लेखक परिचय

डॉ. राजेश कपूर

डॉ. राजेश कपूर

लेखक पारम्‍परिक चिकित्‍सक हैं और समसामयिक मुद्दों पर टिप्‍पणी करते रहते हैं। अनेक असाध्य रोगों के सरल स्वदेशी समाधान, अनेक जड़ी-बूटियों पर शोध और प्रयोग, प्रान्त व राष्ट्रिय स्तर पर पत्र पठन-प्रकाशन व वार्ताएं (आयुर्वेद और जैविक खेती), आपात काल में नौ मास की जेल यात्रा, 'गवाक्ष भारती' मासिक का सम्पादन-प्रकाशन, आजकल स्वाध्याय व लेखनएवं चिकित्सालय का संचालन. रूचि के विशेष विषय: पारंपरिक चिकित्सा, जैविक खेती, हमारा सही गौरवशाली अतीत, भारत विरोधी छद्म आक्रमण.

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डॉ. राजेश कपूर

कई बार सच हमारे सामने होता है पर हम उसे देख नहीं पाते. भारत पर इस्लामी आक्रमणों के बारे में कुछ ऐसा ही हुआ है. अपनी स्थापना के चन्द दशकों के भीतर इस्लाम ने सारे अरब, अफ्रीका, आधे यूरोप को जीत लिया. इतिहास में ऐसा जोश और किसी में नज़र नहीं आता. यह कमाल मुहम्मद साहेब की दूर-दृष्टि का है. ‘भूतो न भविष्यति’ की कहावत जैसी स्थिति है. इससे पहले न कोई ऐसा सम्प्रदाय बना और न बनने की अब उम्मीद है. ऐसा कभी न हारनेवाला जनूनी मज़हब भारत पर सन ७०० के बाद से एक हज़ार साल तक हमले करता रहा पर उसे सफलता न मिली. ७०० साल के लम्बे संघर्ष के बाद कुछ सफल हुआ. क्या कायर भारत यह कमाल कर सकता था?

दुनिया में भारत के अलावा और कौन है जो इस्लाम के आगे टिका ही नहीं, अपनी पहचान को भी बनाए रख सका. और कोई कर सका यह कमाल? फिर हम कायर कैसे? भारत में अपने आगमन से अपने शासन की समाप्ति तक एक भी मुस्लिम शासक ऐसा नहीं था जिसका पूरे भारत देश पर राज्य स्थापित हो सका हो.

भारत में एक भी ऐसा कोई विदेशी शासक नहीं हुआ जो एक रात भी चैन की नीद सोया हो. एक भी दिन उसके शासन का ऐसा नहीं जब उसके राज्य में आज़ादी के लिए युद्ध या संघर्ष न हुआ हो. एक भी दिन ऐसा नहीं जिस दिन भारत के देशभक्तों का रक्त आज़ादी पाने के लिए न बहा हो.

दुनिया के इतिहास में एक भी उदाहरण नहीं है जब किसी समाज ने मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ इतना लंबा संघर्ष किया हो और अपनी पहचान, अपनी संस्कृती को बना-बचा कर रखा हो. इतनी लम्बी आजादी की लड़ाई लड़ने का और कोई एक भी उदाहरण संसार में नहीं मिलता.

स्मरणीय बात यह है कि यदि हम सदा हारते रहे, हम कायर थे तो फिर अरबी आक्रामकों को भारत में घुसने में ५-६ सौ साल कैसे लग गए.?

हज़ार साल तक विदेशी आक्रमणकारियों के साथ कोई कायर लड़ सकता है क्या? यह वह सच्चाई है जो सामने होते हुए भी हमको नज़र नहीं आती.

भारतीयों के पतन का काम मैकाले द्वारा १८४० में पहला कॉन्वेंट स्कुल खोलने के साथ शुरू हुआ. पर इसके कोई विशेष परिणाम अनेक दशकों तक नज़र नहीं आये. धीरे- धीरे ये कान्वेंट स्कूल बढ़ते गए और तथाकथित आज़ादी के बाद बहुत तेज़ी से बढे. तब हमारा चारित्रिक पतन अधिक तेज़ी से हुआ. जापान ने इस कान्वेंट स्कूलों के खतरे को समझ लिया था, अतः उन्होंने आज़ादी मिलते ही जो पहले काम किये उनमें एक था इन कान्वेंट स्कूलों को बंद करना.

मेरा, आपका जन्म भारत के इस पतन के बाद ही हुआ है न? अतः भारत की जो तस्वीर हम-आप देख रहे हैं वह असली भारत नहीं है. क्या इसे देखकर विदेशी विद्वान भारत के दीवाने बने और बन रहे हैं? उन्हों ने पश्चिम की असलियत और असली भारत की असलियत को ठीक से देखा है, जो अनेक लोग नहीं देख पा रहे.

यह वर्तमान परिदृश्य असली भारत नहीं, यह वह भारत है जो मैकाले जैसों ने बनाने का षड्यंत्र किया था. इस झूठ को चीर कर असली भारत को देखना थोड़ा सा मुश्किल ज़रूर है, पर असम्भव नहीं.

आप किसी एक क्या अनेक कहानीकारों और साहित्यकारों का उदाहरण दे सकते हैं जिन्हों ने भारत के बारे में बहुत कुछ बड़ा अपमानजनक लिखा है. ऐसे ही लोग पैदा करने के लिए मैकाले जैसों ने मेहनत की थी जो अपने आप को, अपनी जननी, अपनी मातृभूमि, अपनी परम्पराओं को गाली देने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं.

इस प्रकार ऐतिहासिक तथ्यों के विश्लेषण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस्लामी संस्कृति के साथ एक हज़ार साल तक संघर्ष करने वाली विश्व की एकमात्र अविजित शक्ति हिन्दू शक्ति है जो आज भी अपनी पहचान को बनाए हुए है. संसार के इतिहास में कोई दूसरा एक भी ऐसा उदहारण दुर्लभ है. भारत और भारतीय संस्कृति व समाज की एकांगी निंदा करने वाले लोग सच्चाई को नहीं जानते और मैकाले के षड्यंत्रों के शिकार बन कर भारत व भारतीय समाज की केवल आलोचना करते रहते हैं और इसकी अच्छाईयों व विशेषताओं से अनजान हैं.

9 Responses to “हम कमज़ोर हैं क्या?”

  1. uttam kumar

    कपूर जी आपका लेख मुझे बहुत पसंद आया.

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  2. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    मान्यवर प्रो. मधुसुदन जी, ज्ञानवर्धक टिपण्णी हेतु आभार. जिन अल्स्ट महोदय का आपने वर्णन किया है उनके बारे में मैं नहीं जानता, जानना चाहूँगा. उनके लेखन पर कुछ जानकारी देसकें तो कृपा होगी.
    संतोष जी आपका विश्लेषण व कथन सही है, मैं आपसे सहमत हूँ.

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  3. Santosh Kumar Singh

    आदरणीय कपूर साहब हम कायर न कभी थे और न है, लेकिन यह भी अकाट्य सत्य है कि हम तब भी कमजोर थे और अब भी है | इस कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण हमारा टुकड़ो में होना है | हमारे देश में कभी भी समग्र एकजुटता नही रही है वर्ना कोई भी आक्रमणकारी कभी हमारे ऊपर राज नहीं करता, लेकिन अब आत्मावलोकन का समय है | अब हमें जाति, सम्प्रदाय, भाषा ,प्रान्त के बन्धनों से ऊपर उठकर सबकी अच्छाइयों को समेटना होगा तभी हम आनेवाली चुनौतिओं से निपट कर एक सशक्त भारत की कल्पना कर सकते है |

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  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    मान्यवर, डॉ. राजेश कपूर जी। धन्यवाद- एक उपेक्षित बिंदू की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए।
    (१) बिलकुल सही निदान है इतिहासका। दीर्घ कालीन संघर्ष में हम विजय ही प्राप्त करते आए हैं। बाकी संसार भर में कोई इतनी लंबी अवधितक संघर्ष नहीं कर पाया है। फ्रॅंक्वा गौटिएर भी, और कोन्राड एल्स्ट भी यही बात कहते हैं। वैदिक कालसे लेकर आज तक ३८ संस्कृतियां आयी और मिट भी गयी। यही हमें सनातन बना देता है।
    (२) पर हमने, हमारी जनसंख्या का कुछ भाग, एवं भू भाग खो दिया है।यह हमारी जिन गलतियोंका परिणाम है, इस ऐतिहासिक सच्चाई से भी कुछ पाठ सीखना आवश्यक है।आप भी उससे अनभिज्ञ तो निश्चित नहीं है।
    शायद हम अपने बंधुओं पर किए गए, अन्याय का परिणाम भोग रहे हैं। कर्म फल से कोई बच नहीं सकता।
    (३)आप निश्चिन्त हो, प्रतिक्रिया दीजिए। फिरसे धन्यवाद।

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  5. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    gaud जी आपने सही बात पकड़ी है.ईसाईयों की कथनी-करनी के अंतर को हम नहीं देखते, यह एक बड़ी समस्या है. आप सरीखे विचारशील लोग ही वास्तविकता को dekhpaate हैं और समाज को सही दिशा देने में योगदान करते हैं.
    – आदरणीय भाई आर. सिंह जी आप कहते हैं की मुझे भारत की कमियाँ नज़र नहीं आतीं, तो यह बात सच नहीं. सब नज़र आता है पर आप कमियों का ढिंढोरा पीट कर हासिल क्या करना चाहते हैं ? मित्रवर अगर रोग का निदान सही हो तो इलाज आसान हो जाता है. भारत की समस्याओं का निदान यह है की यूरोपीयों द्वारा हमारी संस्कृति व समाज को पतित बनाने के अनगिनत कुटिल व क्रूर प्रयास किये गए जो आज भी जारी हैं. मेरी प्रार्थना है की उन्हें जान लें, फिर जो ठीक समझें सो करें और कहें. हमारे शत्रुओं द्वारा इतिहास के छुपाये गए
    तथ्यों को जाने बिना हम परिस्थितियों का सही मूल्यांकन कभी नहीं कर सकते. इसके बिना अपने हालात सुधारने के लिए कभी भी सही निर्णय नहीं ले सकते. अतः ज़रूरी है की हम उस सच को जानें जो अभी तक दफन है.
    ** इतिहास पर मुझे अपने जीवन की सर्वोत्तम पुस्तक कुछ मास पहले ही मिली है जो ठोस प्रमाणों के साथ सरल भाषा में वह सब बतला देती हैं जो प्रत्येक उस भारतीय को जानना ज़रूरी है जो भारत ही नहीं सारे संसार का कल्याण चाहता है और कुछ करना चाहते है. भारत और विश्व की अधिकाँश समस्याओं के समाधान शीशे की तरह साफ़ नज़र आने लगेंगे.
    ### पुस्तक का नाम है ”भारतीय इतिहास का पुनर लेखन एक प्रवंचना” प्राप्ति स्थान है ‘सुरुचि साहित्य प्रकाशन, झंडेवालान, नई दिल्ली-५५’
    ## विद्वानों के लिए श्री धर्पल जी द्वारा likhit दस पुस्तकों का संच है जो भारत की वास्तविकता, अंग्रजों द्वारा कियी भारत के सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक विनाश का प्रमाणिक चित्र प्रस्तुत करती हैं. श्री धर्मपाल जी ने साठ साल तक संसार भर के पुस्तकालयों में hazaaron dastaawezon का adhyayan karke ye दस putaken likh हैं. isai aakramankaariyon द्वारा likhe jhuthe इतिहास की pol kholane और सही इतिहास batalaane का isase badaa kaam आज तक kisee ने नहीं kiyaa. angrezee में likhee in दस पुस्तकों का anuwaad gujaraatee और hindee में भी हो chukaa है.inakaa pakaashan / प्राप्ति स्थान है :
    ”punuraathaan trust, 4-wasundharaa socity,aanand park, kankariyaa,ahamadaabad-380022. ph.079-25467790
    -= sigh saaheb jaise sabhee sanwedansheel व imaandaar पर anek तथ्यों से anbhigy bhaarteeyon से meraa niwedn है की uparukt putakon को padne का kasht करें anyathaa wideshi taakaton का shikaar ban कर samaapt hote rahenge, swayam अपने विनाश के लिए istemaal hote rahenge और pataa भी n chalegaa, yahee हो rahaa है. kshmaa करें की आप anek लोग जो mujh jaison की baaten नहीं samaj paate और asahmat hote हैं तो isakaa kaaran yahee है की आप ने वह इतिहास padhaa है जो 90 % jhuthaa और hamane वह इतिहास padhaa है जो सही है. सही- sachaa इतिहास british sansad व eest indiyaa kampanee के dastaawezon में dafan है और जो इतिहास हम padhate हैं वह jhooth का pulindaa है.
    main jaanataa hun की आप में से अधिकाँश लोग mujh से adhik deshbhakt व mujh से adhik budhimaan hinge. समस्या yahee है की आपने यूरोपीयों द्वारा likhe huthe इतिहास को mpadhaa और सच maanaa और मुझे sanyoog wash वह इतिहास padhne को milaa जो सच है. हमारे bheech asahmati का yahee muul kaaran है. अतः kamse kam uparokt में से kam से kam एक पुस्तक तो हर भारतीय को padhnee ही hogee ( भारतीय इतिहास का पुनर लेखन …. ) tbhee सही बात को samajh कर हम सही दिशा में soch sakenge और सही कुछ कर sakenge.
    – saadar आप sabkaa apanaa.

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  6. आर. सिंह

    R.Singh

    डाक्टर राजेश कपूर को एक बात के लिए तो दाद देनी ही पड़ेगी.उनको भारत और भारतीयों की कोई कमजोरी नजर ही नहीं आती ऐसे मुझे विश्व इतिहास का कुछ ज्यादा ज्ञान नहीं है अतः मुस्लिमों द्वारा दूसरे देशों पर कब्ज़ा करने के बारे में तो मैं राय नहीं दे सकता पर भारतीयों के बारे में अवश्य बोल सकता हूँकि उन्होंने बहादुरी के बदले कायरता ही दिखाई है और अपने निजी स्वार्थ से देश प्रेम को सदा पीछे रखा है.रह गयी बात भारत पर कब्ज़ा करने में लगने वाली समय की तो यही कहा जा सकता है की भारत की सीमा बहुत बड़ी थी और यह देश अनेक टुकड़ों में बटा हुआ था.उस हालत में इन टुकड़ो पर अलग अलग लगाने वाला समय तो लम्बा होना ही था.ऐसे भी चूकि हर टुकड़े की अपनी अलग अलग बिशेषता थी,समय भी उसी क्रम से लगा.कही कही असीम रूकावटे भी दी गयी पर सम्मिलित रूप से भारत राष्ट्र के रूप में कभी नहीं लड़ा,क्योंकि भारत कभी भी एक राष्ट्र रहा ही नहीं.यह भारतीय इतिहास का एक कटु सत्य है और इस पर पर्दा डाल कर अपने मुंह मिया मिठू बनने से मुझे तो कोई खास लाभ नहीं दीखता.

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  7. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय कपूर साहब आपका लेख पढ़कर बहुत हर्ष हुआ…एक ऐसी धारणा को हमारे मन में मैकॉले द्वारा बैठा दिया गया है कि हम कितने कमज़ोर और कायर हैं, किन्तु आपका लेख पढ़कर गर्व का अनुभव होता है…कॉन्वेंट का तो कहना ही क्या? यहाँ के पादरी तो हमें आज भी तुच्छ समझते हैं और बच्चों को आज भी विदेशी शिक्षा ही देते हैं…बच्चों के मन में आज भी ये हीन भावना ही भर रहे हैं…वैसे तो चौथी कक्षा तक मै भी कॉन्वेंट में पढ़ा हूँ, किन्तु इसकी असलियत को जानने के बाद मेरे पिता ने मुझे दुसरे किसी स्कूल में पढने भेजा…
    अभी क्रिसमस की रात को मै जयपुर के सैंट एन्स्लम स्कूल के चर्च में गया था…तीन घंटे तक पादरी हमारे सामने प्रभु येशु की महिमा का बखान करते रहे कि प्रभु की नज़रों में सभी समान हैं, प्रभु किसी में भेद नहीं करते, प्रभु सबसे प्रेम करते हैं, प्रभु के लिए सभी जाति व सम्प्रदाय एक ही हैं आदि आदि| किन्तु समापन के समय जब होली वाटर का वितरण हुआ तो पादरी ने कहा कि अब सब रोमन कैथोलिक लोग आगे आएं व प्रभु कि भक्ति में प्रसाद लें…अन्य किसी जाति व धर्म को आगे आने की परमीशन नहीं थी…तब मन में आया कि अभी कुछ देर पहले तक तो सभी धर्म प्रभु के लिए समान थे फिर अचानक ये क्या हुआ?
    इस प्रकार की हरकतों से वे बच्चों के मन में यही हीन भावना भरना चाहते हैं कि तुम तुच्छ हो, जब तक तुम इसाई धर्म स्वीकार नहीं करते तुम्हे प्रभु की कृपा नहीं मिलेगी…इस प्रकार के कई उदाहरण मै पहले भी देख चूका हूँ कि किस प्रकार छोटे छोटे बच्चों के मन में उनके धर्म के प्रति नफरत भरकर इसाइयत के प्रति प्रेम भरा जाता है…और अभिभावक तो सबसे बड़े बेवकूफ होते हैं जो अपने बच्चों को यहाँ भेज कर शान समझते हैं, बिना यह जाने कि इन कौन्वेंट्स का इतिहास क्या है, ये कहाँ से पैदा हुए? बस पश्चिम के पीछे दौड़ने के चक्कर में अपने बच्चों को अनाथ आश्रम में पढने भेज रहे हैं…
    आदरणीय कपूर साहब आप जैसे राष्ट्र भक्तों से ही उम्मीद बंधी है…कृपया निरंतर हमें अपने ज्ञान से परिचित कराते रहें…आपको पढ़कर हम सच्चा भारत देख सकते हैं, जिस पर हमें गर्व है…हमें आप पर गर्व है…
    आपको बहुत बहुत धन्यवाद…

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  8. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    बरबर इस्लाम को सच्ची ठोकर इस भूमि पर ही मिली थी रन के मैदान में भी और अध्यात्म के मार्ग पर भी तब ही शुध्ध वेदांत के प्रभाव ने भारत के इस्लाम को परिवर्तित कर उसे सूफी रूप दिया यही कारन है की बुल्ले शाह जब कहता है मुझे नहीं मालूम में कौन हु पर में न हवा हु न एजी न मोमिन न हिन्दू न तुर आदि तो उसमे शंकराचार्य का शिवोःम गूंजता है ………………

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