2011 की जनगणना से सुलझ सकते हैं अनसुलझे सवाल

आज महिला आरक्षण के मुद्वे पर जिस तरह से कोटे के अंदर कोटे की बात की जा रही है, उसका सही समाधान तभी हो सकता है, जब सभी जाति एवं धर्म के पुरुषों और महिलाओं की संख्या हमें ज्ञात हो।

मंडल आयोग के रिर्पोट के आधार पर पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देने की व्यवस्था 1990 के दशक के शुरुआत में की गई थी, किन्तु इस रिर्पोट को लागू करने के पहले पिछड़ों की वास्तविक संख्या कितनी है, इस बात का ध्‍यान नहीं रखा गया था ? अगर हमें उनकी वास्तविक संख्या मालूम होती और हम उनके आर्थिक और सामाजिक हैसियत से अवगत होते तो शायद इस रिर्पोट को दूसरे स्वरुप में लागू किया जाता तथा इस रिर्पोट को लागू करने के क्रम में जिस तरह से बवाल हुआ था, वह भी नहीं होता।

जो भी हो मंडल आयोग के रिर्पोट को लागू करने के बाद हमारे देश में पिछड़ों में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव तो आया ही है और यह जागरुकता स्पष्ट रुप से पूरे देश में परिलक्षित भी हो रहा है। ”मायावती” से ”मालावती” बनने की प्रक्रिया भी शायद इस तरह के बदलाव का ही एक हिस्सा है।

आश्‍चर्यजनक रुप से मंडल आयोग के रिर्पोट को लागू करने के बाद भी आरक्षण का जिन्न आज भी अक्सर एक नये स्वरुप और क्लेवर में बाहर निकल आता है। बोतल से इस जिन्न का बार-बार निकलना तभी बंद हो सकता है, जब 1931 में जिस तरह से जाति और धर्म के आधार पर जनगणना करवायी गई थी, उसी तर्ज पर 2011 में भी जनगणना करवाई जाए। 2001 में इस मौके को हम गवां चुके हैं। अगर इस बार भी हम चूक करते हैं तो देश के हित के लिए यह ठीक नहीं होगा।

सच कहा जाए तो आज जरुरत इस बात की है कि सभी धर्म और जाति के पुरुषों और महिलाओं की संख्या का पता हमें स्‍पष्ट रुप से हो। ताकि किस जाति और धर्म के कितने लोग हैं और उनकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर क्या है, इसका हमें सही-सही पता चल सके?

लिहाजा अब अंधेरे में तीर चलाने की कवायद से हमें बाज आना चाहिए। इससे फायदा कम है और नुकसान अधिक।

वैसे इसतरह से जनगणना करवाने के दूसरे फायदे भी हैं। हमारे देश में दूसरे देश के कितने लोग रह रहे हैं, इस प्रक्रिया को पूर्ण करके उनको भी हम चिन्हित करने में सफल हो जायेंगे।

विदेशी नागरिकों में मुख्य रुप से हमारे देश में नेपाली और बंगलादेशी रह रहे हैं। इसका मूल कारण-इन दोनों देशों की सीमाओं का पष्चिम बंगाल, आसाम और बिहार से सटा होना है। हालांकि फिलहाल बंगलादेश के साथ हमारे संबंध अच्छे हैं, पर कब इसमें खटास आ जाएगा, कहा नहीं जा सकता है। यह भी सत्य है कि आई.एस.आई के एजेंट सबसे अधिक बंगलादेश के रास्ते ही हमारे देश में प्रवेश करते हैं। चीन का नेपाल में किस तरह से हस्तक्षेप बढ़ रहा है, इससे भी हम अनजान नहीं हैं।

एक आकलन के अनुसार वर्तमान में हमारे देश में तकरीबन 20 लाख बंगलादेशी रह रहे हैं। नेपाली गोरखा 1980 से ही गोरखालैंड की मांग कर रहे हैं। दार्जलिंग स्थित ऑल इंडिया भाषा समिति तो आजकल पश्चिम बंगाल, सिक्किम, आसाम और भारत के अन्यान्य हिस्सों में रह रहे नेपालियों की अपने स्तर पर गणना करने का काम कर रही है। एक अनुमान के अनुसार आज की तारीख में हमारे देश में नेपालियों की संख्या लगभग 1 करोड़ के आसपास है। आसाम के पूर्व मुख्यमंत्री श्री पी. के. मोहन्ता ने अपनी किताब जोकि 1986 में प्रकाशित में हुआ था में लिखा है कि सिर्फ आसाम में ही नेपालियों की संख्या तकरीबन 5 लाख है।

इन दोनों देशों के अलावा पाकिस्तानी, अफगानिस्तानी और बर्मा के नागरिकों की भी पहचान करने की जरुरत है, क्योंकि इनसे खतरा भारत को सबसे ज्यादा है। पाकिस्तानी, अफगानिस्तानी आज भारत में आंतक फैलाने में सबसे आगे हैं, तो बर्मा के जरिए चीन अपना दायरा भारत में बढ़ाना चाहता है।

आश्‍चर्य की बात यह है कि ये सभी विदेशी नागरिक आज भारत के सरकारी आंकड़ों में भारत के नागरिक बन चुके हैं । इनका अपने देश के अलावा भारत में भी वोटर लिस्ट में नाम है और हमारा चुनाव आयोग हर पाँच साल के बाद इस वोटर लिस्ट को यथावत् समीक्षा करने का काम भी कर रहा है। इसतरह ये विदेशी नागरिक दोहरी नागरिकता के मजे ले रहे हैं। इतना ही नहीं राशन कार्ड से लेकर हर तरह की सुविधा का उपभोग भी ये विदेशी नागरिक कर रहे हैं और हमारे देश के राजनेता और अधिकारी बस हाथ-पर-हाथ धर कर बैठे हुए हैं।

लिहाजा जरुरत इस बात की है कि हम इस बार बिना कोई गलती किये हुए सन् 1931 में सम्पन्न हुए जनगणना की तरह आगामी वर्ष यानि 2011 में जनगणना करवायें। इससे बहुत तरह की समस्याओं का हल स्वत:-स्फूर्त तरीके हो जाएगा और नेताओं के तरकश के बहुत सारे तीर अपने-आप बेअसर हो जायेंगे।

-सतीश सिंह

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