विवाह में सियासत बंद करो, साझेदारी का समय आ गया)
– डॉ. प्रियंका सौरभ
शादी कोई सत्ता-संघर्ष नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच भरोसे, सम्मान और जिम्मेदारी का रिश्ता है। लेकिन हमारे समाज में कई बार विवाह को साझेदारी के बजाय नियंत्रण का खेल बना दिया जाता है, जहाँ एक पक्ष अपनी परंपराएँ थोपना चाहता है और दूसरा अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए कठोर रुख अपना लेता है। यही टकराव आगे चलकर झगड़े, दूरी और अविश्वास में बदल जाता है, और फिर लोग पूरे रिश्ते को ही दोष देने लगते हैं। असल समस्या रिश्ते में नहीं, बल्कि रिश्ते को समझने की सोच में होती है।
आज जो वैवाहिक तनाव दिखाई देता है, उसे केवल महिलाओं की सोच कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन यह अधूरा विश्लेषण होगा। भारतीय परिवारों में लंबे समय तक पुरुष को निर्णयकर्ता और महिला को समर्पित भूमिका में रखा गया। इस ढाँचे में बहू से अपेक्षा की गई कि वह सब कुछ स्वीकार करे, चुप रहे, ढले और परिवार की परंपराओं को बिना सवाल के निभाए। दूसरी ओर, नई पीढ़ी की महिलाएँ शिक्षा, नौकरी, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान के कारण इस भूमिका को चुनौती देने लगी हैं। वे अब सिर्फ “बहू” बनकर नहीं रहना चाहतीं, वे व्यक्ति के रूप में सम्मान पाना चाहती हैं।
यही वह बिंदु है जहाँ पीढ़ियों का अंतर साफ दिखाई देता है। पहले विवाह का अर्थ था पति के घर में जाकर उसी व्यवस्था को अपनाना, चाहे वह व्यवस्था न्यायपूर्ण हो या नहीं। आज की स्त्री यह मानती है कि शादी के बाद भी उसका अपना व्यक्तित्व, उसका परिवार, उसके विचार और उसकी सीमाएँ बनी रहनी चाहिए। यह मांग अपने आप में गलत नहीं है। हर इंसान को अपने सम्मान और अपनी पहचान के साथ जीने का अधिकार है। समस्या तब शुरू होती है जब इस अधिकार को अड़ियलपन या विद्रोह समझ लिया जाता है।
दूसरी तरफ, कई पुरुष भी पुराने ढर्रे में फँसे रहते हैं। वे चाहते हैं कि पत्नी उनके परिवार में पूरी तरह घुल जाए, उनकी माता-पिता की हर बात माने, घर की हर परंपरा निभाए और किसी भी स्थिति में सवाल न उठाए। वे यह भूल जाते हैं कि शादी दो व्यक्तियों का मिलन है, न कि एक व्यक्ति का दूसरे पर अधिकार। जब पुरुष यह सोच रखता है कि पत्नी को बस समायोजन करना है, और उसे बदलने का अधिकार सिर्फ उसी के पास है, तब रिश्ते में असंतुलन पैदा होता है। यह असंतुलन धीरे-धीरे शंका, कटुता और दूरी में बदल जाता है।
ससुराल का रिश्ता तब तक मधुर रहता है जब तक उसमें सम्मान हो। सम्मान का अर्थ केवल औपचारिक आदर नहीं, बल्कि भावनात्मक स्वीकार्यता है। बहू से यह उम्मीद करना कि वह अपने माता-पिता, अपने संस्कार, अपने विचार और अपनी प्राथमिकताएँ छोड़ दे, वास्तव में एक प्रकार का भावनात्मक दबाव है। विवाह के बाद नया घर मिलना अलग बात है, लेकिन पुराने रिश्तों को काट देना अलग बात है। एक स्त्री एक ही समय में बेटी भी रह सकती है, पत्नी भी रह सकती है और बहू भी। समस्या तब होती है जब उससे केवल बहू बनकर रहने की माँग की जाती है, और बाकी पहचानों को महत्व नहीं दिया जाता।
इसी तरह यह भी सच है कि कुछ मामलों में पत्नी भी रिश्ते को साझेदारी की बजाय नियंत्रण की लड़ाई बना देती है। वह पति को प्रेम, समझ और संवाद से नहीं, बल्कि दबाव, शिकायत और आरोप के माध्यम से चलाना चाहती है। ऐसा व्यवहार भी रिश्ते को कमजोर करता है। विवाह में यदि एक पक्ष हर बात पर हावी होने की कोशिश करे, तो दूसरा या तो टूटता है या प्रतिरोध में कठोर हो जाता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि गलती केवल पुरुषों की है या केवल महिलाओं की। समस्या उस मानसिकता की है जो विवाह को सहयोग की जगह शक्ति-संतुलन की लड़ाई बना देती है।
असल में, भारतीय समाज में विवाह पर कई परतें एक साथ काम करती हैं। प्रेम, परंपरा, जाति, परिवार, संपत्ति, प्रतिष्ठा और सामाजिक दबाव, सब मिलकर शादी को प्रभावित करते हैं। ऐसे में किसी एक व्यक्ति से यह अपेक्षा करना कि वह बिना विरोध किए सब कुछ स्वीकार कर ले, अवास्तविक है। समाज बदल रहा है, शिक्षा बढ़ी है, आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी है, और सूचना के साधन भी बढ़े हैं। अब लोग पुराने निर्णयों को बिना सवाल किए नहीं मानते। यही कारण है कि विवाह के भीतर संवाद की ज़रूरत पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि संवाद की जगह अक्सर आरोप, शिकायत और भावनात्मक दूरी ले लेती है।
कई घरों में समस्या पति-पत्नी के बीच कम और परिवार की हस्तक्षेपकारी भूमिका के कारण अधिक बढ़ती है। सास-ससुर, भाई-बहन, रिश्तेदार और समाज, सब मिलकर दंपति के निजी जीवन में राय देने लगते हैं। हर छोटी बात पर सलाह, तुलना और दखल रिश्ते को खोखला कर देती है। जब पति अपनी पत्नी के पक्ष में खड़ा नहीं होता, तब पत्नी को लगता है कि शादी के बाद उसका अपना कोई सहारा नहीं बचा। और जब पति को लगता है कि पत्नी उसके घर में आई है, इसलिए उसे पूरी तरह झुकना चाहिए, तब वह संवेदनशीलता खो देता है। ऐसे में दोनों ओर से दूरी बढ़ती है। रिश्ते में प्रेम कम और रणनीति अधिक दिखने लगती है।
यह भी समझना होगा कि स्वतंत्रता और स्वच्छंदता एक ही चीज़ नहीं हैं। किसी स्त्री का अपने सम्मान के लिए बोलना, अपने निर्णय लेना और अपने आत्मसम्मान की रक्षा करना स्वच्छंदता नहीं है। लेकिन यदि वह हर बात में टकराव को ही समाधान समझने लगे, तो रिश्ते में शांति नहीं रह सकती। इसी तरह पुरुष का परिवार के प्रति जिम्मेदार होना जरूरी है, लेकिन जिम्मेदारी के नाम पर पत्नी पर एकतरफा शासन करना न्याय नहीं है। पति-पत्नी के संबंध में मर्यादा, संवेदना और सम्मान का संतुलन होना चाहिए। जब तक यह संतुलन नहीं होगा, तब तक शादी में तनाव बना रहेगा।
समाज को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज की महिला पहले जैसी चुप और सहने वाली नहीं रही। यह बदलाव बुरा नहीं है। यह सामाजिक विकास का संकेत है। जिस स्त्री ने शिक्षा पाई है, जो कमाती है, जो अपने अधिकार समझती है, वह अब हर बात पर समझौता नहीं करेगी। उसे यह भी एहसास है कि शादी का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि साझी ज़िंदगी है। इसी तरह पुरुष को भी यह समझना होगा कि पत्नी का सम्मान करना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी परिपक्वता है। जो पति अपनी पत्नी को बराबरी से देख सकता है, वही वास्तव में मजबूत है। जो पति अपनी पत्नी को दबाकर रखना चाहता है, वह ताकतवर नहीं, असुरक्षित होता है।
परिवारों के भीतर सबसे बड़ी जरूरत यह है कि रिश्तों को पदानुक्रम की तरह नहीं, बल्कि साझेदारी की तरह देखा जाए। बेटी को अपने घर में जो सम्मान मिला है, वही सम्मान बहू के रूप में भी मिलना चाहिए। पत्नी को पति के घर में अनुग्रह नहीं, अधिकार मिलना चाहिए। पति को भी केवल कमाने वाला नहीं, समझने वाला, सुनने वाला और जिम्मेदारी बाँटने वाला साथी बनना चाहिए। यह बात जितनी जल्दी समझ ली जाएगी, उतनी जल्दी वैवाहिक रिश्तों में तनाव कम होगा। विवाह का भविष्य दमन में नहीं, संवाद में है। डर में नहीं, भरोसे में है। आदेश में नहीं, समानता में है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम महिलाओं के बारे में सामान्यीकरण बंद करें। हर महिला एक जैसी नहीं होती। हर पुरुष भी एक जैसा नहीं होता। कुछ महिलाएँ सचमुच रिश्ते में हावी होने की कोशिश करती हैं, तो कुछ केवल सम्मान और सुरक्षा चाहती हैं। कुछ पुरुष सच्चे जीवनसाथी होते हैं, तो कुछ केवल अपनी इच्छा थोपना जानते हैं। इसलिए किसी एक वर्ग को दोषी ठहराना समाधान नहीं है। सही दृष्टि यह है कि हम रिश्तों को इंसानी स्तर पर समझें, न कि लिंग के आधार पर एकतरफा निष्कर्ष निकालें।
विवाह को बचाने के लिए सबसे पहले अहंकार को कम करना होगा। पति को यह स्वीकार करना होगा कि पत्नी उसकी संपत्ति नहीं है। पत्नी को यह समझना होगा कि पति को नियंत्रित करना प्रेम नहीं है। ससुराल को यह मानना होगा कि बहू कोई बाहरी वस्तु नहीं, परिवार की सदस्य है। और मायके को यह भी समझना होगा कि हर समस्या का समाधान दखल नहीं, धैर्य और संवाद है। जब तक हर पक्ष अपनी भूमिका को अधिकार और दबाव के रूप में देखता रहेगा, तब तक समस्या बनी रहेगी।
सच यह है कि आधुनिक विवाह में सबसे बड़ी चुनौती स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के बीच संतुलन की है। यदि स्वतंत्रता केवल अपने लिए चाही जाए और जिम्मेदारी दूसरे पर डाल दी जाए, तो रिश्ता नहीं चलेगा। यदि जिम्मेदारी केवल एक पक्ष से माँगी जाए और दूसरे पक्ष को छूट दी जाए, तो भी रिश्ता नहीं चलेगा। इसलिए ज़रूरत साझी समझ की है। पति-पत्नी को एक-दूसरे के खिलाफ नहीं, एक-दूसरे के लिए खड़ा होना सीखना होगा। जब यह भावना बनेगी, तभी शादी का असली अर्थ वापस आएगा।
समाज को भी अपनी भाषा बदलनी होगी। “बहू ने घर तोड़ दिया”, “पत्नी ने पति को बदल दिया”, “स्त्री ही सब कुछ चाहती है” जैसी टिप्पणियाँ केवल जटिल समस्या को और भड़काती हैं। ऐसे कथन सोच को सरल बनाते हैं, लेकिन समाधान नहीं देते। समस्या तब सुलझेगी जब हम मानेंगे कि हर विवाह में दो व्यक्तियों की इच्छाएँ, सीमाएँ, भावनाएँ और अपेक्षाएँ होती हैं। इन्हें समझना और संतुलित करना ही зрелता है। यही समझ परिवार को बचाती है, और यही समझ रिश्ते को सम्मानजनक बनाती है।
अंततः, विवाह का भविष्य किसी एक लिंग की जीत में नहीं, बल्कि आपसी सम्मान में है। न स्त्री को पुरुष पर विजय पानी है, न पुरुष को स्त्री पर प्रभुत्व। दोनों को मिलकर एक ऐसा जीवन बनाना है जिसमें प्रेम, स्वतंत्रता, मर्यादा और भरोसा साथ चलें। जो रिश्ता बराबरी पर खड़ा होता है, वही टिकता है। जो रिश्ता वर्चस्व पर खड़ा होता है, वह दिखने में मजबूत और भीतर से खोखला होता है। यही वह सच्चाई है जिसे आज के समाज को समझना ही होगा।