ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिये शाकाहार जरूरी

– आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि-
कोरोना महामारी से निजात पाने के लिये शाकाहार को अपनाने का विश्वस्तर पर वातावरण बन रहा है,  शाकाहार न केवल इस महामारी से बचने बल्कि पर्यावरण के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने, उसकी रक्षा करने एवं उसे बचाने के उद्देश्य से भी जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि माँसाहार का बढ़ता प्रचलन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर न केवल कोरोना महामारी के तीव्रता से फैलने का बल्कि ग्लोबल वार्मिंग बड़ा कारण है, यह जलवायु परिवर्तन और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। इससे बचाव और पर्यावरण संतुलन के लिए विशेषज्ञ शाकाहार को अपनाने का सुझाव देते हैं।
आज विश्व के सामने कोरोना महामारी एवं ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं चुनौती के रूप में खड़ी है। ग्लोबल वार्मिंग का एक पहलू यह भी है कि शाकाहार या हरी सब्जियों तथा फलों के लिए अधिक कृषि उत्पादन होगा तो वातावरण में आक्सीजन अधिक मात्रा में उत्सर्जित होगी। मांसाहारियों के लिए बड़े पैमाने पर जानवर पाले जाते हैं। जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में जगह चाहिए। एक अंदाजे के मुताबिक दुनिया में बारह अरब एकड़ जमीन खेती और उससे जुड़े काम में इस्तेमाल होती है। इसका 68 फीसद हिस्सा जानवरों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अगर सभी शाकाहारी हो जाएंगे तो करीब 80 फीसद जमीन चारागाहों और जंगलों के लिए इस्तेमाल में लाई जाएगी। इससे माहौल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा कम होगी और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिलेगी। बची हुई 10 से 20 फीसद जमीन का इस्तेमाल फसलें उगाने में किया जा सकेगा। अभी जितनी जमीन पर खेती होती है, उसके एक तिहाई हिस्से पर जानवरों के लिए ही चारा उगाया जाता है।
औद्योगिक गैसों के लगातार बढ़ते उत्सर्जन और वन आवरण में तेजी से हो रही कमी के कारण ओजोन गैस की परत का क्षरण हो रहा है। इस अस्वाभाविक बदलाव का प्रभाव वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तनों के रूप में दिखलाई पड़ता है। सार्वभौमिक तापमान में लगातार होती इस वृद्धि के कारण विश्व के ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का प्रभाव महासागर में जलस्तर में ऐसी ही बढ़ोतरी होती रही तो महासागरों का बढ़ता हुआ क्षेत्रफल और जलस्तर एक दिन तटवर्ती स्थल भागों और द्वीपों को जलमग्न कर देगा। इसका नतीजा समुद्र के किनारे बसे शहरों को भुगतना पड़ रहा है। इनसे वहां रहने वाले हजारों-लाखों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत को पूरा करती है, इसलिए यह जिम्मेदारी हरेक व्यक्ति की है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से भी कुछ प्रयास करे।
 पेड़-पौधें मनुष्य को स्वच्छ वायु और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, साथ ही जलवायु सुधार, जल संरक्षण, मिट्टी के संरक्षण और वन्य जीवन की सुरक्षा करते हंै। इसलिए पेड़-पौधों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। कोरोना जैसी आपदाओं से बचाव के लिए पर्यावरण संरक्षण पर जोरे देने की आवश्यकता है। यह पर्यावरण हमंे क्या नहीं देती? वर्तमान समय में पर्यावरण के समक्ष चुनौती बढ़ती जनसंख्या की है। धरती की कुल आबादी आज आठ अरब के निकट पहुंच चुकी हैं। बढ़ती आबादी पर्यावरण पर उपलब्ध संसाधनों पर अधिक दबाव डालती है, जिससे वसुंधरा की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित होती है। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्यावरण के शोषण की सीमा आज चरम पर पहुंच रही है। जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम से कम करना सबसे बड़ी चुनौती है और शाकाहार को प्रोत्साहन देकर हम इस चुनौती का सामना कर सकते हैं। आज हमारा पर्यावरण अपना प्राकृतिक रूप खोता जा रहा है। विश्व में बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण एवं शहरीरकरण में तेजी से वृद्धि के साथ-साथ मांसाहार के कारण पर्यावरण प्रदूषण की समस्या विकराल होती जा रही है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक शोध के मुताबिक वातावरण में जो ग्रीनहाउस होता है उसका चैथाई खाद्य उत्पादन से आता है और ग्लोबल वार्मिंग में इसका बड़ा योगदान होता है। शोध में पाए गए नतीजों के अनुसार खाद्य पदार्थ से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में करीब आधा हिस्सा केवल मांस या अन्य तरह के मांसाहारी खाद्य के कारण होता है। लेकिन इस तरह के खाद्य पदार्थों से हमें कुल खाने से मिलने वाले कैलरी का पांचवा हिस्सा ही मिलता है। इस दृष्टि से ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा कारण मांसाहार है।
कोलंबिया में इंटरनेशनल सेंटर फॉर ट्रॉपिकल एग्रीकल्चर में काम करने वाले एंड्र्यू जार्विस कहते हैं कि विकसित देशों में शाकाहारी होने के बहुत से फायदे हैं। ये कोरोना महामारी से बचने, पर्यावरण और सेहत के लिए बेहतर है। उनका कहना है हमारे खाने की आदतें हमारे माहौल पर असर डालती हैं। लेकिन इसे लोग गंभीरता से नहीं लेते। मिसाल के लिए अमरीका में चार लोगों का मांसाहारी परिवार दो कारें से भी ज्यादा ग्रीन हाऊस गैस छोड़ता है। लेकिन जब ग्लोबल वॉर्मिंग की बात होती है तो सिर्फ कारों की बात की जाती है, मांस खाने वालों की नहीं। ऑक्सफोर्ड मार्टिन स्कूल के मार्को स्प्रिंगमैन का कहना हैं अगर सिर्फ रेड मीट को ही हटा दिया जाए तो खाने से निकलने वाली ग्रीन हाऊस गैस में 60 फीसद की कमी आ जाएगी। और अगर सन् 2050 तक सारे इंसान शाकाहारी हो जाते हैं तो इसमें 70 फीसद की कमी आएगी।
स्प्रिंगमैन कहते हैं सारी दुनिया का शाकाहारी होना एक कल्पना भर ही है। लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि भविष्य में खान-पान से पैदा होने वाली ग्रीन हाउस गैस फिक्र की बड़ी वजह बनने वाली है। कोरोना कहर ने दुनिया की खानपान की सोच पर गहरा प्रभाव डाला है और दुनिया ने समझा है कि शाकाहार ही अधिक सुरक्षित और निरापद है। माँसाहार की तुलना में शाकाहार में प्रोटीन, विटामिन, खनिज, लवण आदि सभी का बेहतर संतुलन होता है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे संगठन ग्रीनपीस के नीति सलाहकार श्रीनिवास के अनुसार शाकाहार अपनाने से अप्रत्यक्ष तौर पर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है। जब जलवायु परिवर्तन की बात होती है तो हम जीवनशैली बदलने की बात करते हैं, क्योंकि इसका प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। जीवनशैली में भोजन भी शामिल होता है। उनके मुताबिक माँसाहार के अधिक प्रचलन के कारण कहीं-न-कहीं वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। इसलिए माँसाहार जलवायु परिवर्तन में भूमिका निभा रहे हैं। इसलिए शाकाहार को बढ़ावा देकर हम केवल कोरोना महामारी के स्वास्थ्य कारणों से ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी हम लाभान्वित होंगे।
सही मायनों में शाकाहारी जीवनशैली को बल देने एवं पर्यावरणीय कसौटियों पर खरे उतरने वाले कामों को करके एवं जागरूकता का माहौल निर्मित करके ही कोरोना महासंकट से मुक्ति की अग्रसर हुआ जा सकता है। अहिंसा विश्व भारती का प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है। इसमें जन-जन की सहभागिता अपेक्षित है। पर्यावरण सर्तकता एवं शाकाहार हम सभी को सतर्क कर रहा है कि अगर हमने कोरोना से मुक्ति की दिशा में सोच-समझकर कदम नहीं उठाये तो हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा। कोरोना महामारी सिर्फ किसी समुदाय विशेष या राष्ट्र विशेष की समस्या न होकर एक सार्वभौमिक चिंता का विषय बना हुआ है। परिस्थितिकीय असंतुलन हर प्राणी को प्रभावित करता है अतः यह जरूरी हो जाता है कि विश्व के सभी नागरिक पर्यावरण  सृजन एवं कोरोना महामारी से मुक्ति में अपनी हिस्सेदारी को पहचाने और इन समस्याओं के समाधान के लिए अपना-अपना सहयोग दें। आज विश्व में कोरोना संक्रमण एवं पर्यावरण में असंतुलन गंभीर चिंता का विषय बन गया है जिस पर अब विचार नहीं, ठोस पहल की आवश्यकता है अन्यथा जीवन-संकट, जलवायु परिवर्तन, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर मानव जीवन के अस्तित्व को अधिक तीव्रता से खतरे में डाल देंगे।
अहिंसा विश्व भारती इस विश्वास और संकल्प के साथ शाकाहार क्रांति को सचेतन करने को तत्पर है कि मानव जीवन एवं पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरों के लिये न केवल सावधान किया जायेगा, बल्कि अब तक जो नहीं हुआ, उसे क्रियान्वित करने एवं जागरूकता का माहौल निर्मित करने का सार्थक प्रयत्न किया जायेगा। पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो वातावरण में फैल रहे कोरोना वायरस एवं प्रदूषण के कारण समूची मानव जाति पर एक बड़ा संकट मंडरा रहा है। अगर इसपर समय रहते रोक न लगाई गई तो इसके और भी हानिकारक प्रभाव होंगे और सम्पूर्ण मानव जाति का अस्तित्व संकट में आ जायेगा। एक आम इंसान को भी इसका अहसास होने लगा कि मनुष्य ने प्रकृति को हर दृष्टिकोण से नुकसान पहुंचाया है। मनुष्य के स्वार्थ का ही दुष्परिणाम है कोरोना महारोग जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है।

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