आखिर यह हंगामा क्यों बरपा है?

लाइनों में खड़े लोगों से भड़काऊ संवाद किया गया घरना, प्रदर्शन, सभाएं की गई लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ। हर जगह मोदी-मोदी के नारे मिले साथ ही विरोध का सामना करना पड़ा। इतना होने के बावजूद राहुल बाबा, ममता दीदी मानने को तैयार नहीं हैं। उन्हें सलाह है कि बुद्धिमानी इसी में है कि शांत बैठकर अपनी देश तोड़ू नीतियों, भ्रष्टाचार और घपले, घोटालों को समर्थन देने वाली नीतियों में परिवर्तन का कोई रास्ता तलाशें इसी में उनकी भलाई है।

congressप्रवीण दुबे
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आत्मा आज सर्वाधिक दुखी और परेशान होगी, उन्होंने शायद कभी कल्पना भी न की होगी कि एक ऐसे विषय पर जो देश के लिए, गरीब के लिए सर्वाधिक हितकारी है उसके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए उनकी प्रतिमा स्थल का सहारा लिया जाएगा। इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रदर्शन में वह कांग्रेस सर्वाधिक आगे दिखाई देती है जिसने आजादी के बाद से लेकर आज तक गरीबी के नाम पर न केवल राजनीति की बल्कि प्रत्येक चुनाव में गरीबी दूर करने का वादा जनता से करती रही।
आज जब गरीबों के हित में मोदी सरकार ने नोटबंदी का सबसे बड़ा निर्णय लिया तो कांग्रेस के युवराज इसके पीछे बड़े घोटाले का आरोप लगा रहे हैं और इसकी जांच जेपीसी से कराए जाने की मांग कर रहे हैं।
बेशर्मी देखिए कि राहुल गांधी ने इस विरोध प्रदर्शन को गरीबों के नेतृत्व में चलाया जा रहा आंदोलन करार दिया। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कि कांग्रेस 70 वर्षों तक प्रत्येक लोकसभा विधानसभा चुनाव में गरीबों को ढाल बनाकर उनके वोट बैंक का इस्तेमाल करती रही और जब सत्ता में लौटी तो गरीबी दूर करने का बात एक छलावा साबित हुई।
ऐसा लगता है राहुल गांधी इस देश के गरीब को एक बार पुन: छल कपट और झूठ के सहारे बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। वह यह भूल चुके हैं कि समय बदल चुका है, व्यवस्था भी बदल चुकी है, इतना ही नहीं देश भी बदल चुका है अब इस देश के आम नागरिकों खासकर गरीब, किसान और मध्यम आय वर्ग को झूठ के सहारे न तो बेवकूफ बनाया जा सकता है और न उसकी ताकत का इस्तेमाल देश के शांत माहौल में जहर घोलने के लिए किया जा सकता है।
इस बात का प्रमाण 8 नवंबर से लेकर 23 नवंबर के बीच देशवासियों ने बखूबी दिया है। पूरा देश आज नोटबंदी के समर्थन में नरेन्द्र मोदी के साथ दिखाई दे रहा है। लोग थोड़ी परेशानी उठाकर देश को बर्बाद करने करोड़ों के कालेधन को बाहर लाने में सहयोग कर रहे हैं।
इस निर्णय से सबसे ज्यादा यदि किसी के पेट में मरोड़ उठ रही है तो वह है कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के, नोटों की माला पहनकर अपना जन्म दिन मनाने वाली मायावती के, संसद में कालेधन के सहारे सांसद खरीदने वाले मुलायम सिंह के और बांग्लादेश से नकली करेंसी को भारत में प्रवेश करने की छूट देने वाली ममता बनर्जी के।
इस निर्णय ने सर्वाधिक परेशान किया है उन वामपंथी नेताओं को जो भारत में ही रहकर नारे लगवाते हैं ”कश्मीर की आजादी तक भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी के जो चीन के गुणगान करते हंै और उस नक्सलवाद को बढ़ावा देते हैं जो नकली करेंसी से हथियार खरीदकर गरीबों के ऊपर उनका इस्तेमाल करते हैं। पेट में मरोड़ है उन नेताओं के जो कश्मीर में अलगाववाद की आग को लगातार जलाए रखना चाहते हैं। नकली करेंसी से खरीदे गए हथियारों से भारतीय सैनिकों का खून बहे और भारत में याकूब, अफजल जैसे आस्तीन के नाग फलें फूलें यह प्रयास रहता है।
आखिर किस बात पर संसद नहीं चलने दी जा रही है? किस कारण देश की राजधानी में धरना देकर माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है? यदि विपक्ष को खासकर राहुल गांधी को देशवासियों की इतनी ही चिंता है तो संसद में आकर तर्क संगत बहस क्यों नहीं करते? क्यों सड़कों पर चिल्ला रहे हैं?
उत्तर साफ है नोटबंदी के मामले पर शोर-शराबा करने वाले विपक्ष के पास नरेन्द्र मोदी के इस निर्णय के खिलाफ कहने को कुछ भी नहीं है। उन्होंने पिछले एक पखवाड़े में देशवासियों को भड़काने, माहौल खराब करने की भरपूर कोशिश करके देख ली है।
लाइनों में खड़े लोगों से भड़काऊ संवाद किया गया घरना, प्रदर्शन, सभाएं की गई लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ। हर जगह मोदी-मोदी के नारे मिले साथ ही विरोध का सामना करना पड़ा। इतना होने के बावजूद राहुल बाबा, ममता दीदी मानने को तैयार नहीं हैं। उन्हें सलाह है कि बुद्धिमानी इसी में है कि शांत बैठकर अपनी देश तोड़ू नीतियों, भ्रष्टाचार और घपले, घोटालों को समर्थन देने वाली नीतियों में परिवर्तन का कोई रास्ता तलाशें इसी में उनकी भलाई है।

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