राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर डालेंगे चुनावी नतीजे?

  • योगेश कुमार गोयल
    चार राज्यों और एक केन्द्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणामों का समग्रता से आकलन करें तो जहां केरल और असम में पहले से सत्तारूढ़ दल ही पुनः सत्ता हासिल करने में सफल हुए हैं, वहीं पश्चिम बंगाल में 200 पार का नारा लगाकर सत्ता पाने के लिए मीडिया मैनेजमेंट और साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल कर अपनी सारी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा 80 सीटें भी नहीं जीत पाई जबकि तृणमूल कांग्रेस तीसरी बार रिकॉर्ड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी है। पुडुचेरी में भाजपा गठबंधन सरकार बनाने में सफल हुआ है लेकिन केरल में उसका खाता तक नहीं खुला और तमिलनाडु में सहयोगी अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बावजूद वह काफी पिछड़ गई, जहां एक दशक बाद जनता ने द्रमुक को शासन संभालने का अवसर दिया है। बहरहाल, इन पांच प्रदेशों के जो चुनाव परिणाम सामने आए हैं, वे आने वाले समय में न केवल इन राज्यों की राजनीति पर बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा असर डालेंगे और सबसे ज्यादा असर पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों का होगा।
    पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अति आत्मविश्वास से लबरेज होकर ‘सोनार बांग्ला’ के नारे के साथ इस राज्य को अपने जीवन-मरण का प्रश्न बनाकर चुनाव लड़ा था, जिसे जीतने के लिए उसने तमाम तरह के पैंतरों का इस्तेमाल किया और देश में फैले कोरोना प्रकोप के बीच पूरे लाव लश्कर के साथ अपनी सारी ताकत यहां झोंक दी थी लेकिन भाजपा के अति आक्रामक चुनाव प्रचार तथा ध्रुवीकरण की तमाम कोशिशों के बीच जनता ने बंगाल की सत्ता फिर से प्रचण्ड बहुमत के साथ ममता की झोली में डाल दी। मतुआ समुदाय को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री का चुनावी प्रक्रिया के बीच किया गया बांग्लादेश दौरा भी भाजपा के काम नहीं आया। भाजपा की हार के प्रमुख कारणों की चर्चा करें तो पार्टी के पास ममता के मुकाबले कोई मजबूत स्थानीय चेहरा न होना, कांग्रेस-वाममोर्चा के निष्प्रभावी हो जाने से चुनाव का पूरी तरह द्विपक्षीय हो जाना, तृणमूल के पक्ष में मुस्लिम मतों का पूर्ण धु्रवीकरण, भाजपा नेताओं की ममता पर की गई टिप्पणियों के चलते महिला मतदाताओं का ममता के पक्ष में एकजुट होना इत्यादि प्रमुख रहे। उधर ममता बनर्जी ने एंटी-इनकमबेंसी फैक्टर से बचने के लिए न केवल अपने 160 प्रत्याशी बदले बल्कि 28 विधायकों तथा 5 मंत्रियों के टिकट भी काटे और 2016 के मुकाबले और भी मजबूत होकर पुनः सत्तासीन हुई हैं।
    असम में भाजपा गठबंधन की वापसी सुखद मानी जा सकती है क्योंकि वहां पिछले पांच साल से सत्ता में बने रहने के बावजूद भाजपा जिन मुद्दों को लेकर यहां सत्ता में आई थी, उन तमाम मुद्दों को लेकर राज्य में असमंजस की स्थिति बरकरार थी। उत्तर-पूर्वी भारत में असम सबसे बड़ा राज्य है, जो भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण था। हालांकि करीब डेढ़-दो साल पहले उसे असम में देश के नागरिकता कानून में केन्द्र सरकार के संशोधनों के खिलाफ व्यापक प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा था लेकिन समय के साथ उसने वहां अपनी स्थिति मजबूत की। भाजपा गठबंधन का मुकाबला कांग्रेस गठबंधन के साथ था लेकिन कांग्रेस के पास तरुण गोगोई जैसे दिग्गज नेता के अभाव में उसकी राह शुरू से ही मुश्किल लग रही थी। दूसरी ओर भाजपा के पास सर्वानंद सोनोवाल तथा कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए हेमंत बिस्वा की आक्रामक जोड़ी थी, जिन्होंने भाजपा की राह चुनाव के दौरान आसान बना दी। मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की जनहितैषी छवि भी भाजपा की जीत का आधार बनी जबकि कांग्रेस यहां भी जमीनी हकीकत पहचानने में विफल रही। कांग्रेस ने बदरूद्दीन अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन किया था और इसी आधार पर भाजपा हिन्दू मतों का धु्रवीकरण अपने पक्ष में करने में सफल हो गई।
    पुडुचेरी जीतने के बाद भाजपा के खाते में एक और प्रदेश जुड़ गया है। पुडुचेरी में चार साल से कांग्रेस की सरकार थी लेकिन चुनाव से पहले ही उसने अधिकांश विधायकों का समर्थन खो दिया था और कुछ ने सत्तारूढ़ पार्टी से इस्तीफा भी दे दिया था। महज 30 सीटों वाले इस छोटे से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के धराशायी होने के बाद कांग्रेस की सांगठनिक क्षमता पर गंभीर सवाल भी उठे थे। इस घटनाक्रम के बाद तय लग रहा था कि यहां भाजपा अपने सहयोगी और कांग्रेस के बागी एन रंगास्वामी के दल के साथ गठजोड़ कर अपना परचम लहराने जा रही है। कांग्रेस की अंतर्कलह का भाजपा भरपूर लाभ उठाने में सफल रही।
    केरल में भाजपा ने मैट्रोमैन श्रीधरन को कमान सौंपकर उनकी साफ-सुथरी छवि के सहारे इस राज्य पर भी कब्जा करने की भरसक कोशिश की थी लेकिन इस वामपंथी गढ़ में बड़ी सेंध लगा पाना उसके लिए आसान नहीं था। शुरू से ही माना जा रहा था कि यहां वाममोर्चा पुनः सत्ता में वापसी करेगा लेकिन कांग्रेस के आक्रामक चुनाव प्रचार को देखते हुए ऐसी उम्मीद कम ही थी कि वाममोर्चा बड़ी जीत हासिल करेगा। चूंकि पांचों प्रदेशों के चुनाव प्रचार में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सर्वाधिक समय केरल में ही व्यतीत किया, इसलिए उनसे काफी उम्मीदें लगाई जा रही थी लेकिन वायनाड से सांसद राहुल गांधी मुख्यमंत्री पी विजयन की लोकप्रियता के मुकाबले पिछड़ गए। हालांकि केरल में राहुल को कांग्रेस के बेहतरीन प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन उनकी लोकप्रियता और अपने संसदीय क्षेत्र में निरंतर सक्रियता भी पार्टी के ज्यादा काम नहीं आई। 25.12 फीसदी वोट हासिल करने के बावजूद वह केवल 21 सीटें ही हासिल कर सकी जबकि सीपीआई (एम) 25.38 फीसदी मतों के साथ 62 सीटें झटकने में सफल रही। कांग्रेस के साथ दुविधा यह थी कि जिन वामदलों के खिलाफ वह केरल में ताल ठोंक रही थी, उन्हीं के साथ मिलकर वह पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ रही थी। मतदाताओं को इस गणित के बारे में समझाना उसके लिए बिल्कुल असहज था। केरल में हर बार सत्ता परिवर्तन की परम्परा रही है लेकिन विजयन इस परम्परा को तोड़ने में सफल हो गए। विजयन की लोकप्रियता का राज अपने तंत्र पर उनका नियंत्रण है लेकिन राहुल गांधी का गृहराज्य होने के बावजूद कांग्रेस के पिछड़ जाने के बाद आने वाले समय में पार्टी के भीतर राहुल के नेतृत्व के खिलाफ स्वर मुखर हो सकते हैं।
    तमिलनाडु में भाजपा ने सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के कंधों पर सवार होकर चुनाव लड़ा था लेकिन अन्नाद्रमुक के साथ परेशानी यह थी कि जयललिता के निधन के बाद से पार्टी के पास कोई ऐसा एकछत्र नेता नहीं है, जो पार्टी को एकजुट रख सके। अभी तक सत्तारूढ़ रही अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन करके भाजपा इस दक्षिण भारतीय राज्य में सत्ता का स्वाद चखना चाहती थी लेकिन उसकी हसरतों पर पानी फिर गया है। तमिलनाडु की राजनीति नए नेतृत्व के तलाश के दौर से गुजर रही थी और वहां की जनता ने द्रमुक के एम.के. स्टालिन तथा कांग्रेस के गठबंधन पर भरोसा जताकर अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन को सत्ता से बेदखल कर दिया है। एम. करूणानिधि के निधन के बाद स्टालिन के नेतृत्व में यह पहला चुनाव था, जिसमें वह सफल रहे जबकि पनीरसेल्वम तथा पलानीसामी के दो धड़ों में बंटी अन्नाद्रमुक की पराजय के बाद अब इसके वजूद पर संकट मंडराने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं।
    बहरहाल, चूंकि भाजपा की नजरें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के जरिये 2024 के लोकसभा चुनाव का ट्रैंड सैट करने पर केन्द्रित थी, इसीलिए उसने अन्य विधानसभा चुनावों के मुकाबले पश्चिम बंगाल को ही अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर यहां अपनी सारी ताकत झोंक दी थी लेकिन इतनी ताकत लगाने के बाद भी यहां उसे जो झटका लगा है, उससे भाजपा को भारी निराशा हुई है। अगले साल पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां कई महीनों से चल रहे किसान आन्दोलन के कारण वह पहले से ही बैकफुट पर है, ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से ये नतीजे भाजपा के लिए बड़ी चुनौती के रूप में सामने आए हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल की धमाकेदार जीत के बाद ममता का क्षेत्रीय कद काफी बढ़ गया है और साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में भी वह मजबूत विकल्प के रूप में उभरी हैं। दूसरी ओर कांग्रेस किसी भी प्रदेश में अपने विरोधियों के समक्ष मजबूत चुनौती पेश करने में विफल रही, इससे कांग्रेस की पकड़ लगातार कम हो रही है।
    पिछले काफी समय से विपक्ष को एक ऐसे सशक्त नेता की तलाश थी, जो प्रधानमंत्री मोदी को कड़ी चुनौती देते हुए उनके मजबूत विकल्प के रूप में उभर सके। पश्चिम बंगाल चुनाव में जबरदस्त सफलता के बाद ममता इस कसौटी पर खरी उतरी हैं। दरअसल ममता की यह जीत भाजपा के चुनावी प्रबंधन पर उनके करिश्माई चेहरे की जीत है और इस जीत में तमाम विपक्षी दलों को उम्मीद की किरण दिखाई दी है। ममता की इस बड़ी जीत ने उनके लिए राष्ट्रीय राजनीति के द्वार खोल दिए हैं और आने वाले दिनों में वह विपक्ष का बड़ा चेहरा बनकर राष्ट्रीय राजनीति में भी दस्तक दे सकती हैं। दरअसल कांग्रेस की लगातार पस्त होती हालत के बीच भाजपा के खिलाफ एकजुट होने के लिए विपक्ष के पास अब स्वयं को साबित कर चुकी ममता बनर्जी के रूप में नेतृत्व करने लायक सशक्त चेहरा है। कुल मिलाकर पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आने वाले समय में देश में गठबंधन की राजनीति को नया रूप देने का महत्वपूर्ण कार्य करेंगे।

1 thought on “राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर डालेंगे चुनावी नतीजे?

  1. इस बात को तो भूल जाइये कि ममता का राष्ट्रीय चेहरा BB पाएगा यदि वह ऐसा सोचती है तो व्यर्थ है ममता जैसी महिला को सहन करना मुश्किल काम है ममता काम पर नहीं गुंडा तत्वों के कंधों पर चढ़ कर सत्ता में आयी है आम बंगाली को अपनी नितांत बेवक़ूफ़ियों का अंजाम अब भुगतना होगा और यदि अब भी बंगाली नहीं संभला तो उसे मुसलमानों की ग़ुलामी और अपनी अस्मत को उन के आगे समर्पित करना ही होगा

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