ऐसी महंगाई में क्या करे आदमी

शादाब जफर “शादाब’’

ऐसी महगॉई मै क्या करे आदमी

पेट बच्चो का कैसे भरे आदमी

 

खू पसीना बहा कर भी रोटी नही

कैसे अपना गुजारा करे आदमी

 

बिक चुके सारे नेता मेरे देश के

कैसे सरहद पे जाकर लडे आदमी

 

चन्द सिक्को मै कानून बिकने लगा

किस से फरियाद अपनी कहे आदमी

 

हम सफर पा के होता था खुश आदमी

आदमी देख कर अब डरे आदमी

 

दौरे हाजिर के बच्चे जॅवा हो गये

और कितनी तरक्की करे आदमी

 

आज कहने का॔’शादाब’’मजबूर हेै

शक्ल सीरत से हेवा लगे आदमी

 

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