लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से कोई यह आशा नहीं करता कि वे जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या अटल बिहारी वाजपेयी की तरह लालकिले से कोई ओजस्वी या प्रेरणादायक भाषण देंगे। वे जन नेता नहीं हैं। वे नेता भी नहीं हैं, लेकिन जो व्यक्ति सात बार लालकिले से राष्ट्र को संबोधित कर चुका हो, क्या उसमें इतना आत्मविश्वास भी पैदा नहीं हुआ कि वह आठवीं बार बिना पढ़े बोल सके? लिखे हुए भाषण तो सौ-दो सौ श्रोताओं की विद्घत गोष्ठियों में पढ़े जाते हैं। जिस भाषण को सुनने के लिए देश के करोड़ों लोग आस लगाए रखते हैं, वह बेजान शब्दों की शवयात्र बनकर रह जाए, इससे बढ़कर लोकतंत्र की विडंबना क्या होगी?

इस निराशा के बावजूद प्रधानमंत्री की ईमानदारी की दाद देनी होगी। उन्होंने माना कि इस समय भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या है। उनके भाषण पर भ्रष्टाचार छाया रहा। सबसे ज्यादा शब्द उन्होंने इसी मुद्दे पर खर्च किए। वे चाहते तो उनके ड्राइंगरूम में बैठे इस हाथी की वे अनदेखी कर सकते थे। वे भी मिस्र के होस्नी मुबारक की तरह आंख मींचे रह सकते थे, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से चल रहे जनांदोलनों ने सरकार की नींद हराम कर दी है। अच्छा हुआ कि उन्होंने लिखा हुआ भाषण पढ़ा वरना लेने के देने पड़ जाते। कांग्रेस के कुछ उत्साही युवा नेताओं ने अपने त्वरित बयानों से अपनी पार्टी और अपनी शख्सियत को जैसा नुकसान पहुंचाया, वैसा नुकसान प्रधानमंत्री ने नहीं पहुंचाया। इस नाजुक मौके पर उनका नौकरशाही स्वभाव उनके काम आया। उनके भाषण पर किसी ने वाह-वाह नहीं की तो आलोचना भी नहीं की।

यह तो उन्होंने ठीक ही कहा कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। जादू की बात जाने दें, भ्रष्टाचार से निबटने के लिए उनके पास कैसी भी छड़ी नहीं है। लेकिन भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों को उन्होंने बता दिया कि उनके पास डंडा है। यह डंडा उनकी सरकार ने पहले रामदेव पर बजाया और अब अन्ना हजारे पर बजा दिया। डंडे के जोर पर इस लोकतंत्र को चलाने की कोशिश 1974-75 में भी हुई थी, लेकिन उसका परिणाम क्या हुआ? भारत की परम प्रतापी प्रधानमंत्री को भारत की जनता ने सूखे पत्ते की तरह उड़ा दिया। अब जिन नेताओं की हैसियत सूखे पत्ते की भी नहीं है, वे जनता के हिमालय से टकराना चाहते हैं। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।

उनकी हिमाकत देखिए कि वे अनशन और प्रदर्शन को संसद और लोकतंत्र् की अवहेलना बता रहे हैं। संसद की इज्जत पैंदे में किसने बिठाई? नेताओं ने या जनता ने? नेताओं ने संसद में सवाल पूछने के लिए पैसे खाए। मंत्रियों ने धांधली की और संसद की आंखों में धूल झोंकी। उन्हें संसद ने नहीं, अदालतों ने निकाल बाहर किया। लोकपाल जैसे विधेयक चालीस साल से लटके हुए हैं। आखिर क्यों? क्योंकि संसद को हमारे नेताओं ने पंगु बना रखा है। यदि रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोग देश को हिलाते हैं तो हमारे कुछ नेता कहते हैं कि वे संसद के अधिकारों का हनन कर रहे हैं। संसद के अधिकार के नाम पर नेताओं के अधिकार सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे हैं। सांसदों के वेतन और भत्तों की तुलना जरा देश के 80 करोड़ लोगों से कीजिए, 20 रूपए रोज वाले लोगों से कीजिए। एक-एक सांसद को 25 से 30 करोड़ रूपए की स्वविवेक राशि दे दी गई है। इस अधिकार का ‘सदुपयोग’ कैसे होता है, यह सबको पता है। किसी भी जनांदोलन ने संसद या सांसदों के अधिकारों में कटौती की मांग नहीं की है, लेकिन वे सिर्फ संसद के कर्तव्य पर सवाल खड़ा कर रहे हैं।

संसद अपना कर्तव्य ठीक से पूरा करे, यही तो मांग है, जन जनांदोलनों की। ये संसद की ताकत घटा नहीं रहे हैं, बल्कि बढ़ा रहे हैं। जिन मुद्दों पर फैसला लेने में राष्ट्रध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों को संकोच होता है, उन्हें समर्थन घटने का डर लगा रहता है, लेकिन जिन मुद्दों को वे बिल्कुल ठीक समझते हैं, उन्हीं मुद्दों पर ये आंदोलन जोर दे रहे हैं। डॉ. मनमोहन सिंह चाहते थे कि प्रधानमंत्री पर लोकपाल निगरानी रखे तो यही बात तो अन्ना कह रहे हैं। प्रणब मुखर्जी कहते हैं कि वे काला धन वापस लाएंगे तो यही बात तो रामदेव कह रहे हैं। रामदेव और अन्ना की बात मानने से सांसद की इज्जत बढ़ेगी या घटेगी? गद्दियों पर जमे हुए लोग सचमुच नेता होते तो वे इन आंदोलनों से अपने फेफड़ों में नई प्राणवायु भर लेते। वे संसद और सरकार के चेहरे पर चार चांद लगा देते।

लेकिन, वे क्या कर रहे हैं? वे अनशनों और प्रदर्शनों को ब्लैकमेल बता रहे हैं। क्यों बता रहे हैं? क्योंकि वे डर गए हैं। आजादी के बाद कांग्रेस ने एक भी बड़ा जनांदोलन नहीं चलाया। छोटे-मोटे प्रतिरोधों, दिखावटी जलसों और कुछ नाटकीय प्रदर्शनों के अलावा कांग्रेस ने क्या किया है। वह भी इसलिए वह आठ-दस साल सत्ता से बाहर हो गई थी। यह उसकी मजबूरी थी। इसीलिए जब कोई भी बड़ा जनांदोलन होता है तो उसके हाथ-पांव ही नहीं, दिमाग भी फूल जाता है। उसके पसीने छूट जाते हैं। वह आंदोलनों का मुकाबला राजनीति से नहीं करती है, क्योंकि उसके तरकस में वह तीर है ही नहीं। वह आंदोलनों का मुकाबला राज्य की ताकत से करती है। डंडे और गोली से करती है। राज्य की ताकत का वह दुरूपयोग करती है। अहिंसक आंदोलनकारियों के मुकाबले क्या वह अहिंसक कांग्रेसियों को उतार सकती है? अहिंसक, निहत्थे और बेकसूर सत्याग्रहियों पर डंडे बरसानी वाली कांग्रेस क्या गांधी और नेहरू की कांग्रेस हो सकती है? अपने नाम के साथ उस महात्मा का नाम जबर्दस्ती जोड़ने वाले लोगों को क्या कोई शर्म नहीं आती?

अगर यह किसी भी गांधी की कांग्रेस है तो क्या उसे सत्याग्रहियों को ब्लैकमेल करना चाहिए? क्या गांधी ने अपने विरोधियों का कभी चरित्र् हनन किया? अन्ना हजारे और रामदेव पर जिस तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं और इन साधु-पुरूषों के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, क्या यह कांग्रेस-जैसी महान पार्टी की शानदार परंपराओं के अनुकूल है? जो पार्टी अपने अहिंसात्मक सत्याग्रहों और जनांदोलनों के लिए कभी विश्वविश्यात हुई थी, आज उसके डरे हुए और नादान नेताओं ने उसकी इज्जत धूल में मिला दी है। सत्तारूढ़ नेता इस मुगालते में न रहें कि अभी तीन साल बाकी हैं। यह ठीक है कि भारत की जनता हिंसा पर उतारू नहीं होगी, लेकिन इस बार अगर उस पर जुल्म दोहराया गया तो ये तीन साल का कुराज अगले तीस साल का वनवास बन जाएगा। जनांदोलनों की यह टक्कर तय करेगी कि लोकतंत्र में कौन बड़ा है, नौकर या मालिक?

4 Responses to “क्या यही है गांधी और नेहरू की कांग्रेस?”

  1. Radhey Shyam Sharma

    वेदिक सहब लाल किले कि प्राचीर से अब सिंह गर्जना नहि होती अब कोई नेता नही बोलता अब तो एक विदेशि८ महिला के आंगन मे उचल कूद करने वाला एक मैमना मिमयाताअ है ल्गता है कोई देश को मुशिबत मे फसाकर मदद के लिये रो रहा है।
    एसै ही लोगो के कारन ये देश सदियो गुलाम रहा है

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  2. एल. आर गान्धी

    l.r.gandhi

    वैदिक जी आप किस नेहरु गाँधी की बात कर रहे हो जी …नेहरूजी के गांधीजी के बारे में विचार सुनिए ..१९५५ में कनाडियन पी.एम् नेहरूजी से मिले और गांधीजी के बारे में एक प्रशन किया तो नेहरूजी बोले ओह ! that awful old hypocrite..ओह !वह भयंकर ढोंगी बूढा … गाँधीवादी अन्ना जैसे लोगों के लिए ये जो कांग्रेसी अनाप शनाप बोल रहे हैं ..वह तो इन्हें नेहरूजी से विरासत में मिला है. .. बाकि गाँधी जी के बारे में कुछ न कहें तो अच्छा है.

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  3. प्रभुदयाल श्रीवास्तव

    prabhudayal Shrivastava

    नैतिक पतन की ओर अग्रसर महान भ्रष्टाचारी सरकार के दिन पूरे हॊ चुके हैं|सॊनियां गांधी को यदि मुसॊलिनी बताया जा रहा है तो यह गलत नहीं है|यह सरकार पागल हो चुकी है नेता मंत्री भ्रष्ट हो चुके हैं प्रधान मंत्री का अपना कोई वज़ूद नहीं है सरकार को कपिल सिब्बल कानून के डंडे से हांक रहे हैं प्रजा तंत्र का खुल्ल्म खुल्ला गला घोंटा जा रहा है शायद यह कांग्रेस की समाप्ति के दिन हैं|इस भ्रष्ट राज नैतिक पार्टी के ताबूत में अंतिम कील कब और कौन ठोगेगा प्रतीक्षा करें|

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  4. sunil patel

    आदरणीय डॉ. वैदिक जी बिलकुल सही प्रश्न कह रहे है.
    * भारतीय इतिहास की सबसे भ्रष्ट सर्कार है.
    * श्री मनमोहन जी भारतीय इतिहास के सबसे बेबस प्रधानमंत्री है.

    आखिर उनकी भी क्या गलती है. उन्हें आम आदमी के बारे में पता भी क्या है. विशिष्ट – अति विशिष्ट व्यक्ति जिन्हें यह नहीं पता होता है की गुड और तेल में क्या बोतल में मिलता है और क्या पन्नी में. गुड तेल का आज का भाव क्या है और पिछले दस साल पहले भाव क्या था. ऐसे मैं उन्स्से उम्मीद भी क्या की जा सकती है.

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