लेखक परिचय

इफ्तेख़ार अहमद

मो. इफ्तेख़ार अहमद

लेखक इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के अनुभवी पत्रकार है। वर्तमान में पत्रिका रायपुर एडिशन में वरिष्ठ सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं और निरंतर लेखन कर रहे हैं। कई राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में इनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। पत्र पत्रिकाओं के लिए लेख मंगवाने हेतु 09806103561 पर या फिर iftekhar.ahmed.no1@gmail.com पर संपर्क करें.

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मो. इफ्तेख़ार अहमद,
यूरोपियन अब तक अपने आपको दुनिया के सबसे स्मार्ट, सभ्य और दुनियाभर को सभ्य बनाने का ठेकेदार मानते रहे हैं। इनके इस सिध्दांत को दुनियाभर से चुनौती मिली। 21वीं सदी में एशिया के उभार ने तो इसे पूरी तरह ख्वारिज कर दिया। अब ये जग जाहिर हो चुका है कि 21वीं सदी में एशिया की निर्णायक भूमिका होगी। मौजूदा एशियाई देश प्रकृतिक संपदा से भरपूर होने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान कुशल मानव संसाधन के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आज एशिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी मूल्यपरक जीवन शैली है। जहां 21वीं सदी के इस भौतिकवादी युग में भी मानव मूल्यों को बचाने के लिए सारी सुख सुविधाओं की तीलांजलि दी जा रही, लेकिन अब भी लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) में ऐसे शोध किए जा रहे हैं जो मानव मात्र को खूबसूरत और बदसूरत वर्ग में बांटने और भेद-भाव पैदा करने वाले सिध्दांतों को वैज्ञानिक रूप दे रहा है।

शोध में बताया गया है कि सुंदर पुरुष और महिलाएं सामान्य दिखने वाले पुरुष, महिलाओं से ज्यादा बुद्धिमान होते हैं। हालांकि सुंदरती की परिभाषा नहीं दी गई है जो अपने आपमें भ्रामक है। अगर भारतीय परिदृश्य की बात करें तो यहां सुन्दरता को मूल्यों और चारित्रिक सुंदरता के रूप में देखने की परंपरा रही है, लेकिन स्मार्ट चेहरों के पीछे भागने और काले लोगों पर सफेद चमरी बनाने का नशा चढ़ाकर क्रीम और पाउडर की दुकानदारी चलाने वालों से तो ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

यूरोपियन की निगाह में असभ्य माने जाने वाले एशिया के बढ़ते कद और महत्व को पहचानते हुए अमेरिका भी अपनी विदेश नीति में बदलाव करते हुए ‘लुक एशिया की राह पर चल पड़ा है। इसी क्रम में पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति ने एशिया की तीन उभरती हुई शक्तियों भारत, इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया से संबंध सुधारने के लिए इन देशों की यात्रा की, लेकिन इन सब बातों से अलग लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) में खूबसूरती का इंटेलीजेंसी से संबंध तलाशने के नाम पर जो रिजल्ट सामने आया है वह एक बार फिर सभ्यता, शिक्षा और नई खोज को खूबसूरत लोगों की बपौती साबित करने की कोशिश की तरह है। अब तक माना जाता था कि किसी के दिमाग के तेज होने का खूबसूरती से कोई तअल्लुक नहीं है, ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) द्वारा कराए गए अध्ययन में पाया गया है कि खूबसूरत स्त्री-पुरुष ज्यादा बुद्धिमान होते हैं और उनका आईक्यू औसत से 14 प्वाइंट अधिक होता है। ‘इंटेलीजेंस पत्रिका के मुताबिक खूबसूरत जोड़ों के बच्चे सुंदर भी होते हैं और बुद्धिमान भी। इन गुणों का उनकी आगे तक की पीढिय़ों में आनुवांशिक रिश्ता रहता है। वेबसाइट ‘डेली मेल डॉट को डॉट युके की रिपोर्ट में समाचार पत्र ‘संडे टाइम्स के हवाले से एलएसई की शोधकर्ता संतोषी कनाजावा कहती हैं कि शारीरिक अकर्षण सामान्य बुद्धि से महत्वपूर्ण सकारात्मक ढंग से जुड़ा हुआ है। फिर चाहे इस पर सामाजिक वर्ग, शरीर के आकार और स्वास्थ्य का नियंत्रण हो अथवा नहीं। इस अध्ययन में पाया गया है कि शारीरिक रूप से आकर्षक दिखने वाले पुरुषों का आईक्यू औसत से 13.6 प्वाइंट अधिक होता है, जबकि खूबसूरत दिखने वाली महिलाओं का आईक्यू औसत से 11.4 प्वाइंट अधिक होता है। कनाजावा के ये परिणाम ‘नेशनल चाइल्ड डेवलपमेंट स्टडी पर आधारित हैं। इसमें 17,419 लोगों पर 1958 में मार्च में उनके जन्म के समय से एक सप्ताह तक के लिए नजर रखी गई थी। बताया गया है कि इन लोगों ने अपने बाल्यकाल और व्यस्क अवस्था की शुरुआत में शैक्षिक प्रगति, बौद्धिकता और शारीरिक दिखावट से सम्बंधित कई परीक्षाएं दीं। अमेरिका के ‘नेशनल लांगीट्यूडिनल स्टडी ऑफ एडोलीसेंट हेल्थ के ऐसे ही अध्ययन में 35,000 युवा अमेरिकियों को शामिल किया गया था। कनाजावा का कहना है कि खूबसूरत लोगों के अधिक बुद्धिमान होने की उनकी बात शुद्ध रूप से वैज्ञानिक है।

ये शोध कितना वैज्ञानिक है इस पर तो कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में बेरोजगारों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। जिसे देखते हुए यहां इन दिनों बाहरी पेशेवरों की आमद को लेकर हो-हुल्ला मचा हुआ है और नतीजतन वहां की सरकारें भी आव्रजन वीजा नीति को सख्त बनाने पर आमादा है। ये शोध उसी दिशा में उठाया गया कदम लगता है। यानी आर्थिक रूप से जर्जर हो चुकी यूरोप की अर्थ व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए इस शोध के माध्यम से अब सारकारें अपने देशों में कार्यरत कंपनियों से कह सकेगी कि उनके ये गोरे लोग बाकी दुनिया के लोगों से ज्यादा योग्य और दक्ष है, लिहाजा पहली प्राथमिकता गोरे लोगों को मिलनी चाहिए। इस प्राकर ये शोध यूरोपियन कंपनियों को सुंदर दिखने वाले गोरे लोगों को नौकरी में रखने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करेगी। वहीं इस शोध से सुंदर बनाने के नाम पर दुकान चलाने वालों की दुकानदारी भी चल पड़ेगी। जैसा कि हम सभी आज कल फेयर एंड लवली के विज्ञापन में देखते हैं। लिहाजा ये शोध खूबसूरत और बदसूरत लोगों को बांटने का वैज्ञानिक आधार देने जैसा है, जो एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमेरिका के लोगों के अधिकारों का खुला उलंघन और भेद-भाव को बढ़ावा देने का पाखंडपूर्ण वैज्ञानिक आधार के इलावा कुछ नहीं है।

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