गंवाए गए दो अवसर, छ: विनाशकारी नतीजे

लालकृष्ण आडवाणी

शहीद उसे कहा जाता है जो शत्रु देश के विरूद्ध लड़ते हुए युध्द क्षेत्र में अपने जीवन का बलिदान देता है। डॉ. मुकर्जी अपने स्वयं के देश में एक सरकार के विरूध्द लड़ते हुए शहीद हुए। उनकी लड़ाई जम्मू एवं कश्मीर राज्य के भारतीय संघ में पूर्ण विलय के लिये थी। वह एक ऐसे दूरद्रष्टा थे, जिन्होंने जम्मू कश्मीर, जोकि सामरिक महत्व का राज्य है, को शेष भारत के साथ एक पृथक और कमजोर संवैधानिक सम्बन्धों से जोड़ने के परिणामों को पहले से भांप लिया था।

दु:ख की बात है कि न तो नई दिल्ली में पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने और न ही श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला की सरकार ने सोचा कि जम्मू और कश्मीर को भारतीय संघ में पूरी तरह से मिलाया जाना जरूरी है।

जहां तक शेख अब्दुल्ला की वास्तविक समस्या उनकी महत्वाकांक्षा थी कि वे स्वतंत्र कश्मीर के निर्विवाद नेता बनना चाहते थे। जहां तक नेहरूजी का सम्बन्ध है, यह मामला साहस, दृढ़ता और दूरदर्शिता की कमी का मामला था।

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370, जिसे पंडित नेहरू ने स्वयं एक अस्थायी उपबंध बताया था, अभी तक समाप्त नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप, कश्मीर में अलगाववादी ताकतें, जिन्हें पाकिस्तान में भारत विरोधी व्यवस्था द्वारा सहायता प्रदान की जाती है और भड़काया जाता है, अपने इस जहरीले प्रचार को फैलाने में उत्साहित महसूस कर रही है कि जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय अंतिम नहीं था और विशेष रूप से कश्मीर भारत का भाग नहीं है।

हमारे देश ने विभाजन के समय नेहरूजी द्वारा कश्मीर मुद्दे का हमेशा के लिए भारत के पक्ष में समाधान करने में उनकी असफलता के लिये भारी कीमत चुकाई है। नेहरूजी द्वारा की गई भारी भूल से पूर्णतया बचा जा सकता था। आखिरकार गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल अन्य सभी रियासतों का-कुल 561 रियासतें-भारतीय संघ में विलय करने में सफल रहे। जब उनमें से कुछ ने हिचकिचाहट दिखाई या पाकिस्तान में शामिल होने की अपनी मंशा जताने का साहस किया तो पटेल ने नये-नये स्वतंत्र हुए भारत राष्ट्र की ताकत का उपयोग करके उनको उनका स्थान दिखाया। उदाहरण के तौर पर, हैदराबाद के नबाव के सशस्त्र प्रतिरोध को कड़ाई से दबा दिया गया। जूनागढ़ का शासक पाकिस्तान भाग गया।

जम्मू एवं कश्मीर एकमात्र ऐसा राज्य था जिसके विलय संबंधी मामला प्रधानमंत्री नेहरू सीधे तौर पर देख रहे थे। वास्तव में, ताकत और छलकपट के माध्यम से कश्मीर पर कब्जा करने के लिये 1947 में भारत के विरूध्द पाकिस्तान द्वारा छेड़े गये पहले युध्द से नेहरू सरकार को एक ऐसा शानदार अवसर मिला था जिससे न केवल आक्रमणकारियों को पूरी तरह से बाहर निकाला जाता अपितु पाकिस्तान के साथ कश्मीर मुद्दे का हमेशा के लिये समाधान भी हो जाता।

भारत ने एक बार फिर 1971 के भारत-पाक युध्द में कश्मीर मुद्दे का हमेशा के लिऐ समाधान करने का अवसर खो दिया जब पाकिस्तान न केवल बुरी तरह हारा था अपितु भारत के पास 90,000 पाकिस्तानी युध्द कैदी थे।

अत: हमारे देशवासी यह जानते हैं कि कश्मीर समस्या नेहरू परिवार की ओर से राष्ट्र के लिये विशेष ‘उपहार‘ है। इस ‘उपहार‘ के नतीजे इस रूप में सामने आए हैं :-

पाकिस्तान ने पहले कश्मीर में और बाद में भारत के अन्य भागों में सीमापार से आतंकवाद फैलाया।

पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में धार्मिक उग्रवाद फैलाना, जो बाद में भारत के अन्य भागों में फैल गया।

हमारे हजारों सुरक्षा जवानों और नागरिकों का मारा जाना।

सेना और अर्ध्द सैन्य बलों पर करोड़ों-करोड़ रुपयों का खर्च।

भारत-पाकिस्तान के बीच कटु सम्बन्ध होने से विदेशी ताकतों को लाभ उठाने का अवसर मिलना।

लगभग सारे कश्मीरी पंडितों का अपने गृह राज्य से बाहर निकाला जाना और अपनी मातृभूमि में शरणार्थी अथवा ‘आन्तरिक रूप से विस्थापित‘ लोग बनना।

डा0 मुकर्जी ने पहले से भांप लिया था कि जम्मू कश्मीर को एक पृथक और गलत संवैधानिक दर्जा देने के भयावह परिणाम होंगे। परन्तु उन्होंने न केवल जम्मू एवं कश्मीर के भारत के साथ पूर्ण विलय की बात सोची थी, अपितु एक बहादुर और शेरदिल वाला राष्ट्रभक्त होने के नाते उन्होंने इस विज़न को अपने निजी मिशन का रूप दिया था।

उन्होंने अपने मिशन को तीन क्षेत्रों-राजनीतिक, संसदीय और कश्मीर की धरती पर लागू करने का निश्चय किया।

पहला, अक्तूबर, 1951 में उन्होंने कांग्रेस के सच्चे राष्ट्रवादी विकल्प के रूप में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिये अपने संघर्ष के अलावा, जनसंघ का एजेंडा नये-नये हुए स्वतंत्र भारत के ऐसे ढंग से पुनर्निर्माण तक विस्तारित हुआ जिससे धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के इसके सभी नागरिकों के लिये समृध्दि, न्याय, सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित हो।

दूसरा, वर्ष 1952 के प्रथम आम चुनावों में जनसंघ द्वारा पहली बार भाग लेने के बाद डा0 मुकर्जी लोकसभा में वस्तुत: विपक्ष के नेता के रूप में उभरे। यहां पर उन्होंने कांग्रेस सरकार की जम्मू एवं कश्मीर के प्रति नीति का जोरदार विरोध किया, जिसका अन्य बातों के साथ-साथ यह अर्थ निकला कि भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित कोई भी व्यक्ति कश्मीर के ‘प्रधानमंत्री‘ की अनुमति के बिना कश्मीर में दाखिल नहीं हो सकता था। कश्मीर का स्वयं का संविधान होगा, स्वयं का प्रधानमंत्री होगा और इसका अपना ध्वज होगा। इसके विरोध में डा0 मुकर्जी ने मेघनाद किया : ”एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।”

तीसरे, डा0 मुकर्जी ने 1953 में यह घोषणा की कि वह बिना परमिट के कश्मीर जायेंगे। 11 मई को कश्मीर में सीमापार करते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और श्रीनगर के निकट एक जीर्णशीर्ण घर में नज़रबन्दी के रूप में रखा गया। जब उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया तो उन्हें उचित चिकित्सा सहायता प्रदान नहीं की गई और 23 जून को वह रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत पाए गए।

डा. मुकर्जी के बलिदान के तत्काल परिणाम हुए।

इस घटना के बाद से परमिट प्रणाली को रद्द कर दिया गया और राष्ट्रीय तिरंगा राज्य में फहराया जाने लगा।

जून, 1953 में डा0 मुकर्जी के बलिदान के बाद ही राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग और सी.ए.जी. का प्राधिकार जम्मू एवं काश्मीर राज्य पर विस्तारित किया गया।

यह बड़े शर्म की बात है कि भारत की एकता और अखंडता के लिये डा0 मुकर्जी के बलिदान का इतिहास स्कूल और कालेजों में हमारे छात्रों को पढ़ाया नहीं जाता।

हमारी शिक्षा प्रणाली और सरकार-नियंत्रित मास-मीडिया नेहरू परिवार के योगदान की महिमा तो गाता है, परन्तु अन्य राष्ट्रभक्तों, जैसेकि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सरदार पटेल, गोपीनाथ बारदोलाई, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, हिरेन मुखर्जी, ए. के. गोपालन और निश्चय ही डा0 मुकर्जी द्वारा किये गये संघर्षों और बलिदानों को या तो जानबूझकर कम आंकती है या अनदेखा करती है।

टेलपीस (पश्च्य लेख)

एक समय था जब कांग्रेस एक ऐसा विशाल प्लेटफार्म था जहां पर सभी प्रकार के राष्ट्रभक्तों का सम्मान किया जाता था। वास्तव में महात्मा गांधी के कहने पर ही डा0 मुकर्जी, जो उस समय हिन्दू महासभा से संबंध रखते थे, और डा0 बी. आर. अम्बेडकर, जो कांग्रेस के कट्टर आलोचक थे, इन दोनों को स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।

दु:ख की बात है कि आज कांग्रेस एक ही परिवार का जागीर बन गई है। प्रधानमंत्री का पद या तो किसी मनोनीत व्यक्ति या नेहरू परिवार के किसी सदस्य के लिए आरक्षित है। कांग्रेस अध्यक्षा द्वारा मनोनीत एक कमजोर और असहाय प्रधानमंत्री के कारण भारत भारी कीमत चुका रहा है।

अब कांग्रेस के भीतर एक नई मांग की जा रही है कि नेहरू वंश के किसी व्यक्ति को भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाल लेना चाहिए।

हमारा देश संप्रग सरकार के कुशासन को और अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकता। भारत जैसे महान लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पद एक परिवार की जागीरदारी नहीं बनने दी जा सकती।

4 thoughts on “गंवाए गए दो अवसर, छ: विनाशकारी नतीजे

  1. जनाब आडवानी जी, मेरे कुछ सवाल हैं जो आपके लेख के बारे में नहीं हैं, मेहरबानी करके इसका जवाब ज़रूर दे दें.
    १. भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है, यहाँ की राजनीतिक पार्टियों को भी धर्म निरपेक्ष होना चाहिए, फिर आपकी पार्टी मंदिर बनाने की ही बात क्यों करती है, आपके लिए तो मंदिर मस्जिद एक सामान होने चाहिए?
    २. बाबरी मस्जिद शहीद करके आपने भी तो देश को नफरत की आग में झोंक दिया है, जिसका दंश देश आजतक झेल रहा है ? आखिर एक राजनीतिक पार्टी को इस धार्मिक मामले में पड़ने की क्या ज़रूरत थी?
    ३. हमारा देश पाकिस्तान को हरा सकता है लेकिन जब दंगे होने लगते है तो आपकी सरकार उनपर नियंत्रण क्यों नहीं कर पाती ?
    ४. राम तो सभी हिंदुओं के आराध्य हैं, क्या सिर्फ भाजपा के लोग ही राम भक्त हैं? आखिर राम के नाम पर वोट लेने का क्या औचित्य है ?
    ५. आप प्रज्ञा सिंह जैसे लोगों का बचाव क्यों करते है, उनके लिए आप प्रधान मंत्री से भी मिले थे. क्या आपको न्याय पालिका पर भरोसा नहीं है?
    ६. कांग्रेस को तो गाँधी परिवार चलाता लेकिन आपकी पार्टी संघ संचालित क्यों है? एक राजनीतिक पार्टी को एक धार्मिक या सांप्रदायिक संगठन क्यों चला रहा है?
    ७. गोधरा कांड के आरोपियों को तो सजा मिल गयी आखिर गुजरात के दंगाईयों को सजा कब मिलेगी?
    ८. आपकी पार्टी में मुसलमानों जनसँख्या के अनुपात में यानि लगभग २० % परतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाता.

    शायद उनका आखिरी हो ये सितम, हर सितम ये सोच कर हम सह गए.

    अगर सरकारी ज़मीन पर कोई मंदिर बना ले और वो ६ महीने भी पुराना हो जाये, तो सरकार उसे स्थानांतरित भी नहीं कर सकती, और आप लोगो ने ६०० साल पुरानी मस्जिद शहीद कर दी. और किसी को सजा तक नहीं हुई.

    आडवानी जी न तो इतिहास आप को माफ़ करेगा और न ही मुसलमान
    (प्रवक्ता.कॉम से निवेदन है कि मेरी बात आडवानी जी तक ज़रूर पहुंचा दें)

  2. माननीय अडवानी जी ने सामयिक इतिहास कुछ ऐसे पन्नों को पलटने की कोशिश की है,जो विवाद पूर्ण भी है और दुखद भी.उस समय के भारतीय शासक विशेष कर नेहरु इसके लिए अवश्य उत्तरदाई ठहराए जा सकतेहैं,१९७१ वाली बात भी कुछ हद तक ठीक है,पर अडवानी जी के पास तीन खूंखार आतंक वादियों के छोड़ने का क्या उत्तर है?वर्तमान काश्मीर समस्या और आतंक वाद में उस एक भूल का कम हाथ नहीं है.इतिहास गवाह है की हमारे शासकों ने हमेशा यह भूल की है.हो सकता है की किसी का दोष कम हो किसी का ज्यादा.पर दोषी सब हैं.हमारे शासकों का एक एसीड टेस्ट अभी सामने आरहा है जन लोकपाल बिल के रूप में ,देखें इस परीक्षा में कौन खरा उतरता है?

  3. यह लेख निश्चित ही कांग्रेस विरोधी अडवानी ने लिखा है .
    किन्तु आज जो अपने आप को कांग्रसी कहते है कभी उन्होंने सोचा क्या नेहरु ने ऐसा क्यों किया .

    नेहरु जन्मजात अंग्रेजो के गुलाम थे और तजन्म गुलाम रहे

    नेहरु के बाप ,बाबा , और बाबा के बाप ,चाचा

    ये सारे के सारे अंग्रेजो के जूते चाटते थे .

    साथियों अगर किसी को बुरा लगे तो क्रपया नेहरु का इतिहास जरूर पद लेना .
    (किन्तु वह नहीं जो सोनिया पडवा रही है )

    इसी लिए नेहरु ने कश्मीर की बीमारी भारत को सौप दी ताकि इस बीमारी के सहारे उसकी अवैध संताने
    इन्द्रा,राजीव,राहुल, देश की मूर्ख जनता को और अधिक मुर्ख बना कर ताउम्र देश पर राज कर सके .
    दोस्तों हम तो मुर्ख है ही नहीं तो ये कम्पुटर के बट्टन नहीं तोड़ रहे होते.

    लेकिन अफ़सोस केवल इतना है की अपनी संतानों को क्या देकर जाउगा यह भ्रस्ताचार यह अनाचार और यह अश्लीलता .
    छि मुझे खुद पर शर्म आती है.
    क्या आपको भी आती है

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