समझें, स्वाभिमान एवम आत्मसम्मान के सूक्ष्म अंतर को

स्वाभिमान क्या होता हैं ??

स्वाभिमान शब्द आत्मगौरव और आत्मसम्मान के लिए प्रयुक्त होता है।

स्वाभिमान का सामान्य अर्थ पाठशाला में ही संधि विच्छेद में पढ़ा था कि स्व का अभिमान मतलब स्वाभिमान, स्व मतलब खुद, आप स्वयं.।

यह ऐसा शब्द है जो हमें जाग्रत करता है, प्रेरित करता है और हमें कर्तव्य के प्रति आगे बढ़ने के लिए ललकारता है। स्वाभिमान हमारे अपने विश्वास को जाग्रत करता है। हमें जीवन मूल्यों के प्रति, अपने देश के प्रति, अपनी संस्कृति, अपने समाज और अपने कुल के प्रति स्वाभिमानी बनने की प्रेरणा देता है। मानव तीन ऋणों को लेकर जन्मता है। पहला-पितृ ऋण। दूसरा ऋण है-सामाजिक ऋण। हम जिस समाज में है, उस समाज को अपने कौशल और विवेक-बुद्धि से समाज-सेवा करने में स्वाभिमान की पवित्र भावना रखें। हमारे ऊपर तीसरा ऋण है-राष्ट्र ऋण। हम अपने राष्ट्र में रहकर उसके अन्न-जल से पोषण प्राप्त करके अपना, अपने परिवार और अपने समाज के विकास में सहयोगी बनते हैं। इसलिए उस राष्ट्राभिमान को जाग्रत रखना चाहिए। राष्ट्र पर किसी भी प्रकार की आपदा या परतंत्रता आए तो राष्ट्र को स्वतंत्र कराने के लिए अनेक राष्ट्रभक्तों व विवेकी पुरुषों ने स्वाराष्ट्राभिमान के वशीभूत होकर अपने को उत्सर्ग कर दिया। ऐसा स्वाभिमान हमारे विवेक को प्रकाशित करता है।

स्वाभिमान इन्सान की श्रेष्ठता से समाज में होने वाली पहचान होती है। समाज में स्वाभिमानी इंसानों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है तथा समाज में स्वाभिमानी इंसानों की पूर्ण विश्वसनीयता भी कायम होती है।

जो इन्सान समाज में अपनी सम्पत्ति एवं धन या पद के आधार पर खुद को महत्वपूर्ण समझ कर अभिमान करते हैं वास्तव में वह उनका अहंकार होता है। अभिमानी तथा स्वाभिमानी होने में बहुत अंतर होता है। स्वाभिमानी को समाज महत्वपूर्ण समझता है परन्तु अभिमानी खुद को महत्वपूर्ण समझता है। स्वाभिमानी समाज में सम्मानित माना जाता है परन्तु अभिमानी खुद को सम्मानित मान लेता है। अभिमानी इन्सान को यह समझता आवश्यक होता है कि समाज किसी की सम्पत्ति, धन या पद का सम्मान नहीं करता समाज इन्सान के कर्म, व्यवहार एवं आचरण की श्रेष्ठता का सम्मान करता है। स्वाभिमानी इन्सान सत्य से प्रेम करता है तथा अभिमानी इन्सान सत्य से दूर भागता है इसलिए जब सत्य से प्रेम होने लगे तो समझ लेना चाहिए कि वह भी स्वाभिमानी हो रहा है।

स्वाभिमान की श्रेष्ठता को ईमान कहा जाता है। इन्सान जब सत्य एवं निष्ठा से अपने कार्यों को परिणाम देता है तथा अपने सभी कर्तव्यों का पालन पूर्ण निष्ठा से करता है तब वह ईमानदार कहलाता है। स्वाभिमान की श्रेष्ठता पर जब ईमानदारी की छाप लग जाती है तो ऐसे इन्सान को समाज में विशेष स्थान प्राप्त हो जाता है। किसी ईमानदार इन्सान को समाज से पूर्ण सहयोग एवं समय पर जितना धन चाहिए उधार के रूप में प्राप्त हो जाता है। किसी धनी इन्सान को यदि समाज में ईमानदार होने का विश्वास प्राप्त नहीं होता तो उसे भी उधार लेने में असुविधा होती है क्योंकि विश्वास धन से नहीं ईमानदारी के आधार पर होता है। ऐसे कारण प्रमाणित करते हैं कि संसार में इन्सान अपने स्वाभिमान के कारण कितना अधिक श्रेष्ठ बन सकता है जिससे उसका जीवन सम्मानित एवं आनन्दित बन जाता है।

स्वाभिमान व्यक्ति को स्वावलम्बी बनता है जबकि अभिमानी हमेशा दूसरों पर आश्रित रहना चाहता है। स्वाभिमान एवं अभिमान के बीच बहुत पतला भेद है। इन दोनों का मिश्रण व्यक्तित्व को बहुत जटिल बना देता है।

अपने कार्यों का प्रतिफल सभी अन्य लोगों की सहायता मानता है उसका स्वाभिमान अभिमान में परिवर्तित नहीं होता है तथा उसके अंदर स्वाभिमान और अभिमान को परखने की प्रवृति जाग्रत होती है।

मेरा एक मित्र कभी किसी की सहायता स्वीकार नहीं करता चाहे कितनी भी कठिन परस्थितियां क्यों न हों वह हमेशा अकेला ही उनका सामना करता है। लोग कहते हैं की वह अभिमानी है लेकिन वह कहता है की वह स्वाभिमानी है। भौतिक सम्पदा ,धन,बल,सम्पत्ति ,भूमि आदि अभिमान को जाग्रत करती हैं।
महात्मा विदुर ने किसी प्रसंग में कहा है “बुढ़ापा रूप को ,आशा धैर्य को,मृत्यु प्राण को,क्रोध श्री को,काम लज्जा को एवं अभिमान सर्वस्य को हरण कर लेता है।

संतान की उपलब्धियां,ज्ञान,विद्या आदि अभिमान का कारण है किन्तु इनकी प्राप्ति के बाद विनम्रता एवं शीलता आती है तो वह स्वाभिमान का प्रेरक मानी जाती है। जितने भी महान वैज्ञानिक ,दार्शनिक एवं राजनेता हुए हैं उनमे अभिमान लेशमात्र भी नहीं था इसलिए वो महान कहलाये। अभिमान अपनी सीमाओं को लाँघ कर दूसरे की सीमाओं में प्रवेश करता है जबकि स्वाभिमानी अपनी और दूसरों की सीमाओं के प्रति सतर्क एवं जागरूक होता है।

लघुत्व से महत्व की और बढ़ना स्वाभिमान होने की निशानी है जबकि महत्व मिलने पर दूसरों को लघु समझना अभिमानी होने का प्रमाण है। अभिमान में व्यक्ति अपना प्रदर्शन कर दूसरों को नीचे दिखने की कोशिश करता है इसलिए लोग उससे दूर रहना चाहते हैं सिर्फ चाटुकार लोग ही अपने स्वार्थ के कारण उसकी वह वाही करते हैं इसके विपरीत स्वाभिमानी व्यक्ति दूसरों के विचारों को महत्व देता है इसलिए लोग उसके प्रशंसक होते हैं।

अच्छा श्रोता होना स्वाभिमान का लक्षण है क्योंकि वह सोचता की मुझे लोगों से बहुत कुछ ग्रहण करना है। प्रत्येक उपलब्धि के नीचे अहंकार का सर्प होता है उसके प्रति सदैव सावधान रहकर ही आप उसके दंश से बच सकते हैं। स्वाभिमान हमेशा स्वतंत्र का पक्षधर रहता है इसलिए स्वाभिमानी स्वतंत्रता के लिए लड़ते हैं जबकि अभिमानी अपने को स्वतंत्र रख कर दूसरों की गुलामी का पक्षधर है

कोई इन्सान जब किसी भी प्रकार की बेईमानी करता है तो उसे सर्वप्रथम अपने स्वाभिमान का अंत करना पड़ता है अथवा वह स्वाभिमानी नहीं होता क्योंकि बेईमानी जब प्रमाणित होती है तो अपमान भी भरपूर होता है। स्वाभिमान इन्सान की श्रेष्ठता एवं शुभ कर्मों की पहचान है। जीवन में बेईमान से स्वाभिमान इन्सान समृद्धि में पिछड़ अवश्य सकता है परन्तु समाज में सदैव अग्रणी रहता है।

स्वाभिमानी इन्सान को प्रयासों से ही सही परन्तु सफलता अवश्य प्राप्त होती है क्योंकि समाज उसका साथ अवश्य देता है। बेईमान इन्सान का कोई बेईमान अथवा लोभी या स्वार्थी इन्सान कुछ समय के लिए साथ अवश्य दे सकता है परन्तु ऐसे इन्सान किसी भी समय धोखा दे देते हैं। बेईमान अथवा साधारण इन्सान की मृत्यु के साथ ही पहचान समाप्त हो जाती है परन्तु स्वाभिमानी एवं ईमानदार इंसानों को समाज सदैव स्मरण रखता है तथा समय-समय पर उनकी व्याख्या भी करता रहता है।

संसार में अपनी पहचान स्थापित करनी हो तो इन्सान को स्वाभिमानी होना आवश्यक है जिसके लिए अपने कर्मों, व्यवहार एवं आचरण में श्रेष्ठता उत्पन्न करना आवश्यक होता है। इन्सान यदि किसी प्रकार का अनुचित कार्य करता है तो वह अपना सम्मान स्वयं भी नहीं कर सकता क्योंकि उसे पता होता है कि वह गुनाहगार है। जो इन्सान अपना सम्मान स्वयं भी नहीं कर सकता उसे दूसरों से सम्मान की अपेक्षा करना नादानी होती है। इन्सान को यदि सम्मान की अपेक्षा हो तो सर्वप्रथम खुद अपना सम्मान करना सीखना चाहिए और अपना सम्मान सिर्फ स्वाभिमानी इन्सान ही कर सकता है।

दूसरों को कमतर आँकना एवं स्वयं को बड़ा समझना अभिमान है।एवं अपने मूलभूत आदर्शों पर बगैर किसी को चोट पहुंचाए बिना अटल रहना स्वाभिमान है। अभिमानी व्यक्ति अपने आपको स्वाभिमानी कहता है किन्तु उसके आचरण,व्यवहार एवं शब्दों से दूसरे लोग आहत होते हैं। अभिमानी अन्याय करता है और स्वाभिमानी उसका विरोध। स्वाभिमानी दूसरों का अधिपत्य खत्म करता है जबकि अभिमानी अपना अधिपत्य स्थापित करता है। रावण अभिमानी था क्योंकि वह सब पर अधिकार जमाना चाहता था ,कंस अभिमानी था क्योंकि वह आतंक के बल पर राज करना चाहता था। राम ने रावण के अधिपत्य को समाप्त किया तथा कृष्ण ने कंस के आतंक को ,इसलिए राम और कृष्ण दोनों स्वाभिमानी थे।

देश की अस्मिता की रक्षा के लिए हजारों ललनाओं ने जौहर की आग में कूदकर अपने स्वाभिमान की रक्षा की। अपने स्वाभिमान के लिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने फिरंगियों से युद्ध करते हुए अपना जीवन राष्ट्र के लिए बलिदान कर दिया। यह स्वाभिमान ही है, जो हमें हमारे निश्चय से डिगा नहीं सकता। स्वाभिमान हमारे डिगते कदमों को को ऊर्जावान कर उनमें दृढ़ता प्रदान करता है। कठिन परिस्थितियों और विपन्नावस्था में भी स्वाभिमान हमें डिगने नहीं देता।

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