उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव 2017 : किसकी शह किसकी मात ?

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uk-mapनिशीथ सकलानी

उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव की तिथि ज्यों -ज्यों नजदीक आती जा रही है वैसे-वैसे क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय राजनीतिक दल सत्ता के गुणा भाग में लग गये हैं। सत्ता पर काबिज होने के लिए प्रमुख विपक्षी दल भाजपा व क्षेत्रीय पार्टियां एक ओर जहां सत्तारूढ़ कांग्रेस को भ्रष्टाचार में लिप्त बताते हुए उससे पिछले पांच साल का हिसाब-किताब मांग रही हैं। वहीं प्रदेश की हरीश रावत सरकार भी अपना लेखा-जोखा जनता के दरबार में रख कर पूनः सत्ता में वापसी का दंभ भर रही है।

विधानसभा चुनाव 2017 के लिए कमर कसने का दावा करने वाले सत्तारूढ़ कांग्रेस व प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के प्रादेशिक व राष्ट्रीय नेता गोपनीय ढ़ग से प्रदेश में घूम-घूम कर संभावित जिताऊ प्रत्याशियों की ढंूढ के साथ-साथ ऐसे चेहरे की भी तलाश में हैं जिसे बतौर मुख्यमंत्री राज्य की जनता के सामने पेश कर राजनीतिक लाभ लिया जा सके। सत्तारूढ़ कांग्रेस की यदि हम बात करें तो मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत का नाम ही स्पष्ट तौर पर सामने दिखाई दे रहा है। उनके मुकाबले  फिलहाल कोई भी दमदार चेहरा कांग्रेस में नहीं है जो सत्ता की बिसात पर मोदी के रंग में रंगी भाजपा का राज्य में मुकाबला कर सके। हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय जैसे एक-आध अपवाद को छोड़कर उनके नाम का विरोध कर सकते हैं लेकिन वह नक्कार खाने में तूती की आवाज जैसा है।

जहां तक भारतीय जनता पार्टी की बात है कुछ हद तक वह हरीश रावत सरकार की नाकामी का एजेन्डा राज्य की जनता तक पहुंचाने में सफल रही है। जिसका राजनैतिक लाभ आगामी विधानसभा चुनावों उसे मिलने की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में वह राज्य में किस नाम पर राजनीतिक दांव खेले वह यह तय नहीं कर पा रही है। आगामी विधानसभा चुनावों को दृष्टिगत् रखते हुए अभी भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी मुसीबत कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामने वाले बागियों को टिकट वितरण में एडजेस्ट करने की है।

यदि पार्टी उनका ध्यान रखकर  विधानसभा प्रत्याशियों का चयन करती है तो उसके अपने सिपाही जो वर्षो से विधानसभा जाने की हसरत पाले हुए हैं, बगावत पर उतारू हो सकते हैं। जैसा कि गाहे-बगाहे पिछले कुछ समय से सुनाई भी दे रहा है। यहि हाल मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर भी नजर आ रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, मे.ज. से.नि. भुवन चन्द्र खण्डूडी, डा. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के साथ-साथ वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष व  विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं।

जबकि लोकसभा चुनावों के समय कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामने वाले हाईप्रोफाईल नेता सतपाल महाराज जो कि पार्टी हाईकमान की पसंद बताये जाते हैं बतौर मुख्यमंत्री पद के सबसे बडे़ दावेदारों में माने जा रहे हैं। सतपाल महाराज    आध्यात्मिक, राजनीतिज्ञ प्रभाव वाले ऐसे नेता हैं जिनका देश ही नहीं अपितुविदेशों में भी अच्छा-खासा प्रभाव है। ईमानदार, स्वच्छ छवि, बड़ी सोच और व्यापक जनाधार इनकी दावेदारी को पुख्ता करते दिखाई दे रहे हैं.   सतपाल महाराज गढवाल के ऐसे एक मात्र ठाकुर नेता हैं जिनका गढवाल एवं कुमायूं दोनों जगहों में खासा प्रभाव है।

जातिय और क्षेत्रीय समीकरणों की यदि हम बात करें तो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व नेता प्रतिपक्ष ब्रहमण होने के साथ-साथ कुमायूं  का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं  जबकि वर्तमान में  गढवाल से  संगठन एंव अन्य प्रमुख स्थानों पर किसी का प्रतिनिधित्व न हो के कारण मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में महाराज ही ऐसा नाम है जो राजनीति संतुलन को देखते हुए        अधिक प्रभावी दिखाई दे रही है। इसमें संदेह नहीं कि यदि उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी को 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावांे में पार पाना है तो उनसे बेहतर चेहरा कोई हो ही नहीं सकता। भाजपा में यह एक मात्र चेहरा है जो कांग्रेस की वर्तमान हरीश रावत सरकार के लिए एक चुनौती खड़ी कर भाजपा को सत्ता तक पहुंचा सकता है।हाल ही में कांग्रेस से बगावत कर अपने समर्थक       विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हुए पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी लगातार इस कोशिश में दिखाई दे रहे हैं कि विधानसभा चुनावों में भाजपा के सत्तारूढ़ होने पर उन्हे ही सूबे की कमान सौंपी जाये।

उत्तराखण्ड में अपने समर्थक विधायकों को भाजपा की सदस्यता दिलाने के बाद विजय बहुगुणा ने जिस चतुराई से चुनावों से ठीक पहले उत्तर प्रदेश में प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रही अपनी बहिन रीता बहुगुणा जोशी को भाजपा में प्रवेश कराने का सियासी दांव चला उससे यह तो स्पष्ट हो गया है कि उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड कहीं भी भाजपा सत्ता में आती है तो कहीं न कहीं इसका लाभ भाई या बहिन में से किसी न किसी को तो मिलेगा ही। उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव की तैयारी के मामले में बढ़त लेती दिख रही भाजपा, इन तमाम चेहरों के बावजूद भी पूरी तरह असमंजस में नजर आ रही है। प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पार्टी से मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसे अनुभवी व दिग्गज नेता के सामने कोई दमदार चेहरा उतारने का दबाव भाजपा पर साफ दिखाई पड़ रहा है, मगर लगता है गुटबाजी और अंतर्कलह की आशंका भाजपा हाईकमान के कदम रोके हुए है। माना जा रहा है कि इसी वजह से राष्ट्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड में पार्टी का चेहरा घोषित करने की जरूरत को फिलहाल नकारना शुरू कर दिया।

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कुछ माह पूर्व ही हरिद्वार से शंखनाद कर चुके हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष की हरिद्वार में दो बड़ी रैलियों के बाद प्रदेशभर में केंद्रीय मंत्रियों के सिलसिलेवार दौरों ने भाजपा के चुनाव अभियान में आ रही तेजी के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय, केन्द्रीय पैट्रोलियम मंत्री व प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री व भाजपा नेता धर्मेंन्द्र प्रधान भी बीते रोज देहरादून में प्रवास कर चुके हैं। यानी, सत्तारूढ़ कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दलों के मुकाबले भाजपा चुनावी तैयारी के मामले में तेजी से बढ़त लेते दिखाई दे रही है।

यह सही है कि उत्तराखण्ड में भाजपा को अगर चुनाव जीतना है तो इसके लिए आवश्यक है कि पार्टी अपना चेहरा घोषित करे। चेहरा भी ऐसा होना चाहिए जो हरीश रावत का मुकाबला कर सके  और जिसके नाम पर कोई विवाद भी ना हो।

यह सुझाव पार्टी पदाधिकारियों ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को दिया भी है। गौरतलब है कि उत्तराखंड में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल हैं। क्योंकि 18 मार्च 2016 के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा कांग्रेस से मात खा चुकी है। फ्लोर टेस्ट के  दौरान पार्टी की रणनीतिक कमान संभालने वाले भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय विधानसभा चुनावों को लेकर रणनीति तय करने के लिए जब पिछले दिनों देहरादून स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित बैठक में आये तो पार्टी के कई पदाधिकारियों ने खुलकर कहा है कि अगर यहां चुनाव जीतना है तो पार्टी को अपना चेहरा सामने लाना होगा।

लेकिन आगामी चुनाव में भाजपा से मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, इस पर पार्टी फिलहाल पूरी तरह खामोश है। बीते रोज राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बयान ने भी भाजपा में चुनावी चेहरे के मामले में गहराते असमंजस को सतह पर ला दिया। राष्ट्रीय महामंत्री का कहना है कि हर राज्य में चेहरा घोषित करना जरूरी नहीं। परिस्थितियों व जरूरत के आधार पर ही पार्टी नेतृत्व इस पर फैसला करता है।

उत्तराखंड में अभी तक चेहरा घोषित करने की जरूरत महसूस नहीं हो रही। साफ है कि भाजपा नेतृत्व फिलहाल चेहरा घोषित करने से बच रहा है, मगर इसकी गुंजाइश भी बनाए रखना चाहता है। पार्टी में गुटबाजी व अंतर्कलह बढऩे की आशंका को इस असमंजस की वजह माना जा रहा है। पिछले दिनों भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के दिग्गज नेताओं के बयान भी इस ओर संकेत कर चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी 2009 के लोकसभा चुनाव और 2012 के विधानसभा चुनाव में हुए नुकसान का जिक्र करते हुए पार्टी को इस बड़े खतरे से आगाह भी कर चुके हैं। यही वजह है कि पार्टी हाईकमान चुनावी चेहरा घोषित करने से फिलहाल परहेज कर रहा है।

जबकि वहीं दूसरी ओर भाजपा के सीएम के चेहरे को लेकर जारी कयासों के बीच मुख्यमंत्री हरीश रावत ने चुटकी लेत हुए कहा कि भाजपा के पास कोई चेहरा नहीं होने से ‘कन्फ्यूजन’ की स्थिति है। वे न तो नेता का चुनाव कर पा रहे हैं, न ही उनके पास विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कोई रोडमैप है। उन्होने कहा कि भाजपा नेता राज्य की जनता को यह बताने में भी नाकामयाब रहे हैं कि आखिरकार राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास को लेकर उनकी सोच क्या है। सीएम ने कहा कि भाजपा को लगता है कि विधानसभा चुनाव में इस बार कमल खिलेगा। लेकिन, मेरा दावा है कि कमल कतई नहीं खिलने जा रहा है। सीएम रावत ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले विधायकों पर भी जमकर हमला बोला।

पूर्व मंत्री हरक सिह रावत के उस बयान पर कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे, सीएम रावत ने कहा कि यदि कांग्रेस के बागी विधायक भाजपा की वाकई में मदद करना चाहते हैं तो वह चुनाव न लड़ें। सीएम का कहना है कि कांग्रेस को मझधार में छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले नेताओं को जनता सबक जरूर सिखाएगी। बहरहाल चुनाव की तिथि आते-आते प्रदेश में कब-कब कौन-कौन से सियासी मुकाम आते हैं और चुनावों में जनता किस दल को कितना तव्वजो देते है और किसे सबक सिखाती है यह भविष्य की गर्त में है।

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