लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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वो शाम चुलबुली सी

रातें खिली खिली सी

वक़्त के समंदर में

वो वक़्त ही घुल गया है।

अब शांत सी शामें हैं,

चादर में नहीं हैं सिलवट

नींद से रूठा मनाई,

यादें आईं नई पुरानी,

बचपन की कोई कहानी

या जवानी की नादानी,

रातों को आंखो में आकर,

नीदें चुराने लगी हैं।

भविष्य भी अब तो

अतीत में खोने लगा है।

‘आज’ का मैं करूं क्या

वो शून्य सा हो रहा है!

कहां से रंग लाऊं,

जो शून्य में समाये,

कहाँ से ऊर्जा पाऊं,

क़दम आगे बढ़ाऊँ।

आज और कल मे अब

फर्क ही कहाँ है……जैसे चल रही

ज़िन्दगी वैसे उसे निभाऊं।

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