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    उच्च शिक्षा में पाँव पसारती यौनाचार की प्रवृत्ति

    उच्च शिक्षा के नाम पर दुनिया भर के छात्रों को व्यभिचार के उस अंतहीन गर्त में धकेला जा रहा है, जहाँ अन्धकार के अलावा और कुछ भी नहीं है। इसको समझने के लिए पश्चिमी देशों के कुछ शोधों पर नज़र डालना ज़रूरी है। रायटर ने 18 मई 2011 को बर्लिन स्टडी सेंटर द्वारा जर्मनी की राजधानी बर्लिन के विश्वविद्यालयों में किये गए एक शोध के निष्कर्ष को छापा। जिसके अनुसार विश्वविद्यालय के छात्र शिक्षा ज़ारी रखने के लिए वेश्यावृत्ति करतें थें। अध्ययन के लेखकों में से एक और बर्लिन के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय के छात्र ईवा ब्लुमेन्शिन ने बताया कि वेश्यावृत्ति की ओर मुड़ने वाले छात्रों की मुख्य प्रेरणा प्रति घंटा की दर से मिलने वाली भारी-भरकम रकम थी। उन्होंने इसके कारण के रूप में महंगी शिक्षा और छात्रों का कर्ज में डूबे होना पाया। उन्होंने शोध में बताया कि बर्लिन में वेश्यावृत्ति की दर फ्रांस की राजधानी पेरिस और उक्रेन की राजधानी कीव के छात्रों से अधिक थी। पश्चिमी देशों में किये गए शोधों से स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच वेश्यावृत्ति ने एक अंशकालिक पेशे के रूप में लोकप्रियता हासिल की है। जिसका कारण यह है कि हजारों छात्र हर साल अपनी विश्वविद्यालय की डिग्री को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं। छात्र महंगे ट्यूशन, किराए और पाठ्यपुस्तकों के साथ अपने खर्चों को संतुलित करने में सक्षम नहीं होते हैं और मजबूरी में वेश्यावृत्ति की अंधेरी दुनिया में कदम रख देतें हैं। इस प्रकार की समस्या का सामना ऑस्ट्रेलिया, पोलैंड, घाना, मेडागास्कर सहित दुनिया के अनेक देश कर रहें हैं। यह भारत के लिए भी आसन्न ख़तरा है। देश की उच्च शिक्षा बाज़ारवाद का शिकार हो चुकी है और निरंतर महंगी होती जा रही है। केंद्र सरकार भी सहयोग करने के नाम पर हाथ खड़े कर चुकी है। 2019-20 के अंतरिम बजट में हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी के लिए 2,100 करोड़ रुपये आवंटित किये गए जो पिछले साल की तुलना में 650 करोड़ रुपये कम है। कोई रास्ता निकालने के बजाय सरकार इसके निजीकरण पर उतारू है। देश के 993 विश्वविद्यालयों में से 385 निजी क्षेत्र के हैं। प्राइवेट विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इनकी फीस आम आदमी के पहुंच से बाहर है। सरकारी और वित्तीय सहायता प्राप्त संस्थानों में स्ववित्तपोषित कोर्सों का चलन बढ़ा है। कॉलेज की पढ़ाई के साथ कोचिंग संस्थान आवश्यक आवश्यकता बनते जा रहें हैं। जिसके कारण सामान्य उच्च शिक्षा बहुत महंगी हो गयी है। महंगी होती जीवनशैली आग में घी का काम कर रही है। देश के शैक्षिक सत्र 2018-19 में राष्ट्रीय स्तर पर लगभग तीन करोड चौहत्तर लाख छात्रों ने विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया। इस समूह का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के छात्रों का है। उनमें पढ़ाई का जुनून तो है लेकिन इस प्रयोजन के लिए खर्चों का बंदोबस्त कर पाना उनके परिवार के बूते के बाहर है। पश्चिमी देशों की तर्ज़ पर भारत में सम्मानपूर्वक पार्ट टाइम नौकरी करके पढ़ाई का खर्चा निकालना बहुत ही कठिन काम है। उच्च शिक्षा की समीक्षा करते समय विश्वविद्यालय में राजनीतिक हस्तक्षेप, कुलपतियों की नियुक्ति, नौकरशाही का मनमानापन, शिक्षकों की कमी, शिक्षकों की तदर्थ नियुक्ति, कम वेतनमान के कारण उच्च स्तरीय शिक्षा एवं अनुसंधान पर नकारात्मक प्रभाव, शोध का निम्नस्तर, डाक्टरेट की निम्न गुणवत्ता एवं आदि बातों का उल्लेख तो किया जाता है लेकिन छात्र और उसके परिवार की आर्थिक और व्यवहारिक समस्याओं को महत्व नहीं दिया जाता है। शिक्षा में फैल रहे व्यभिचार का सीधा सम्बन्ध परिवार के नियंत्रण से दूर एकांत और आर्थिक तंगहाली झेल रहे बच्चे हैं। आधुनिकता के नाम पर बढ़ती स्वच्छंदता की प्रवृति ने जिस्म व्यापार में लगे दरिंदों को अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया है। बची-खुची कमी इंटरनेट ने पूरी कर दी है। इंटरनेट पर फ़ैल रहे इस अनैतिकता का आंकलन अमेरिका स्थित संस्था एनफ इज़ एनफ के शोध से पता चलता है। इस संस्था के अनुसार इंटरनेट सामग्री का 30 प्रतिशत पोर्न है। 2005 से 2013 तक टीन पॉर्न की खोज प्रतिदिन बढ़कर पांच लाख तक हो गई। पोर्न साइटें प्रत्येक महीने अमेज़ॅन, नेटफ्लिक्स और ट्विटर की संयुक्त तुलना में अधिक लोगों को आकर्षित करती हैं। अमेरिका स्थित दुनिया की एक सबसे लोकप्रिय पोर्न वेबसाइट ने वर्ष 2018 में आँकड़ों की एक श्रृंखला जारी किया। जिसके अनुसार अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम के बाद भारत दुनिया में उस अश्लील वेबसाइट का तीसरा सबसे बड़ा ग्राहक है। इस वेबसाइट पर अश्लील सामाग्री की खोज करने वाले 44 प्रतिशत भारतीयों की आयु 18 से 24 वर्ष थी जबकि 41 प्रतिशत लोगों की आयु 25 वर्ष से 34 वर्ष के बीच थी। घर से दूर या परिवार व्यस्तताओं के कारण उपेक्षित यही 18 से 24 वर्ष के बच्चे इस दलदल में बहुत आसानी से फंस जातें है। समस्या बहुत गंभीर है देश में वास्तविक स्थित क्या है यह अभी पता नहीं है। इससे पहले कि पश्चिम की कोई संस्था यहाँ शोध करके देश को शर्मसार करने वाले आंकड़े ज़ारी करे, सरकार को सजग हो जाना चाहिए। इस समस्या से निपटने में परिवार, समाज, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं सहित सरकार को गंभीरता से जुट जाने की आवश्यकता है। सवाल देश की सनातन संस्कृति को बचाने का है।

    रवीन्द्र प्रताप सिंह
    रवीन्द्र प्रताप सिंह
    संपर्क -ं 8960031704 प्रकाशन क्षेत्र में प्रबन्धक के रूप में ‘हिन्दवी’ साप्ताहिक समाचार पत्र का सफल प्रकाशन। हिन्दवी साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रबन्ध सम्पादक रहा। संगठन की पत्रिका ‘हिन्दवी वार्षिकी’ का सम्पादक रहा। विश्व हिन्दु महासंघ की पत्रिका ‘पराक्रम’ का सह सम्पादक रहा। अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में लेख छपा। वर्तमान में अवध राज्य आंदोलन समिति के राष्ट्रीय संयोजक हैं

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