कांग्रेस का सर्कुलर: नेहरू विरोध अर्थात देशद्रोह

चीन को लेकर दिग्भ्रमित विपक्ष

 इन दिनों विद्वान लेखक  और युद्धनीति विश्लेषक, 1962 के भारत-चीन युद्ध की विभीषिका के दारुण परिणाम, उसके कारण और तात्कालिक सरकार द्वारा की गई रणनीतिक त्रुटियों की मीमांसा अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं | संभावित युद्ध को द्रष्टि में रखते हुए नेहरू जी के उस समय लिए गए निर्णयों व मोदी जी द्वारा इस समय लिए जा रहे निर्णयों पर तुलनात्मक समीक्षाएँ लिखी जा रही हैं | गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों द्वारा चालीस से अधिक चीनी  सैनिकों को मारकर स्वयं वीर गति प्राप्त होने पर ‘मन की बात’ में मोदी जी ने चीन को  कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा “भारत मित्रता निभाना जानता है तो आँख में आँख डालकर  देखना और उचित जवाब देना भी जानता है”  इस पर विरोधियों ने बदला लेने के लिए उन्हें बार-बार उकसाने प्रयत्न किया किन्तु शत्रु सैनिकों के मारे जाने पर कोई गौरव पूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की | इसके बाद राष्ट्र के नाम सम्बोधन में जब प्रधानमंत्री मोदी ने  चीन को उपेक्षा और तिरस्कार से उत्तर देने की नीति अपनाई तो कांग्रेस ने उन पर चीन से डरने का आरोप लगा कर चीन का नाम न लेने पर  आलोचना की | 62 में चीन ने आक्रमण कर  नेहरू सरकार से भारत की लगभग 40 हजार वर्ग किलो मीटर भारतीय भूमि (अक्साई चिन ) छीन ली, यह भूमि इतनी है जिस पर आज के दिल्ली और मुंबई जैसे बीसियों महानगर बसाए  जा सकते हैं | नेहरू सरकार की इस पराजय को छिपाने के लिए कांग्रेस बार-बार एक ही बात दुहरा रही है मोदी जी सच बोलिए ! कहिये कि चीन ने भारत की पवित्र भूमि हमसे छीन ली है ! इतना ही नहीं कुछ विरोधी तो उनके गलवान में घायल सैनकों से मिलने और हाल-चाल पूछने को भी पचा नहीं पा रहे  | मेरे विचार से इस प्रकार की ओछी प्रतिक्रियाओं से कांग्रेस अपना ही अहित कर रही है | विरोध जब तथ्यों पर आधारित होता है तब उसमें शक्ति होती है, उसका प्रभाव भी होता है किन्तु विरोध जब केवल विरोध के लिए होता है तब वह आत्मघाती सर-संधान ही होता है | मोदी जी ने लद्दाक में भारतीय सेना की चौकी नीमू पर पहुंचकर सैनिको का मनोवल बढ़ाने के साथ-साथ चीन को भी स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारत विस्तारवादी सोच के सामने झुकने वाला नहीं है | विदेश नीति, युद्धनीति और कूटनीति के लगभग सभी पंडित मोदी सरकार के इन निर्णयों को एक बड़े स्टेट्स मैंन और शक्तिशाली प्रधानमंत्री के द्वारा लिए गए निर्णयों के रूप में व्याख्यायित कर रहे हैं | किन्तु कांग्रेस पार्टी अभी भी मोदी को प्रत्येक प्रयास के लिए शून्य अंक ही दे रही है, युद्धकाल में उसकी ऐसी हठी प्रतिक्रियाएँ  विपक्ष के रूप में उसकी वैचारिक दुर्बलता को ही प्रदर्शित कर रही हैं |  वामपंथियों की चीन के साथ वैचरिक समानता सर्वविदित है, वे किसी भी कम्युनिस्ट शासित देश से युद्ध के समय, भारत के स्थान पर अपनी विचारधारा को ही प्रधानता देते आये हैं, किन्तु कांग्रेस ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त’  जैसी क्यों होती जा रही है | मोदी सरकार को घेरने के लिए उसके पास अर्थव्यवस्था,रोजगार आदि अति महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, पर न जाने क्यों सुरक्षा संबंधी विषयों पर वह सरकार को घेरने के प्रयास में  पुनः-पुनः स्वयं ही घिर जाती है | सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा, राफेल आदि सभी मुद्दों पर अनावश्यक विरोध करने के कारण उसके द्वारा की गई उचित आलोचना भी निरर्थक सी लगाने लगी हैं | वह प्रत्येक गेंद पर छक्का मारने के प्रयास में बार-बार बोल्ड हो जाती है | पिछले चुनाव में ‘चौकीदार चोर है’ के नारे भी लगे और मोदी को हिटलर भी कहा गया |  इसी प्रकार दिल्ली चुनावों में  सीएए  के  विरोध में प्रधान मंत्री को डंडों से पीटने की बात भी कही गई और मोदी-शाह के सामने किसी की चलती नहीं है, विरोधियों को डराया जा रहा है आदि  आरोप भी लगाये गए,किन्तु जनता नहीं जुड़ी और कांग्रेस इंच भर भी आगे न बढ़ सकी |  

आज मोदी सरकार पर चीन-पाक को लेकर जिस प्रकार के आरोप लगाने की सुविधा है वैसी और उतनी सुविधा संभवतः नेहरू जी के कार्यकाल में नहीं थी | नेहरू युग में उनके समक्ष तो क्या पीठ पीछे भी निंदा करने की अनुमति नहीं थी | अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने तो इसके लिए एक परिपत्र (सर्कुलर) भी जारी किया था जिसमे यह कहा गया कि “जो प्रधान मंत्री के ख़िलाफ़ हैं वे देशद्रोही हैं |” (31 / समास -7) इस परिपत्र के कारण 1962 में भारत-चीन युद्धकाल में जो भी नेहरू जी का  या उनकी नीतियों का विरोध करता उसे देशद्रोही मानलिया जाता | उस समय प्रधानमंत्री के नाम विरोध-पत्र लिखने या आलोचना करने पर  भी जेल में डाला जा सकता था | प्रसिद्द इतिहासकार और गाँधीवादी स्वतंत्रता सेनानी धर्मपाल जी चीन को लेकर नेहरू जी की नीतियों का प्रखर विरोध करने के अपराध में देशद्रोही  के रूप में जेल की हवा खाने वालों में प्रमुख हैं | जयप्रकाश नारायण जी के  हस्तक्षेप करने पर तत्कालीन गृहमंत्री ने उन्हें कारागार से मुक्त किया | इस घटना से अनुमान लगाया जा सकता है कि बहुत कम लोग रहे होंगे जो खुलकर प्रधानमंत्री की नीतियों और निर्णयों का विरोध कर पाते होंगे | संभवतः इसीलिये 62 के युद्ध के वास्तविक कारण, की गई भूलों और गँवाई गई भूमि की ठीक-ठीक जानकारी आम जनता को नहीं है | यद्यपि सभी सरकारें अपने स्याह पक्षों को यथासंभव आवरण वेष्टित करने का यत्न तो करती ही हैं किन्तु इतिहास समय आने पर उन्हें निर्ममता से उघाड़ देता है |

डॉ.रामकिशोर उपाध्याय

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