लेखक परिचय

अनिल अनूप

अनिल अनूप

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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अनिल अनूप
मनुष्य-जीवन पर भोजन का प्रभाव बहुत गहराई तक पड़ता है। जितना सात्विक, शुद्ध एवं उपयुक्त भोजन किया जायेगा, मनुष्य का तन-मन भी उतना ही शुद्ध एवं सात्विक बनेगा। निम्न कोटि एवं निम्न भावनाओं से प्राप्त अन्न मनुष्य के शरीर को अस्वस्थ एवं मलीन बना देता है। ‘जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन’ वाली कहावत से सभी परिचित हैं। अन्न उत्पादन से ग्रहण तक उसकी शुद्धता एवं स्वच्छता पर ध्यान रखने का निर्देश शास्त्रों में किया है, जिससे कि उससे प्राप्त होने वाले तत्व एवं सूक्ष्म और विकृत होकर मनुष्य के तन-मन एवं आत्मा पर प्रभाव न डालने पावें, उसकी प्रवृत्तियाँ पूर्ण पवित्र एवं स्वच्छ बनी रहें, जिससे कि वह मनुष्यता के उन्नत शिखर पर क्रम से बढ़ता चला जाये।
परावलम्बन, पराधीनता अथवा अनाचरण से प्राप्त किया हुआ अन्न तो दूषित होता ही है, किन्तु भिक्षा से एकत्र किया हुआ अन्न सबसे अधिक दूषित होता है, वह चाहे पैसा माँगकर खरीदा गया हो अथवा भोजन के रूप में किया गया हो। भिक्षा का अन्न मनुष्य के मन, बुद्धि व आत्मा के लिये विष ही है। भिखारी जब किसी से कुछ माँगता है, तब उसकी आत्मा में एक दीनता, दासता एवं ग्लानि होती है। वह स्वयं जानता है, कि वह स्वाभिमान खोकर माँग रहा है। भिखारी यदि एक बार भूखा होने पर माँगता है, तो अनेक बार झूँठ बोलकर माँग लाता है। यह एक प्रकार की ठगी है, जिसके कारण न तो उसका मन प्रसन्न होता है और न बुद्धि। उसकी आत्मा इस निकृष्ट कार्य के लिये धिक्कारती रहती है। ऐसे धिक्कार पूर्ण अन्न से स्वस्थ तत्वों का मिल सकना सम्भव नहीं। साथ ही अनेक बार तो लोग भिखारी के हठ के कारण से खीझकर ही उसे भीख दे देते हैं। देने वाले एवं लेने वाले दोनों की भावनाओं के प्रभाव से अन्न के सूक्ष्म संस्कार दूषित होते हैं जो झोली पर दयनीयता के रूप में प्रतिफलित होता है। यही कारण है कि ग्लानि पूर्ण अन्न खाने से भिखारी दीन-हीन और मलीन दीखते रहते हैं। उनका शरीर रोगी तथा मुख निस्तेज ही बना रहता है। भिक्षा-वृत्ति करने वाला, चाहे वह कितना ही पौष्टिक भोजन खा पाये, किसी प्रकार से स्वस्थ नहीं रह सकता।
भारतीय धर्म में दान देने और लेने दोनों का विधान है। दान का पुण्य तो यज्ञादिक धर्म-कर्मों के समकक्ष ही पाया गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है—
यज्ञ दान तपः कर्म न त्याज्यं कार्यमे तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषणाम्॥
अर्थात् यज्ञ, दान, तप-रूप जो कर्म हैं, वह त्यागने योग्य नहीं है। यह कर्म निश्चित रूप से बुद्धिमान लोगों को पवित्र करने वाले हैं।
इतना ही नहीं, दान को मानवता का लक्षण बतलाया गया है और कहा गया है कि यज्ञ के रूप में अन्य व्यक्तियों तथा समाज का दान द्वारा उपकार करने के उपरान्त शेषाँश को अपने पर व्यय करने, उतने से ही निर्वाह करने वाला पुण्य पथ-गामी होता है। जो अपनी कमाई का एक भाग दान के रूप में नहीं देता और सबका उपयोग स्वयं ही करता है वह चोर के समान है।
गीता के अतिरिक्त अन्य धर्म-शास्त्रों में दान की महिमा का बखान किया गया है। मनु भगवान का कथन है—
‘तपः परं कृतयुगे त्रेतायाँ ज्ञान मुच्यते। द्वापरे यज्ञ मेवादुयनिमेक कलौ युगे॥’
अर्थात्, सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलियुग में दान ही धर्म के विशेष लक्षण हैं।
इस प्रकार सभी धर्म-ग्रन्थों में दान की भूरि-भूरि महिमा गाई गई है। दान करने से जहाँ मनुष्यों में उदारता की अभिवृद्धि होती है, वहाँ उसके द्वारा व्यक्तियों एवं समाज का भी उपकार होता है। किन्तु जहाँ दान की महिमा का वर्णन पाया जाता है, वहाँ इस बात का भी निर्देश है कि दान ऐसे व्यक्ति को ही देना चाहिए, जो उसका वास्तविक पात्र हो। अपात्र को दिया दान निष्फल चला जाता है और कुपात्र को दिया दान तो पाप का ही आवाहक होता है। दान द्वारा पुण्य-लाभ के लिये दानी को पात्रा-पात्र का विचार कर लेना बहुत आवश्यक हैl
भिक्षावृत्ति किसी भी सभ्य देश के लिए कलंक है। यह एक सामाजिक बुराई हैं । अब यह लाइलाज गंभीर रोग बनता जा रहा हैं। मगर हमारे देश में आज भी सार्वजनिक स्थलों पर भीख मांगते बच्चे, बूढ़े, युवक-युवती आसानी से दिख जाते है जो सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। भीख मांगना आज एक प्रकार का धंधा धंधा बन गया हैं। भिखारी दिन में कमाता हैं और रात में मस्ती करता हैं। कुछ गिरोहों के द्वारा भी भीख मंगवाया जाता हैं। वे लोग बच्चे का अपहरण कर उनसे भीख मंगवाते हैं। यदि बच्चे भीख नहीं मांगते हैं तो उन्हें मारा पीटा जाता हैं। बच्चो का अपहरण कर उन्हें विकलांग बनाकर उनसे भीख मंगवाए जाते हैं। भिखारी छोटे मोटे अपराध करने से भी नहीं चुकते हैं। यह बिना पूंजी का धंधा हैं। इसमें बिना पैसा का पैसा कमाया जाता हैं । हालांकि सरकार ने इसे कानूनन अपराध घोषित कर रखा हैं फिर भी यह लाइलाज रोग दिन पर दिन बढ़ता जा रहा हैं। भिखारियों की संख्या में दिन पर दिन वृद्धि होती जा रही हैं। लगभग 9 फीसदी विकास दर वाले भारत के माथे पर भिक्षावृत्ति ऐसा कलंक है जो हमारे आर्थिक तरक्की के दावों को खोखला बताता है। भीख मांगना कोई सम्मानजनक पेशा नहीं वरन अनैतिक कार्य और सामाजिक अपराध है। जब किसी गैंग या माफिया द्वारा जबरन बच्चों, महिलाओं या किसी से भी भीख मंगवायी जाए, तब यह कानूनन अपराधा भी है। इस विशाल देश में कोई भूखा न रहे और भूख के कारण अपराधा न करे, इसीलिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम का प्रस्ताव लाया गया। पर अब कोई नि_ल्ला न रहे ऐसा उपाय भी आवश्यक है। यानी राइट टू जॉब की बात भी करनी होगी। मनरेगा इसी दिशा में सरकार द्वारा उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन काम करने की मानसिकता का विकास इसके लिए अनिवार्य है। चूंकि भीख मांगना सभ्य समाज का लक्षण नहीं और आत्मसम्मान तथा स्वाभिमान जागृत किए बिना इससे किसी को विमुख नहीं किया जा सकता। सरकार को शिक्षा के प्रसार पर बल देना चाहिए। शिक्षा ही व्यक्ति को संस्कारित कर उसे स्वाभिमानी बना सकती है। लेकिन यह अकेले सरकार के बूते की बात नहीं, इसमें सभी समाज सेवी व्यक्तियों और संगठनों को अपना सहयोग देना होगा। तभी देश को भिक्षावृत्ति के कलंक से मुक्ति मिल सकेगी। भारत के संविधान में भीख मांगने को अपराध कहा गया है। फिर देश की सडक़ों पर लाखों बच्चे भीख आखिर कैसे मांगते हैं? बच्चों का भीख मांगना केवल अपराध ही नहीं है, बल्कि देश की सामाजिक सुरक्षा के लिए खतरा भी है। हर साल कितने ही बच्चों को भीख मांगने के धंधे में जबरन धकेला जाता है। ऐसे बच्चों के आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की काफी आशंका होती है। बहुत से बच्चे मां-बाप से बिछडक़र या अगवा होकर बाल भिखारियों के चंगुल में पड़ जाते हैं। फिर उनका अपने परिवार से मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है। पुलिस रेकॉर्ड के अनुसार, हर साल 44 हजार बच्चे गायब होते हैं। उनमें से एक चौथाई कभी नहीं मिलते। कुछ बच्चे किसी न किसी वजह से घर से भाग जाते हैं। कुछ को किसी न किसी वजह से उनके परिजन त्याग देते हैं। ऐसे कुल बच्चों की सही संख्या किसी को नहीं मालूम! ये तो पुलिस में दर्ज आंकड़े हैं। इनसे कई गुना केस तो पुलिस के पास पहुंचते ही नहीं। फिर भी, हर साल करीब 10 लाख बच्चों के अपने घरों से दूर होकर अपने परिजन से बिछडऩे का अंदेशा है। उन बच्चों में से काफी बच्चे भीख मंगवाने वाले गिरोहों के हाथों में पड़ जाते हैं। यानी हर साल हजारों गायब बच्चे भीख के धंधे में झोंक दिये जाते हैं। इन बच्चों का जीवन ऐसी अंधेरी सुरंग में कैद होकर रह जाता है, जिसका कोई दूसरा छोर नहीं होता। इनसे जीवन की सारी खुशियां छीन ली जाती हैं। भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते। वे संगठित माफिया के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। तमिलनाडु, केरल, बिहार, नई दिल्ली और ओडिशा में यह एक बड़ी समस्या है। हर आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों का ऐसा हश्र होता है। इन बच्चों के हाथों में स्कूल की किताबों की जगह भीख का कटोरा आ जाता है। भारत में भीख माफिया बहुत बड़ा उद्योग है। इससे जुड़े लोगों पर कभी आंच नहीं आती। इस मामले में कानून बनाने वालों और कानून तोडऩे वालों की हमेशा मिलीभगत रहती है। इन हालात से निपटने के लिए सिस्टम को ज्यादा जवाबदारी निभानी चाहिए।
भारत के मानवाधिकार आयोग की रपट के मुताबिक, हर साल जो हजारों बच्चे चुराये जाते हैं या लाखों बच्चे गायब हो जाते हैं, वे भीख मांगने के अलावा अवैध कारखानों में अवैध बाल मजदूर, घरों या दफ्तरों में नौकर, पॉर्न उद्योग, वेश्यावृत्ति, अंग बेचने वाले माफिया, अवैध रूप से गोद लेने और जबरन बाल विवाह के जाल में फंस जाते हैं। भारत में आप कहीं भी चले जाएं आपको भिखारी हर जगह मिल जाएंगे।
2011 की जनगणना रिपोर्ट में कोई रोजगार ना करने वाले और उनके शैक्षिक स्तर का आंकड़ा हाल ही में जारी किया गया है। इसके अनुसार देश में कुल 3.72 लाख भिखारी हैं, लेकिन आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि इनमें से बहुत सारे पढ़े लिखे हैं। इन 3.72 लाख भिखारियों में से 21 फीसदी ऐसे हैं जो 12वीं तक पढ़े लिखे हैं। यही नहीं इनमें से 3000 ऐसे हैं जिनके पास किसी प्रोफेशनल कोर्स का डिप्लोमा है और बहुत सारे ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं। इन आंकड़ो से एक बात और सामने आई है। ये सब भिखारी अपनी पसंद से नहीं बने बल्कि शायद मजबूरी में बने हैं। इनमें से अधिकतर का कहना था कि पढऩे लिखने के बाद अपनी डिग्री और शैक्षिक योग्यता के आधार पर भी संतोषजनक नौकरी ना मिलने पर वे भिखारी बने।
जनगणना के डेटा के मुताबिक देश में में कुल 3.72 लाख भिखारी हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि उनमें से 21 फीसदी 12वीं पास हैं और कुछ हजार भिखारी तो ग्रैजुएट और पोस्ट ग्रैजुएट भी हैं.
हालांकि ये कह पाना मुश्किल है कि भिखारियों की जो संख्या सरकार बता रही वह कितनी सही है. इसी साल अगस्त में राज्यसभा में सरकार ने कहा था कि देश में भिखारियों की संख्या 4,13,670 है, जिनमें से 2.2 लाख पुरुष और 1.9 लाख महिलाएं शामिल हैं.ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या सरकार देश के इन चार लाख भिखरियों, या कहें नागरिकों या कहें वोटरों का एक योजनाबद्ध भविष्‍य नहीं तय कर सकती?
जब दिल्‍ली, मुंबई में खाने-कमाने के लिए लोग पूरे देशभर से आ सकते हैं, क्‍या कोई ऐसी जगह नहीं बनाई जा सकती जहां देशभर के 4 लाख भिखारियों को लाकर एक सम्‍मानजनक काम से जोड़ा जा सके.
यदि 4 लाख में से 65 हजार पढ़े-लिखे हैं तो उन्‍हें बाकी भि‍खारियों को पढ़ाने का जिम्‍मा सौंप दिया जाए.
जो अनपढ़ हैं, उन्‍हें किसी कौशल से जोड़कर खाने-कमाने लायक बनाया जा सकता है.
करोड़ों के खर्च से जारी शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट और तमाम योजनाओं में पैसा है. इसके अलावा भिक्षावृत्ति रोकने के नाम पर हो रही करोड़ों रुपए की बर्बादी भी रोकी जा सकेगी.-
भीख मांगवाने वाले माफिया से भी निजात मिल जाएगी, यदि किसी एक ही जगह पर ऐसे लोगों को लाकर बसा दिया गया तो.
गरीबी और शारीरिक अपंगता के कारण भीख मांगने को मजबूर लोगों को राज्‍यवार ऐसे ही पॉकेट बनाकर स्‍वावलंबी बनाया जा सकता है.
क्‍योंकि दंडनीय अपराध बनाने पर भी नहीं रुका है भीख मांगनाl
आपको शायद जानकार हैरानी होगी लेकिन ये सच है. बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग ऐक्ट 1959 के मुताबिक सार्वजनिक जगहों पर भीख मांगना दंडनीय अपराध है. इसमे कहा गया है कि सार्वजनिक जगहों पर नाचकर, गाकर या किसी और तरीके से भीख मांगना अपराध है. इसके तहत पहली बार भीख मांगते हुए पकड़े जाने पर एक वर्ष और दूसरी बार पकड़े जाने पर 3 से 10 वर्ष कैद की सजा हो सकती है. राजधानी दिल्ली में इस ऐक्ट को 1960 में लागू किया गया था. साथ ही देश के कई राज्यों में भी ये एक्ट लागू है.
इस ऐक्ट के मुताबिक किसी भी भिखारी को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है और बिना किसी ट्रायल के ही जेल या मान्यता प्राप्त आश्रय घरों में भेजा जा सकता है.प्रधानमंत्री मोदी कुछ हटकर करने की बात कहते हैं. शायद वे सकारात्‍मक ढंग से देश को भिक्षावृत्ति से मुक्ति दिलाने का प्रयास भी करेंगे. वैसे ही जैसे एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत गांव गांव बिजली पहुंचाने की बात कही गई है.
भिक्षावृत्ति एक अपराध, यह वे पंक्तियां हैं जो कभी पोस्टरों तो कभी विज्ञापनों द्वारा अकसर दिखाई दे जाती हैं, इन पंक्तियों को पढ़कर हम भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि हमारी घृणा का वास्तविक हकदार आखिर है कौन, वो जो अपनी भूख मिटाने के लिए 1-1 रुपए के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, धूप, बारिश, तूफान हर मौसम में आसमान को ही अपनी छत समझकर रहते हैं, कूड़े के ढेर से खाने का सामान एकत्रित कर खाते हैं या फिर वो लोग जो इनकी ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार हैं?
कुछ देर के लिए जिस जगह से गुजरने पर हम अपनी नाक रुमाल से ढक लेते हैं वहां यह लोग अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं, लेकिन जब किसी को दोषी ठहराने की बात आती है तो हम इन्हें ही साफ-सुधरे शहर की गंदगी समझ लेते हैं. इनके जीवन को सुधारने के स्थान पर हम इनके जीवन को ही कोसते रहते हैं.
सड़क पर जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए ना तो राशन कार्ड की व्यवस्था है और ना ही पहचान पत्र की इसीलिए अब तो सरकार भी उन्हें तरक्की करते भारत देश का नागरिक नहीं मानती. अब जब वह भारत के नागरिक ही नहीं हैं तो सरकार उन्हें बराबरी का अधिकार कैसे दे सकती है?
सरकार की नजर में भिक्षावृति एक अपराध है और भीख मांगने वाले लोग एक अपराधी, लेकिन हैरत की बात तो यह है कि इन अपराधियों के लिए तो जेलों में भी कोई जगह नहीं है. उन्हें यूं ही सड़कों पर सडअने के लिए छोड़ दिया जाता है. भिक्षावृत्ति को आपराधिक दर्जा देने के अलावा हमारी सरकार ने कभी उनकी ओर, उनके जीवन में व्याप्त मर्म की ओर ना तो कभी ध्यान दिया और ना ही उनके लिए किसी भी प्रकार की कोई योजना बनाई. सरकार ही क्यों हम अपनी ही बात कर लेते हैं, समाजिक व्यवस्था को ताने देने के अलावा हम करते भी क्या है. सड़क पर कोई भीख मांगता है तो हम उसे लेक्चर सुना देते हैं कि कुछ काम कर लो, लेकिन आप ही बताइए क्या कोई खुशी से अपने आत्म-सम्मान को किनारे रखकर कटोरा हाथ में उठाता है? हम उन्हें यह समझाते हैं कि कुछ काम करो भीख मांगना अच्छी बात नहीं है तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें दुत्कार कर अपनी शान बढ़ाते हैं.
बड़ी-बड़ी बातें करने वाले सरकारी नुमाइंदों के साथ-साथ शायद अन्य लोग भी जिन्हें आजकल हम समाज सुधारक कहते नहीं थक रहे उनके सामने भी जब कोई भिखारी भीख मांगने आता है तो वह उसे कभी पैसे देकर तो कभी दुत्कार कर अपनी गाड़ी के शीशे बंद कर लेते हैं. लेकिन शोहरत और संपन्नता से भरे अपने जीवन में वापस लौटने के बाद उन्हें कुछ याद नहीं रहता और बात फिर वहीं की वहीं रह जाती है कि भिक्षावृत्ति अपराध है और भीख मांगने वाले अपराधी.

2 Responses to “आत्मसम्मान तथा स्वाभिमान जागृत किए बिना भिक्षावृत्ति को रोका नहीं किया जा सकता”

  1. राजन मल्होत्रा

    वाह रे हमारा भारत!
    धिक्कार है हमारी व्यवस्था को..
    बड़े बड़े होटलों मे भिक्षावृत्ति उन्मूलन पर विचार संगोष्ठियां की जा रही और रोज हजारों मासूम हाथ मांगने को बिछते रहते….
    नमन करना चाहता हूं लेखक अनूप जी को जिन्होंने कम से कम लिखकर विषय को जन जन तक पहुचाने का जो प्रयास किया उसे प्रवक्ता ने सफल कर महायोगदान देने हेतु साधुवाद का पात्र हैl

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    • अनिल अनूप

      शुक्रिया राजन मल्होत्रा जी
      लेख को मनो़योग से पढी आपने

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