जब रानी झाँसी ‘लक्ष्मीबाई’ खुद को ‘बलिदान’ कर गयी

■ डॉ. सदानंद पॉल

‘खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थी’ कि कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान को ही मैं बाल्यावस्था में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई समझता था । वो मराठी ब्राह्मण थी । विकिपीडिया के अनुसार, लक्ष्मीबाई का जन्म बनारस में 19 नवम्बर 1828 को हुई थी, बचपन का नाम मणिकर्णिका थी, लेकिन प्यार से उन्हें मनु नाम से पुकारी जाती थी। उनकी माँ का नाम भागीरथी सापोर और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथी बाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ स्वभाव की थी तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी, क्योंकि घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ पेशवा बाजीराव II के दरबार में ले जाने लगे। जहाँ चंचल और सुन्दर मनु को सब लोग उसे प्यार से छबीली कहकर बुलाने लगे। मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्र की शिक्षा भी ली। वर्ष 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखी गयी । वर्ष 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, परन्तु 4 महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी। वर्ष 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद 21.11.1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया, किन्तु ब्रिटिश साम्राज्य को यह मान्य नहीं था ! उन्होंने सिर्फ़ 29 साल की उम्र में ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से युद्ध किया और रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुईं। बताया जाता है कि सिर पर तलवार लगने से 17.06.1858 को रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुई थी।
रानी लक्ष्मीबाई कैसी थी, उस पर समकालीन अधिवक्ता ने बॉयोग्राफी लिखने कस प्रयास किये हैं ! नवभारत टाइम्स के अनुसार, रानी ने ऑस्ट्रेलिया के रहने वाले जॉन लैंग को अपना वकील नियुक्त किया थाउन दिनों जॉन लैंग आगरा में थे जहां से वे रानी से मिलने के लिए झांसी गएजॉन लैंग के साथ रानी के वित्त मंत्री और प्रधान वकील थेरानी झांसी को ब्रिटिश शासन में विलय करने और पेंशन लेने को तैयार नहीं हुई। ऑस्ट्रेलिया के रहने वाले जॉन लैंग एक बैरिस्टर थे। जब ब्रिटिश की ओर से रानी लक्ष्मीबाई को किला छोड़कर राज महल में रहने का आदेश दिया गया तो उन्होंने अपना केस लंदन की कोर्ट में ले जाने का फैसला किया। इसके लिए जॉन लैंग को उनकी तरफ से वकील नियुक्त किया गया। उन दिनों जॉन लैंग आगरा में ही थे जहां रानी के वित्त मंत्री ने उनसे भेंट की। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई से अपनी मुलाकात की पूरी कहानी “वंडरिंग्स इन इंडिया : स्केटचेस ऑफ लाइफ इन हिन्दोस्तान” में लिखी है। जॉन लैंग लिखते हैं कि जब ब्रिटिश शासन ने झांसी को ब्रिटिश साम्राज्य में विलय का आदेश दे दिया तो उसके एक महीने उनको एक पत्र मिला। रानी लक्ष्मीबाई की ओर से भेजा गया यह पत्र ‘गोल्ड पेपर’ में था। पत्र की भाषा फारसी थी। रानी लक्ष्मीबाई ने उनसे भेंट का आग्रह किया था। जॉन लेंग के पास रानी का पत्र लेकर दो लोग गए थे। उनमें से एक रानी के पति के वित्त मंत्री थे और दूसरा रानी का प्रधान वकील था। जब रानी का पत्र मिला तो जॉन लैंग आगरा में थे और आगरा से झांसी का रास्ता दो दिनों का था। वह झांसी की रानी के निवास पर जाने की पूरी कहानी यूं लिखते हैं, शाम को मैं अपनी पालकी पर सवार हुआ और अगले दिन सुबह ग्वालियर पहुंचा। छावनी से डेढ़ मील दूरी पर झांसी के राजा का एक छोटा सा मकान था। उस मकान को ठहरने के स्थान के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। वहां मुझे एक मंत्री और वकील ले गए जो मेरे साथ-साथ थे। मैंने नाश्ता किया और हुक्का पिया। उसके बाद करीब दस बजे के करीब हमसे जाने के लिए कहा गया। दिन तो काफी गर्म था लेकिन रानी ने एक बड़ी और आरामदायक पालकी भेजी थी। वैसे वह पालकी कम और एक छोटा सा कमरा ज्यादा लगती थी। उसमें हर तरह की सुविधा थी। उसमें एक पंखा भी लगा था जिसे बाहर से एक आदमी खींचता था। पालकी में मेरे और मंत्री एवं वकील के अलावा एक खानसामा भी था जो मेरी जरूरत के मुताबिक खाने-पीने की चीजें मुहैया कराता। इस पालकी को एक जोड़ा घोड़ा खींच रहा था जो काफी ताकतवर और फुर्तीला था। दोनों करीब सत्रह हाथ ऊंचे थे। दिन के करीब दो बजे हम झांसी के इलाके में पहुंचे। पालकी को एक जगह पर ले जाया गया जिसे ‘राजा का बाग’ कहा जाता था। जब मैं उतरा तो वकील, वित्त मंत्री और राजा के अन्य सेवक मुझे एक विशाल टेंट के अंदर ले गए। फिर रानी ने एक पंडित से मशविरा किया कि मेरे साथ बातचीत के लिए क्या उचित समय होगा। उनको बताया गया कि साढ़े पांच से साढ़े छह के बीच का समय उचित रहेगा। जब मुझे इस बारे में बताया गया तो मैंने संतोष व्यक्त किया। इसके बाद मैंने रात के खाने का ऑर्डर दिया। उसी बीच वित्त मंत्री ने मुझसे कहा कि वह मुझसे किसी खास मामले पर बात करना चाहते हैं। फिर उन्होंने वहां मौजूद सभी लोगों को चले जाने का आदेश दिया। सबके चले जाने के बाद वित्त मंत्री ने मुझसे आग्रह किया कि क्या आप रानी के कमरे में जाते समय अपना जूता बाहर उतार सकते हैं। शुरू में तो मैं इसके लिए राजी नहीं था लेकिन लम्बी बहस के बाद मैं तैयार हो गया। मिलने की घड़ी आ गई थी। रानी की ओर से एक सफेद हाथी भेजी गई थी। रानी का महल उस जगह से करीब आधे मील की दूरी पर था, जहां मैं ठहरा हुआ था। हाथी के दोनों तरफ घोड़े पर मंत्री सवार थे। शाम में हम महल के दरवाजे पर पहुंच गए थे। रानी को सूचना भेजी गई। कुछ मिनटों के बाद दरवाजा खोलने का आदेश मिला। मैंने हाथी पर सवार होकर प्रवेश किया और आंगन में उतरा। शाम का समय था और गर्मी काफी था। जैसे ही मैं उतरा चारों तरफ से लोगों ने घेर लिया। यह देखकर मंत्री ने सभी को दूर हटने को कहा। फिर थोड़ी देर बाद मुझे पत्थर की एक सीढ़ी पर चढ़ने को कहा गया जो काफी तंग थी। जब ऊपर पहुंचा तो वहां एक आदमी ने मुझे करीब छह-सात कमरे दिखाए। कुछ देर बाद एक कमरे के दरवाजे के करीब मुझे ले जाया गया। उस आदमी ने दरवाजे को खटखटाया। अंदर से एक महिला की आवाज आई, ‘कौन है?’ उस आदमी ने जवाब दिया- साहिब। दरवाजा खुला और उस आदमी ने मुझे अंदर जाने को कहा। साथी ही उसने कहा कि वह जा रहा है। वहां पर मैं जूता उतारकर अपार्टमेंट में पहुंचा। रूम के बीचो-बीच एक आर्मचेयर थी जो यूरोप में बनी हुई थी। कमरे में सुंदर सा कालीन बिछा हुआ था। कमरे के अंत में पर्दा था और उसके पीछे लोग बात कर रहे थे। लैंग कुर्सी पर बैठा और अपनी टोपी उतार ली। मैंने एक महिला की आवाज सुनी जो बच्चे को लैंग के पास आने के लिए कह रही थी लेकिन बच्चा आने को तैयार नहीं था। बच्चा डरते-डरते हुए मेरे पास आया। उसने जो आभूषण और पोशाक पहन रखे थे, उससे मुझे अंदाजा लग गया कि इसी बच्चे को राजा ने गोद लिया होगा। बच्चा काफी खूबसूरत था और अपने उम्र के मुकाबले काफी छोटा था। उसका कांधा चौड़ा था जैसा मैंने अकसर मराठा बच्चों का देखा था। जब मैं बच्चे से बात कर रहा था तो पर्दे के पीछे से एक तेज और अजनबी आवाज आई। मुझे बताया गया कि लड़का महाराजा है जिसका अधिकार भारत के गवर्नर जनरल ने छीन लिया है। बाद में पता चला कि वह रानी की आवाज थी।

‘मणिकर्णिका’ नामक हिंदी फिल्म रानी झाँसी लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित है, जिसमें रानी झाँसी की अविस्मरणीय भूमिका ‘कंगना रनौत’ ने निभाई है। वीरांगना रानी झांसी लक्ष्मीबाई को सादर नमन।

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