लेखक परिचय

ललित कुमार कुचालिया

ललित कुमार कुचालिया

लेखक युवा पत्रकार है. हाल ही में "माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता विश्विधालीय भोपाल", से प्रसारण पत्रकारिता की है और "हरिभूमि" पेपर रायपुर (छत्तीसगढ़) में रिपोर्टिंग भी की . अभी हाल ही में पत्रकारिता में सक्रीय रूप से काम कर है

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जैसे – जैसे नजदीक आता जा रहा है वैसे – वैसे सभी राजीनीतिक दलों के दिल की धड़कने तेज़ होती दिख रही है | हाल ही में स्टार न्यूज़ का नील्सन ओपिनियन पोल बताता है कि इस बार यूपी में बसपा कों भारी सीटों का नुकसान होने वाला है आंकड़े तो चौकाने वाले है ही इसमें कोई गुरेज नहीं है | माया सरकार वैसे भी पहले से चर्चा में बनी हुई है आए दिन कोई न कोई उसका मंत्री लोकायुक्त की जाँच के घेरे में बना रहता है |

 

इसमें कोई दोराय नहीं है लेकिन एक बार फिर से मायावती के सबसे करीबी और कैबिनेट में नंबर दो कि हैसियत रखने वाले “नसीमुद्दीन सिद्दीकी” इस समय लोकायुक्त के शिकंजे में है | नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर अपने “रिश्तेदारों कों गलत ढंग से ठेके दिलाने और सरकारी ज़मीन कों अवैध तरीके से कब्जाने का आरोप’ है | लोकायुक्त की जाँच के घेरे में है “राज्य के लघु उद्योग एवं निर्यात प्रोत्साहन मंत्री चन्द्रदेव राम यादव” जिन पर आज़मगढ़ जिले के बम्हौर गाँव के एक सरकारी स्कूल में वेतन लेने की बात कही जा रही है | देश में अगर किसी राज्य सरकार के मंत्री लोकायुक्त की जाँच के घेरे में है तो वो है सबसे ज्यादा यूपी सरकार के, मानो ऐसा लगता है कि यह सिलसिला अभी रुकने वाला है नहीं | विधानसभा चुनाव नजदीक आते- आते और भी कई मंत्री घोटालो की चपेट में आ सकते है | घोटाला करने वाले मंत्रियो की फेहरिस्त ही इतनी लंबी है कि अंदाज़ा लगाना बड़ा ही मुश्किल है | आखिर इन सबके मद्देनज़र अब सवाल मायावती की साख का भी है जो चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री है | माया वैसे तो हमेशा से अपनी पार्टी के पाक साफ बताने लगी रहती है लेकिन एकदम से मायावती सरकार के ज्यादातर कैबिनेट मंत्रियो का लोकायुक्त की जाँच के घेरे में आना यह दर्शाता है कि कही न कही बसपा से कोई भूल हुई है जिसका खमियाजा अब उसे खुद भुगतना पड़ रहा है | स्टार न्यूज़ नील्सन ओपिनियन पोल के ताज़ा आंकड़ो ने पार्टी के भीतर खलबली तो मचा ही दी है जिसके कारण पार्टी के हर मंत्रियो के चेहरे पर चिंता की रेखाये साफ देखी जा सकती है | यूपी विधानसभा चुनाव में इस बार विपक्षी समाजवादी पार्टी फिर से बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आ रही है पिछले साल की अपेक्षा सपा 135 (+38 ) सीटों पर काबिज होती दिख रही है |

 

पूर्ण बहुमत के बलबूते सरकार चला रही बसपा 120 (-86) सीटों पर ही सिमट सकती है लगता है कही न कही बसपा फेक्टर बिखरता नज़र आ रहा है | कहा तो यहाँ तक जाता है कि बसपा का दलित वोट बैंक हमेशा खामोश रहता है लेकिन वह कब पलट जाए कहना मुश्किल है |राजनीति के मैदान पर जन्म लेने वाले राहुल गाँधी और दलितों के घर खाना खाकर उनका ही गुणगान करने वाले, राहुल के साथ दलित फेक्टर पंजे से पंजा मिला सकता है | ज़रा याद कीजियेगा 1985 के विधानसभा चुनाव कों जब कांग्रेस ने 425 सीटों में से 269 सीटे जीतकर एक नया इतिहास रचा था | तब से लेकर अब तक कांग्रेस यूपी में हासिये पर चल रही है लगता है चुनावी मंदी की मार ने कांग्रेस कों कभी इस राज्य में उभरने ही नहीं दिया | कारण जो भी रहा हो, जनता तो सिर्फ बदलाव चाहती है | वैसे भी भूमंडलीकरण युग की इस जनता कों बार- बार एक ही व्यक्ति का चेहरे देखना शायद अच्छा नहीं लगता इसीलिए वह बदलाव चाहती है | जिसकी भुक्तभोगी खुद कांग्रेस है इसीलिए यूपी के मैदान पर कांग्रेस कों एक नई ज़मीन तलाश करनी पड़ रही है लेकिन यूपी 2012 के चुनाव में कांग्रेस उभार ले सकती है | कांग्रेस लगभग 68 (+48 ) सीटों पर काबिज होकर यूपी की राजनीति में खलबली मचा सकती है |राम नाम का जाप करने वाली बीजेपी भले ही बड़े -बड़े दावे करती हो लेकिन वह खुद ही यह तय नहीं कर पा रही है कि यूपी के मुख्यमंत्री पद के लिए किसे प्रमोट करे? बीजेपी की चिंता यही से शुरू होती है कि यूपी का दावेदार किसे बने जाए ? हालाकि इन सबके बीच बीजेपी 65 (+14 ) पर काबिज होकर एक नया खेल, खेल सकती है |

 

राजनीति का चिकना घड़ा कहे जाने वाले आरएलडी प्रमुख अजित सिंह या फिर यूँ कहे की घाट-घाट का पानी पीने वाले अजित सिंह न तो कोई लाभ उठाते दिख रहे है और न ही कोई नुकसान इनका तो हिसाब बराबर है | पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी मात्र 10 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकते है | वैसे भी उनके वोट बैंक का दायर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहा है इससे आगे वे कही जा भी नहीं सकते | आरएलडी का सपना है कि कब हरित प्रदेश बने और कब आरएलडी का सिक्का चले लेकिन उनके नल से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहर पानी निकलने वाला है नहीं | यूपी 2012 का सपना संजोए अजित सिंह ने एक बार फिर से यूपीए के साथ गठबंधन कर लिया है, बताया तो यहाँ तक जा रहा है कि अजित सिंह यूपी की मात्र 50 -60 विधानसभा सीटों पर ही अपने प्रत्याशी उतारने वाले है लेकिन यूपीए के साथ गठबंधन करके एक बार से फिर अजित ने एक ओर नई चल चली है | जिस जाट वोट बैंक के आसरे अजित पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ गिनी चुनी सीटों पर काबिज होते है उन्ही सीटों के सहारे केंद्र और राज्य सरकार में अपनी घुसपैठ बना लेने में माहिर कहे जाते है | लेकिन सवाल अब यही से एक और खड़ा होता है कि अजित सिंह आखिर कब तक जाटों पर राजनीति करके उनका बेवकूफ बनाते रहेंगे | बागपत जिले की ज़मीन से ताल्लुक रखने वाले अजित सिंह, हर बार इसी जिले की लोकसभा सीट से चुनाव कर आते है| बागपत जिले का नाम आज भी खून खराबे और लूट, हत्याओ जैसे मामलों में सबसे ज्यादा चर्चित रहता है | मेरठ जिले से अलग जिला बने हुए बागपत जिले कों करीब एक दशक हो चुका है लेकिन इस जिले का सही से विकास नहीं हुआ है | अजित सिंह ने अब तक कौनसा ऐसा बड़ा कार्य इस जिले के लिए किया है जिससे यहाँ के युवकों का बोद्धिक स्तर सुधरे, बागपत की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है |इस बार यूपी के महाभारत पर पूरे देश की नज़र बनी हुई है 403 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में चार पार्टिया के बीच चुनावी घमासान होने वाला है | देखना यह है कि यूपी के इस कुरुक्षेत्र मैदान पर कौन बाज़ी मरता है ? ताकि यूपी 2012 का ताज उसके सिर पर हो |

One Response to “यूपी 2012 के ताज का हक़दार कौन ?”

  1. Anil Gupta

    ये सर्वे बकवास है. इस बार चुनावी नतीजे चौंकाने वाले होंगे. मुस्लिम वोट जो पिछले चुनाव में बड़ी संख्या में बसपा को मिला था वो इस बार बसपा से दूर जा चूका है. इस बार मुस्लिम वोट सपा, कांग्रेस,बसपा के साथ नवउदित दल पीस पार्टी को भी जायेगा. बसपा से ब्रह्मण भी छिटक चुके हैं. अन्ना के कारन कांग्रेस की हालत ख़राब है. राहुल के अभियान का वही हस्र होना है जो बिहार में हुआ था.सपा में भी अमर सिंह के अलग होने के कारन राजपूत वोट अलग हुआ है. मुस्लिम वोट उसके साथ पूरी तरह से नहीं जा पायेगा. और कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को आरक्षण का झांसा देकर तथा मुलायम सिंह द्वारा उसके समर्थन से ओ बी सी वोट में भी दरार पड़ना स्वाभाविक है. ऐसी स्थिति में केवल भाजपा रह जाती है जो अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद इन सब का लाभ उठाती दीख रही है. कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आये.

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