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    चीन को कमजोर करने के लिए उसकी आर्थिक रूप से कमर तोड़ना जरूरी, चीनी सामान का जल्द से जल्द भारतीय विकल्प दे भारत सरकार

    देश व दुनिया में आयेदिन नित नई समस्या खड़ी करने का विशेषज्ञ बन चुके नापक देश भूमाफिया चीन ने एक बार फिर से भारतीय सीमा पर तवांग सेक्टर में भारत की भूमि हथियाने की ओछी मंशा से रात के अंधेरे में अपनी सेना की लगभग 600 सैनिकों की एक टुकड़ी को कंटीले लाठी डंडे और इलेक्ट्रिक बैटन आदि के साथ

    भारतीय सीमा में घुसपैठ करने की नीयत से भेजा था, हालांकि  चीन की 9 दिसंबर 2022 को की गयी घुसपैठ की इस बेहद ओछी हरकत का भारतीय सीमा पर तैनात हमारे देश के जांबाज सैनिकों ने मूंह तोड़ जबरदस्त करारा जवाब देना का कार्य किया था और उनको तत्काल ही वहां से वापस खदेड़ने का कार्य बहुत ही दिलेरी से बखूबी किया था, सूत्रों के अनुसार सीमा पर इस झड़प के घटनाक्रम में भारत व चीन दोनों की सेना के सैनिक घायल हुए हैं, लेकिन इस घटनाक्रम में बड़ी संख्या में चीनी सैनिक घायल हुए है। लेकिन जब से यह बात देशवासियों को पता चली है तब से ही देश के आम जनमानस में एकबार फिर से चीन के सभी प्रकार के उत्पादों से लेकर व उसका हर तरह से बॉयकॉट करने की बात चल रही है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक ने भी चीन की इस नापाक हरकत पर चिंता व्यक्त करते हुए भारत के पक्ष में बयान देकर खड़ा होने का कार्य किया है, भारत की विदेशी रणनीति के दृष्टिकोण से जो एक बहुत ही अच्छा संकेत है।

    *”लेकिन अफसोस की बात यह है कि देश की सुरक्षा से जुड़े हुए इस बेहद अहम ज्वलंत मुद्दे पर भी ना जाने क्यों संसद से लेकर सड़क तक हमारे राजनेताओं में जबरदस्त ढंग से आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। हर बार की ही तरह इस बार भी अपनी आदत से बहुत ही ज्यादा मजबूर हो चुके हमारे देश के बहुत सारे राजनेता व राजनीतिक दल सेना के शौर्य के पीछे छिपकर ‘अपनी डफ़ली अपना राग’ को गाते हुए अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में व्यस्त हैं, हालात देखकर लगता है कि इनको राजनीति के अलावा देशहित की जरा भी चिंता नहीं है।”*

    देश की सुरक्षा से जुड़े हुए बेहद गंभीर मसले पर भी जिस तरह की ओछी राजनीति चल रही है, उस हाल को देखकर देश के देशभक्त आम जनमानस को बेहद दुःख पहुंचता है, लेकिन फिर भी ना जाने क्यों हमारे प्यारे देश में अधिकांश राजनेता व दल सुधरने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। पिछले कुछ दिनों से देश में हालात यह है कि जब से चीन का यह प्रकरण भारत के राजनेताओं के सामने आया है तब ही से पक्ष व विपक्ष में सेना के शोर्य की बात तो कम हो रही है, लेकिन एक दूसरे पक्षों पर विभिन्न आरोप व प्रत्यारोप की बातों को लेकर के घमासान ज्यादा मचा हुआ है‌।

    *”देश की सुरक्षा से जुड़े हुए मसले पर भी राजनेताओं की गंभीरता का आलम यह है कि चीन का यह मसला नेहरू की गलतियों से चलते हुए चीनी चंदे व चीन पर मौजूदा सरकार देश को गुमराह कर रही है आदि जैसे बिना सिर पैर के मुद्दों तक पहुंच चुका है। चीन जैसे दुश्मन देश के खिलाफ भी भारत के राजनेताओं में एकजुटता देखने को नहीं मिल रही है, जो देशहित में बिल्कुल भी ठीक नहीं है।”* 

    वैसे तो भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया भूमाफिया कपटी चीन की विस्तारवादी नीतियों से बखूबी परिचित हैं, अपने सभी पड़ोसी देश की भूमि को कब्जा करना चीन की दशकों से फितरत रही है, उसके चलते ही चीन का अपने हर पड़ोसी देश के साथ सीमा विवाद का मसला चल रहा है, वही स्थिति भारतीय सीमा यानी की एलएसी पर भी बनी हुई है। वैसे भी तिब्बत पर अवैध रूप से कब्जा जमाने के बाद से ही भूमाफिया चीन ने अपनी विस्तारवादी रणनीति के तहत भारत के अरुणाचल प्रदेश पर निगाहें जमाकर बैठा है, चीन अपनी उस नापाक सोच को ही अमलीजामा पहनाने के चक्कर में ही आयेदिन अरुणाचल व लद्दाख से लगी सीमा पर कुछ ना कुछ उटपटांग हरकत करता रहता है, लेकिन भारत की जांबाज सेना तुरंत ही चीन की सेना को पीटकर उसकी ओछी हरकतों का करार जवाब आक्रामक तरीके से देने का कार्य करती है। भारत की जांबाज सेना के द्वारा गलवान घाटी व तवांग सेक्टर में दिये गये चीनी सेना को सबक दुनिया के सामने उसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। 

    देश में चीन की नापाक हरकत के बाद से ही उसकी आर्थिक रूप से कमर तोड़ने के लिए चीनी उत्पादों के पूर्ण रूप से बहिष्कार की मांग बार-बार उठती रहती है, आम व खास वर्ग की जनता से लेकर के छोटे-बड़े राजनेता तक भी इसके पक्ष में समय-समय पर आवाज उठाते रहते हैं, तवांग सेक्टर में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के साथ भारतीय सेना की हाल के दिनों की झड़प के बाद से ही देश में एकबार फिर से चीन में बने सभी प्रकार के उत्पादों के बहिष्कार का मुद्दा जबरदस्त ढंग से चल रहा है। लेकिन वास्तव में धरातल पर चीन से दिन प्रतिदिन कारोबार बढ़ रहा है, चीन के उत्पादों पर दिन प्रतिदिन भारत की निर्भरता बढ़ रही है, जो भारत के लिए ठीक नहीं है, वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार गलवान घाटी में हुई भारत व चीन की सेना की झड़प के समय वर्ष 2020-2021 में 75 बिलियन डॉलर का चीन से जो कारोबार था, वह मार्च 2022 तक मात्र 12 महीनों में ही 34 प्रतीशत बढ़कर के 115.83 बिलियन डॉलर हो चुका है। चीन को आर्थिक मोर्चे पर चोट देने के लिए इस हालात पर हम सभी देशवासियों को गहन विचार करना होगा और भविष्य में भारतीय उत्पादों को चीनी उत्पादों पर तरजीह देना रोजमर्रा के व्यवहार में सीखना होगा, तब ही चीन को हम सैन्य व व्यापारिक दोनों ही मोर्चे पर बुरी तरह से हरा सकते हैं। 

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