जिन घड़ियों में हंस सकते हैं, उनमें रोये क्यों?

ललित गर्ग

जिन्दगी का एक लक्ष्य है- उद्देश्य के साथ जीना। सामाजिक स्वास्थ्य एवं आदर्श समाज व्यवस्था के लिए बहुत जरूरी होता है कत्र्तव्य-बोध और दायित्व-बोध। कत्र्तव्य और दायित्व की चेतना का जागरण जब होता है तभी व्यक्तिगत जीवन की आस्थाओं पर बेईमानी की परतें नहीं चढ़ पाती। सामाजिक, पारिवारिक एवं व्यक्तिगत जीवनशैली के शुभ मुहूत्र्त पर हमारा मन उगती धूप ज्यूं ताजगीभरा होना चाहिए, क्योंकि अनुत्साही, भयाक्रांत, शंकालु, अधमरा मन संभावनाओं के नये क्षितिज उद्घाटित नहीं होने देता, समस्याओं से घिरा रहता है।
समस्याएं चाहे व्यक्तिगत जीवन से संबंधित हों, पारिवारिक जीवन से संबंधित हों या फिर आर्थिक हों या फिर सामाजिक जीवन की। इन प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष कर रहे व्यक्ति का यदि नकारात्मक चिंतन होगा तो वह भीतर ही भीतर टूटता रहेगा, नशे की लत का शिकार हो जाएगा और अपने जीवन को अपने ही हाथों बर्बाद कर देगा। जो व्यक्ति इन प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझ नहीं पाते वे आत्महत्या तक कर लेते हैं या परहत्या जैसा कृत्य भी कर बैठते हैं। कुछ व्यक्ति इन परिस्थितियों में असामान्य हो जाते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं के जीवन को और अधिक जटिल बना देता है। लेखिका पैट होलिंगर पिकेट कहती हैं, ‘ये आपको तय करना है कि अपना समय कैसे बिताएंगे। वरना हम यूं ही व्यस्त बने रहते हैं और जीवन कहीं और घटता रह जाता है।
जीवन की बड़ी बाधा है खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की होड़ एवं दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश। इससे हम कई बार खुद ही नीचे गिरते जाते हैं। वो करते हैं, जो असल में करना ही नहीं चाहते। नतीजा, सफलता मिलती भी है तो खुशी नहीं मिल पाती। खुद को बेहतर बनाना एक बात है, पर हर घड़ी खुद को साबित करने के लिए जूझते रहना खालीपन ही देता है। यह खालीपन का एहसास जीवन को बोझिल बना देता है। अकेलापन, उदासी और असंतुष्टि की भावनाएं कचोटती रहती हैं। मानो खुद के होने का एहसास, कोई इच्छा ही ना बची हो। तब छोटी-छोटी चीजों में छिपी खूबसूरती नजर ही नहीं आती। वियतनामी बौद्ध गुरु तिक न्यात हन्न् कहते हैं, ‘बहुत से लोग जिंदा हैं, पर जीवित होने के जादुई एहसास को कम ही छू पाते हैं।’ हम जितना भागते हैं, समस्याएं उतनी बड़ी होती जाती हैं। हम एक से भागते हैं, चार और पीछा करने लगती हैं। हम जितना समस्याओं से भागते हैं, उतना ही उनके सामने छोटे पड़ने लगते हैं। जबकि सच कुछ और ही होता है। लेखक बर्नार्ड विलियम्स कहते हैं, ‘ऐसी कोई रात या समस्या नहीं होती, जो सूरज को उगने से रोक दे या आशा को धूमिल कर दे।’
सामाजिक एवं व्यक्तिगत अनुशासन के लिये आखिर दंड और यंत्रणा से कब तक कार्य चलेगा? क्या पूरे जीवन-काल तक आदमी नियंत्रण में रहेगा? क्या यह भय निरंतर सबके सिर पर सवार ही रहेगा? भयभीत समाज सदा रोगग्रस्त रहता है, वह कभी स्वस्थ नहीं हो सकता। भय सबसे बड़ी बीमारी है। भय तब होता है जब दायित्व और कत्र्तव्य की चेतना नहीं जगती। जिस समाज में कत्र्तव्य और दायित्व की चेतना जाग जाती है उसे डरने की जरूरत नहीं होती।
यह मन का डर ही है कि हम प्रतिष्ठा एवं अपनी पहचान बनाने के लिये अनेक काम हाथ में ले लेते हैं, पर पूरा एक भी नहीं हो पाता। सारे काम आपस में ही उलझने लगते हैं। समझ नहीं आता कि क्या जरूरी है, क्या नहीं? और फिर काम करने की प्रेरणा ही नहीं बचती। लेखिका ए. एम. होम्स कहती हैं, ‘अपने कामों को आसान बनाएं। छोटे-छोटे कदम बढ़ाएं। एक छोटा काम पूरा करके, दूसरे काम को पूरा करें।’ जिन लोगों में सम्यक् दायित्व की चेतना एवं संतुलित सोच होती है, वे व्यक्ति अनेक अवरोधों के बावजूद ऊपर उठ जाते हैं। आज के साहित्य का एक शब्द है-‘भोगा हुआ यथार्थ’। हमें केवल कल्पना के जीवन में नहीं जीना। सामाजिक परिवेश में बहुत कल्पनाएं उभरती हैं। किन्तु, आप निश्चित मानिए कि कल्पना तब तक अर्थवान नहीं होती जब तक कि ‘भोगे हुए यथार्थ’ पर हम नहीं चल पाते। हमारा जीवन यथार्थ का होना चाहिए।
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी व्यक्ति सामान्य रूप से जीवनयापन कर सकता है। आवश्यकता है मानसिक संतुलन बनाए रखने की। सकारात्मक चिंतन वाला व्यक्ति इन्हीं परिस्थितियों में धैर्य, शांति और सद्भावना से समस्याओं को समाहित कर लेता है। समस्याओं के साथ संतुलन स्थापित करता हुआ ऐसा व्यक्ति जीवन को मधुरता से भर लेता है। सकारात्मक चिंतन के माध्यम से इच्छाशक्ति जागती है। तीव्र इच्छाशक्ति एवं संकल्प से ही व्यक्ति आगे बढ़ता है। रूमी कहते हैं, ‘अपने शब्दों को ऊंचा करें, आवाज को नहीं। फूल बारिश में खिलते हैं, तूफानों में नहीं।
प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच असंतुलन से हमारे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर होता है। हम स्वभाव में आवेग, आवेश, क्रोध, ईष्र्या, द्वेष, घृणा और उदासीनता की वृद्धि होती है। एक के बाद एक कार्य बिगड़ सकते हैं और उस स्थिति में कोई सहायक भी नहीं होता। असहाय बना हुआ व्यक्ति बद से बदतर स्थिति में चला जाता है। आज की युवा पीढ़ी अपने कैरियर को संवारने के लिए संघर्षरत है। इस संघर्ष में जब उन्हें सफलता मिलती है तो वह अपने आपको आनंदित महसूस करती है। उसमें नई ऊर्जा, नई स्फूर्ति का संचार होने लगता है जबकि देखने में आता है कि असफल होने पर युवा मानस जल्दी ही संयम, धैर्य, अनुशासन और विवेक खो देता है। लाइफ कोच एंडी सेटोविट्ज कहती हैं, ‘अनुशासन का मतलब है खुद से पूछना कि मेरे इस समय का सबसे अच्छा इस्तेमाल क्या है? और फिर उसमें जुट जाना। हर दिन थोड़ा आगे बढ़ना ही हमें बड़ी सफलता की ओर ले जाता है।’
प्रतिकूलता और उदासीनता के क्षणों में इन पंक्तियों को बार-बार दोहराये-‘‘कल का दिन किसने देखा, आज के दिन को खोयें क्यों? जिन घड़ियों में हंस सकते हैं उन घड़ियों में रोये क्यों?’’ मुझे सफल होना है, मैं अपनी प्रतिकूलताओं को दूर करने का पुनः प्रयास करूंगा। प्रतिकूल परिस्थितियों के बारे में सोचते रहने से समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। इसे संभव बनाया जा सकता है -किंतु आवश्यकता है मानसिक संतुलन बनाए रखने की, तीव्र इच्छाशक्ति, सकारात्मक और स्वस्थ चिंतन को बनाएं रखने की। मानसिक संतुलन तभी संभव है जब विचारों की उलझन को कम किया जाए, निर्वैचारिकता की स्थिति विकसित की जाए। जब विचारों की निरंतरता कम होगी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में समायोजन कर सकता है।

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