लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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अन्‍ना की तरह आर. सिंह भी सत्तर पार कर चुके हैं। इस उम्र में जब लोग अतीत में जीने लगते हैं आर. सिंह अन्‍ना की तरह ही वर्तमान में जीने वाले शख्सियत हैं। अभियंता हैं इसलिए वैज्ञानिक नजरिया रखते हैं। जब भी उनके मन में विचार हिलोरें लेता है तो श्रमपूर्वक लेख कंपोज कर ‘प्रवक्‍ता’ को भेज देते हैं। कॉलोनी की समस्‍याओं से लेकर राष्‍ट्रीय सवालों पर वे बेचैन हो जाते हैं। अभी कुछ दिनों पहले बिहार गए थे तो वहां मनरेगा को लेकर हो रही गड़बडि़यों को देखा तो मुझे फोन कर दिया कि ‘संजीव, इस पर कुछ लिखा जाना चाहिए, बिहार के किसी लेखक को इससे अवगत कराइए।‘ चार दिन पहले उनका फोन आया कि ‘संजीव, अभी अन्‍ना के स्‍वागत में उमड़े जन-ज्‍वार के भव्‍य दृश्‍य का साक्षी हूं। अद्भुत है। ऐतिहासिक। जेपी आंदोलन जैसा दृश्‍य उपस्थित है।‘ लाइव रिपोर्टिंग करने लगे। वहीं मैंने उनसे निवेदन किया कि यह सब ‘प्रवक्‍ता’ के लिए लिख दीजिए। और आज उन्‍होंने हमारे आग्रह को फलीभूत किया। 

आर. सिंह ने जीवंत रिपोर्टिंग की है। चारों दिनों के घटनाक्रम को इतनी तारतम्‍यता के साथ प्रस्‍तुत किया है कि लगता है हम भी उनके साथ-साथ आंदोलन के हमसफर हैं। विशेष क्‍या कहूं, आप स्‍वयं भी उनके साथ शब्‍द-यात्रा कर लीजिए। (सं.)

चौथा दिन

आज उन्नीस तारीख़ है, अन्ना हजारे के अनशन का चौथा दिन. दिन के बारह बज चुके थे. मैं रामलीला मैदान में खड़ा था और हजारों लोगों के साथ अन्नाजी के यहाँ पंहुचने की प्रतीक्षा कर रहा था। खबर आयी थी कि अन्ना जी तिहाड़ जेल को परिसर से बाहर आ चुके हैं. यह भी विडम्बना थी कि एक ऐसा आदमी जिसको जेल में पहुचते ही वहाँ से रिहाई मिल गयी थी, पर वह विवश था वहां अनशन करते ही रहने के लिए क्योंकि उसको जहां बैठने की अनुमति दी गयी थी वह जगह उसके लिए तैयार नहीं थी. किसको इसका दोष दें. कांग्रेस को या भारतीय जनता पार्टी को या उस व्यवस्था को, जिसके तहत दोनों काम करते हैं? ऐसे आज भी यह मैदान आंशिक रूप में ही तैयार था, पर कम से कम इस काबिल हो गया था कि हजारों की संख्या में लोग वहां खड़े हो सके, उनके लिए सर छुपाने की जगह तो वहां अभी भी नहीं नहीं बन पायी थी। अन्नाजी राजघाट की ओर बढ़ रहे थे और किसी भी समय रामलीला मैदान में पहुच सकते थे. पर वहां प्रतीक्षारत लोगों का उत्साह देखते हीं बनता था..प्रतीक्षा रत हजारों निगाहें मंच पर टिकी हुई थी कि कब वे वहां दिखे. अन्दर आने के मार्ग इस तरह बनाए गये थे कि मैदान के एक तरफ से तो जनता का प्रवेश हो और दूसरे मार्ग से अन्ना जी और उनके सहयोगी आयें. क्या नजारा था? अनुमानत: पंद्रह हजार लोग वहां उपस्थित हो चुके थे. क्या जज्बा था. सब उत्साह से लबरेज नजर आ रहे थे. पर देखते ही देखते आसमान फट पड़ा, पहले तो बुंदा बूंदी शुरू हुई जो लोगों पर किसी तरह का भी प्रभाव डालने में नाकामयाब रही. पर इस बूंदा-बूंदी को मुसलाधार बारिश में तब्दील होने में तनिक भी देर नहीं लगी, फिर तो ऎसी बारिश होने लगी जैसा नजारा मैंने खुले में बहुत अरसे से नहीं देखा था. पर उससे भी बड़ी चीज जो मैं निहार रहा था रहा था, वह था लोगों का हुजुम और उनका उत्साह .मूसलाधार बारिश हो रही है, लोग भी भींग रहे हैं, पर टस से मस होने का नाम नहीं ले रहे हैं. वे तो नाच रहे थे, नारे लगा रहे थे. क्या जवान क्या बूढ़े, सब एक ही रंग में सराबोर नजर आरहे थे. किसी को भी शायद यह एहसास नहीं हो रहा था कि वह भींग रहा है और बीमार भी पड़ सकता है. सच पूछिए तो यह दृश्य देख कर मेरी आँखे भर आयी। मुझे लगा कि क्या यही वह भ्रष्ट भारत है या ये किसी अन्य देश के निवासी हैं. अगर ये हमाम के वही नंगे थे, तो ऐसा लग रहा था कि आज उनका हृदय परिवर्तन हो रहा था. विचार आ रहा था कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध यह अभियान क्या वास्तिवकता में बदलेगा? इसी बीच अन्ना हजारे मंच पर आ चुके थे. वर्षा को तो आखिर बंद होना ही था, पर बारिश और नहीं बारिश .मुझे तो कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ा. बाद में मैंने ’आजतक’ के प्रसारण में यह कहते हुए सुना कि वर्षा के कारण थोड़ी अफरा तफरी मची, पर बाद में सब कुछ ठीक हो गया, पर मैं तो बारिश के बीच खड़ा रहा था, न तो मुझे कोई अफरा तफरी दिखी और न कोई प्रसारण वाले नजदीक में नजर आये. वे तो छुपने की जगह की तलाश मे पहले ही भाग खडे़ हुये थे.

पन्द्रह अगस्त की शाम तक यह जाहिर हो गया था कि सरकार अन्ना को दिल्ली में अनशन नहीं करने देगी. वैसे उनको आधिकारिक तौर से जेपी पार्क में अनशन की इजाजत दी गयी थी, पर उसके साथ के शर्तों को मानने से उन्होंने इनकार कर दिया था. फिर भी मैं जनता था कि अन्ना हजारे १६ अगस्त को जेपी पार्क अवश्य जायेंगे और वहां गिरफ्तार कर लिए जायेंगे. मैं तो यहाँ तक सोच रहा था कि अन्ना जी के गिरफ्तारी के साथ ही आंदोलन के भंग होने के आसार नजर आने लगेंगे, क्योंकि मैं देख रहा था कि अन्नाजी के पीठ पर वैसे किसी संगठन का हाथ नहीं है जैसा जेपी के साथ था. मुझे लग रहा था कि ये चन्द सिविल सोसायटी वाले इससे ज्यादा क्या कर पायेंगे कि वे भी उनके साथ ही साथ गिरफ्तार हो जायेंगे. मैं जेपी पार्क में ग्यारह बजे के आसपास पंहुचना चाहता था, क्योंकि मैं देखना चाहता था कि अन्ना जी की गिरफ्तारी के बाद क्या हो रहा है? मन में एक अन्य बात भी आ रही थी. मैं सोच रहा था कि आवश्यकता पड़ने पर मैं अपनी सेवायें भी उपस्थित कर दूंगा और शायद मैं उस समय की स्थिति को काबू, करने में भी समर्थ हो सकूं. पर इसकी तो नौबत ही नहीं आयी. अन्नाजी और उनके सहयोगियों को दस बजे से बहुत पहले गिरफ्तार कर लिया गया। मैं तो तब तक निकलने के लिए भी तैयार नहीं था. फिर पता चला कि उन्हें क्रमश: सिविल लाइंस और छत्रसाल स्टेडियम ले जाया गया है. मैं जब तक तैयार होकर सिविल लाइंस की ओर रवाना हुआ तब तक मुझे पता चल गया कि सबको छत्रसाल स्टेडियम में रखा गया है.यद्दपि मुझे छत्रसाल स्टेडियम पहुँचते-पहुँचते पता चल गया था कि अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों को राजौरी गार्डेन से होते हुए तिहाड़ जेल भेज दिया गया है, फिर भी मैं छत्रसाल स्टेडियम पहुंचना चाहता था, क्योंकि मेरा असली उद्देश्य तो अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों की गिरफ्तारी के बाद के माहौल का जायजा लेना और और आन्दोलन के भविष्य की रूप रेखा देखना था. अगर आवश्यकता हो तो उसमे सहयोग करना भी था. मुझे छ्त्रसाल स्टेडियम के पास पहुँचने पर पहली बार अन्ना हजारे के इस आन्दोलन के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हुआ. अन्नाजी और उनके सहयोगियों को तो तिहाड़ जेल ले जाया गया था, पर करीब १५०० लोगों को गिरफ्तार करके छ्त्रसाल स्टेडियम के अस्थाई कारागार में रखा गया था. पता चला कि पहले तो पुलिस को निर्देश मिला था कि यहाँ जो भी आये उसे गिरफ्तार कर लिया जाए, पर जब गिरफ्तारी के बावजूद लोगों की संख्या बढती गयी, तो पुलिस को मजबूर होकर गिरफ्तारी बंद करनी पड़ी, नहीं तो मैं भी शायद गिरफ्तार हो जाता. १९७५ -७६ में तो मैं गिरफ्तारी से बच ही गया था, यहाँ भी बच गया, पर अभी भी ख़तरा टला नहीं है. मैं वहां पांच या छ: घंटे रहा. उस दिन यद्दपि वहां पीने के पानी का भी ठीक तरह से प्रवंध नहीं था ,पर मुझे लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं नजर आयी. मुझे तो यह भी पता नहीं चल रहा था कि उस भीड़ का जो लगातार बढती जा रही थी और जिसमे लोगों की संख्या हजारों में थी नेतृत्व कौन कर रहा था. लोग नारे अवश्य लगा रहे थे, तिरंगा भी पूरे जोश से लहराया जा रहा था, पर उतेजना का नामोनिशान नहीं था. पुलिस भी भारी संख्या में मौजूद थी, पर उनके लिए कोई कार्य मुझे नजर नहीं आ रहा था. छ्त्रसाल स्टेडियम महात्मा गांधी रोड पर है और जगह भी काफी भीड़-भाड वाली है, पर सबकुछ इतना अनुशासित था की इतनी भीड़ के बावजूद आवागमन में कोई रुकावट नहीं थी.

दूसरा दिन.(१७.०८ २०११)

आज मैं दुविधा में था. पूरा जन समूह तिहाड़ जेल की ओर जा रहा था. एकबार तो लगा कि मुझ भी वहाँ जाना चाहिए. फिर मैंने सोचा कि मैं तो देखने निकला हूँ कि आन्दोलन का स्वरूप उस जगह कैसा है, जहां नेतृत्व का अभाव है. यह भी तो देखना था कि जो १५०० कैदी थे वे किस हालात में हैं. तिहाड़ जेल परिसर के पास का भी समाचार आया कि अपार भीड़ के बावजूद वहाँ कोई अफरा तफरी नहीं है. छ्त्रसाल स्टेडियम में भी आज भीड़ पहले दिन के मुकाबले ज्यादा थी. गिरफ्तार लोग भी गेट के बाहर आ गये थे पर उनके और अन्य लोगों के बीच का अवरोध अभी भी बरकरार था, पर देखते ही देखते यह अवरोध खत्म हो गया और करीब-करीब पूरी जनता स्टेडियम के अंदर चली गयी. एक घंटे के बाद मैं बाहर आया तो देखा कि उतने या उससे अधिक लोग बाहर इकठ्ठा हो चुके हैं. भीड़ बढ़ती ही जा रही थी, फिर खबर आयी कि अन्ना हजारे छुट कर रामलीला मैदान में पहुँचने वाले हैं, तो मेरी इच्छा वहाँ पहुँचने की हुई. फिर शाम चार बजे इंडिया गेट का भी कार्यक्रम था. मैं समय तब वहाँ से निकला और सीधा रामलीला मैदान पहुंचा. वहाँ की जो हालत मैंने देखी उससे तो लगा कि आज क्या यहाँ तो दो चार दिन बाद भी लोगों के खड़ा होने की भी जगह नहीं बन पायेगी. तब तक यह भी पता लग चुका था कि आज भी अन्ना हजारे तिहाड़ जेल में ही रहेंगे. एक बात बताना मैं भूल गया. छ्त्रसाल स्टेडियम में आज पानी की कौन कहे खाने की भी व्यवस्था थी. यह सब वहाँ के नजदीकी लोगों के सौजन्य से उपलब्ध हुआ था.

अब मैं इंडिया गेट पहुँच चुका था. चार बजने में अभी देर था, पर लोग जुटने शुरू हो गए थे. चार बजते-बजते तो वहाँ लोगों का सैलाब उतर आया. ऐसे पूर्ण अनुशासित रैलियां मैंने बहुत कम देखी है. पर आज की रैली मुझे सम्पूर्ण क्रIन्ति वाले रैली की याद दिला रही थी. लोग जुटते गए भीड़ बढती गयी और फिर यह काफिला रवाना हुआ जंतर मंतर की ओर. मैं तो उस काफले का हिस्सा था, पर एक अनुमान के अनुसार उसमे पच्चीस से तीस हजार लोग थे तो इंडिया टीवी वालों के अनुसार लोगों की संख्या लाखों में थी. बड़े बूढ़े, जवान और स्कूली बच्चे उस काफिले के हिस्से थे जो अपने पूरे मार्ग में बहुत ही कम शाम के आवागमन में बाधक बना. इंडिया गेट पर उतनी देर रहने और पैदल उतना मार्ग तय करने बाद भी किसी के चहरे पर थकान नहीं नजर आ रही थी.

तीसरा दिन(१८.०८.२०११)

मेरा तीसरा दिन एक तरह से खामोशी में ही बीता. मैं आज भी तिहाड़ जेल के परिसर के पास तो गया नहीं, हालाकि बाद में मुझे महसूस हुआ कि आज मुझे वहाँ जाना चाहिए था. हल्ल्ला यह भी था कि अन्ना हजारे आज दस बजे तक रामलीला मैदान पहुँच जायेंगे. पर मैंने जो कल मैदान की हालत देखी थी उससे तो नहीं लगता था कि मैदान तैयार हो गया होगा फिर भी कडकती धूप में मैं वहाँ पहुंचा तो पुलिस ने राम लीला मैदान के अंदर जाने की इजाजत नहीं दी और कहा कि दो घंटे बाद यानी करीब दो बजे आइये फिर यह समय सीमा बढा कर तीन बजे कर दी गयी. तीन बजे के बाद तो कह दिया गया कि कल दस बजे आइये. लोग आज भी यहाँ थे. समय सीमा बढने के साथ हीं उनके चहरे पर निराशा की झलक बढती गयी पर शिकायत किसी ने नहीं की.

अब फिर लौटता हूँ चौथे दिन पर..वर्षा बहुत देर तक नहीं टिकी. ऐसे भी उतनी तेज वर्षा ज्यादा देर तक टिकती नहीं. पर यह वर्षा मेरे लिए जिन्दगी को एक ऐसा अनुभव दे गयी, जिसको शायद मैं अंत तक न भूलूँ .ऐसे मैंने लिखा है कि मुझे यह आन्दोलन जेपी के आन्दोलन की याद दिलाता है, पर आज का यह दृश्य ऐसा था कि मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई दृश्य मैंने उस आन्दोलन में भी देखा था. जेपी अपने सम्पूर्ण क्रांति वाले आन्दोलन के बहुत पहले. एक प्रतिष्ठित नेता बन चुके थे, पर कौन है यह अन्ना हजारे? क्या है इसमें? कैसे यह सब परिवर्तन उसने इतने कम दिनों में कर दिया? मेरा दर्जी, मेरा सब्जी वाला जब कहता है कि साहब छ: महीने पहले तो हमने अन्ना हजारे का नाम भी नहीं सुना था और आज लगता है कि वे महात्मा गाँधी के बराबर हो गए हैं तो मुझे सोचने पर बाध्य होना पड़ता है कि आखिर क्या है इस आदमी में? न यह कोई जाना पहचाना नेता है और न कोई साधू या संन्यासी? न यह किसी धर्म या मजहब की दुहाई देता है और न किसी तरह की राजनीति में निमग्न है. तो क्या है इसमें जो इसको सबसे अलग बना रहा है? क्या है इसमे जो लोगों को गाँधी की याद दिला रहा है? क्या है इसमें जिसके चलते १४ तारीख को इसको भ्रष्ट कहने वाला १६ तारीख़ को पूरे राष्ट्र की भर्त्‍सना का शिकार हो जाता है?

10 Responses to “अन्‍ना का अनशन : आंखों ने जो देखा”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    आज पांच वर्षों बाद अपने ही आँखों देखे हाल के बारे में सोच रहा हूँ कि यह सब सत्य था या केवल स्वप्न ?

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  2. sandhya

    आदरणीय सिंह जी आप का लेख बहुत भावना पूर्ण हे.अन्ना जी की तरह आप भी बधाई के पात्र हे.आपने कष्ट सहकर हमारे लिए यह लेख लिखा .

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  3. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan Uvach

    आदरणीय, आर सिंह जी आपने टिपण्णी में जो प्रश्न किया है, उत्तर मैंने भारतेंदु सिंह जी की पुस्तक “माँ की पुकार” में पढ़ा हुआ स्मरण है| वे लिखते हैं कि (१) जो विचार आपके मस्तिष्क में हैं (२) वही अगर जिह्वा पर, और जो जिह्वा पर है, (३) वही कृति में, अगर है, तो आप की वाणी में आप ही आप ऊर्जा आ जाती है| यही बात सच्चाई की हुयी उसमें त्याग जुड़ जाए तो फिर चमत्कारिक शक्ति पैदा हो जाती है| मेरे अपने शाला शिक्षकों के अनुभव भी यही प्रमाणित करते हैं| और आपके लेखमें ऐसी सच्चाई झलक रही है| धन्यवाद|

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  4. prabhudayal

    आँखों देखा हाल कितना बढ़िया मजा आ गया

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  5. Shailendra Saxena

    आदरणीय अन्ना जी ,
    जय माई की ,
    अन्ना जी आप ने देश को जगा दिया है
    देश १००% अन्ना जी के साथ हूँ.
    हम सभी अन्ना जी के लिए गंज बासोदा मैं प्रतिदिन
    कार्यक्रम करवा रहे हैं
    राष्ट्रपति जी, अन्ना जी की पूरी सुरक्षा करें
    . उनको कुछ भ्रष्ट लोग निशाना बना सकते हैं .
    देश मैं लगभग सारे (९०% नेता भ्रष्ट हैं ) चाहे वे किसी भी दल के हों .
    सभी राज्यों के अधिकांश मुख्य मंत्री , मंत्री व विधायक भी भ्रष्ट हैं जनता व युवा वर्ग को
    इनका भी घेराव करना चाहिए.
    अन्ना जी अगले चुनाव मैं पढ़े लिखे ईमान दार लोगों को चुनाव लढ़वाएं या फिर इमानदार
    लोगों का समर्थन करें पुरे देश मैं एक वार फिर से चुनाव होना चाहिए पुरे देश की विधानसभाओं के
    विधायकों की वेइमानी व भ्रस्टाचारी जग जाहिर है .अन्ना जी किसी भी कीमत पर पीछे मत हटना पूरा देश आपके साथ है .
    शैलेन्द्र सक्सेना “आध्यात्म” एवं मुक्ता सक्सेना , संचालक असेंट इंग्लिश स्पीकिंग कोचिंग ,बरेठ रोड गंज बासोदा जिला विदिशा म. प्र .पिन- ४६४२२१. फ़ोन – ०७५९४-२२१५६८, मो. – ०९८२७२४९९६४, ०९९०७८२०१३१.

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  6. आर. सिंह

    आर.सिंह

    आप लोगों की टिप्पणियों को पढ़ कर प्रेरणा मिलती है,,पर मैं तो उत्तर ढूंढ़ रहा हूँ उन प्रश्नों का जो मेरे आलेख के अंत में आये हैंऔर जो मुझे उद्विग्न किये हुए हैं.क्या सचमुच सच्च्चाई और त्याग में आज भी इतना दम है?.प्रत्यक्ष देख कर भी विश्वास नहीं हो रहा है.

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  7. जगत मोहन

    jagat mohan

    -हमने गाँधी को नहीं देखा. लेकिन उनके नाम की दुहाई देकर जो सत्ता तक पहुंचे है उनके भ्रष्टाचारी चेहरे देखे है, यदि यह गाँधीवाद है तो नहीं चाहिए गाँधी.
    -हमने जयप्रकाश नारायण को नहीं देखा. लेकिन उनके नाम की दुहाई देकर जो सत्ता तक पहुंचे है उनके भ्रष्टाचार और समाज विभाजन के चेहरे को देखा है, यदि यह जयप्रकाश नारायण जी के समाजवाद का चेहरा है तो नहीं चाहिए ऐसा समाजवाद.
    -हमने बाबा साहब आंबेडकर को नहीं देखा लेकिन उनका नाम लेकर सत्ता तक पहुँच कर भ्रष्टाचार का नया उदहारण प्रस्तुत करने वाली मायावती को देखा हे
    बाबा साहब आंबेडकर का नाम लेने वाले ऐसे अनुयायी नहीं चाहिए
    – हमने अन्ना को देखा हे जिसने सत्ता के लिए न गाँधी न जयप्रकाश नारायण न आंबेडकर के नाम को बदनाम किया.
    समाज के लिए स्वयं आगे बढ़ चला
    दम है तो राष्ट्रभक्तो के अनुयायी बनो और बढ़ चलों समाज को न्याय दिलवाने के लिए.
    —————————-
    सत्ता के लिए इन महान आत्माओ को बख्शो.
    ——————————–

    Reply
  8. जगत मोहन

    jagat mohan

    -देश बड़ी या संसद ?
    -संसद समाज के लिए या समाज संसद के लिए ?
    -जब जनता सड़को पर हो तो सरकार की नियमो की दुहाई ठीक या फिर जनता के मुद्दे पर निर्णय देने की आवश्यकता?
    जनसैलाब खोज रहा है इन प्रश्नों के उत्तर

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  9. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    सिह साहेब आपका आलेख पढ़ते-पढ़ते आँखे धुंधला गयीं, आंसू मुश्किल से रोक कर पंक्तियाँ पूरी करने का प्रयास कर रहा हूँ. यदि आप सरीखे तार्किक आन्दोलन के सम्मोहन में बध सकते हैं तो औरों की तो बात ही क्या. आपने अपने सशक्त और भावपूर्ण लेखन से सारे दृश्य को सजीव कर दिया है. किसी संवेदना रहित व्यक्ति के वश में ऐसा चित्रण नहीं हो सकता. टी.वी.पर प्रत्यक्ष देख कर भी उन भाव संवेदनाओं को अनुभव नहीं किया जा सकता जो आपने करवा दीं. आपके पवित्र भावों और आपको सादर नमन…..

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