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    वक्त है, सम्भल जाइए क्योंकि ‘हिन्दी’ आधार है…

    आज के डिजिटल युग में ‘हिन्दी दिवस’ के अवसर पर आपको तमाम लेख, रचनाएं, टिप्पणियां पढ़ने, सुनने और देखने को मिल जाएंगी। हर कोई यह बताने जुटा होगा कि आखिर, 14 सितम्बर को ही हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है? ‘हिन्दी’ को राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए किन-किन लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, यह भी जानने, पढ़ने को मिल जाएगा। लेकिन, क्या आपको पता है कि वर्तमान में इसी ‘हिन्दी’ की दुर्दशा कर दी गई है? आख़िर, यह ‘हिन्दी दिवस’ क्या मात्र एक पर्व के रूप में मनाने के लिए ही है? दरअसल, जो ‘हिन्दी’ कल तक हिन्दीभाषी क्षेत्र के लोगों कीे जीवनशैली हुआ करती थी, आज वह एक विषय बनकर रह गई है। अभी हाल ही में, उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद में 10वीं और 12वीं का जब रिजल्ट आया, तो उसने सबको चौंका दिया। हां, कुछ लोग ऐसे भी थे, जो यह कहने जुटे थे, ‘अरे, बड़ा टफ (कठिन) सब्जेक्ट (विषय) है हिन्दी…!’ अब, इसे आप दुर्भाग्य नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? जब व्यक्ति को अपनी जीवनशैली ही कठिन लगने लगे तो समझ लीजिए कि उसका मानसिक पतन शुरू हो चुका है। यूपी बोर्ड की हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट की परीक्षा वर्ष 2020 में कुल 7 लाख 97 हजार परीक्षार्थी हिन्दी विषय में अनुत्तीर्ण हो गए। सोचिंए, हिन्दीभाषी क्षेत्र का हृदय उत्तर प्रदेश में हिन्दी की यह दुर्दशा हुई।

    यदि इन आंकड़ों पर अगल-अगल नज़र डालें तो इण्टरमीडिएट में 2 लाख 70 हजार परीक्षार्थी और हाईस्कूल में 5 लाख 28 हजार परीक्षार्थी ‘हिन्दी’ विषय की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाए। हाईस्कूल और इण्टर के करीब 2 लाख 39 हजार परीक्षार्थियों ने हिन्दी का प्रश्नपत्र ही छोड़ दिया। पता है, यह किस ओर इशारा कर रहा है? यह इशारा है कि हम ‘हिन्दी’ को उतना महत्वपूर्ण नहीं मान रहे, जितना कि अंग्रेजी को। कहने में कोई गुरेज नहीं है कि आज अभिभावक अपने बच्चों को जिस तरह कान्वेन्ट शिक्षा दिलाकर एक उज्जवल भविष्य के सपने देख रहे हैं, उनका आने वाला कल उतना ही अधिक भयावह होगा। वह इसलिए, क्योंकि कल यही संताने आपके ‘पेन’ को सुन तो लेंगी, लेकिन ‘दर्द’ को महसूस नहीं कर पाएंगी। यही संताने कल ‘आप’ को भी ‘यू’ कहेंगी और आप कुछ नहीं कर पाएंगे। यही संताने आपके चोट लगने पर ‘ओ माय गाॅड’ कहकर दोनों गालों पर अपनी हथेलियां रखकर सोशल मीडिया की इमोजी की तरह नज़र तो आएंगी, लेकिन ‘अरे…’ कहकर आपको हाथ देकर उठाएंगी नहीं। शायद, उस वक्त आपको अंदाजा होगा कि आपने ‘हिन्दी’ के साथ क्या किया? आपको कोई अधिकार नहीं है कि आप उन पुरखों की आत्मा को कष्ट दीजिए, जिन्होनें ‘हिन्दी’ को राजभाषा बनाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। यदि तत्कालीन ‘हिन्दी’ के सेवकों ने संघर्ष न किया होता जो आज भारत की राजभाषा ‘हिन्दी’ नहीं अपितु ‘हिन्दुस्तानी’ होती।

    यह जो यूपी बोर्ड के रिजल्ट आए, इनमें एक और बात गौर करने वाली थी। इण्टर के ज़्यादातर परीक्षार्थी ‘आत्मविश्वास’ शब्द नहीं लिख पाए। परीक्षार्थियों ने ‘यात्रा’ की जगह अंग्रेजी में ‘सफर’ शब्द का प्रयोग लिखा। अब, आखिरकार इनमें आत्मविश्वास कितना है, इसका अंदाजा लगाना बुद्धिजीवियों के लिए काफी सहज है। क्या सोंचते हैं आप, यह सब आसान है या यह सिर्फ एक ख़बर बनकर रह गई है? यदि आप इन दोनों में से कुछ भी ऐसा सोंचते हैं तो आप आंखों पर पट्टी बांधे हुए हैं। सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में हिन्दी की क्या दशा है, यह किसी से छिपी नहीं है। हिन्दी में अंग्रेजी का मिश्रण कर परोसने की आदत भी अब लोगों में लत बनती जा रही है। चाहे वह मीडिया का क्षेत्र हो या फिर शिक्षा का, हर जगह यह मिलावट मूल चीज को ‘समूल’ नष्ट करने जुटी है। लेकिन, फिर भी धुरंधर लोग 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाएंगे। लम्बे-लम्बे भाषण देंगे। ट्विट्र, फेसबुक, इंस्टाग्राम पर कार्यक्रमों की फोटो अपलोड होंगी और फिर कार्यक्रम के बाद, ‘थैंक्यू एवरीवन’ होगा। बस, उस वक्त सिर्फ एक चीज़ ‘धन्यवाद’ कहीं मुंह छिपाए इस आस में कोने में दुबका खड़ा होगा कि कोई तो साधारण सा व्यक्ति होगा, जो मेरी भी कद्र करेगा। जाग जाइए। अभी भी वक्त है। सम्भल जाइए। हिन्दी को ज़िन्दा रखना बहुत जरूरी है। वरना, आने वाली पीढ़ियां अंतिम संस्कार भी डिजिटल अंग्रेेजी में कर देंगी और आप अपने पिण्डदान को तरस जाएंगे। यह सब इसलिए क्योंकि इस बात को अभी भी आत्मसात कर लीजिए कि, ‘हिन्दी आधार है…।’

    सुमंगल दीप त्रिवेदी
    सुमंगल दीप त्रिवेदी
    विगत एक दशक से अधिक समय से हिन्दी परम्परागत पत्रकारिता के क्षेत्र में लगे हुए हैं। वर्तमान में लेखक प्रसार भारती न्यूज़ सर्विसेज के हिन्दी डिजिटल अनुभाग में कार्यरत हैं। इससे पूर्व लेखक हिन्दी के विभिन्न समाचार पत्रों के उप सम्पादक पदों पर भी कार्यरत रहे हैं।

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