लेखक परिचय

विजय निकोर

विजय निकोर

विजय निकोर जी का जन्म दिसम्बर १९४१ में लाहोर में हुआ। १९४७ में देश के दुखद बटवारे के बाद दिल्ली में निवास। अब १९६५ से यू.एस.ए. में हैं । १९६० और १९७० के दशकों में हिन्दी और अन्ग्रेज़ी में कई रचनाएँ प्रकाशित हुईं...(कल्पना, लहर, आजकल, वातायन, रानी, Hindustan Times, Thought, आदि में) । अब कई वर्षों के अवकाश के बाद लेखन में पुन: सक्रिय हैं और गत कुछ वर्षों में तीन सो से अधिक कविताएँ लिखी हैं। कवि सम्मेलनों में नियमित रूप से भाग लेते हैं।

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विजय निकोर

कौन हो तुम ?

पहेली-सी आई,

पहेली ही रही।

बहुत करी थी कोशिश मैंने

कि शायद समझ लूँ तुमको

बातों से ….. आँखों से,

पास से ….. या दूर से,

पर मेरे लिए अभी तक तुम

परिच्छन्न पहेली ही रही हो ।

 

कुछ ऐसा लगता है तुम कभी

जाड़े की किरणों की उष्मा-सी

मुझको बाहों में लपेट लेती हो,

और कभी तुम्हारी रूखी बातें

ग्रीष्म की कड़ी धूप-सी लगती

देर तक चुभती रहती हैं मुझको।

कभी तुम्हारी पलकें बिछी रहतीं

मेरे आने की वही राह तकती,

और कभी यह भी लगता है कि

अब परिक्षत पलकों में तुम्हारी

इस पदाश्रित के लिए

कहीं कोई शरण नहीं है।

 

सच, बहुत दुखता है प्रिय, तब

मेरा यह व्याकुल विशोक मन

भीतर ही भीतर अंशांशत: अकेले

पास तुम्हारे और दूर भी तुमसे,

पर उस परितापी परिक्षत पल में

कुछ भी कह नहीं पाता हूँ डर से।

 

क्या तुम जानती हो उस घड़ी

इन साँसों से भी बढ़कर मुझको

बस, तुम्हारी ज़रूरत होती है ?

खो गया हूँ मैं कब से तुम्हारे

अस्तित्व की भूलभुलैयाँ में ऐसे,

सांकल लगे बंद कमरे में जैसे

कोई भयभीत पंखकटा

रक्ताक्त पक्षी

अवशेष पंख फड़फड़ाता

दीवार से दीवार टकरा रहा हो ।

 

सोचता हूँ यह कैसा होता,

जो मैं भी तुम्हारी आँखों में

किसी काल्पनिक पहेली-सा,

या, गणित के ग्रंथित कृताकृत

अनुचित प्रश्न-सा लटका रहता ।

2 Responses to “कौन हो तुम ?”

  1. Binu Bhatnagat

    कविता मे महादेवी जी जैसा छायावाद है, जो अच्छा लगता है समझकर भी समझ मे नहीं आता।

    Reply
    • Vijay Nikore

      बीनू जी,

      मेरी कविता से आपको महादेवी जी की याद आई, यह मेरा सौभाग्य है।

      आपने ठीक कहा … छायावाद प्रायः समझ कर भी समझ नहीं आता।

      छायावाद वह रहस्य है जो हमारे अंतरतम को छू कर हमारे भीतर कोई तरंग शूरू कर देता है … हम सभी के अनुभव चाहे भिन्न होते हैं, यह उनसे उभरी भावनाओं को मानों एक कर देता है, इसीलिए छायावाद की कविताओं का अपना ही आनन्द है .. भावनाएँ जो हम अनुभव कर सकते हैं, लेकिन शब्दों में नहीं कह सकते।

      विजय निकोर

      Reply

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