— डॉ. प्रियंका सौरभ
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनमत होता है। यह जनमत किसी एक दिन या एक चुनाव के दौरान निर्मित नहीं होता, बल्कि समाज में निरंतर चलने वाले संवाद, बहस, विचार-विमर्श, सामाजिक अनुभवों, राजनीतिक चेतना और नागरिक भागीदारी की लंबी प्रक्रिया से आकार लेता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों का सूचित निर्णय, विभिन्न विचारों का आदान-प्रदान और असहमति के प्रति सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लंबे समय तक भारत में जनमत के निर्माण का आधार प्रत्यक्ष संवाद, जनसभाएँ, सामाजिक संगठन, समाचार-पत्र, पुस्तकें, शिक्षण संस्थान और जनआंदोलन रहे। लेकिन डिजिटल क्रांति के बाद यह परिदृश्य तेजी से बदला है। आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि वह जनमत निर्माण की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा है। ऐसे समय में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या अब जनमत नागरिकों के स्वतंत्र चिंतन से अधिक सोशल मीडिया ट्रेंड और एल्गोरिदम द्वारा निर्धारित होने लगा है?
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और साथ ही दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल उपभोक्ता समूहों में से एक भी। करोड़ों लोग प्रतिदिन फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब, व्हाट्सऐप और अन्य डिजिटल मंचों का उपयोग करते हैं। समाचारों से लेकर राजनीतिक विचारों तक, समाज के बड़े वर्ग की प्राथमिक जानकारी अब इन्हीं प्लेटफॉर्मों से प्राप्त होती है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पहले जहाँ नागरिक किसी मुद्दे पर अखबार पढ़कर, बहस सुनकर या स्थानीय स्तर पर चर्चा करके राय बनाते थे, वहीं अब राय निर्माण की प्रक्रिया काफी हद तक डिजिटल मंचों पर निर्भर हो गई है। इस प्रक्रिया में सोशल मीडिया एल्गोरिदम की भूमिका केंद्रीय हो गई है।
एल्गोरिदम ऐसे तकनीकी तंत्र हैं जो यह तय करते हैं कि किसी उपयोगकर्ता को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी और कौन-सी नहीं। वे उपयोगकर्ता की पसंद, गतिविधियों, खोज इतिहास और ऑनलाइन व्यवहार का विश्लेषण करके सामग्री का चयन करते हैं। तकनीकी दृष्टि से उनका उद्देश्य उपयोगकर्ता को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखना होता है, क्योंकि डिजिटल कंपनियों का आर्थिक मॉडल इसी पर आधारित है। लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से यह प्रक्रिया कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। यदि नागरिकों को वही सामग्री दिखाई जाए जो उनकी पूर्व मान्यताओं से मेल खाती हो, तो क्या वे विविध विचारों से परिचित हो पाएँगे? यदि एल्गोरिदम यह तय करने लगें कि कौन-सा मुद्दा महत्वपूर्ण है, तो क्या लोकतांत्रिक विमर्श स्वतंत्र रह पाएगा?
आज सोशल मीडिया पर ट्रेंड होना किसी विषय की लोकप्रियता का प्रमुख संकेतक माना जाता है। कोई हैशटैग लाखों बार साझा हो जाए तो वह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि जो ट्रेंड कर रहा है वही जनभावना का प्रतिनिधित्व कर रहा है। किंतु यह आवश्यक नहीं कि ट्रेंड वास्तव में समाज की व्यापक राय का प्रतिबिंब हो। अनेक बार ट्रेंड संगठित डिजिटल अभियानों, राजनीतिक प्रचार, भुगतान आधारित प्रचार रणनीतियों या बॉट नेटवर्क द्वारा भी निर्मित किए जाते हैं। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि डिजिटल दृश्यता और वास्तविक जनसमर्थन हमेशा समानार्थी नहीं होते।
जमीनी स्तर की राजनीतिक भागीदारी और डिजिटल सक्रियता के बीच का अंतर भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास प्रत्यक्ष जनसहभागिता के अनेक उदाहरणों से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन में लोगों ने जेल यात्राएँ कीं, सत्याग्रह किए और सामाजिक परिवर्तन के लिए व्यक्तिगत जोखिम उठाए। बाद के दशकों में भी अनेक आंदोलनों ने नागरिकों को प्रत्यक्ष रूप से संगठित किया। इन आंदोलनों में लोगों के बीच संवाद, विश्वास और सामूहिकता का निर्माण होता था। इसके विपरीत डिजिटल सक्रियता अक्सर प्रतीकात्मक भागीदारी तक सीमित रह जाती है। किसी पोस्ट को साझा करना, किसी हैशटैग का समर्थन करना या प्रोफाइल फोटो बदलना आसान है, लेकिन यह हमेशा वास्तविक सामाजिक हस्तक्षेप में परिवर्तित नहीं होता। परिणामस्वरूप राजनीतिक भागीदारी का एक नया स्वरूप विकसित हुआ है जिसमें दृश्यता अधिक और प्रत्यक्ष सामाजिक प्रतिबद्धता अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
सोशल मीडिया एल्गोरिदम का एक महत्वपूर्ण प्रभाव तथाकथित “इको चैंबर” और “फिल्टर बबल” के रूप में सामने आता है। जब कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रकार की सामग्री देखता या पसंद करता है, तो एल्गोरिदम उसे उसी प्रकार की और सामग्री दिखाने लगते हैं। धीरे-धीरे वह व्यक्ति ऐसे डिजिटल वातावरण में पहुँच जाता है जहाँ उसे मुख्यतः वही विचार दिखाई देते हैं जिनसे वह पहले से सहमत होता है। इससे वैचारिक विविधता कम हो जाती है और विरोधी विचारों के प्रति असहिष्णुता बढ़ने लगती है। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिक विभिन्न दृष्टिकोणों को सुनने और समझने के लिए तैयार हों। लेकिन यदि एल्गोरिदम नागरिकों को वैचारिक रूप से अलग-अलग खेमों में बाँट दें, तो लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।
भारत में राजनीतिक ध्रुवीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर विभिन्न राजनीतिक समूह अपने-अपने डिजिटल समुदायों में सक्रिय रहते हैं। इन समुदायों के भीतर साझा की जाने वाली सामग्री अक्सर एक विशेष दृष्टिकोण को पुष्ट करती है और विरोधी विचारों को संदेह, उपहास या शत्रुता की दृष्टि से प्रस्तुत करती है। इससे समाज में संवाद की जगह टकराव की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक और आवश्यक है, लेकिन जब असहमति संवाद के बजाय वैमनस्य का रूप लेने लगे तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर पड़ने लगती है।
फेक न्यूज़ और दुष्प्रचार का प्रश्न भी सोशल मीडिया एल्गोरिदम से गहराई से जुड़ा हुआ है। एल्गोरिदम उन सामग्रियों को अधिक बढ़ावा देते हैं जिन पर लोग तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं। अक्सर भावनात्मक और सनसनीखेज सामग्री तथ्यात्मक और संतुलित सामग्री की तुलना में अधिक तेजी से फैलती है। यही कारण है कि झूठी खबरें, आधे-अधूरे तथ्य, भ्रामक वीडियो और मनगढ़ंत दावे सोशल मीडिया पर अत्यंत तेजी से वायरल हो जाते हैं। भारत में कई अवसरों पर फेक न्यूज़ ने सामाजिक तनाव, सांप्रदायिक विवाद और सार्वजनिक भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है। चुनावी राजनीति में भी गलत सूचनाओं का उपयोग मतदाताओं की राय को प्रभावित करने के लिए किया जाता रहा है। जब नागरिकों के निर्णय तथ्यात्मक जानकारी के बजाय दुष्प्रचार पर आधारित होने लगें, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
सोशल मीडिया ने राजनीतिक संचार को भी पूरी तरह बदल दिया है। पहले राजनीतिक दलों को जनता तक पहुँचने के लिए रैलियों, सभाओं, पोस्टरों और पारंपरिक मीडिया का सहारा लेना पड़ता था। अब वे सीधे नागरिकों के मोबाइल फोन तक पहुँच सकते हैं। यह सुविधा लोकतंत्र के लिए सकारात्मक भी है क्योंकि इससे सूचना का प्रवाह तेज हुआ है। लेकिन इसके साथ ही माइक्रो-टार्गेटिंग जैसी नई रणनीतियाँ भी विकसित हुई हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं के व्यवहार से संबंधित विशाल मात्रा में डेटा एकत्र करते हैं। इस डेटा के आधार पर अलग-अलग समूहों को अलग-अलग राजनीतिक संदेश भेजे जा सकते हैं। इससे राजनीतिक प्रचार अधिक प्रभावी तो हो जाता है, लेकिन पारदर्शिता कम हो जाती है। नागरिकों को यह पता ही नहीं चलता कि उन्हें जो संदेश दिखाया जा रहा है, वही संदेश अन्य नागरिकों को भी दिखाई दे रहा है या नहीं। लोकतंत्र का आदर्श सार्वजनिक और खुला विमर्श है, जबकि माइक्रो-टार्गेटिंग राजनीतिक संवाद को खंडित और निजी बना सकती है।
हालाँकि सोशल मीडिया और एल्गोरिदम के प्रभाव को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। इन मंचों ने अनेक सकारात्मक अवसर भी प्रदान किए हैं। समाज के हाशिए पर स्थित समूहों, महिलाओं, युवाओं, ग्रामीण समुदायों और अल्पप्रतिनिधित्व वाले वर्गों को अपनी बात रखने का नया मंच मिला है। कई सामाजिक मुद्दे जो पहले मुख्यधारा मीडिया में पर्याप्त स्थान नहीं पाते थे, सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय बहस का विषय बने हैं। डिजिटल माध्यमों ने सूचना तक पहुँच को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है और नागरिकों को सत्ता से सीधे संवाद करने का अवसर दिया है। कई जनहित अभियानों ने सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक समर्थन प्राप्त किया है। प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक आंदोलनों और जनजागरूकता अभियानों में डिजिटल प्लेटफॉर्म की सकारात्मक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब तकनीकी मंच स्वयं लोकतांत्रिक विमर्श के निर्णायक बनने लगते हैं। किसी लोकतंत्र में यह निर्णय नागरिकों और संस्थाओं का होना चाहिए कि कौन-से मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, न कि किसी निजी कंपनी के एल्गोरिदम का। लेकिन व्यवहार में कई बार यही होता दिखाई देता है कि जो विषय एल्गोरिदमिक रूप से अधिक दृश्यता प्राप्त कर लेता है, वही सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ जाता है। इससे उन महत्वपूर्ण मुद्दों की उपेक्षा हो सकती है जो डिजिटल रूप से आकर्षक नहीं हैं, लेकिन सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ग्रामीण संकट, श्रमिक अधिकार, शिक्षा की गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्थानीय प्रशासन जैसे विषय अक्सर मनोरंजक या विवादास्पद सामग्री की भीड़ में दब जाते हैं।
भारत जैसे लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह डिजिटल तकनीक के लाभों को स्वीकार करते हुए उसके दुष्प्रभावों को कैसे नियंत्रित करे। इसके लिए केवल सरकारी नियमन पर्याप्त नहीं होगा। डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना आवश्यक है ताकि नागरिक सूचना का आलोचनात्मक मूल्यांकन कर सकें। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में मीडिया साक्षरता तथा तथ्य-जाँच संबंधी शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया कंपनियों को भी अपने एल्गोरिदम की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी। राजनीतिक विज्ञापनों और डिजिटल प्रचार अभियानों के लिए स्पष्ट नियमों की आवश्यकता है ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की निष्पक्षता बनी रहे। स्वतंत्र मीडिया, नागरिक समाज और शैक्षणिक संस्थानों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र केवल तकनीक से संचालित नहीं हो सकता। तकनीक लोकतंत्र का साधन हो सकती है, उसका विकल्प नहीं। सोशल मीडिया नागरिकों को जोड़ सकता है, लेकिन वह वास्तविक सामाजिक संबंधों और जमीनी भागीदारी का स्थान नहीं ले सकता। किसी पोस्ट को साझा करना और किसी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी हैशटैग को ट्रेंड कराना और समाज में स्थायी परिवर्तन लाना भी समान नहीं हैं। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति अभी भी जागरूक नागरिकों, स्वतंत्र चिंतन, सार्वजनिक संवाद और सामूहिक भागीदारी में निहित है।
जब ट्रेंड जनमत को प्रभावित करने लगें, तब नागरिकों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्हें यह समझना होगा कि हर वायरल सामग्री सत्य नहीं होती, हर ट्रेंड जनभावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता और हर डिजिटल बहस लोकतांत्रिक विमर्श नहीं होती। लोकतंत्र की रक्षा केवल संस्थाएँ नहीं करतीं, बल्कि सचेत नागरिक भी करते हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि डिजिटल युग में नागरिक तकनीक का उपयोग करें, लेकिन उसके द्वारा नियंत्रित न हों। यदि हम ऐसा कर पाए, तो सोशल मीडिया लोकतंत्र को सशक्त बनाने का माध्यम बनेगा; अन्यथा यह खतरा बना रहेगा कि एक दिन जनमत नागरिकों की स्वतंत्र चेतना से नहीं, बल्कि एल्गोरिदम द्वारा निर्मित ट्रेंड से निर्धारित होने लगेगा। यही हमारे समय की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक चुनौती है।