कौन हैं ‘किन्नर’?

अनिल अनूप हिजड़ा उर्दू एवं हिंदी भाषा का शब्द है जिसका प्रयोग तृतीय प्रकृति के लोगों के संदर्भ में किया जाता है। इस वर्ग के व्यक्तियों को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। ‘किन्नर’ इसी वर्ग के लिए एक संबोधन है। तेलुगु भाषा में हिजड़े के लिए ‘नपुंसकुडु’, कोज्जा या मादा जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। तमिल भाषा में इसके समतुल्य शब्द थिरु नंगई, अरावनी हैं। जहां पंजाबी में इनके लिए खुसरा शब्द का प्रयोग होता है वहीं गुजराती में इन्हें पवैय्या कहा जाता है। कन्नड़ भाषा में इनके लिए जोगप्पा शब्द प्रचलन में है। भारत में कई जगह इस समुदाय के लोगों के लिए कोठी शब्द का प्रयोग भी होता है। अंग्रेजी में इन्हें ‘युनक’ (Eunuch) कहा जाता है। इनकी देश में अनुमानित संख्या सवा दो लाख से अधिक है। संयुक्त रूप से इन्हें ‘किन्नर समुदाय’ अथवा आधुनिक पाश्चात्य भाषा में ‘ट्रांसजेंडर्स’ या ‘टी.जी. समुदाय’माना जाता है, जिनके अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए देश में कोई कानून न होने के कारण उन्हें अनेक परेशानियों एवं कठिनाइयों
का सामना करना पड़ रहा है।
व्यवहारिक पक्ष यह भी है कि इस वर्ग को वर्तमान व्यवस्था में न तो ‘पुरुष’ माना जाता है और न ही ‘स्त्री’। प्राचीनतम रूप में इन्हें ‘नपुंसक’ की भी संज्ञा दी गई जिसका प्रचलित रूप ही ‘हिजड़ा’ है।
देश के किन्नर समुदायों के लोगों ने एक समिति के माध्यम से अपने विधिक एवं संवैधानिक अधिकारों की मांग के साथ उत्पीड़न से संरक्षण के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका प्रस्तुत की और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण से सहायता की मांग की। अंततः प्राधिकरण की याचिका को ही मुख्य याचिका मानकर यह निर्णय दिया गया।
उच्चतम न्यायालय ने मामले के तथ्यों और सबूतों का अध्ययन करने के बाद अनुभव किया कि वास्तव में यह वर्ग देश में उपेक्षित है और इसे तत्काल विधिक और संविधानिक संरक्षण प्रदान किया जाना आवश्यक है। चूंकि इनके पक्ष में किसी भी कानून का अभाव था, अतः न्यायालय ने इन्हें एक ‘व्यक्ति’ मानते हुए किसी ‘व्यक्ति’ को प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय मूल मानवाधिकार तथा देश के संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का स्वयं इनके पक्ष में निर्वचन करते हुए यह निर्णय दिया है।

किन्नरों के पक्ष में न्यायालय का निर्णय

उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19(1) (क) और 21 के अंतर्गत देश के व्यक्तियों/नागरिकों को प्रदत्त सभी मूल अधिकारों को किन्नरों के भी पक्ष में विस्तारित करते हुए निम्नलिखित निर्णय दिया है-

(i) विधि के समक्ष समता का अधिकार (अनुच्छेद 14)

संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रावधान किया गया है कि राज्य किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। यह अनुच्छेद ‘व्यक्ति’ को केवल ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ तक ही सीमित नहीं करता है। ‘हिजड़ा’ या ‘ट्रांसजेंडर’, जो न तो पुरुष हैं और न ही स्त्री, भी शब्द ‘व्यक्ति’ के अंतर्गत आते हैं। इसलिए राज्य के उन सभी क्षेत्र के कार्यों, नियोजन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा तथा समान सिविल और नागरिक अधिकारों, जिनका उपभोग देश के अन्य नागरिक कर रहे हैं, ये वर्ग भी विधियों का कानूनी संरक्षण प्राप्त करने का हकदार है। अतः उनके साथ लिंगीय पहचान या लिंगीय उत्पत्ति के आधार पर विभेद करना विधि के समक्ष समानता और विधि के समान संरक्षण का उल्लंघन करता है।

(ii) किन्नरों के साथ लिंग-विभेद (अनुच्छेद 15 एवं 16)

संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 संयुक्त रूप से लिंगीय पक्षपात या लिंगीय विभेद को प्रतिबंधित करते हैं। इनमें प्रयोग किया गया शब्द ‘लिंग’ केवल पुरुष या स्त्री के जैविक लिंग तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके अंतर्गत वे लोग भी शामिल हैं जो स्वयं को न तो पुरुष मानते हैं और न स्त्री। अतः ये वर्ग इन अनुच्छेदों के संरक्षण के साथ-साथ अनुच्छेद 15(4) एवं 16(4) के द्वारा प्रदत्त आरक्षण का भी लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है, जिसे देने के लिए राज्य बाध्य है।

वास्तव में ये अनुच्छेद ‘सामाजिक समेकता’(Social Equality) की अपेक्षा करते हैं और इनका अनुभव टीजी समुदाय केवल तब ही कर सकता है जब उसे भी सुविधाएं और अवसर प्रदान किए जाएं।

(iii) किन्नरों की स्व-पहचानीकृत लिंग एवं आत्म- अभिव्यक्ति [अनुच्छेद 19(1)क]

संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) का कथन है कि सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी और इसके अंतर्गत किसी नागरिक के अपने ‘स्व-पहचानीकृत लिंग’(Self-identified Gender) को अभिव्यक्त करने का अधिकार भी सम्मिलित है, जिसे पहनावा (Dress), शब्द, कार्य या व्यवहार अथवा अन्य रूप में दर्शित किया जा सकता है और संविधान के अनुच्छेद 19(2) में कथित प्रतिबंधों के सिवाय किसी ऐसे व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रस्तुति या वेशभूषा पर अन्य कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है।

अतः ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों की एकांतता का महत्त्व, स्व-पहचान (Self-identity), स्वायत्तता और व्यक्तिगत अखंडता अनुच्छेद 19(1) (क) के अंतर्गत प्रत्याभूत किए गए मूल अधिकार हैं और राज्य इन अधिकारों की रक्षा करने तथा उन्हें मान्यता प्रदान करने के लिए बाध्य है।

(iv) लिंगीय पहचान और गरिमा का अधिकार (अनुच्छेद 21)

संविधान का अनुच्छेद 21 यह प्रावधान करता है कि ‘‘किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं’’। यह अनुच्छेद मानव जीवन की गरिमा, किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता एवं किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है। किसी व्यक्ति की लिंगीय पहचान को मान्यता दिया जाना गरिमा के मूल अधिकार के हृदय में निवास करता है। इसलिए लिंगीय पहचान हमारे संविधान के अंतर्गत गरिमा के अधिकार और स्वतंत्रता का एक भाग है।

(v) ‘तृतीय लिंग’ की संविधानिक अवधारणा और कानूनी मान्यता

स्व-पहचानीकृत लिंग या तो ‘पुरुष’ या ‘महिला’ या एक ‘तृतीय लिंग’(Third Gender) हो सकता है। ‘हिजड़ा’ तृतीय लिंग के रूप में ही जाने जाते हैं, न कि पुरुष अथवा स्त्री के रूप में। इसलिए इनकी अपनी लिंगीय अक्षमता को सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समूह के कारण एक तृतीय लिंग के रूप में विचारित किया जाना चाहिए।

संक्षेपतः संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 19 और 21 हिजड़ा या टीजी समूह के सदस्यों को अपनी सीमाओं से बाहर नहीं करते हैं। वास्तव में इन अनुच्छेदों में प्रयुक्त शब्द ‘व्यक्ति’, ‘नागरिक’ और ‘लिंग’ संपूर्ण ‘मानव-प्राणी’ को संकेतिक करता है जो निस्संदेह हिजड़ा (किन्नर) और टीजी समूह तक विस्तारित हैअतः लिंगीय उत्पत्ति या लिंगीय पहचान के आधार पर कोई भी विभेद करना या किसी भी प्रकार का अंतर करना, अपवर्जन, प्रतिबंध या प्राथमिकता को भी सम्मिलित करता है, जो संविधान के अंतर्गत प्रत्याभूत विधियों के समान संरक्षण या विधि के समक्ष समता को शून्य करने का प्रभाव रखता है।

(vi) लिंग परिवर्तन करने वाले के संवैधानिक अधिकार

21वीं शताब्दी को ‘अधिकारों का काल’(Age of Rights) के रूप में जाना जा रहा है। इस न्यायालय ने पिछले दो-तीन दशकों से अनुच्छेद 21 का निर्वचन करने में अनेक अधिकारों की घोषणा की है, जिनकी समीक्षा करने के बाद निष्कर्षित किया जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने लिंग या अपनी लिंगीय विशेषता और मानसिक भाव का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत ‘लिंग पुनर्स्थापना शल्य क्रिया’(Sex Re-assignment Surgery-SRS) के द्वारा परिवर्तन करा लेता है, तब ऐसी शल्य क्रिया के बाद बनाए गए पुनर्लिंग (Assigned Sex) को लिंगीय पहचान की मान्यता देने में कोई बाधा या रुकावट नहीं है। अतः ऐसा व्यक्ति भी पुरुष या स्त्री के रूप में मान्यता प्राप्त करने का संविधानिक अधिकार रखता है।

वस्तुतः टीजी समूह भी देश के नागरिक हैं और उन्हें तृतीय लिंग की पहचान दी जानी चाहिए जिससे वे भी गरिमा और सम्मान के साथ अर्थपूर्ण ढंग से जीवन-यापन कर सकें और देश के अन्य नागरिकों की भांति मतदान के अधिकार, संपत्ति अर्जन के अधिकार, विवाह के अधिकार, पासपोर्ट, राशन कार्ड, वाहन-चालन अनुज्ञप्ति इत्यादि के माध्यम से औपचारिक पहचान प्राप्त करने के अधिकार, शिक्षा, नियोजन एवं स्वास्थ्य इत्यादि के अधिकार का दावा कर सकें। वास्तव में इन अधिकारों से इन वर्गों को वंचित रखे जाने का कोई कारण नहीं है। (इस शीर्षक के अंतर्गत निर्णय के अंश न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी के हैं, जिन्होंने अन्य मामलों में इसके पूर्व न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन के संपूर्ण तर्कों का समर्थन किया है)।

(vii)किन्नर और अंतर्राष्ट्रीय कानून

उच्चतम न्यायालय ने किन्नरों को देश के संविधान के अंतर्गत एक ‘नागरिक’ और ‘व्यक्ति’ के अंतर्गत सम्मिलित करने के पीछे उन अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को भी विचार में लिया जो ‘मानव-प्राणी’ को मूल मानव अधिकार प्रदान करने के लिए राज्यों को उत्तरदायित्व सौंपते हैं। यद्यपि ये कानून किसी राज्य पर बाध्यकारी नहीं होते हैं किंतु यदि कोई देश ऐसे कानूनों पर एक सदस्य राज्य के रूप में हस्ताक्षर कर देता है, तब उनके मानकों को न्यायालय के माध्यम से लागू करवाया जा सकता है। इस आशय का निर्णय और उसके माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रावधानों को देश के नागरिकों के पक्ष में लागू किए जाने का प्रश्न अनेक बार उच्चतम न्यायालय के समक्ष पहले भी आ चुका है। ऐसा ही एक मामला ग्रामोफोन कंपनी ऑफ इंडिया लि. बनाम वीरेंद्र बहादुर पांडेय का है, जिसमें न्यायालय ने इस विषय पर विधिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि देश का न्यायालय अंतर्राष्ट्रीय कंवेंशनों को देश की वचनबद्धता के सिद्धांतों के अनुसार लागू कर सकता है जब तक कि ऐसा देश की विधि के स्पष्ट नियमों द्वारा वर्जित न हो और इस निर्णय का सहारा लेते हुए अन्य अनेक मामलों के साथ-साथ एप्रैल एक्सपोर्ट प्रो. काउंसिल बनाम ए.के. चोपड़ा (1999) 1 SCC 759के मामले में भी अंतर्राष्ट्रीय कंवेंशन का प्रवर्तन देश में किया गया।

फिलहाल किन्नरों के पक्ष में जिन अंतर्राष्ट्रीय कंवेंशनों एवं कानूनों का सहारा लिया गया है उनमें मानव अधिकारों पर सार्वभौमिक घोषणा, 1948 के अनुच्छेद 1, 3, 5, 6, 7 और 12 के अंतर्गत प्रदत्त मूल मानव अधिकार, मानव अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा, 1966, योज्ञकर्ता सिद्धांत, 2006 तथा यूरोपीय कंवेंशन, 2006 और ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, दक्षिण अमेरिका में पारित किए गए हाल के वर्षों के कानून मुख्य हैं।

(viii)कैसे हो अंतर्राष्ट्रीय कानून और संविधान का प्रवर्तन

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि जब किन्नरों के अधिकारों के लिए देश में कोई विधि अर्थात विधायन नहीं है और इसके कारण टीजी समुदाय को अनेक विभेदकारी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, तब यह न्यायालय उनके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से संबंधित अधिकारों की सुरक्षा पर मूकदर्शक नहीं बना रहेगा और अपने संविधानिक दायित्व का निर्वहन करते हुए अपने निर्देशों /आदेशों के माध्यम से उसे प्रवर्तनीय बनाएगा। फिलहाल संसद चाहे तो संविधान के अनुच्छेद 51/253 के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और कंवेंशनों के अनुरूप कानून बना सकती है।

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