कहाँ गया देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र?

हिमकर श्याम

देश की एकता और अखंडता के सामने आज जितनी बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है, उतनी इसके पहले कभी नहीं थी। सत्ता की राजनीति ने एकता के सूत्रों को न सिर्फ कमजोर किया है बल्कि उसे अपने फायदे के लिए तहस-नहस भी किया है। सहिष्णुता का झीना आवरण उतरता और धर्मनिरेपक्ष भारत का सपना बिखरता दिखाई दे रहा है। देश में अलगाववाद का नया दौर शुरू हो गया है और भविष्य में इसके और तीव्र होने की आशंका है। राष्ट्रीयता का मसला इतना महत्वपूर्ण है कि उसे नकारा नहीं जा सकता है। विघटनकारी शक्तियों से हमारे देश की सुरक्षा और स्थिरता दोनों को खतरा है। ऐसी ताकतों को नियंत्रित रख पाने में हमारा तंत्र पूरी तरह से विफल रहा है।

असम और म्यांमार में हिंसा के प्रतिक्रिया स्वरूप जो कुछ हुआ, जिस तरह से देश के विभिन्न हिस्सों में उग्र प्रदर्शन किये गये वह राष्ट्रीय एकता और देश के सांप्रदायिक चरित्र पर सवालिया निशान लगाते हैं। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, संस्कृति इत्यादि के आधार पर बनी अस्मिताओं से हमारा अस्तित्व बनता है। इन अस्मिताओं ने हमेशा ही शांतिपूर्ण सह अस्तित्व नहीं रहता और विभिन्न समूहों के हित परस्पर विरोधी भी हो जाते हैं। कभी धर्म, कभी क्षेत्र, कभी भाषा और कभी संस्कृति के नाम पर अलगाववादी शक्तियां सर उठाती रहीं हैं। सरकार की नीति हमेशा से इन तत्वों को पुचकारने की रही है।

सरकार को अपने वोट बैंक की अधिक चिंता है और अन्य राजनीतिक पार्टियां अल्पकालिक फायदों पर ज्यादा नजर रखती हैं। प्रायःहर राजनीतिक दल अपने वोट के नजरिए से चीजों को तौलता और देखता है। धार्मिक संवेदनाओं का खुला इस्तेमाल अपना वोट बैंक बचाने और बनाने के लिए किया जाता रहा है। वह चाहे कश्मीर का मुद्दा हो या अयोध्या का। गुजरात के दंगे हो या असम की ताजातरीन घटना, सब राजनीति के इसी सोच के प्रतिफल हैं। असम में वोटों की खातिर सरकार ने लाखों घुसपैठियों को न सिर्फ रहने की जगह दी, उन्हें भारत का नागरिक होने का हक भी प्रदान किया। इसका परिणाम यह हुआ कि असम सांप्रदायिक हिंसा की भेट चढ़ा जिसमे लाखो लोग बेघर हो गए और न जाने कितने लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी। असम की आग देखते-देखते पूरे देश में फैल गयी। पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को जिस तरह उत्तर और दक्षिण भारत के शहरों से भागना पड़ा है और उसमें देश के सांप्रदायिक तत्वों और पाकिस्तान में बैठे कट्टरपंथियों द्वारा संचालित वेबसाइटों, फेसबुक और ट्वीटर ने जैसी भूमिका निभाई है, वह चिंता का विषय है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश में पाकिस्तानी झंडे लहराने और शहीद स्मारक को तोड़ने वाले लोगों को मनमानी छूट नही मिलनी चाहिए। सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय पाना और जीवन को दोबारा पटरी पर लाना बेहद कठिन होता है।

सांप्रदायिक हिंसा से समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है, जिससे समाज में वैमनस्यता जन्म लेती है। राजनीति के अलावा अलग-अलग गुटों का छद्म स्वार्थ भी हिंसा की जमीन तैयार करता है। धार्मिक और क्षेत्रीय भावनाओ को भड़काने और उनसे सहानुभूति रखनेवालों के अपने-अपने हित एवं औचित्य होते हैं। सांप्रदायिकता को वैधता प्रदान करने के लिए हर समुदाय अपने तर्क गढ़ता है। अपने को सहिष्णु और उदार मानना और दूसरे को कट्टर और शंका की दृष्टि से देखना ठीक नहीं है। हिंदू और मुसलमान ये दो ऐसे समुदायों है जिसने ने हमेशा ही संघर्ष का रास्ता अख्तियार किया है। इनके बीच वैमनस्य की ऐसी आग है जो बुझती नहीं है, कुछ समय के लिए ठंडी होती है और जरा-सी हवा मिलने पर फिर भड़क उठती है। देश के अल्पसंख्यकों के में सिक्ख, ईसाई, बौद्ध और जैन भी आते हैं लेकिन उनके प्रति शक और संघर्ष की वह भावना नहीं दिखती है, जो दोनों समुदायों का आपस में है। मुठ्ठी भर लोग धार्मिक जुनूं भड़का कर लोगों के दिमाग में हमेशा ही जहर भरते रहे हैं। इन्हें जब भी मौका मिलता है, विष वमन से नहीं चूकते। वह हमारे आपसी पूर्वाग्रहों और अविश्वासों को फायदा उठाते रहे हैं। इन पूर्वाग्रहों और अविश्वासों के कारण ही अमन चैन का माहौल कभी कायम नहीं हो पाया। अंग्रेजों ने इस आपसी फूट का खूब फायदा उठाया।

भारत में सांप्रदायिक विद्वेष मुख्य रूप से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अंतर्विरोंधों की उपज है। भारतीय जन उभार को धार्मिक जन उन्माद में डुबोकर अंग्रेज अपना शासन बरकार रखना चाहते थे। ब्रिटिश राज की नीति थी ‘फूट डालो और राज करो’ और बहुत हद तक वह इसमें सफल भी रहे। हिन्दुस्तानी कौम अंग्रेजों की इस नीति का शिकार बन गयी और विदेशी शासकों से लड़ने के स्थान पर आपस में ही मारकाट करने लगी। जिसकी परिणति बाद में ‘दो-राष्ट्र’ सिद्धांत के रूप में निकली। इस सांप्रदायिक विभाजन के कारण ही देश को बंटवारे का दंश झेलना पड़ा। आजादी के बाद यही काम सत्ता की राजनीति ने किया।

स्वतंत्रता के बाद देश ने एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक व्यवस्था बनाने का सपना देखा था। हालाँकि धर्मनिरपेक्षता को कहीं अक्षरशः परिभाषित नहीं किया गया है लेकिन आमतौर पर उसके मायने यह होते हैं कि सभी धर्मों के प्रति समान आदरभाव होगा और सभी नागरिकों को, फिर उनकी धार्मिक आस्था चाहे जो हो, समान अवसर और व्यवहार प्राप्त होंगे। विडंबना यह है कि धर्मनिरपेक्षता को कभी ईमानदारी से लागू नहीं किया गया और देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर निरंतर खतरे के बादल मंडराते रहे। इस शब्द को लेकर हमेशा ही राजनीति होती रही है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हो रहे तुष्टीकरण के कारण समुदायों के बीच अंतर उभर कर सामने आ गये। इससे सांप्रदायिक भेदभाव गहरे हुए और गंगा-जमुनी संस्कृति की जड़े हिल गयीं। समुदाय विशेष के प्रति हद से ज्यादा उदारता धर्मनिरेपक्षता के हित में नहीं हैं। अल्पसंख्यक के नाम कोई समुदाय इतने अधिक विशेषाधिकार पाता है कि बहुसंख्यक समुदाय को इससे खतरा महसूस होने लगता है। तुष्टीकरण की नीति के कारण बहुसंख्यक समाज में अक्सर यह संदेश जाता है कि अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए उनके हकों की तिलांजलि दी जा रही है। बहुसंख्यक समाज की अवहेलना न्यायिक और मानवीय संदेश देने वाला निर्णय नहीं कहा जा सकता है।

तुष्टीकरण सामान्यतः ऐसी राजनयिक नीति को कहते हैं जो किसी दूसरी शक्ति या पक्ष को इसलिये छूट दे देता है ताकि युद्ध से बचा जा सके। एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में नागरिकों का तुष्टीकरण उचित नहीं है। गांधी जी के अनुसार तुष्टीकरण तो सिर्फ दुश्मनों के बीच होता है। अम्बेडकर ने तुष्टीकरण को हमेशा राष्ट्र विरोधी बताया था। तुष्टीकरण की नीति से ऊपर उठकर ऐसा खुशहाल समाज बनाने की कोशिश की जानी चाहिए जिसमें सबके लिए अवसर, उम्मीद और आकांक्षाएं हों। इसके लिए बहुत ही ईमानदार कोशिशों की जरूरत है।

देश की प्रमुख राजनैतिक पार्टी कांग्रेस पर हमेशा से ही मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगता रहा है। अतीत की बातें छोड़ दें, हाल के दिनों में अल्पसंख्यकों की तुष्टीकरण के लिए केन्द्र सरकार ने मजहब के आधार पर आरक्षण देने की घोषणा की थी। सर्वोच्च न्यायालय में जब इस मुद्दे को चुनौती दी गई तो सरकार को मुंह की खानी पड़ी। मजहब के आधार पर आरक्षण सम्बंधी असंवैधानिक निर्णय क्या सांप्रदायिकता को बढ़ावा देनेवाला नहीं हैं? यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है? इतना ही नहीं सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के द्वारा तैयार किए गए सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केन्द्रित हिंसा निवारण अधिनियम के मसौदे में ये दलील दी गयी है कि सांप्रदायिक हंगामें के लिए कथित तौर पर बहुसंख्यक ज़िम्मेदार हैं। ये मान कर चलना कि बहुसंख्यक समुदाय के लोग ही हिंसा करेंगें या फैलाएंगे, ये गलत और आपत्तिजनक सोच है। अजमल कसाब तथा अफजल गुरु जैसे लोगों के साथ नरमी सरकार के तुष्टीकरण नीति का ही परिचायक है। मुल्सिम वोट बैंक के मद्देनजर जो काम कांग्रेस करती है वही काम पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा, बिहार में राजद और अब जदयू, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, तमिलनाडु में द्रमुक जैसी पार्टियां करती हैं। वोट की राजनीति के कारण ही उग्र हिन्दुत्व का उभार हुआ है। भाजपा ने कांग्रेस की तुष्टीकरण की कथित नीति के खिलाफ हिन्दुओं के असंतोष को उभारा है।

धर्म और क्षेत्र के नाम पर मुखर होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे क्षेत्रों व समुदायों के बीच शांति स्थापित करना और भी ज्यादा मुश्किल हो गया है। सबको यह समझना चाहिए कि देश में रहने वाले सर्वप्रथम भारतीय हैं, उसके बाद ही कोई हिन्दू , मुस्लिम, सिक्ख या ईसाई हैं। आम धारणा है कि मुसलमान सिर्फ अपने धर्म की ही परवाह करते हैं, अपने देश की नहीं। एक साजिश के तहत मुस्लिम समाज को कट्टरपन, दकियानूसीपन और पृथकतावादी मानसिकता के रास्ते पर धकेला जा रहा है। वह भ्रष्टाचार, आर्थिक विकास, राष्ट्रीय एकता, समाज सुधार आदि सब प्रश्नों से मुंह मोड़कर केवल और केवल मुसलमान के नाते सोचता और निर्णय लेता है। इस संकुचित और पृथकतावादी मानसिकता के कारण कई तरह की शंकाएं पैदा होती हैं। आखिर क्या वजह है कि जमीयाते उलेमा ए हिंद तथा दारूल उलूम देवबंद जैसी संस्थाओं द्वारा ‘वंदे मातरम’ के खिलाफ फतवा जारी करना पड़ता है। जहां कोई अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यक समुदाय के साथ एकाकार होने से इंकार करता है वहां स्थानीय सांप्रदायिक संघर्ष उठ खड़े होते हैं। मुसलमानों की तीव्र अतिसंवेदनशीलता, छोटे-बड़े मसलों पर उनका आक्रामक और उग्र रवैया उन्हें दूसरों से अलग-थलग करता है। अल्पसंख्यक समुदाय को असुरक्षा का भाव एक-दूसरे के नजदीक लाता है और एकजुट समुदाय की तरह चलने के लिए प्रेरित करता है। हाल के वर्षों में भारत कट्टरपंथी हमले का सबसे आसान निशाना बनकर उभरा है। इस्लामी कट्टरपंथी अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए समुदाय के गुमराह युवकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे युवकों को भी इस्लामी कट्टरता में अपना भविष्य नजर आ रहा है। मुसलमान अपनी पहचान बनाये रखने के लिए जितना मुखर होते हैं हिन्दुओं में उसकी प्रतिक्रिया उतनी ही उग्र होती है।

हिन्दू, हिन्दुत्व के उमड़ते ज्वार में बहते जा रहे हैं और वे अब मुसमलमानों से कोई तालमेल बिठाना नहीं चाहते। हिन्दुओं में ‘भारतीय’ और ‘हिन्दू’ को एक-दूसरे को पर्याय मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अधिकांशः हिन्दू मानस अपने को भारतीय मानता है। उन्हें भी यह समझना होगा कि देश सिर्फ हिन्दुओें का नहीं। हिन्दुओं के अलावा यह देश मुसलिम, सिख, ईसाई, पारसी बौद्ध सबका है। वहीं अल्पसंख्यक समुदायों को भी बेमानी बातों में उलझने के बजाए अपने व्यवहार से यह बताने की कोशिश करनी चाहिए कि अपने देश के प्रति उनका प्रेम उतना ही गहन है जितना अपने धर्म के प्रति। खुद को अलग रखने की प्रवृत्ति उनकी पीड़ा का सबसे बड़ा कारण बन गया है। बहुसंख्यक मुस्लिम तबका अपनी बिरादरी के उन कट्टरपंथियों की विध्वंसक कार्रवाईयों पर उतना ही चिंतित है, जितना समाज का दूसरा समुदाय। एक खास वर्ग के कारण पूरा समुदाय बदनाम हो रहा है। हर मुसलमान को यह अहसास कराना कि वह राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल है, गलत है। समुदाय के कुछ लोगों की हरकतों के कारण सभी मुसलमानों को एक चश्मे से देखना उचित नहीं है। अब हमें संघर्ष का रास्ता छोड़कर समन्वय का रास्ता अपनाना चाहिए। हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे की संवेदनाओं और भावनाओं का सम्मान करना होगा। ऐसे व्यवहारिक उपाय ढूंढने होंगे जिससे पूर्वाग्रह छूट सके, गलतफहमियां दूर हो और दोनों समुदाय एक-दूसरे के करीब आयें।

हमारी राष्ट्रीय चेतना उत्तरोत्तर शिथिल हो रही है और जाति, क्षेत्र, भाषा व सम्प्रदाय की संकीर्ण चेतनाएं प्रबल हो रही हैं। क्षेत्रीयता और सांप्रदायिकता के उभार के कारण लोग अपने ही देश में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अलगावादी और कट्टरवादी शक्तियों को सख्ती से नहीं कुचला गया तो वह आधारशिला ही ढह जाएगी जिस पर एक उदार धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील समाज बनाने का सपना देखा गया था। कट्टरवाद किसी भी सूरत में ठीक नहीं है चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक। कट्टरवाद से केवल नुकसान ही होता है। कट्टरवादी मानसिकता के कारण इंसान ऐसा रास्ता चुन लेता है जिसकी इजाजत न तो मानवता देती है न ही विश्व का कोई धर्म देता है।

कट्टरपंथ वहीं संभव होता है जहां लोकतंत्र नहीं होता। किसी भी लोकतांत्रिक देश के विकास के लिए परस्पर सौहार्द का होना नितांत आवश्यक है। पूरे देश और सभी क्षेत्रों का सामान आर्थिक विकास, भाषा और धर्म के मामले में सच्चे अर्थों में सहिष्णुता तथा जातिवाद को समाप्त करने की सुदृढ़ चेष्टा यदि रही तो भारत सशक्त और संगठित देश के रूप में फिर उठ खड़ा होगा।

2 thoughts on “कहाँ गया देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र?

  1. भारत सिर्फ नाम का धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है वास्तव में यहाँ सम्प्रदायिक ताकतों का ही बोलबाला है. लेखक महोदय, क्या मंदिर बनाने का वादा करना हिंदुओं का तुष्टिकरण नहीं है ? एक धर्म निरपेक्ष राष्ट की राजनीतिक पार्टी द्वारा मंदिर के नाम पर वोट मांगना क्या साम्प्रदायिकता नहीं है? संघ परिवार ही देश में ज़हर घोल रहा है लेकिन आपको दिखाई नहीं दे रहा है.

    1. खान साहब! शुक्रिया, आपने मेरे आलेख पर अपनी राय जाहिर की. ऐसा लगता है कि आपने आलेख को पूरा पढ़े बिना ही अपने गुस्से का इजहार कर डाला है. पूरा आलेख पढ़ा होता तो शायद आपकी राय इससे कुछ अलग होती. देश और समाज में होने वाली हर घटना और गतिविधियां मुझे साफ दिखाई देती हैं. मेरा आलेख वोट की राजनीति और कट्टरवाद के खिलाफ है, न कि किसी समुदाय विशेष के खिलाफ. मैंने अपने आलेख में तुष्टीकरण की नीति को गलत बताया है. साम्प्रदायिकता के आधार पर सियासत करने की छूट किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए. तुष्टीकरण चाहे जातियों का हो या समुदायों का, मेरी नजर में ठीक नहीं है. तुष्टीकरण के कारण समुदायों और जातियों के बीच अंतर उभर कर सामने आये हैं. तुष्टीकरण की नीति से ऊपर उठकर ऐसा खुशहाल समाज बनाने की कोशिश की जानी चाहिए जिसमें सबके लिए अवसर, उम्मीद और आकांक्षाएं हों. अम्बेडकर ने तुष्टीकरण को राष्ट्र विरोधी बताया था. आप से गुज़ारिश है कि आप आलेख दोबारा पढ़ें और पूरा पढ़ें. मैंने यह भी लिखा है कि वोट की राजनीति के कारण ही उग्र हिन्दुत्व का उभार हुआ है. भाजपा ने कांग्रेस की तुष्टीकरण की कथित नीति के खिलाफ हिन्दुओं के असंतोष को उभारा है, शायद आपने इसे पढ़ा ही नहीं.
      राजनीती का चरित्र समझने और सजग रहने की जरुरत है. सत्ता में बैठे लोग हमेशा ही समाज का भावनात्मक शोषण करते रहे हैं. तुष्टीकरण किसी के हित में नहीं है. आम आदमी सांप्रदायिकता, जातीयता और तुष्टीकरण के बीच पिसता रहता है. सामाजिक समरसता खत्म हो रही है और समाज जातियों और संप्रदायों में बंटा हुआ दिखाई देने लगा है. देश का आम मानस कम्युनल नहीं है, राजनीती उन्हें कम्युनल बनाती है. राजनीती के कारण ही क्षेत्रीयता की भावना उड़ान भरने का मौका मिलता है. हमें अब हिंदू- मुस्लिम होने की भावनाओं से ऊपर उठना चाहिए.

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