लेखक परिचय

लीना

लीना

पटना, बिहार में जन्‍म। राजनीतिशास्‍त्र से स्‍नातकोत्तर एवं पत्रकारिता से पीजी डिप्‍लोमा। 2000-02 तक दैनिक हिन्‍दुस्‍तान, पटना में कार्य करते हुए रिपोर्टिंग, संपादन व पेज बनाने का अनुभव, 1997 से हिन्‍दुस्‍तान, राष्‍ट्रीय सहारा, पंजाब केसरी, आउटलुक हिंदी इत्‍यादि राष्‍ट्रीय व क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रिपोर्ट, खबरें व फीचर प्रकाशित। आकाशवाणी: पटना व कोहिमा से वार्ता, कविता प्र‍सारित। संप्रति: संपादक- ई-पत्रिका ’मीडियामोरचा’ और बढ़ते कदम। संप्रति: संपादक- ई-पत्रिका 'मीडियामोरचा' और ग्रामीण परिवेश पर आधारित पटना से प्रकाशित पत्रिका 'गांव समाज' में समाचार संपादक।

Posted On by &filed under विविधा.


cbse topperइन दिनों परीक्षा परिणामों का दौर रहा है। बेटियां इतिहास रच रही हैं, अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। लगभग सभी परीक्षाओं में लड़कों के मुकाबले वे ही अव्वल आ रही हैं, टॉप कर रही हैं। छात्राओं के उतीर्ण होने का प्रतिशत भी  छात्रों की अपेक्षा अधिक ही रह रहा है। सीबीएससी 10वीं की परीक्षा में 99 फीसदी छात्राएं पास हुईं हैं, तो 12वीं में भी 85 फीसदी, जबकि केवल 73 प्रतिशत लड़के पास हुए। बिहार में तो सीबीएससी 12वी बिहार और बिहार बोर्ड के तीनों संकायों विज्ञान, कला और कामर्स में न सिर्फ उन्होंने बाजी मारी है, बल्कि तीनों में टॉप भी किया है। कला संकाय में तो टॉप 20 में 19 लड़कियां ही हैं।

इन परिणामों ने बेटियों को हौसला दिया है और उन्हें सपने देखने का हक भी। कोई वैज्ञानिक बनना चाहती है तो कोई प्रशासनिक अधिकारी, कोई डाक्टर-इंजिनीयर तो कोई सीए. शिक्षिका…..। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़कर काम करने का, खुद के पांव पर खड़े होने का और परिवार को संबल देने का- बेटियां अब सपने देख रही हैं।

बहुत खूब! लेकिन क्या ये सपने सचमुच साकार हो पाते हैं, हो पाएंगे ? या कि आगे चलकर हमारे पुरूष सत्तात्मक समाज में अपने सपनों की कुर्बानी देकर उन्हें ही फिर ‘‘घर बैठना’’ पड़ जाएगा।

अब तक के आंकड़े तो यही कहते हैं। एक ओर दसवीं में 99 फीसदी पास होने वाली बेटियां हैं, तो दूसरी ओर हमारे देश के शहरों में मात्र 15.4 प्रतिशत ही कामकाजी महिलाएं हैं। देश के ग्रामीण क्षेत्र में जरूर 30 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं हैं, जिनकी बदौलत ग्रामीण और शहरी क्षेत्र दोनों में मिलाकर जरूर औसतन 25 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं हो जाती हैं। कामकाजी महिलाओं का आंकड़ा ऐसा इसलिए नजर आता है कि गांवों में खेतों में मजदूरी का काम करने वाली महिलाओं की संख्या काफी है। ग्रामीण कृषि महिला मजदूरों का प्रतिशत करीब 49 है। और इनमें शायद ही 99 फीसदी पास होने वाली बेटियां हों।

तो देखा जाए तो इन पढ़ी लिखी बेटियों में से महज 15 प्रतिशत ही कामकाजी बन पाती हैं। जबकि इनमें स्थायी तौर पर और थोड़ी अवधि (3-6 महीने, कुछ साल) तक काम करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं।

तो कहां गुम हो जाती हैं ये टॉपर बेटियां ? कहां दफन हो जाते हैं उनके सपने ? कुछ को तो इससे आगे उच्च शिक्षा पाने का ही मौका नहीं मिल पाता है, विभिन्न कारणों से। जबकि किसी तरह पास कर गए बेटों को भी हमारा समाज किसी न किसी तरह उच्च शिक्षा में दाखिला दिलवा ही देता है। जबकि बेटियों को किसी तरह विदा कर देने की जिम्मेवारी समझने वाला समाज उसे साधारण शिक्षा दिलाकर उन्हें ब्याहकर ‘मुक्ति’ पा लेता है।

हां कई बेटियां आगे मनमुताबिक पढ़ पाती हैं। लेकिन उनमें से भी अधिकतर आगे चलकर घर-परिवार की जिम्मेदारियों में ही बांध दी जाती हैं/ बंधने को विवश कर दी जाती हैं। और इस तरह देश की जनगणना में कामकाजी महिलाओं वाले खाने में रहने की बजाये उनकी गिनती ही कहीं नहीं रह जाती है।

आखिर इनकी चाहतें हकीकत क्यों नहीं बन पातीं ? क्यों नहीं मिल पाता इनके सपनों को उड़ान ? सवाल एक है, वजहें कई-कई। और इनके जबाव न सिर्फ हमें तलाशने होंगे, बेटियों को जबाव देना भी होगा

2 Responses to “कहां गुम हो जाती हैं टॉपर बेटियां? क्या सपने सचमुच साकार हो रहे हैं ?”

  1. ोो

    बेटियां घर बनाती हैं. घर बनाना भी एक बहुत महत्वपूर्ण और बड़ा काम है, जिससे समाज तैयार होता है। जैसे कुछ महिलाएं शहरों में दफ़्तरों में काम करती है, बाकी घर पर रहकर परिवार का लालन-पालन करती हैं। लेख के अनुसार घर पर रहने वाली महिलाएं निक्कमी और नकारा हैं, उनका समाज में कोई योगदान नहीं है। सिर्फ पैसा कमाना ही कामकाजी होने की परिभाषा नहीं है अपितु:अपने धर-परिवार की देखभाल, बच्चों को आदर्श नागरिक बनाना सबसे उच्चतम और कठिन कार्य है।

    Reply
    • लीना

      लीना

      लेख कहीं भी घर पर रहने वाली महिलाओं को निक्कमी और नकारा नहीं बताता । लेकिन उन्हें भी सपने देखने और काम करने का हक है। और जो बेटियाँ सपने देखती हैं, वे सपने कहाँ दब जाते हैं या उनके सपनों को आखिर कहाँ दबा दिया जाता है ?- लेख सिर्फ यह सवाल उठाता है ।

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *