारकार्ड से जोड़ कर मतदान की आधुनिक सुविधा प्रणाली विकसित की जा सकती है।आज का दौर आधुनिक है और हर वोटर के हाथ में एंड्रायड मोबाइल की सुविधा उपलब्ध है। आयोग वोटिंग ऐप लांच कर नई वोटिंग प्रणाली का आगाज कर सकता है। आधार जैसी सुविधाओं का हम दूसरी सरकारी योजनाओं में उपयोग कर सकते हैं, फिर वोटिंग के लिए आधार प्रणाली का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता है। 
भारत में आज भी लाखों लोग चाह कर भी अपने वोट का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। देश के अधिकांश लोगों के पास आधार कार्ड उपलब्ध है। वोटिंग प्रणाली को सीधे अंगूठे से अटैच किया जाए। जिस तरह से दूसरी सरकारी योजनाओं में आधार का उपयोग किया जा रहा है उसी तरह वोटिंग में भी इसका उपयाग होना चाहिए। इस व्यवस्था के तहत कोई व्यक्ति सीधे अपने अंगूठे का प्रयोग कर मतदान कर सकता है।मोबाइल ऐप के जरिए भी लोग अपने मताधिकार का प्रयोग बगैर वोटिंग बूथ तक पहुंचे कर सकते हैं। इससे चुनाव और सुरक्षा पर होने वाला करोड़ों रुपये का खर्च बचेगा। ईवीएम मशीनों के विवाद और इस्तेमाल के अलावा रख रखाव से निजात मिलेगी। वोटिंग की तारीख किसी विशेष इलाके के आधार पर निर्धारित करने के बजाय कम से कम 30 दिन तक निर्धारित की जाए।हालांकि यह तकनीक बेहद उलझाव भरी होगी, क्योंकि वोटिंग विधान और लोकसभा के आधार पर की जाएगी। उसी के आधार पर वोटिंग ऐप और दूसरी सुविधाएं लांच करनी पड़ेगी। 

ऑनलाइन वोटिंग में तमाम तरह की समस्याएं भी आएंगी। इसमें काफी लंबा वक्त भी लग सकता है। हैकरों की तरफ से इसे हैक किए जाने की कोशश भी की जा सकती है। लेकिन अगर आयोग चाहेगा तो यह बहुत कठिन नहीं होगा। तकनीकी सुविधाओं का इस्तेमाल कर इसे आसान बनाया जा सकता है।भारत निर्वाचन आयोग बेहद विश्वसनीय संस्था है। उसे अपना यह भरोसा कायम रखना होगा। हालांकि विपक्ष के आरोपों में बहुत अधिक गंभीरता नहीं दिखती है। लेकिन अगर सवाल उठाया गया है तो उसका समाधान भी होना चाहिए। लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है। सत्ता और प्रतिपक्ष का अपना-अपना धर्म है। राजनीति से परे उठ कर सभी संस्थाओं को अपने दायित्वों का अनुपालन करना चाहिए, जिससे लोकतंत्र की तंदुरुस्ती कायम रहे। 

चुनाव आयोग ईवीएम मशीन की सुचिता बनाए रखने के लिए वीवीपैट का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है। लेकिन आपको याद होगा कि मध्यप्रदेश के भिंड में परीक्षण में इसकी हवा निकल गई थी। एक निर्दलीय उम्मीदवार को जाने वाला वोट दूसरे पार्टी को चला गया था। जिसके बाद आयोग की खूब किरकिरी हुई थीं। वीवीपैट ईवीएम की वह व्यवस्था है, जिसमें मतदाता को वोटिंग करने के बाद पता चल जाएगा कि उसका वोट किस दल को गया। वोटिंग के बाद एक पर्ची निकलेगी और वह बताएगी आपका वोट आपके चुने हुए उम्मीदवार के पक्ष में गया है। हलांकि वह पर्ची वोटर अपने साथ नहीं ले जा पाएगा। लेकिन आयोग के दावों पर भी सवाल उठने लगे हैं। लेकिन आयोग बार-बार यह कहता रहा है कि ईवीएम में किसी प्रकार की कोई तकनीकी बदलाव नहीं किया जा सकता। आयोग ईवीएम को पूरी तरह सुरक्षित मानता है। आयोग के विचार में ईवीएम चिप आधारित सिस्टम है। इसमें एक बार ही प्रोग्रामिंग की जा सकती है। 

चिप में संग्रहित डाटा का लिंक कहीं से भी जुड़ा नहीं होता है उस स्थिति में इसमें किसी प्रकार की छेड़छाड़ और हैकिंग नहीं की जा सकती। यह ऑनलाइन सिस्टम पर भी आधारित नहीं होता है। ईवीएम में वोटिंग क्रमांक सीरियल से सेट होता है। यह पार्टी के अधार के बजाय उम्मीदवारों का नाम वर्णमाला के अधार पर होता है, जिसमें पहले राष्ट्रीय, फिर क्षेत्रिय, दूसरे दल और निर्दलीय होते हैं।हलांकि चुनाव आयोग ने 2009 में ऐसे लोगों को आमंत्रित किया था, जिन्होंने ईवीएम मशीन को हैक करने का दावा किया था। लेकिन बाद में यह साबित नहीं हो सका। अयोग की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में भी हैक का दावा करने वालों को भी चुनौती दी गई थी, लेकिन ऐसा दावा करने वाला कोई भी शख्स मशीन को हैक नहीं कर पाया। वहीं 2010 में अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ईवीएम को हैक करने का दावा किया था, जिसमें बताया गया था कि एक मशीन के जरिए मोबाइल से कनेक्ट कर इसमें बदलाव किया जा सकता है। 
बिहार में राज्य विधानसभा के चुनाव होने हैं। चुनाव को लेकर सियासी दलों ने कमर कस लिया है। कोरोना संक्रमण काल में गृहमंत्री अमितशाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वर्चुअल चुनावी रैली कर चुके हैं। आरजेडी और दूसरे दल भी चुनावी गणित को फिट करने में जुट गए हैं। लेकिन ईवीएम को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहते हैं। फ़िर सवाल उठता है कि चुनाव आयोग मताधिकार के दूसरे विकल्पों पर विचार क्यों नहीँ करता है। देश में ऑनलाइन वोटिंग की मांग भी उठ रही है। यह विकल्प कम खर्चीला भी है। आज के दौर में सबकुछ ऑनलाइन हो गया है फ़िर ऑनलाइन वोटिंग पर विचार क्यों नहीँ किया जा रहा है। सरकार डिजिटलाइजेशन पर अधिक जो देर रही है उसे आयोग के सामने यह विकल्प रखना चाहिए। 

फ़िलहाल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और उसके दावे पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। यह देश की सबसे बड़ी निष्पक्ष और लोकतांत्रिक संस्था है। स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव संपन्न कराना आयोग का नैतिक दायित्व भी है। यहां किसी की जय पराजय का सवाल नहीं बल्कि बात स्वस्थ्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता का है। ईवीएम पर आयोग सुप्रीमकोर्ट तक पहुँच अपनी स्थिति साफ कर दिया है। लेकिन ऑनलाइन वोटिंग की शुरुवात आयोग को प्रयोग के तौर पर बिहार से करनी चाहिए। 

Leave a Reply

28 queries in 0.396
%d bloggers like this: