अपराध के खिलाफ निर्णायक फैसले का वक्त

                      प्रभुनाथ शुक्ल 

कानपुर की घटना ने यह साबित कर दिया है कि अपराध और अपराधियों के हाथ बेहद गहरे हैं। समाज में अपराध का संरक्षण किसी भी तरह से उचित नहीँ है। अपराधी का कोई जाति और धर्म नहीँ होता है। अपराधी का कार्य सिर्फ़ अपराध करना है। पुलिस और राजनीति के संरक्षण में विकास दुबे जैसे अपराधी फलते- फूलते रहे लेकिन सरकारें उधर देखने की हिम्मत तक नहीँ जुटा पाती। 20 साल पूर्व राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की थाने में हत्या के बाद भी पुलिस उसका एनकाउंटर नहीँ कर पाई। पुलिस की मौजूदगी में खुलेआम हत्या के बाद भी अदालत में पुलिस गवाह तक उपलब्ध नहीँ करा पाई। जिसका नतीजा रहा कि वह साक्ष्य के अभाव में अदालत से बरी हो गया। 

हमारे कानून- व्यवस्था की यह कितनी विडम्बना है कि पुलिस थाने में सरकार के एक ओहदा प्राप्त राज्यमंत्री की 2001 में हत्या हो जाती है और सरकारें अपने मंत्री तक के हत्यारे को दबोच नहीँ पाती। निश्चित रूप से यह बगैर राजनीतिक संरक्षण के सम्भव नहीँ हो सकता है। जब पुलिस के आठ लोग शहीद हो गए तो तत्काल सरकार और पुलिस महकमा सक्रिय हो गया। लेकिन 20 साल पूर्व पुलिस ने यह तत्परता क्यों नहीँ दिखाई? राजनीतिक संरक्षण देने का नतीजा हमने देख लिया है। इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि अपराधियों के हाथ बेहद गहरे हैं इतने गहरे की सत्ता भी उसके सामने बौनी साबित हुई।

विकास दुबे जैसे अनगिन आस्तीन के साँप हमारे समाज में बिखरे पड़े हैं जिसकी पीड़ा समाज को आए दिन भुगतनी पड़ती है लेकिन पुलिस की तरफ़ से कोई खास एक्शन नहीँ उठाए जाते। विकास दुबे कितना दुर्दांत अपराधी है इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि हत्या के कई दिन बाद भी उसकी गिरफ्तारी को गठित यूपी पुलिस की 100 टीमें अभी तक उसे जिंदा या मुर्दा नहीँ पकड़ पाई हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जिस तरह अपराधियों को गमले में सजा कर खाद- पानी दिया गया वह किसी से छुपा नहीँ है। 

हालांकि योगी सरकार राज्य में अपराधियों के खिलाफ़ सख्त रवैया अपनाया लेकिन विकास दुबे जैसे लोगों पर कोई फर्क नहीँ पड़ा। विकास दुबे के ऊपर हत्या और हत्या के प्रयास समेत कुल 60 मामले दर्ज हैं। हिस्ट्रीशीटर घोषित होने के बाद भी वह खुले आम घूमता रहा। अपराध की दुनिया में बिंदास और बेखौफ खेलता रहा। जिला पंचायत से लेकर गाँव पंचायत तक पर उसका कब्जा हो गया। ऐसा कोई सियासी दल नहीँ था जिसमें विकास का दबदबा न रहा हो। समाजवादी पार्टी के साथ बसपा और भाजपा में उसकी अच्छी पैठ रहीं है। राजनीति में मिले भरपूर संरक्षण की वजह से उसने अच्छी- खासी आपराधिक ज़मीन तैयार कर लिया।  पुलिस में उसकी इतनी पैठ बन गई कि वह जो चाहता वहीं करता। 
राजनीति और अपराध की दोस्ती काफी पुरानी है। एक दौर वह भी था जब राजनेता और अपना चुनाव जीतने के लिए अपराधियों का सहारा लेते थे। लेकिन समय बदलता तो अपराधियों की पहली पसंद राजनीति बन गई। राजनैतिक दल भी सीटें निकालने के लिए अपराधियों को चुनाव मैदान में उतारने लगे। राजनीति को अपराध से बचाने के लिए कानून बने लेकिन वह इतने लचर रहे कि उसका कोई मतलब नहीँ निकला। जिसका फायदा विकास दुबे जैसे लोग उठाते रहे। बीबीसी के एक आंकड़े पर गौर करें तो यह स्थिति और अधिक साफ हो जाती है। 

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में 402 विधायकों में से 143 ने अपने ऊपर दर्ज आपराधिक मामलों का विवरण दिया था। सत्ताधारी भाजपा में 37 फ़ीसद विधायकों पर अपराधिक मामले दर्ज हैं। भाजपा के 312 विधायकों में से 83 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। समाजवादी पार्टी के 47 विधायकों में से 14 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जबकि बीएसपी के 19 में से पांच विधायकों पर इस तरह के अपराध दर्ज हैं। कांग्रेस भी इससे अछूती नहीँ है। उसके सात विधायकों में से एक का आपराधिक रिकार्ड है। सबसे दिलचस्प बात है है कि राज्य विधानसभा में तीन निर्दलीय विधायक भी चुनाव जीत कर पहुँचे हैं। जिनके दामन पर भी गुनाह के दाग हैं। यह जानकारी विधायकों ने अपने चुनावी हलफनामों में दिया है। फ़िर सोचिए, राजनीति कितनी गंदी और बदबूदार है। राजनीति क्या अपराधी कारण से मुक्त होगी यह बड़ा सवाल है। 
कानपुर में घटना की रात पुलिस एक मामले में विकास दुबे की बकरू गाँव में गिरफ्तारी करने पहुँची थीं।  लेकिन यूपी  पुलिस वर्दी में छुपे विभीषणों की वजह से ख़ुद अपनी ही  लंका जला बैठी। पुलिस की एक- एक हरक़त का डान विकास दुबे को पता गया था। उसने 20 से अधिक दुर्दांत गुण्डों को घर की छत पर बुलाकर रखा था। आम रास्ते पर जेसीबी खड़ी करवा दिया। जैसे ही पुलिस जेसीबी से आगे बढ़ी घात लगा कर विकास के गुर्गों ने उस पर हमला बोल दिया। छतों से विकास और उसके गुर्गों ने गोलियां बरसाई गई। कानुपुर आईजी ने मीडिया को जो बयान दिया है उसमें कहा है कि घटना स्थल से तकरीबन 400 कारतूस बरामद किए गए हैं। यह भी खबरें आई हैं कि पुलिस टीम को गाँव में पहुँचने से पहले वहाँ कि बिजली कटवाई गई। जिसकी वजह से अँधेरा होने से पुलिस आसानी से गुंडो की गिरफ़्त में आ गई। 

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद यह साबित हो गया है कि पुलिस वालों के अत्याधुनिक हथियार छिन कर उसी से उनपर हमला किया गया। शहीद होने वाले पुलिसकर्मियों के जिस्म से गोलियां आरपार हो गई थीं। विकास को सभी सरकारों में राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा जिसकी वजह से उसका अपराध फलता- फूलता रहा। लेकिन अब वक्त आ गया है जब राजनीति को अपराध से मुक्त किया जाय। इस तरह के अपराधियों के खिलाफ़ सख्त से सख्त क़दम उठाए जाएं। समय रहते इस तरह के अपराधों पर नियंत्रण नहीँ किया गया तो हालात बेहद बुरे होंगे। 

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