लेखक परिचय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मीणा-आदिवासी परिवार में जन्म। तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष बाल-मजदूर एवं बाल-कृषक। निर्दोष होकर भी 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे। जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! 20 वर्ष 09 माह 05 दिन रेलवे में मजदूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, नक्सलवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म, दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक उत्पीड़न सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्लेषक, टिप्पणीकार, कवि, शायर और शोधार्थी! छोटे बच्चों, वंचित वर्गों और औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (BAAS), राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स एसोसिएशन (JMWA), पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा/जजा संगठनों का अ.भा. परिसंघ, पूर्व अध्यक्ष-अ.भा. भील-मीणा संघर्ष मोर्चा एवं पूर्व प्रकाशक तथा सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)।

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश

(ऐसे 21 सुधार जो भारत को फिर से सोने की चिडि़या बना सकते हैं।)

मेरी छोटी सी पृष्ठभूमि : मैं मीणा जाति और आदिवासी वर्ग का राजस्थान निवासी हूँ। मेरे माता-पिता भारत के मूल निवासी हैं। मेरे पिताजी स्कूल नहीं गये, लेकिन अच्छी तरह से हिन्दी पढना-लिखना जानते हैं। मैं हिन्दुस्तान में जन्मा हूँ। मेरा नामकरण हिन्दू ब्राह्मण द्वारा किया गया। मेरा विवाह हिन्दूरीति से (सप्तपदि) से हिन्दू ब्राह्मण ने करवाया। मैं हिन्दुस्तान में रहता हूँ।

मेरे पिताजी चाय, बीडी, सिगरेट, तम्बाखू, मांस-मदिरा आदि किसी भी नशीले द्रव्य का सेवन नहीं करते और ये सभी बातें मुझे मेरे पिताजी से विरासत में मिली हैं। मेरे पिताजी पर स्वामी दयानन्द सरस्वती का गहरा प्रभाव है। वे जिला स्तर पर आर्यसमाज के कार्यकर्ता/पदाधिकारी रहे हैं, लेकिन सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित पाखण्ड को उजागर करने वाली बातों को सैद्धान्तिक रूप से सही मानते हुए भी, वे व्यावहारिक जीवन में उनका अनुसरण नहीं कर सके हैं और वे आज भी परम्परागत हिन्दू हैं। उन्हें हिन्दू होने पर गर्व है, मुझे भी है। हालाँकि मुझे आज तक नहीं पता कि हिन्दू किसे कहते हैं, लेकिन मेरे पूर्वज स्वयं को हिन्दू मानते है, सो मैं भी हिन्दू हूँ।

मेरे पिजाती शुरू से जनसंघ एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थक रहे हैं। जनसंघ के पक्ष में मतदान करने के लिये लोगों को उत्साहित करने में उन्हें अच्छा लगा करता था, लेकिन पिछले दो-तीन दशक से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी के उतने ही सख्त विरोधी है, जितने सख्त जनसंघ के समर्थक हुआ करते थे। उन्हें इस बात का अत्यन्त दु:ख है कि एक मात्र राजनैतिक दल जनसंघ हिन्दू हित की बात करता था, उसका वर्तमान स्वरूप भाजपा हिन्दू हित के पथ से विचलित हो गया है और इसी प्रकार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपनी मूल विचारधारा को कागजों से आगे नहीं उतार पाया है। इस कारण अनेक बार मेरे पिताजी किसी अन्य दल को वोट तक नहीं देते हैं।

मैंने हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण की है। मैं अंग्रेजी का कतई भी समर्थक नहीं ही हूँ, लेकिन काले अंग्रेजों द्वारा भारत में थोपी गयी अंग्रेजी व्यवस्था में संघर्ष करके अपने आपके अस्तित्व को बचाये रखने के लिये मैं अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढा रहा हँ, लेकिन ईसाई मिशनरीज द्वारा संचालित अंग्रेजी स्कूलों से मुझे नफरत है। इसलिये मेरे बच्चे राष्ट्रीय स्वयंसेवक के कार्यकर्ता द्वारा संचालित एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में, पढ रहे हैं। यद्यपि इस कारण से वे न तो अंग्रेजी ही ठीक से सीख पाये हैं और न हीं हिन्दी ही सीख सके हैं। यह अलग बात है कि मैं स्वयं उन्हें हिन्दी भाषा का व्यवहारिक महत्व समझाता रहता हूँ। यदि वे मिशनरीज के स्कूल में पढे होते तो कम से कम उनकी अंग्रेजी तो अच्छी होती, लेकिन उनके सच्चे भारतीय बने रहने की सम्भावना कम ही रह पाती। यह मेरी छोटी सी पृष्ठभूमि है।

आगे बढने से पूर्व मैं यह भी साफ कर दूँ कि सैद्धान्तिक रूप से मुझे आज तक नहीं पता कि हिन्दू किसे कहते हैं, लेकिन मेरे पूर्वज स्वयं को हिन्दू मानते है, सो मैं भी हिन्दू हूँ। जिन रीति-रिवाजों को जन्म से माना है, जिन संस्कारों को जिया है, उनसे लगाव है। अपनत्व है। भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र है, सो हिन्दू होने में अच्छाई ही अच्छाई दिखती है।

भारत में मेरे जैसे करोडों लोग हैं, जिन्हें हिन्दू होने पर गर्व है और वे हिन्दू ही बने रहना चाहते हैं, लेकिन फिर भी वे हिन्दूवादी संगठनों या राजनैतिक दलों का समर्थन नहीं करते हैं। ऐसे लोग प्रतिदिन लाखों लोगों को अपने जैसे बनाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं। काफी सीमा तक सफल भी हो रहे हैं। हम जैसे लोग भारत में हिन्दूवादी भारतीय जनता पार्टी को जिताकर सत्ता में लाने के लिये निरुत्साहित रहते हैं। जिसकी वजह से भाजपा भारत की सत्ता से दूर ही नहीं बहुत दूर होती जा रही है। इसी कारण से बाबा रामदेव भी भारत की सत्ता पर काबिज होने में सफल होते नहीं दिख रहे हैं।

मैं यह भी मानता हूँ कि हम जैसे लोगों की वजह से हिन्दुत्व की बात करने वाले अपने मकसद में सफल नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे ही लोगों की वजह से भाजपा सत्ता में नहीं आ पा रही है और इसका दूसरा पहलू यह है कि भारत में हिन्दुओं का बहुमत होने के उपरान्त भी तकरीबन 15 प्रतिशत मुस्लिम वोटों के बल पर काँग्रेस सत्ता का सुख भोग रही है और भोगती रहेगी।

हमारी विचारधारा के पोषक लोगों को भारत के अनन्त काल तक हिन्दू बहुल राष्ट्र बने रहने और दिन-प्रतिदिन ताकवर राष्ट्र के रूप में उभरते रहने में तनिक भी सन्देह नहीं है। हम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, शिव सेना, बजरंग दल आदि के वर्तमान उजागर विचारों का अनुसरण करके कभी भी भारत को में हिन्दू राष्ट्र बनते देखने की कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसा क्यों है? इस देश के पचास करोड से अधिक लोगों की ऐसी ही सोच है! लेकिन क्यों? यह सवाल जिस दिन हिन्दूवादी संगठनों की समझ में आ जायेगा, उस दिन भारत, भारतीयों और हिन्दू धर्म की तस्वीर बदल जायेगी! लेकिन सच्चाई यह है कि हिन्दूवाद या हिन्दुत्व की बात करने वाले चाहते ही नहीं कि भारत, भारतीयों और हिन्दू धर्म की तस्वीर बदले। ये सब चाहते हैं कि सभी हिन्दु, हिन्दुत्व को उसी नजरिये से देखें, जैसा उनके द्वारा हजारों सालों से दिखाया जाता रहा है।

अब यह सम्भव नहीं है, क्योंकि अब उन लोगों ने भी सोचने, समझने और बोलने की ताकत के साथ-साथ जमीनी संघर्ष करने की ताकत भी अर्जित कर ली है, जिन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू धर्म के प्रवर्तक तथा संरक्षकों ने इन सबसे हजारों सालों तक वंचित रखा था। सैद्धान्तिक हकीकत कुछ भी हो, लेकिन व्यवहार में देश के अधिकतर लोग वर्तमान में हिन्दुत्व का जो मतलब समझते हैं, वो इस प्रकार है :-

हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ब्राह्मणों द्वारा लिखे गये हैं।

हजारों सालों तक हिन्दू धर्म के ग्रन्थों को पढने-पढाने का अधिकार केवल ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों तक ही सीमित था।

वर्ण-व्‍यवस्था, जातिभेद, छुआछूत, दहेज, सतिप्रथा, स्त्री के साथ भेदभाव इसी हिन्दू धर्म की दैन है।

क्षत्रियों एवं ताकतवर लोगों द्वारा निचली जातियों पर किया गया या किया जा रहा अत्याचार और पुरुष का नारी पर अत्याचार हिन्दू धर्म के संस्कारों तथा ब्राह्मणों के खुले या मूक समर्थन की ही दैन हैं।

हिन्दू धर्मशास्त्रों एवं क्षत्रियों के पुरोहितों ने क्षत्रियों के शराब सेवन को जायज एवं धर्मसंगत घोषित करके क्षत्रियों की बरबादी की नींव रख थी।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में जानबूझकर लिखा गया कि सारे हिन्दू धर्मस्थलों पर केवल ब्राह्मण ही पुजारी होंगे। जहाँ अछूतों को प्रवेश नहीं दिया गया और आज भी नहीं दिया जाता है।

इन एवं ऐसी ही अनेकों बातों को संस्कारों को बचपन से ग्रहण करते हुए हिन्दू का समाजीकरण होता है। जिसमें हिन्दुत्व वही है, जो हिन्दुत्व के प्रवर्तक एवं संरक्षक ब्राह्मण या उनके अनुयाई घोषित करते रहे हैं।

आज भी हिन्दुत्व पर उन्हीं लोगों का कब्जा है, जिनका अनादि काल से कब्जा रहा है। हाँ उन्होंने जानबूझकर हिन्दुत्व को ताकतवर बनाने के नाम पर कुछ ऐसी बातें जरूर अपनी विचारधारा में शामिल कर ली हैं, जिनसे अब हिन्दुत्व के प्रवर्तकों का साथ देने वालों में क्षत्रियों के छोटे से कुलीन वर्ग के साथ-साथ, वैश्य भी शामिल हो गये हैं। कुछ ऐसे लोगों को भी शामिल कर लिया है, जिनको ज्ञात ही नहीं है कि वे किनका समर्थन कर रहे हैं। ऐसे लोग हिन्दुत्व के सम्मोहन या अन्धभक्ति के शिकार हैं! जबकि हकीकत में हिन्दुत्व के प्रवर्तकों की इस नीति से हिन्दुत्व का भला नहीं हो रहा, बल्कि हिन्दुत्व का विनाश हो रहा है। हिन्दुत्व से हिन्दू दूर भाग रहे हैं। जिसके चलते भारत में विदेशी ताकतों का प्रभाव बढ रहा है। इस बात का प्रत्येक सच्चे भारतवासी को दु:ख भी है।

अब यह जानना अत्यन्त जरूरी है कि वर्तमान में हिन्दुत्व के प्रवर्तकों एवं संरक्षकों की हिन्दूवादी नीति क्या हैं, जिनके बल पर वे भारत में हिन्दुत्व एवं हिन्दूवादी सरकार की स्थापना करके, कथित रूप से भारत को मजबूत करने की बातें करते हैं। भारत के पचास करोड़ से अधिक लोगों का मानना है कि हिन्दूवादी चाहते हैं कि-

अजा एवं अजजा वर्गों का शिक्षण संस्थानों, सरकारी सेवाओं तथा विधायिका में आरक्षण समाप्त हो। अन्य पिछडा वर्ग का शिक्षण संस्थानों, सरकारी सेवाओं तथा पंचायत राज व्यवस्था में आरक्षण समाप्त हो। जिसके पीछे इनका तर्क है कि आरक्षण के कारण उच्च बुद्धिमता वाले लोग विदेशों में पलायन कर रहे हैं और निकृष्ट और कम योग्यता वाले लोग लाभ उठा रहे हैं। इसी कारण से देश का विकास नहीं हो रहा है। उनका तर्क है कि केवल बुद्धिमान लोग ही देश का विकास कर सकते हैं और आरक्षित वर्ग के कम योग्यता वाले लोग बुद्धिमान नहीं होते हैं।

हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की आकांक्षा करने वाले हिन्दुवादियों के इस तर्क से देश की करीब 25 प्रतिशत अजा एवं अजजा वर्ग की आबादी एवं 45 प्रतिशत के करीब अन्य पिछडा वर्ग की आबादी कुल 70 प्रतिशत आबादी को निकृष्ट एवं हीन घोषित कर दिया गया है। इन लोगों की नजर में 15 प्रतिशत मुसलमान भी निकृष्ट होने के साथ-साथ देशभक्त भी नहीं हैं। इस प्रकार करीब 85 प्रतिशत आबादी तो तुलनात्मक रूप से कम योग्य और निकृष्ट होने के साथ-साथ इस देश के विकास में और इस देश के बुद्धिमान लोगों के अवसरों को छीनने के लिये जिम्मेदार है और बुद्धिमान लोगों के विदेशों में पलायन करने के लिये जिम्मेदार है।

यहाँ विचारणीय सवाल यह है कि कौन हैं, वे बुद्धिमान लोग जिनके लिये इस देश के 85 प्रतिशत लोगों को लगातार हीन घोषित किया जाता रहा है। स्वाभाविक रूप से हिन्दुत्व एवं हिन्दूवादी सोच के प्रवर्तक एवं समर्थक। जिनका सदा से सभी संसाधनों एवं सत्ता पर कब्जा रहा है। जिनके कारण देश के 70 प्रतिशत लोगों को आरक्षण देने की जरूरत पडी!

वे अभी भी देश को हिन्दुवादी बनाने और राष्ट्रवादी बनाने के नाम पर फिर से सभी संसाधनों एवं सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। इस सोच के उपरान्त भी सभी हिन्दूओं ये समर्थन हासिल करने की आकांक्षा करना कहाँ तक न्यायसंगत है? यहाँ बडी चालाकी से मुसलमानों का भय दिखाकर, धारा 370 को हटाने, राम मन्दिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता का असंवैधानिक राग अलाप कर, निकृष्ट घोषित 70 प्रतिशत हिन्दुओं को भी हिन्दूवादी सोच के राजनैतिक दल भाजपा का समर्थन करने का अविवेकपूर्ण हथियार आजमाया जाता है। जो कभी भी सफल नहीं हो सकता है।

यदि हिन्दूवादी सोच के लोग वास्तव में ईमानदार और देशभक्त होने के साथ-साथ, यदि सच्चे समतावादी हैं तो देश के 70 प्रतिशत हिन्दुओं का विकास करने वाला हिन्दुत्व कायम करने की बात करें। जिसके लिये हिन्दु धर्म की रक्षा करने के नाम पर काम करने वालों को अपने ऐजेण्डे में कुछ ही बातें बदलनी होंगी। देखते हैं भारत में हिन्दूवादी सरकार कायम होती है या नहीं? ऐसा करने के बाद भारत के 50 करोड से अधिक लोग आपके साथ होंगे।

आपको केवल इतना सा करना है-

1. हिन्दू धर्म सभा का गठन : राष्ट्रीय स्तर से गाँव स्तर तक हिन्दू धर्म सभा का गठन किया जावे, जिसमें सभी हिन्दू जातियों का जनंसख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व हो। हिन्दू धर्म सभा की सिफारिशों पर भारत की संसद विचार करने के लिये संवैधानिक रूप से बाध्य हो। हिन्दू धर्म सभा द्वारा धर्मस्थलों के पुजारी नियुक्त किये जावे। प्रारम्भिक 50 वर्ष के लिये ब्राह्मण, वैश्य एवं क्षत्रिय वर्ग का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं हो। जिससे जन्मजातीय श्रेष्ठता एवं भू-देव जैसी मानसिक विकृतियाँ स्वत: समाप्त हो सकें। धार्मिक मामलो में हिन्दू धर्म सभा को निर्णय करने का अधिकार हो, जिसकी उच्च स्तरीय धर्म सभा में तीन स्तर तक अपील करने का भी प्रावधान हो।

2. सत्ता में आने पर दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले माता-पिता की एवं पूर्व पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने वाले नागरिकों की सम्पूर्ण सम्पत्ति छीनकर ऐसे लोगों को देशद्रोही घोषित करके बिना मुकदमा चलाये, केवल प्राथमिक स्तर पर प्रमाणीकरण के बाद ही कम से कम 10 वर्ष के लिये जेल में डाल दिया जावे और ऐसे माता पिता के बच्चों का लालन-पालन एवं पढाई की सम्पूर्ण व्यवस्था सरकार द्वारा की जावे।

3. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि धर्म के अधार पर विवाह विच्छेद या तलाक मान्य नहीं होगा और कोर्ट द्वारा विवाह विच्छेद या तलाक घोषित होने के बाद पत्नी के भरणपोषण की वर्तमान विभेदकारी व्यवस्था समाप्त की जावे और विवाह विच्छेद या तलाक की सूरत में परिवार की सम्पत्ति में से सभी की हिस्सेदारी के लिये न्यायसंगत व्यवस्था लागू की जावे, जो सभी धर्म के अनुयाईयों पर लागू हो।

4. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि भारत में राजकाज के सम्पूर्ण कार्य हिन्दी एवं स्थानीय/क्षेत्रीय भाषाओं में किये जाने का प्रावधान किया जावे। कार्यपालिका, संसद एवं सर्वोच्च न्यायालय की भाषा केवल हिन्दी हो। अंग्रेजी में सरकारी काम काज पर पाबन्दी हो। विदेशों में होने वाले शोध का तत्कान हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करवाने के लिये हर तरह के तकनीकी साधनों से सम्पन्न एवं योग्यतम अनुवादकों की व्यवस्था हो। भारत में बिकने वाले किसी भी उत्पाद का विवरण अंग्रेजी में देना अपराध हो।

5. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि सार्वजनिक रूप से मांस एवं शराब की विक्री पर पूर्ण प्रतिबन्ध हो और सार्वजनिक रूप से शराब पीना अजमानतीय-अपराध घोषित किया जावे।

6. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि उच्चतर माध्यमिक स्तर (12) तक सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी शिक्षण संस्थानों में सम्पूर्ण रूप से मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था हो। जिसका खर्चा सरकार वहन करे। इसके साथ-साथ सरकारी एवं गैर-सरकारी सभी शिक्षण संस्थानों में एक समान पाठ्यक्रम और राष्ट्रीयता भाव जगाने वाली विद्यार्थियों की एक जैसी ही वेशभूषा हो, जिससे किसी भी विद्यार्थी को विशेष परिस्थितियों में किसी भी अन्य विद्यालय में प्रवेश लेने में कोई परेशानी नहीं हो।

7. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले सभी समाजों के मेधावी बच्चों को उच्चतम स्तर तक पढाई करने के लिये सरकारी द्वारा खर्चा वहन करने की पुख्ता व्यवस्था हो।

8. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि चुनावों की भ्रष्ट दलीय व्यवस्था समाप्त की जावे और स्वतन्त्र रूप से चुनाव लडने वाले उन प्रत्याशियों को, जो कम से कम पचास प्रतिशत वोट प्राप्त करने पर ही निर्वाचित घोषित किया जावे। चुनाव पाँच वर्ष के लिये हों, बीच में विधानसभा या लोकसभा भंग नहीं हो। राज्यसभा तत्काल समाप्त की जावे। मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री का चुनाव सदन में बहुमत के आधार पर किया जावे। दलबदल (विचारधारा/नेता बदलने) को पूर्ण मान्यता हो। कोई भी व्यक्ति अधिकतम तीन कार्यकाल तक ही विधायक या सांसद रह सके। कोई भी विधायक या सांसद अधिकतम दो कार्यकाल के लिये मंन्त्री या मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री रह सके। विधायिका के जिये यह जरूरी हो कि किसी भी प्रकार का कानून अपने कुल सदस्यों के बहुत से पारित किया जावे, न कि उपस्थित सदस्यों के बहुत से।

9. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि किसी भी न्यायाधीश को या भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी को 10 वर्ष की सेवा करने के बाद नौकरी छोडकर या सेवानिवृत्ति प्राप्त करने के बाद कम से कम 20 वर्ष तक सरकारी लाभ के पद पर पदस्थ होने या चुनाव लडने का अधिकार नहीं होगा।

10. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि देश की जनगणना जाति एवं धर्म के आधार पर की जावे, जिससे सभी जातियों एवं सभी धमों के बारे में भ्रम दूर हो सकें और कमजोर, गरीबी रेखा से नीचे और आरक्षित वर्ग की जनसंख्या के अनुसार उनके विकास के साधन उपलब्ध करवाये जा सकें।

11. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि छुआछूत करने वाले को कम से कम १० वर्ष की सजा का प्रावधान हो और मामले का निर्णय होने तक दोषी को किसी भी सूरत में जमानत नहीं दी जावे एवं मामले को निर्णय तीन माह में करने की बाध्यता हो।

12. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि लोक सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार किये जाने पर, मिलावट करने पर या किसी भी प्रकार का मानव को क्षतिकारी उत्पाद बनाने या बेचने पर, कम से कम 20 वर्ष की सजा का प्रावधान हो और मामले का निर्णय होने तक दोषी को किसी भी सूरत में जमानत नहीं दी जावे एवं मामले को निर्णय हर हाल में तीन माह में करने की बाध्यता हो।

13. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि संविधान में वर्णित मूल अधिकारों का विरोध करने वाले और किसी भी प्रकार के विभेद को बढावा देने वाले मनुस्मृति जैसे सभी धर्मग्रन्थों से असंगत एवं असंवैधानिक हिस्सों को स्वयं हिन्दुओं द्वारा एक वर्ष के अन्दर-अन्दर हटाकर फिर से सभी को अधिकृत हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित किया जावे। जिसका खर्चा भारत सरकार के खजाने से वहन किया जावे। असंगत विवरण वाले पूर्व प्रकाशित धर्मग्रन्थों को निर्धारित समय अवधि में स्वयं ही जलाने का आदेश हो और निर्धारित अवधि के बाद ऐसे धर्मग्रन्थों को रखने वालों के विरुद्ध सख्त दण्डात्मक कार्यवाही की जावे।

14. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि हर वर्ग की महिलाओं को उनके अपने-अपने वर्ग में विधायिका में, शिक्षण संस्थानों में एवं सभी स्तर की सरकारी सेवाओं में संविधान के तहत पचास फीसदी आरक्षण दिया जाना सुनिश्चत किया जावे।

15. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि आतंकवाद में लिप्त अपराधियों एवं आतंकवाद को समर्थन देने लोगों को कम से कम उम्रकैद एवं अधिकतम फांसी का सजा का प्रावधान हो और किसी भी सूरत में आतंकवाद से जुडे मामलों में एक वर्ष के अन्दर-अन्दर निर्णय का क्रियान्वयन हो जाना चाहिये। आतंकवादियों के मामलों में राष्ट्रपति या राज्यपालों को प्रदत्त क्षमा आचना की शक्तियों को समाप्त किया जावे।

16. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि हजारों वर्षों से शोषित अजा एवं अजजा वर्ग के लोगों को सभी स्तर की सरकारी सेवाओं, शिक्षण संस्थाओं और विधायिका में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित किया जावे।

17. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि अन्य पिछडा वर्ग के लोगों को सभी स्तर की सरकारी सेवाओं, शिक्षण संस्थाओं और विधायिका में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित किया जावे।

18. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने से पूर्व सरकार की मंजूरी जरूरी नहीं हो।

19. सत्ता में आने पर लोगों को तुरन्त न्याय दिलाने हेतु प्रावधान किया जायेगा कि न्यायाधीशों की संख्या में 25 प्रतिशत बढोतरी की जावे।

20. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि भ्रष्ट या अनैतिक कार्यों में लिप्त न्यायाधीशों जन प्रतिनिधियों, मंत्रियों आदि सभी को भी आम लोक सेवकों की भांति कानूनी कार्यवाही का सामना करना होगा।

21. किसी भी लोक सेवक को उसके विभाग की ओर से किसी भी प्रकार की सेवा या सुविधा मुफ्त में नहीं दी जायेगी। जिससे देश के बजट पर भार नहीं पडे और आम नागरिक के लिये सुविधाएँ मंहगी नहीं हों।

यदि हिन्दूवादी या राष्ट्रवादी इन कुछेक सुधारों को करने को सहमत हों तो न मात्र इस देश में हिन्दुत्व कायम होगा, अपितु भारत फिर से सोने की चिड़िया का सम्मान हासिल कर सकेगा और भारत को दांत दिखाने से पूर्व कोई भी दस बार सोचेगा। हाँ यदि हिन्दूवादी केवल 15 प्रतिशत उच्च जातीय आबादी के हितों को ही राष्ट्रीय हित मानते हैं तो फिर इस देश में कभी भी वो नहीं हो सकता, जो हिन्दूवादी चाहते हैं।

40 Responses to “हिन्दू क्यों नहीं चाहते, हिन्दूवादी सरकार!”

  1. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    अच्छा लेख है………. हिन्दू धर्म और हिन्दू तो सदा ही सुधारवादी रहे हैं और समयानुसार बदलते रहे हैं और आगे भी बदलते ही रहेगे…. इतने हमलो के बावजूद अगर ये धर्म आज तक न सिर्फ जीवित है बल्कि लगातार आगे बढ़ता जा रहा है तो इसके लिए हिन्दुत्व की समयानुसार बदलाव वाली खासियत ही । है

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  2. dr.o.p.billore

    प्रारंभ में लेख विचारोत्तेजक लगा । खूब चाव से पढ़ा । किन्तु उत्तरोत्तर लेख में विचारों की गहनता उथली होती गई ,और मन की भड़ास निकलती दिखने लगी । लेखक का पूर्ण रूप से निष्पक्ष और कमाना रहित होना आवश्यक है । मन की चाहतों के सम्पुट ने लेख की महत्ता को कम किया है । आदि आदि । —

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    मीणा जी नमस्कार। एक मित्र के रूपमें कुछ सुझाव।
    (१) आप जो भी मत प्रस्थापित करना चाहे, उसके लिए तर्क दीजिए। तर्क सभी को समझना पडता है।
    (२) आरोपों के आधार पर,पूर्वाग्रहोंके आधारपर, लेख गढने पर वह वाद विवाद खडा करेगा।
    (३) व्यक्तिगत मत, आपको अपने जीवन में आचरण करने की स्वतंत्रता देता है। उदाहरणार्थ: मेरी माता जी का आदर मैं करुं, तो किसीको तर्क देने की आवश्यकता नहीं है।पर आप सभी मेरी माता जी का आदर करें, यह अपेक्षा करुं, तो मुझे तर्क देना होगा।
    संक्षेप में:
    तर्क आपको सर्व ग्राह्य बनाता है। आपका मत आपको अपने जीवन में आचार स्वातंत्र्य देता है।
    (४) जिस समाजको सुधारना चाहते हैं, उसकी शत्रुता को जगाया ना करें। (वह वाम वाद का रास्ता है)
    सुधार तो हम भी चाहते हैं, पर एक हित चिंतक, मित्र के नाते। इस लिए मैं संवाद में विश्वास करता हूं। कहीं सच्चाई दिखाई दे, तो स्वीकार करने में पीछे नहीं हटूंगा। मत बदल भी सकता हूं।
    (५) वादी और विवादी दो दृष्टियां होती है। दोनों दृष्टियों से देखते देखते बीच में “संवाद” की अवस्था होती है। जैसे, एक घन को(क्यूब को) छः दिशाएं होती है। इस लिए, षट्दर्शन (६ दृष्टियां) से बारी बारी देखने का तरिका मान कर, जब देखा जाता है, तब सच्चाई को पाने की संभावना बढ जाती है। जिसे सम्यक दृष्टि कहा जा सकता है। वह भी संभावना ही पैदा करती है,अधिक नहीं।
    (६) आपके और हमारे पूरखें ऐसा वाद-विवाद करते थे, सच्चाई को ढूंढने के लिए। हारने-जीतने के लिए नहीं। तब शंकराचार्य और मंडन मिश्र भी दोनो को पाप्ति होती थी, सच्चाइ की। इस लिए किसकी जीत, किसकी हार? किसी की नहीं। जीत होती थी सभीकी(सच्चाई की)। इसी लिए कहा गया था।॥वादे वादे जायते शास्त्र बोधः॥
    वाद विवाद से सच्चाई निकले। तभी आपका परिश्रम सही ठहरेगा।
    (७) वाम वादियों के नाटक से उपर उठे बिना सच्चाई ही प्राप्त नहीं हो सकती। देश आप, मैं, इत्यादि सबसे बडा है। हम हारे, और देश जीता तो हम जीत ही गए। वास्तविक हारे हुए को भी बुरा ना लगे ऐसे शब्दों का प्रयोग सोचकर किया जाए।
    कुछ समय मिला, तो उसका उपयोग हो गया।
    धन्यवाद।

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  4. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    डा मीना जी मुझे आपसे सादर निवेदन करना है कि—
    – आपके अनेक बार आग्रह करने पर भी आपका यह लेख पढने का मन इस लिए न बना कि मुझे लगा कि आपके अन्य लेखों की तरह इसमें भी तर्क कम और पूर्वाग्रह, दूसरों की बात को न समझाने की प्रवृत्ति होगी. किन्तु इस लेख को पढ़ कर आपकी सदइच्छा पर श्रधा होती है.
    – आदरणीय मित्रवर सत्य तक पहुँचाने का श्रेष्ठ उपाय हमारे विचारकों ने संवाद को माना है. अतः पूर्वाग्रह रहित संवाद जारी रहना चाहिए.
    – जिस विषय के पक्ष या विपक्ष में हम लिख-बोल रहे हैं, उसका ठीक से अध्ययन हमें करने का प्रयास करना चाहिए.
    – आपने इमानदारी से स्वीकार किया है की आप नहीं जानते की हिन्दू धर्म क्या है या अप हिन्दू क्यूँ हैं. मित्रवर आप हिन्दू समाज की कितनी भी आलोचना करें पर उसके पक्ष-विपक्ष को ठीक से जानने का प्रयास तो करें. बस अभी इतना ही निवेदन शेष अगली बार.
    सादर आपका शुभेच्छु.

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    • ललित किशोर शर्मा

      आदरणीय ,
      निसंदेह यही बात मीणा जी से मुझे कहनी है कि जिस तरह वो आरक्षण समर्थन पूर्वाग्रह और अपने आप को इतना हिन्दुत्व ग्रन्थो के अध्ययन करने वाला बताने के बाद भी ब्राह्मण विरोधी नाद करने को चेष्टारत है उनसे मै सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि अगर आपने इस प्रश्न के बजाय कि ” अन्यो को वंचित करा गया , तथाकथित अत्याचार किया गया ”

      आप इस प्रश्न पर अपने मस्तिष्क की नसो को बल देते कि “ऐसा क्यू किया गया ” ||

      आपको सवाल का जवाब समझ आ जाता |

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  5. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    आपके सुझाव महान और प्रेरणादायी हैं………..जनपक्षधरता की झलक बखूबी मिलती है इनमें….

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  6. Dr.Dhanakar Thakur, MBBS,MD(Gen Med), DCH

    श्री मीना ने बड़ी नम्रता से अपनी बात रखी है. श्रीमती सिंह की भी टिप्पणी अच्छी लगी खास्कर्की वे अब अपने विवाह्जन्य तन्द्रतासे उठ लिखेंगी क्या अच्छा हो कि उनकी जैसी महिला सार्वजनिक जीवनमे आगे आवें.

    मैं समझता हूँ की ऐसे विचारकों को हिन्दुओ के भीतर जाट-पट के पचरे में पड़ना नहीं चाहिए इसलिए नहीं कि एक ब्राह्मन होने के कारण मुझे कोई विशेषधिकार मिला है बल्कि इसलिए कि अब ये बातें बेमानी हो गयी हैं

    आनंद कुमारस्‍वामी ने लिखा था कि केवल जतिभान के कारण ही भारत में पूर्ण इस्लामीकरण रुक गया अन्यथा यह मल्यसिया जैसा हो गया रहता

    मुझे लगता है कि मुस्लिम आक्रमण के समय कम उम्र में विवाह का पैमाना जाति या वंश ही हो सकता था और जिस भाग में यह ढीला रहा वा जिस भाग में बौद्ध दर्शन का प्रभाव हुआ वहां इस्लामीकरण ज्यादा हुआ और यह भारत के बहार भी चेच्या अदि के झंझटों का कारन है

    यदि कोई ब्राह्मण शायद अपने कर्म और अध्ययन में लगा रहे तो उसे कोई भी सम्मान देगा ही

    प्रश्न यह नहीं है कि उन्हें सम्मान दिया जाय बल्कि यह कि वे अधिक संस्कारवान बने

    और आज जबकि उनका ठीक से शिक्षित लड़का खुद ही पूजा-पाट से भागता हो तो उनके लिए आपका सुझाव किस काम का।

    मेरे पिता पंडित वैद्य थे और मैं एमबीबीएस, एमडी, डी सी एच हूँ

    पिता के चाहने पर भी कोई बेटा आयुर्वेद नहीं पढ़ा

    बांकी तीनो ऍम अस की इई अप दी रासयांशास्त्रके हैं और सभी को संस्कृत से प्रेम है

    बस इतना ही – २४ को मैंने संस्कृत दिवसमे ८ मिनुत संस्कृतमे भाषण दिया

    मैंने रुस्सियन, फ्रेंच, कन्नडा भी सीखी है जबकि मेरे पुस्तक neuroscience पर हैं

    मेरा गोत्र कौशिक है जो एक ब्रह्मर्षि बने थे

    यदि वस्तुतः समाज का सबका विकास आद्य्त्मिक होना हो तो सबको ब्राह्मन बनाना होगा उनके जैसा आचरण करना होगा सत्ता से दूर रहना होगा- मुझे भी RSS ने मेरे अपने द्वारा बनाए मेडिकल संगठन से बिना कुछ बताये हटा दिया पर इसके चलते मेरा हिन्दित्वा व राष्ट्रियात्वा से अलगाव नहीं हो जता

    यदि हिन्दू समाज में ८५ % की स्थिति खर्राब है तो वह मुसलमान व इसी व दूसरे धर्मों में अच्छी नहीं है की आप वंहा जाकर अच्छा अनुबव करेंगे

    समाज में सुधार एक क्रमिक प्रक्रिया ही

    हिन्दुधर्म अनेक जमन और वर्ण आश्रम को मानता है इसलिए कैको खराबी लगाती है

    पर इस्लाम में औरतों के साथ क्या व्यव्हार है यह सामने है

    हिन्दू विरोधियों के प्रचार में पर आत्मघाती कार्य मत कीजिये

    कितनो ने मनुस्मृति के अनुसार जीवन जोया है

    वंहा कुछ ख़राब तो बहुत अच्छी भी बात होगी

    मैंने नहीं पढ़ा

    इसकी अब जरुरत भी नहीं है

    ब्राह्मन का ब्रह्माणी से उत्पन्न संतान ब्राह्मन होता पर कोण ब्राह्मण राम को भगवन नहीं मनाता व कृष्ण को

    व आधुनिक विवेकानंद के सामने सर नहीं झुकाता जिनकी जाती सबको मालूम है सूर, कबित की बात छोड़ें

    1. हिन्दू धर्म सभा का गठन : जररू हो पर सभी हिन्दू जातियों का जनंसख्या के अनुपात से समाज नहीं चलता- उन्हें धर्म का जानकर होना चाहिए और अक सही हिन्दू किसी भी जाती का किसी की उपेक्षा नहीं करेगा

    2. हिन्दू ko दो से अधिक बच्चे पैदा करना चाहिए- ब्रिथ्स प्रधानमत्री कैमरून के चौथे बच्चे पर खुशी हुई है

    बेन्क्सीरने प्रधानमत्री होते हुए बछा जाना था

    पूर्व पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह हिन्दू तो कर ही नहीं सकता..

    3. हिन्दू का किसी अधार पर विवाह विच्छेद या तलाक मान्य नहीं होना चाहिए- मेरी पत्नीने गलत बयानबाजी से मुकदमा जीता था मेरे हाई कोर्ट में अप्पील के बीच ही उन्होंने शादी किसी से कर ली

    4. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि भारत में राजकाज के सम्पूर्ण कार्य स्थानीय/क्षेत्रीय भाषाओं में हो हिन्दी में हिंदुत्वा स्थानीय/क्षेत्रीय भाषाओं में हिनुदुत्वा है और सरल संस्कृत में काया हो सकता है जो सभी को मान्य होगा

    भारत में बिकने वाले किसी भी उत्पाद का विवरण अंग्रेजी में देना अपराध हो ऐसा भी नहीं संभव है

    5. सार्वजनिक रूप से शराब की विक्री पर पूर्ण प्रतिबन्ध हो और सार्वजनिक रूप से शराब पीना अजमानतीय-अपराध घोषित किया जावे। मांस पर यह नहीं कहा जा सकता वैसे मई शाकाहारी हूँ

    6. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि उच्चतर माध्यमिक स्तर (12) तक सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी शिक्षण संस्थानों में सम्पूर्ण रूप से मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था हो। जिसका खर्चा सरकार वहन करे। इसके साथ-साथ सरकारी एवं गैर-सरकारी सभी शिक्षण संस्थानों में एक समान पाठ्यक्रम और राष्ट्रीयता भाव जगाने वाली विद्यार्थियों की एक जैसी ही वेशभूषा हो, जिससे किसी भी विद्यार्थी को विशेष परिस्थितियों में किसी भी अन्य विद्यालय में प्रवेश लेने में कोई परेशानी नहीं हो।- वैसे निजी स्चूलको भी रेगुलेट किया जा सकता है

    7. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले सभी समाजों के मेधावी बच्चों को उच्चतम स्तर तक पढाई करने के लिये सरकारी द्वारा खर्चा वहन करने की पुख्ता व्यवस्था हो।

    8. विचार अच्छा है की सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि चुनावों की भ्रष्ट दलीय व्यवस्था समाप्त की जावे और स्वतन्त्र रूप से चुनाव लडने वाले उन प्रत्याशियों को, जो कम से कम पचास प्रतिशत वोट प्राप्त करने पर ही निर्वाचित घोषित किया जावे। चुनाव पाँच वर्ष के लिये हों, बीच में विधानसभा या लोकसभा भंग नहीं हो। राज्यसभा तत्काल समाप्त की जावे। मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री का चुनाव सदन में बहुमत के आधार पर किया जावे। दलबदल (विचारधारा/नेता बदलने) को पूर्ण मान्यता हो। कोई भी व्यक्ति अधिकतम तीन कार्यकाल तक ही विधायक या सांसद रह सके। कोई भी विधायक या सांसद अधिकतम दो कार्यकाल के लिये मंन्त्री या मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री रह सके। विधायिका के जिये यह जरूरी हो कि किसी भी प्रकार का कानून अपने कुल सदस्यों के बहुत से पारित किया जावे, न कि उपस्थित सदस्यों के बहुत से।

    9. गलत है- सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि किसी भी न्यायाधीश को या भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी को नौकरी छोडकर चुनाव लडने का अधिकार होगा -हरने पर फिर नौकरी में जा सके – अच्छे लोग राजनीती में जाने चाहिए ।

    10. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि देश की जनगणना कमजोर, गरीबी रेखा से नीचे जनसंख्या के अनुसार हो जाती पर नहीं

    11. अब छुआछूत कौन करता? होताल्मे सब खाते हैं

    अरक्शंके सरे प्रावधान ख़त्म हो- मीरा कुमार की संतान को लाभ मिल रहा है जिसका प् एक ब्राह्मन है..

    12. भ्रष्टाचार ? रोकने के बहुत उपाय है- सभी गज़ेत्तेद ऑफिस को अधिकार दे गलत को सुस्पेंद करने

    13. मनुस्मृति आदिके झमेले से अलग रहे-

    14. कोई आरक्षण किसीको भी कमजोर और अत्म्सम्मान्हीन बनाएगा

    15. आतंकवादियों के मामलों में राष्ट्रपति या राज्यपालों को प्रदत्त क्षमा आचना की शक्तियों को समाप्त किया जावे।

    १६-17. आरक्षण बंद किया जावे।

    18. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने से पूर्व सरकार की मंजूरी जरूरी नहीं हो।

    19. सत्ता में आने पर लोगों को तुरन्त न्याय दिलाने हेतु झूटे मुकदमे कर्नेबलों को बराबर सजा तुरंत हो -न्यायाधीशों की संख्या से नहीं होगा कम

    20. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि भ्रष्ट या अनैतिक कार्यों में लिप्त न्यायाधीशों जन प्रतिनिधियों, मंत्रियों आदि सभी को भी आम लोक सेवकों की भांति कानूनी कार्यवाही का सामना करना होगा।

    21. किसी भी लोक सेवक को उसके विभाग की ओर से किसी भी प्रकार की सेवा या सुविधा मुफ्त में नहीं दी जायेगी। जिससे देश के बजट पर भार नहीं पडे और आम नागरिक के लिये सुविधाएँ मंहगी नहीं हों।

    हिन्दूवादी में उच्च निम्न का जातीय रखना , हिन्दूवादी का लक्षण नहीं ।

    डॉ धनाकर ठाकुर

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  7. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय श्री भगत सिंह जी,

    आपकी रोमन हिन्दी में लिखी टिप्पणी को जितना मैं समझ सका हूँ, उसके अनुसार मुझे ऐसा लगता है कि आपने प्रस्तुत लेख को या तो जल्दबाजी में पढा है या फिर अन्य कोई बात है। अन्यथा आप इस प्रकार की टिप्पणी कैसे दे सकते हैं?

    आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया इस लेख को फिर से पढने का कष्ट करें। मैं आपसे पुन: पढने का आग्रह मात्र कर रहा हूँ। आगे आपकी इच्छा।

    लेख का एक परिच्छेद (पेरा) मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

    ++++++++++++++++++++++
    “”यदि हिन्दूवादी सोच के लोग वास्तव में ईमानदार और देशभक्त होने के साथ-साथ, यदि सच्चे समतावादी हैं तो देश के 70 प्रतिशत हिन्दुओं का विकास करने वाला हिन्दुत्व कायम करने की बात करें। जिसके लिये हिन्दु धर्म की रक्षा करने के नाम पर काम करने वालों को अपने ऐजेण्डे में कुछ ही बातें बदलनी होंगी। देखते हैं भारत में हिन्दूवादी सरकार कायम होती है या नहीं? ऐसा करने के बाद भारत के 50 करोड से अधिक लोग आपके साथ होंगे।
    आपको केवल इतना सा करना है-“”
    ++++++++++++++++++++++

    इसे सामने रखकर आप अपनी टिप्पणी को पढने का कष्ट करें और अपने आपसे सवाल करें, कि आपकी टिप्पणी कितनी प्रासंगिक है?

    धन्यवाद।

    Reply
  8. bhagat singh

    kamal ka lekh hain.samsya yahi hain ki ise yadi aaj lagu kar diya jaye to puri BJP saf ho jayegi.aur aadhe jail chale jayenge.jab aapne mishnari schoolo me padhna deshdroh mana uske pahle mahan dshbhakt shri lal krihna adwani ji vahi padh rahe tahe,jara pata lagaiyrega ki kitne BJP ke nta isi mishnari se padhe hain.aapki hindu rajya me mualmano aur isaiyo kakaya hoga ye to likha hi nahi.shayad ye likhne ki bat nahi gujrat jiasi karne ki bat hain.
    kaya aapne kisi anya dharmik desh ki yatra ki hain nahi to kisi islamik desh jaiyiye,vaha pata chlega ki dharmik desh me kaya hota hain.mahan hindu rashtra nepal ab vapas secular ho gaya hain aap kis sapne me rah rahe hain.thoda bahar aaiye aur dekhe hamara desh is padav ko bahut pahle hi piche chod chuka hain.aazadi ke samai hindu mahasabha thi use ginne laik bhi vote nahi mile the.desh ne milkar hi tai kiya tha ki hamara desh hindu ya muslimvadi nahi balki dharmnirpech hoga.
    aur chalte chalte yah bh bata de ki us samai thakyhit RSS andolan me nahi balki logo ko bantne me lagi thi,aap aadiwasiyo ki bat bhi kar le jin rajyo me aapke hindu vadi satta me hain vaha aadiwasiyo ki jamine aur sansadhan chin kar unhe marne ko chod diya gaya hain.unhe ya to naxal mar rahe hain ya aapki hindu samrat mukhymantriyo ki police aur senaye.aap hinduo kimmala japte rahe jab tak hamare yaha aadiwasi ajabgharo me rane laik rah jayenge.
    jo jahar dharm ke nam par aap ur aap jaise sanghtan faila rahe hain yahi desh ki ekta khatam kar raha hain.

    Reply
    • Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

      आदरणीय श्री भगत सिंह जी,

      आपने इस लेख पर टिप्पणी की, इसके लिये मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ।

      किसी वजह से हिन्दी में नहीं लिख पाने के कारण बहुत से अन्य लोगों की भांति आप भी रोमन हिन्दी में लिख रहे हैं।

      शायद आपको ज्ञात नहीं कि आपके लिखे को क्या पढा जा रहा है? आपने जो लिखा है, वह हिन्दी में क्या पढा जा रहा है, इसे नेट उप उपलब्ध ट्राँसलेटर के जरिये नीचे ट्राँसलेट करके प्रस्तुत कर रहा हूँ।
      ——————
      कमल का लेख हैं.सम्स्य यहि हैं कि इसे यदि आज लगु कर दिया जये तो पुरि ब्ज्प सफ हो जयेगि. और आधे जैल चले जयेंगे. जब आप्ने मिश्नरि स्चूलो मे पध्ना देश्द्रोह मना उस्के पह्ले महन द्श्भक्त श्रि लल क्रिह्ना अद्वनि जि वहि पध रहे तहे,जरा पता लगैय्रेगा कि कित्ने ब्ज्प के न्ता इसि मिश्नरि से पधे हैं. आप्कि हिंदु रज्य मे मुअल्मनो और इसैयो ककया होगा ये तो लिखा हि नहि.शयद ये लिख्ने कि बत नहि गुज्रत जिअसि कर्ने कि बत हैं.
      कया आप्ने किसि अन्य धर्मिक देश कि यत्र कि हैं नहि तो किसि इस्लमिक देश जैयिये, वहा पता च्लेगा कि धर्मिक देश मे कया होता हैं. महन हिंदु रश्त्र नेपल अब वपस सेकुलर हो गया हैं आप किस सप्ने मे रह रहे हैं. थोदा बहर आइये और देखे हमरा देश इस पदव को बहुत पह्ले हि पिचे चोद चुका हैं. आज़दि के समै हिंदु महसभा थि उसे गिन्ने लैक भि वोते नहि मिले थे. देश ने मिल्कर हि तै किया था कि हमरा देश हिंदु या मुस्लिम्वदि नहि बल्कि धर्म्निर्पेच होगा.
      और चल्ते चल्ते यह भ बता दे कि उस समै थक्य्हित ऋसस अंदोलन मे नहि बल्कि लोगो को बंत्ने मे लगि थि, आप आदिवसियो कि बत भि कर ले जिन रज्यो मे आप्के हिंदु वदि सत्ता मे हैं वहा आदिवसियो कि जमिने और संसधन चिन कर उन्हे मर्ने को चोद दिया गया हैं. उन्हे या तो नक्सल मर रहे हैं या आप्कि हिंदु सम्रत मुख्य्मंत्रियो कि पोलिके और सेनये. आप हिंदुओ किम्मला जप्ते रहे जब तक हमरे यहा आदिवसि अजब्घरो मे रने लैक रह जयेंगे.
      जो जहर धर्म के नम पर आप उर आप जैसे संघ्तन फैला रहे हैं यहि देश कि एक्ता खतम कर रहा हैं.
      ——————

      इसे आप एक बार पढके देखेंगे तो पायेंगे कि आपका लिखना कितना सार्थक है और आपकी लिखी टिप्पणी को पाठकों द्वारा कितना समझा जा सकता है?

      हो सके तो हिन्दी में लिखें, इसके लिये बहुत सारे टूल्स उपलब्ध हैं।

      धन्यवाद।

      Reply
  9. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय डॉ. मधुसूदन जी,

    इस लेख पर विद्वता से परिपूर्ण प्रारम्भिक भूमिका के साथ, बिन्दुबार टिप्पणी देने के लिये आपका आभार।

    मुझे बिन्दु 6 पर आप जैसे चिन्तक और विचारवान व्यक्ति का कोई मत प्रकट नहीं करना और इसी प्रकार बिन्दु 5 पर दूसरों के सम्भाव्य विचारों को सामने रखकर अपने विचार सामने नहीं लाना, मुझे सामान्य नहीं लग रहा है।

    चूँकि किसी को भी किसी भी या हर एक विषय पर विचार रखने के लिये बाध्य करने की कोई बाध्यता या नीति नहीं है, सो आपके विचार प्रकट नहीं करने के अधिकार को संरक्षण भी जरूरी है। जिसका मैं पूरी तरह से समर्थन करता हूँ।

    हमारे संविधान के अनुच्छेद 19 में किसी को भी अपना मत नहीं देने या विचार प्रकट नहीं करने का भी नकारात्मक मूल अधिकार प्रदान किया गया है, जिसे अनुच्छेद 32 एवं 226 में संवैधानिक संरक्षण की गारण्टी भी दी गयी है। इसके उपरान्त भी कुछ लोग आवेश या भावावेश में हर किसी को, हर किसी विषय पर विचार या मन्तव्य बतलाने के लिये अशिष्टतापूर्वक चिंघाड़ते हुए चनौती देते देखे जा सकते हैं!

    इतना सब लिखने के उपरान्त भी मैं आपसे यह निवेदन करने का अधिकार तो रखता ही हूँ कि कृपया उक्त दोनों विषयों पर पुनर्विचार करें। हो सकता है कि इन दोनों विषयों पर आपके विचार आगे के लिये मार्गदर्शक आधार सिद्ध हो सकें।

    बिन्दु आठ में दलीय आधार पर चुनावों की व्यवस्था को समाप्त करने का विचार प्रस्तुत किया गया है। यदि मैं इसे स्पष्ट नहीं कर सका तो यह मेरा लेखन दोष समझा जाना चाहिये। कृपया इस बिन्दु को फिर से पढने का कष्ट करें।

    आलेख पर ईमानदारी से और आपके सर्वविदित बौद्धिक स्तर के अनुसार वैचारिक समर्थन प्रदान करने के लिये आपका पुन: आभार एवं धन्यवाद। आगे भी मार्गदर्शन की अपेक्षा रहेगी।

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

      आदरणीय डॉ. मीणा जी, व्यक्तिगत रूपसे आपका ५ वां बिंदू मेरे विश्वास और व्यवहार का ही भाग है। उसके संविधानके अनुसार क्रियान्वयन के विषयमें मेरा अज्ञान है।
      ६ वे बिंदूमें मैंने “माध्यमिक” पहले नहीं पढा था। उस से गलतफहमी में था। दोनो बिंदुओंसे तत्वतः सहमति है।
      मुझे जो संदेह है, वह इन सारे बिंदुओंके संविधान के अनुसार, कैसे क्रियान्वित किया जा सकता है? इस विषयमें है।
      **बदलाव लानेमें समाज में विघटन ना हो, और बन पाए तब तक गुणवत्ता को ना त्यागते हुए, सारोंको प्रशिक्षित करते हुए, किया जाए।** यह भगिरथ कार्य है। कठिन निश्चित है-शायद असंभव नहीं। प्रतिशत जैसा आप लिखते हैं, अचानक (with one stroke) करनेमें भय लगता है। क्रमशः किया जा सकता है, और back fire होनेसे बचा जा सकता है।जैसे एक बेटा धीरे धीरे पितासे कुटुंबका दायित्व अपने कंधोंपर लेता है।
      पर **पहले बिंदूकी सफलता अन्य बिंदूओंके लिए सरलता प्रदान कर सकती हैं।
      **चौथे वर्णके धर्म वेत्ता भी धर्म को सही समझे और प्रस्तुत करने की क्षमता प्राप्त करायी जाए तो वे आप ही आप कर्मसे ब्राह्मण बन ही जाएंगे।
      गीता:=>श्रीकृष्ण कहते है ही कि, ॥ चातुर्वण्यं मया सृष्टा गुण कर्म विभागशः॥
      –साथमें यम नियम इत्यादि का भी ध्यान आवश्यक है।(V H P) तमिलनाडूनें सीमित रूपमें, यह करके दिखाया है।}
      महाराष्ट्रका वारकरी पंथ जो है, उसमें सभी वर्णोंके लोग है। वैसे चौथे वर्णके विशेष रूपसे आपको पंढरपूर और आळंदी इत्यादि स्थानोंकी यात्राओं में बहुसंख्य (जी हां बहुसंख्य) प्रतीत होंगे। वे कभी मांसाहार, मदिरापान इत्यादिभी करते नहीं हैं। इसका अनुभव मैंने उस यात्रामें मेरी माताजी के साथ जाकर किया है।(मेरी माताजी २५ से भी अधिक वर्षोंतक हर वर्ष दो बार इन यात्राओमें,सम्मिलित हुयी है, अब वृद्धावस्था वश जा नहीं पाती) महाराष्ट्रके बहुत सारे संत चौथे और पांचवे (अवर्ण )वर्णके भी हैं। वे सारे ज्ञानेश्वरी, तुकाराम की गाथा का आधार लेकर कथा/किर्तन/प्रवचन इत्यादि करते हैं। वैसे आज मां अमृतानंदमयी (अम्माची) मछुआरोंकी पार्श्वभूमिसे ही आती है, पर आज विश्वभरमें उनकी ख्याति है। और हर जाति के लोग उनके अनुयायी है।
      आपके हर बिंदूके पीछे बहुत बडा Critical Path Method से योजनाबद्ध रीतिसे कार्य करना आवश्यक है।
      कुछ चंद चुने हुए बिंदूओंपर प्रारंभ करते हुए, इसपर आगे क्रमशः बढा जा सकता है।
      आपने बक्से के बाहरसे जो सोच विचार किया, उससे मैं सर्वाधिक प्रभावित हूं। आपका पहला मूल बिंदू ही मुझे बहुतही जचा। बाकी सारे बिंदू तो उसके संपादित करनेसे वरीयता की दृष्टिसे सोचे जा सकते हैं। योजना बद्ध रीतिसे क्रियान्वित किए जा सकते हैं।
      कुछ जलदी में लिखा है। पर कब तक ठेलते रहता?

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      • Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

        ईमानदारी से लिखी गयी बातें प्रशंसनीय ही कहलाती है. आपका सकारात्मक चिंतन अनेक लोगों को दिशा दिखाता है, जिनमें से मैं भी एक हूँ. आभार एवं धन्यवाद!

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  10. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    विचार प्रवर्तक, और चिंतन प्रेरक ऐसा मीणा जी का लेख मुझे बहुत समयोचित, एवं देशहित्तकारी प्रतीत होता है। समयाभाव के कारण देरसे प्रतिक्रिया भेजता हूं। मेरी प्रतिक्रिया,कोई पत्थर पर की रेखा नहीं है। तर्क औचित्त्य पर, बदल भी सकता हूं।
    सोचनेकी पार्श्व भूमि पहले (क) से (च) तक प्रस्तुत हैं। अंतमें बिंदुवार मेरी सोच दर्शित है।
    पहली चेतावनी दे रहा हूं, कि-
    (क)सामान्य जन, Perception याने जो उन्हे “प्रतीत” होता है, उसीपर मत बनाते हैं, और मतदान भी करते हैं। सच्चाई को सही रीति से जानना उन के लिए, असंभव हैं। और मिडीया बिका हुआ है।बिका हुआ मिडीया, अपने मालिकोंके चष्मेसे सारा समाचार प्रसृत कर रहा है। और जनताकी (Perception) प्रतीति गढने में गलत समाचार भी स्थायी परिणाम ला देता है।(इस बिंदुपर तो पूरा लेख लिखा जा सकता है।) जब तक जनतंत्र रहेगा, यह दोष रहेगा ही। और मिडिया का बिका होना, तो चावला जी ने भी माना है। इसलिए भी मुझे मीणाजी का बताया हुआ मार्ग गहरा विचार करने योग्य प्रतीत होता है।
    कुछ बिंदु प्रस्तुत हैं। अंतमें बिंदुवार मत दर्शाया है।
    (ख) सभा/पक्ष . एक विमान की भांति होते हैं। जैसे एक विमान आपको अपने गांव नहीं पहुंचाता, (अड्डेसे फिर आपको छोटे वाहनसे घर जाना होता है।) लेकिन आपको विमानकी गतिका लाभ मिलता है। वैसे ही संगठनमें आपको अपना हर लक्ष्य़ पूरा प्राप्त नहीं होता, पर अधिकतम (पूर्ण नहीं) प्राप्ति होती है। और गति का लाभ भी मिलता है।
    (ग) दूसरा, यह (लिवर) एक कल है। जो भले, इस रूपमें प्रारंभ हो रही है। पर हिंदुत्व “सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु” मानने वाला होनेसे, अन्ततोऽगत्वा सभीका कल्याण ही करेगा। पर इससे विपरित “सर्व कल्याणकारी अभिगम” को पहलेसे अपनाने में आत्मघात ही दिखाई देता है। जो हम ६३ वर्षोंसे(?) करते हुए चले आ रहे हैं।
    (घ) जिस प्रकारसे एक बढते हुए पौधेको एक बाड़ का घेरा हुआ करता है, किंतु पौधा बडा होकर सशक्त होनेपर उसकी कोई आवश्यकता नहीं होती, इस प्रकारकी संस्थाभी उसी प्रकार से आगे भी सारे पहलुओं पर समीक्षा करती रहे, और आवश्यकतानुसार बदलाव भी लाती रहे। कोई व्यवस्था सनातन नहीं हो सकती।
    (च) जैसे (अ) एक सहृदयी कुटुंब होता है, जिसमें “आवश्यकता के अनुसार लेना, और सामर्थ्य़ के अनुसार (योगदान) देना “– पू. गुरूजी उवाच — होता है। उसी आधारपर मुझे लगता है, मीणाजी देशके भवितव्यके लिए विचार रख रहें है। जो हिंदु समाजमें ऊंचे माने जाते हैं, वे अपनी उच्चता व्यवहार में दिखाए। उदारता का परिचय दे।गिरते हुए भारतको बचाए।
    (आ) दूसरा कुटुंब सिद्धांत तो और भी ऊंचा है। उसे “अंगांगी भाव” -(पू. गुरूजी उवाच)–कहा जता है। जैसे शरीर के अंग होते हैं। बांए हाथको चोट पहुंचने पर दाहिना हाथ उसे आप ही आप सहलाने लगता है। यह भी “गुरूजीका ही विचार है, और हिंदू विचारधारा का मूल भी।
    मैं मानता हूं, कि अंन्ततोगत्वा सारे विश्वकी भलाई के लिए हिंदू को ही संगठित होना होगा। पर पहले से ही उस विशाल आधारपर खडा होना “आत्महत्त्या होगी”, एक पत्थर की दिवारसे टकराना होगा। एक गढ्ढेमें गिरना होगा, जिसमें हम बार बार गिरते आए हैं। मीणा जी के इस लेखपर देशके हित चिंतक गहराईसे सोचे -यह विचार प्रवर्तक, मनन प्रवर्तक, और चिंतन प्रेरक लेख है। मेरी वैयक्तिक मान्यता और प्रामाणिक बुद्धिके अनुसार। “आपत‌ धर्म “की संकल्पना भी इसे पुष्ट करती है।
    बिंदूवार विचार
    (१) “—प्रारम्भिक 50 वर्ष के लिये ब्राह्मण, वैश्य एवं क्षत्रिय वर्ग का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं हो।”
    प्रशिक्षणका प्रबंध किया जाए, और गुणवत्ता टिकानेके लिए — उच्चारण का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। मंत्र शक्ति शुद्ध उच्चारण की ही शक्ति मानी जाती है।
    (२) “—–से माता पिता के बच्चों का लालन-पालन एवं पढाई की सम्पूर्ण व्यवस्था सरकार द्वारा की जावे।—-”
    कुछ कडा प्रतीत होता है। सरकार ठीक संस्कार दे नहीं पाएगी।
    (३) सही लगता है।
    (४) सही।
    (५) इसका कुछ लोग विरोध कर सकते हैं।
    (६) कोई मत नहीं।
    (७) सही।
    (८) “दलबदल (विचारधारा/नेता बदलने) को पूर्ण मान्यता हो।”—-पर किसी टिकट पर चुनाव जीतने के बाद बदलाव ना करें।
    (९) सही।
    (१०) जाति सत्यापित कैसे करें? यह प्रश्न खडा होगा। व्यवसाय पर? कौन करेगा?
    (११) सही।
    (१२) सही। पर अनुपात सोचा जाए।
    (१३) आज के काल के लिए नयी स्मृति (अधिक योग्य भी यही है} भी लिखी जा सकती है। १८ स्मृतियां तो है ही, अब १९ वीं, बन सकती हैं। मनु के नामसे गलतफहमी हो सकती है।
    (१४) “महिलाओंकी”—-क्षमता को ध्यानमें लिया जाए। क्षमता बढाने के लिए प्रशिक्षण सोचा जा सकता हैं।
    (१५) सही।
    (१६)”अजा एवं अजजा ” साथ साथ क्षमता बढानेका प्रशिक्षण आवश्यक हैं।
    (१७) यह ध्यान रहे, कि सरकारी सेवाओं के अतिरिक्त छोटे छोटे घरेलु उद्योग भी है। गुजरात शासनने इन उद्योगोंकी प्रशिक्षा भी शिविरोंके द्वारा प्रसारित की है। सरकार पर सभीको आलंबित करना, वैयक्तिक क्षमता को प्रतिभाको उत्तेजन देनेमें अक्षम सिद्ध हो सकता है।
    (१८) (१९) (२०) (२१) सारे सही प्रतीत होते हैं।

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  11. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    बहुत हि सुन्दर श्ब्दों मे अलोचना की हैं,और कयी बते एसि लिखि है जिन्ससे सहमत नहीं होना अन्याय है,लिकिन जरा आप बतायेन्गे,हिन्दु कब हिन्दु बन कर वोट देते है जो हिन्दु रुप मे हिन्दुवादी सरकर नहीं चाहे??जैसा लिखा आपको हिन्दु क्या है पता नही,फ़िर विक्रितियो को हि हिन्दु क्यों मानने लगे??और कोन हिन्दु सोचते है एसा जरा बतायेन्गे??कभी आप कहते है आर्यों के आने तक जैसे थे वैसे बनेगे,कभी आप कहते है हिन्दुओ पर अनादि काल से ब्राहम्नो का कब्जा है,तय कर लिजिये कि अनादि काल से है या आर्यो के आने के बाद से है.
    आपका ब्राह्म्ण विरोध तो जग जाहिर है हि अब हिन्दुओ को पुरि तरिके से आरक्शित और अनारक्शित में फ़िर ,और भी ना जाने कितने तुकदो मे तोडने का इरादा है?जैसा कि आपके विचारो से लगता है और आपके आधे लेख और कुछ सुत्रो से कि आप पहले दर्जे के ब्राह्मण और अन्य जातियो के विरोधि है पर क्शमा किजियेगा अगर ये जातिया एतनि हि खराब होति तो आज भारत मे ना एतनि उन्न्ति होति ना कोयि बात या संस्क्रिति या शक्ति जैसि कोयि बात होति,दिमाग मे से निकाल दिजिये कि ब्राहम्ण-राज्पुत या वैश्य की हि सारि सम्प्प्ति है भारत मै,आधि से ज्यदा भुमि पिछडो के पास है,सारे के सारे कुटिर और हस्त शिल्प उधोग पिछडो और अन्य के पास है,और हम नही कहते की एनका कब्जा है बल्कि उन पर उनका अधिकार है,जो लोग अपनी योग्य्ता से आगे नही बड सकते वे ही दुसरो को गालि दिया करते है और अपनी अवन्त्ति को दुसरो पर मथे मडा करते है.
    आपको एसा लगता है कि पुजारि कोयि बहुत बडि पोस्ट होती है हिन्दु धर्म मे???पुजारि का काम मन्दिर मे घण्टा-घडियाल-और आरती करना ही होता है ज्यादातर मे उनको वेदो कि तो छोडिये,सहि तरिके से स्लोक भी याद नही रहते है,तो क्या सारे ब्राह्म्ण पुजारि का हि काम करते है??जैसे उनके घरों मे खाना तो दान का ही बनता हो???केवल और केवल प्रतिभा के अतिरिक्त ब्राह्म्णो के पास कुछ नही हैं,और उनकि इस अदम्य प्रतिभा से प्रतिस्प्र्दा करनि ना पडे इस लिये आरक्षण दिया जाता है,शान्ति पुर्ण तरिके से जिवन यापन करने मे विश्वास करने वाले ब्राह्म्ण-बनिये आज एसा लगता है कि राजनैतिक रुप से हासिये पर है क्योकि वो वोट बन्क नही है ना,वो सोच समझ वोट करने वाले है,दारु कि एक बोतल से या जातिवादि अख्डप्न से उन्का वास्ता नही है,सर्वाधिक पढे लिखे है इस लिये कोई उन्हे मुर्ख भी नही बना सक्ता है,लेकिन उन्का ये पढा लिखा होना दोष है??हर परिक्षा मे टोप करना दोष है,और अपनी जातिवादी सोच को छोड कर हिन्दुत्व की बात करना दोष है???कहते है महापुरुशो को जातिवादि चश्मे से देखना बहुत बडा पाप करने से भी बडा अपराध है पर मै ये अपराध कर रहा हु और ये बता रहा हु कि ज्यदा पुराना नही तो अन्ग्रेजो के समय का ही ईतिहास उठा के देख लो पता चल जायेगा कि कोन देश-धर्म और समरसता के लिये खप रहा था और कोन उसका फ़ायदा उठाने के लिये लपक रहा था.
    बाकि सभि सुत्रो का विस्तार पुर्वक जवाब देउन्गा.
    वैसे अधिकान्श मे कोयि आप्पत्ति नही है,अन्ध ब्राह्म्ण विरोध को और आरक्षण को निकाल दिजिये तो कोयी सम्स्या नही एससे.

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  12. sunil patel

    आदरणीय श्री मीना जी, धन्यवाद बहुत अछे लेख के लिए. आपका यह लेख नहीं बल्कि आज की नितांत जरुरत है जिससे भारत वास्तव में फिर से सोने की चिड़िया बन सकता है.

    आपके द्वारा चिंता व्यक्त की गई है की हिन्दू वादी संगठन निचली जातियों को ऊपर नहीं उठाना नहीं चाहती, हो सकता है, किन्तु ऐसा तो नहीं लगता है. आज इन संगठनो में सभी जातियों के लोग है, सभी को मौका मिल रहा है. पार्टी नेता उसको बानाती है जिसके जीतने की संभावना है. यह तो जनता पर निर्भर करता है की वह उच्च जाती के उम्मीदवार या निम्न जाती के उम्मीदवार को जिताए.

    हाँ पिछले कुछ सो सालो से उच्च जातियो ने निचले तबके को बहुत दबाया है, उन्हें उनके जायज हक़ से वंचित रखा है, किन्तु आज सभी स्वतंत्र है. आज सबसे बड़ी चीज है आर्थिक स्तिथि. आज निचली जाती का व्यक्ति जिसकी आर्थिक स्तिथि उच्च जाती गरीब व्यक्ति से ज्यादा है, वह उच्च जाती के सवर्ण से हसियत में ज्यादा ताकतवर है. यहाँ आर्थिक स्तिथि ज्यादा मायने रखती है.

    गायत्री शक्तिपीठ बहुत वर्षो से कर्म काण्ड की सिक्षा दे रहा जहाँ सभी जाती के व्यक्ति पूजा पाठ करा सकता है और बहुत से लोग पूजा पाठ करा रहे है. लाखो शिक्षित सभी जाती के व्यक्ति कर्म काण्ड करा रहे है.

    हर हिन्दू, हर धर्म का व्यक्ति चाहता है राष्ट्रवादी सरकार जहाँ सभी को रोटी, कपडा, makaan, सामान अधिकार मिले. भ्रष्टाचार मुक्त सरकार हो, सभी को सामान अवसर मिले.

    आपने जो २१ सुझाव सुझाये है वाही श्री स्वामी रामदेव जी कह रहे है. शिक्षा, समानता, भरष्टाचार विरोध, सबल भारत उनके विचार है. अगर उनकी पार्टी चुनाव लडती है तो लाखो, करोडो लोग उन्हें ही वोट करेंगे.

    हाँ आरक्षण की जो बात है उसमे कुछ सुधर की जरुरत है – आर्थिक स्तिथि. आरक्षण प्राप्त व्यक्ति जिनिकी आर्थिक स्तिथि अछि है, उनके बच्चो को उसका लाभ नहीं मिलना चहिये. क्योंकि जिसको आरक्षण से नौकरी मिल गई, उनको तरक्की भी जल्दी मिल गई, फिर उनके बच्चो को आरक्षण का लाभ क्यों. वाही लाभ किसी जरुरत मंद आरक्षित वर्ग के बच्चे को मिल सकता है.

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  13. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय श्री हेमंत जैन जी,

    हर भारतीय को हिन्दू मानने के आपके विचार उच्च और सरहनीय हैं , लेकिन यदि आप प्रस्तुत लेख में उठाये गए मुद्दे पर अपने विचार रख सकें तो लेखन का उद्देश्य पूर्ण होगा.

    आदरणीय श्री हेमंत जैन जी चर्चा का मूल आधार ये है कि 95 प्रतिशत हिन्दुओं को उनके हक और हर क्षेत्र में उन्हें भागीदारी समान रूप से और ससम्मान प्रदान कर दी जावे?

    इसमें किसी को आपत्ती क्यों होनी चाहिए?

    इससे देश, समाज और हिंदुत्व मजबूत होगा, जो प्रत्येक राष्ट्रवादी नागरिक की आकांक्षा है.

    कृपया चर्चा में भाग लेकर इसे सही दिशा में आगे बढ़ने में सहयोग करें.

    धन्यवाद!

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  14. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय श्री मिहिरभोज जी,

    आपका सवाल वाजिब है, जिसका जवाब मिलना चाहिए और इस लेख का लेखक होने के कारण उत्तर देना मेरा फ़र्ज़ है. लेकिन आदरणीय यदि हम विषय से भटकेंगे तो असल चर्चा से भटक सकते है, इसलिए आपसे विनम्र निवेदन है कि आप प्रवक्ता पर ही आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता एवं अल्पसंख्यकों का विरोध असंवैधानिक! शीर्षक से मेरे आलेख और उस पर 100 से अधिक टिप्पणियों का अवलोकन करें, फिर भी समाधान नहीं हो तो कृपया विश्वास रखें कि आपके सवाल का जवाब मिलेगा. फ़िलहाल इस चर्चा में भाग लेने के लिए आपका आभार.

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  15. मिहिरभोज

    हिन्दू धर्म सभा का गठन : राष्ट्रीय स्तर से गाँव स्तर तक हिन्दू धर्म सभा का गठन किया जावे, जिसमें सभी हिन्दू जातियों का जनंसख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व हो। हिन्दू धर्म सभा की सिफारिशों पर भारत की संसद विचार करने के लिये संवैधानिक रूप से बाध्य हो। हिन्दू धर्म सभा द्वारा धर्मस्थलों के पुजारी नियुक्त किये जावे। प्रारम्भिक 50 वर्ष के लिये ब्राह्मण, वैश्य एवं क्षत्रिय वर्ग का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं हो। जिससे जन्मजातीय श्रेष्ठता एवं भू-देव जैसी मानसिक विकृतियाँ स्वत: समाप्त हो सकें। धार्मिक मामलो में हिन्दू धर्म सभा को निर्णय करने का अधिकार हो, जिसकी उच्च स्तरीय धर्म सभा में तीन स्तर तक अपील करने का भी प्रावधान हो।…………
    बंधु ये तो आपका बहुत ही शानदार क्रांति कारी विचार है…..यदि ऐसा हो तो सचमुच इस देश मैं हिंदू समाज सुदृढ बनेगा…..मेरा पूर्ण समर्थन

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  16. मिहिरभोज

    आजकल प्रतियोगी परीक्षाओं मैं एस सी एस टी की मैरिट ऊंची जाती जा रही है…..इसका कारण ये नहीं है कि ये समाज एकदम से विकसित हो गये हैं बल्कि कलैक्टरों औऱ डाक्टरों के बच्चे उस गरीब पिछङे अनुसूचित जाति जन जाति के बच्च को अब भी आगे नहीं आने दे रहे…बाकि तो पता नहीं पर इस वर्ष बीकानेर मैडिकल कालेज मैं प्रवेश लेने वाले शत प्रतिशत बच्चे जो इन वर्गों से आते हैं वे प्राईवैट स्कूलों से आये हैं औऱ मंहंगे संस्थानों से कोचिंग लेकर पहुंचे अच्छे धनी मानी परिवारों के बच्चे है…जब तक इस बाधा को दूर नहीं किया जायेगा तब तक समाज का कमजोर वर्ग कहां से सक्षम होगा….इसलिए आरक्षित वर्ग मैं भी क्रीमीलैयर की व्यवस्था होनी चाहिये…

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  17. hemanth jain

    namskar हिन्दू का अर्थ हिन्दुस्थान का वासी फिर चाहे वह मुसमान या पारशी ही क्यों न हो हिन्दू सब्द को धर्म से न जोड़े !

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  18. Madhu Singh, Indore, M. P.

    श्रीमान संपादक जी,

    मैं पिछले एक वर्ष से लगातार प्रवक्ता की पाठिका हूँ, लेकिन कभी भी टिप्पणी लिखने की जरूरत नहीं समझी. आज डॉ. पुरुषोत्तम मीना निरंकुश जी का लेख “हिन्दू क्यों नहीं चाहते, हिन्दूवादी सरकार!” ने मुझे लिखने के लिये बाध्य कर दिया.

    इस लेखक को पूर्व में भी प्रवक्ता एवं अन्य अनेक जगहों पर पढा है. पिछले दिनों मध्य प्रदेश के एक दैनिक में इनका लेख “एक संविधान,फिर दो विधान क्यों?” भी पढने को मिला. हर बार कुछ न कुछ नया और निर्भकता से कहना डॉ. निरंकुशजी की शैली है, लेकिन इस लेख में इन्होंने देश के समक्ष सम्पूर्ण मौलिक एवं बिलकुल नया-नया सोच प्रस्तुत किया है, जिस पर, प्रवक्ता मंच पर मेरी ओर से पहली टिप्पणी प्रस्तुत है.

    आशा है कि आप इसे प्रकाशित करके मेरी वर्षों पूर्व की, विवाह पूर्व की, लिखने की आदत को फिर से जिन्दा करने में सहयोग करने का कष्ट करेंगे.

    श्री निरंकुश जी की “छोटी सी पृष्ठभूमि” पढने के बाद कोई साधारण पढालिखा व्यक्ति भी समझ सकता है कि उनकी आस्था एवं विश्वास कितने दृढ हैं, जो व्यक्ति अपने बच्चों को मिशनरीज के स्कूल में पढाने से केवल इसलिये सचेत रहता हो कि बच्चों में भारतीयता का गुण समाप्त नहीं हो जाये. जो व्यक्ति आज के इस दौर में शराब-मांस और धूम्रपान जैसे दुर्गणों से मुक्त हो. जो देश एवं अपने धर्म के प्रति चिन्तित हो ऐसे व्यक्तित्व को नमन करते हुए मैं यही कहना चाहूँगी कि आज देश में ऐसे लोगों की सख्त जरूरत है.

    यदि पाठकों ने प्रवक्ता पर पिछले कुछ आलेखों की चर्चा में भाग लिया हो, तो उन्हें याद होगा कि प्रवक्ता पर कुछ विद्वान माने जाने वाले राष्ट्रवाद एवं हिन्दुत्व की बात करने वाले पाठकों ने श्री निरंकुश जी को विदेशी ऐजेण्ट, क्रिश्चन, देशद्रोही, भारत विरोधी और न जाने कितने आरोपों से आरोपित कर दिया था. एक दो पाठकों ने तो सारी हदें पार कर दी थी, एक लेख पर तो संपादक को टिप्पणी डिलीट भी करनी पडी थी, लेकिन डॉ. निरंकुश जी ने उनके अपमान के खिलाफ एक भी शब्द ऐसा नहीं कहा कि जिससे लगे कि वे गुस्सा में हैं या उद्वेलित हो रहे हैं. हालांकि अन्य कुछ विद्वान पाठकों ने अवश्य ऐसी गरिमा रहित टिप्पणियों का विरोध किया था, जिसे डॉ. निरंकुश जी के विचारों का विरोध करने वाले पाठकों ने प्रायोजित टिप्पणी बतलाया था। उन्हें श्री निरंकुश जी का समर्थक कह कर खूब कोसा था, लेकिन इस लेख पर न तो श्री निरंकुश जी के कथित समर्थक उपलब्ध हैं और न हीं श्री निरंकुश जी की हिन्दू-निष्ठा, देश भक्ति और राष्ट्रीयता पर सवाल उठाने वालों की ओर से एक भी टिप्पणी है.

    यह न जाने किस प्रकार की सोच का प्रतीक है. मुझे तो लगता है कि कुछ लोगों को न तो देश के उत्थान या विकास से मतलब है और न हीं उन्हें हिन्दू धर्म या हिन्दुत्व या भारतीयता से कोई लेना-देना है. न उन्हें नारी के सम्मान या आजादी से कोई मतलब है. ऐसे लोगों का गुप्त मकसद किसी भी तरह से हंगामा खडा करना और समाज में भय व्याप्त करना ही एक मात्र ऐजेण्डा है. अन्यथा क्या कारण है कि जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बतलाने वाले आडवाणी तथा जसवन्त सिंह तो राष्ट्रवादी एवं हिन्दू धर्म के संरक्षक हैं, जबकि स्त्रियों के अधिकारों की बात करने वाले और धर्मग्रंथों में स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध लिखी गयी, बातों पर चर्चा करने मात्र से डॉ. निरंकुश जैसे विद्वान लेखक भारतीय संस्कृति, भारत, भारतीयता, हिन्दुत्व और राष्ट्र के विरोधी ही नहीं, बल्कि क्रिश्चनों के ऐजेण्ट नजर आने लगते हैं.

    डॉ. निरंकुशजी के एक लेख (राष्ट्रमण्डल खेलों के बहाने मीडिया को नारी पूजा याद आयी?) में स्त्रियों के हालत के पक्ष में प्रकट सच्चे विचारों से हजारों सालों से स्थापित भारत की महान हिन्दू संस्कृति के विखर जाने का खतरा नजर आने लगता है! क्या हिन्दुओं को अपनी संस्कृति इतनी कमजोर या खोखली नजर आ रही है? भूल हो गयी, हिन्दुओं को नहीं, केवल १५ प्रतिशत हिन्दुओं को? एक और भूल हो गयी १५ % में आधी स्त्री कहाँ हैं इनकी समर्थक?? केवल 7-8 प्रतिशत हिन्दू संस्कृति के पुजारी स्वयं को हिन्दुओं और हिन्दू संस्कृति का ठेकदार समझते हैं?

    स्त्री को केवल मनुस्मृति के समर्थकों ने हीं नहीं, बल्कि हर एक धर्म ने स्त्री को इतना कुचला-मसला है कि हजारों सालों से स्त्री जानवर से भी बदतर जीवन जीने को विवश है. स्त्री में प्रजनन का नैसर्गिक दायित्व और सन्तान के प्रति आत्मीय भाव नहीं होता तो स्त्री को पुरुष कभी भी गुलाम नहीं बना सकता था. आज कुछ स्त्रियाँ आज़ादी और आधुनिकता के नाम पर इस नैसर्गिक गुण को त्याग रही हैं, जिसके लिये भी पुरातन संस्कृति के पुजारी ही जिम्मेदार हैं, फिर भी जो स्त्री माँ नहीं बनने को स्त्री की आजादी और आधुनिकता मानती हैं, हम भारत की स्त्रियाँ, उन स्त्रियों का समर्थन नहीं कर रही हैं. ये है हमारी स्त्रेण संस्कृति न कि भारतीय संस्कृति, जो सम्पूर्ण संसार में एक जैसी है. संपादक जी माफ करना स्त्री मन की पीडा उभर आयी.

    इस लेख को और इसमें दिये गये २१ सुझावों पर मेरी प्रतिक्रिया इस प्रकार है :-

    (१) स्वयं श्री निरंकुश जी भी जानते होंगे कि इन सुझावों को लागू करने की हिन्दूवादियों से अपेक्षा करना प्राय: असम्भव है, लेकिन प्रवक्ता डॉट कॉम पर कुछ राष्ट्रवादियों ने डॉ. निरंकुश जी को राष्ट्रद्रोही, धर्मविरोधी, फर्जी आदिवासी एवं क्रिश्चनों का ऐजेण्ट तक घोषित कर दिया. मुझे तो लगता है कि यह मौलिक लेख ऐसे लोगों को डॉ. निरंकुश का बौद्धिक जवाब है.

    (२) डॉ. निरंकुश जी अनेक लेखों में भारत के संविधान को विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान लिख चुके हैं, इसलिये भारत के संविधान में उन्हें कोई कमी नजर आती हो ऐसा लगता नहीं, लेकिन भारत में मुसलमानों के विरोध के नाम पर राजनीति करने वाले हिन्दूवादियों को जवाब देने के लिये ही २१ सुझाव दिये गये लगते हैं, और इनके माध्यम से कहा गया लगता है कि करो सुधार, हम भी तुम्हारे साथ हैं!

    (३) हिन्दू धर्म के नाम पर सारे हिन्दुओं को हर बात पर ललकारने और साथ नहीं देने पर हिन्दुओं को नपुंसक, कायर और धर्मनिरपेक्षतावादियों के समर्थक कहने वालों को श्री निरंकुश जी ने इस लेख में जवाब दिया है कि अजा, अजजा एवं अन्य पिछडा वर्ग जो देश की कुल जनंसख्या का ७० प्रतिशत है, उसे यदि हिन्दू मानते हो तो, उसे भी सत्ता एवं देश के संसाधनों में बाराबर की हिस्सेदारी प्रदान की जावे. केवल १५ प्रतिशत उच्च जातीय सवर्ण ही हिन्दू या हिन्दुस्तान या राष्ट्र की प्रतिभाएँ नहीं हैं. १५ और ७० को मिला कर ८५ प्रतिशत हिन्दू इस देश की ताकत हैं, जिनके भाग्य का निर्धारण करने का अधिकार हजारों सालों से केवल १५ प्रतिशत में से भी केवल 3.5% ब्राह्मणों के हाथ में रहा है, जिनमें भी स्त्री शामिल नहीं है, इस प्रकार देश के दो प्रतिशत से भी कम लोगों ने ९८ प्रतिशत लोगों पर अपने विचार हजारों सालों से लादे हैं, लेकिन अब समय बदल गया है. इसलिये निरंकुश जी अजा, अजजा एवं पिछडा वर्ग के बारे में लिखते हैं कि

    “अब उन लोगों ने भी सोचने, समझने और बोलने की ताकत के साथ-साथ जमीनी संघर्ष करने की ताकत भी अर्जित कर ली है.”

    (४) डॉ. निरंकुश जी ने इस लेख में बिना किसी लागलपेट के स्त्री को भी समान रूप से हर क्षेत्र में योग्य मानते हुए ५० प्रतिशत आरक्षण की बात कही है, जिसके लिये स्त्रियों की ओर से मैं उनका हृदय से धन्यवाद करती हूँ.

    (५) राष्ट्रवाद की बातें करके, धर्मनिरपेक्षता को गाली देने वाले और निष्पक्षता से मानवता की बात करने वालों को विदेशों का ऐजेण्ट बताने वालों के लिये-

    # # # # # “यह आलेख एक ऐसा निवाला बन गया है, जो न तो निगला जा सकता है और न हीं उगला जा सकता है.”

    इसलिये तथाकथित हिन्दू राष्ट्रवादी टिप्पणीकारों ने इस आलेख पर टिप्पणी नहीं करने में ही अपनी भलाई मान रखी है. बजुर्गों ने ठीक ही कहा है कि-

    # # # # # “सच को कहने, सुनने और समझने के लिये सच्चे हृदय की जरूरत होती है. पाखण्डी सच्चाई का सामना नहीं कर सकते.”

    मेरी ओर से लेखक और संपादक प्रवक्ता डॉट काम को इस लेख के प्रकाशन पर शुभकामना एवं धन्यवाद. आशा है कि आगे भी ऐसे लेख पढने को मिलते रहेंगे.

    श्रीमती मधु सिंह
    इन्दौर, मध्य प्रदेश

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  19. Vijay Dubey

    respected Editor Ji,

    aapko kuchh ajeeb nahin lag raha hoga ki is lekh par hindu dharm aur rashtra ki raksha ke liye sankalpit vidwanon ki ek bhi tippani nahin hain. jo lekhak bat bat par musalmanon ko galiyan dete hain unka is prakar se ekdam nadarad hona kuchh samjh men nahi aa raha. jabki aise lekhkon ke liye yahan par kafee masala hai, jaise-

    1 “धर्म के अधार पर विवाह विच्छेद या तलाक मान्य नहीं होगा”
    2 “दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले माता-पिता की एवं पूर्व पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने वाले नागरिकों की सम्पूर्ण सम्पत्ति छीनकर ऐसे लोगों को देशद्रोही घोषित करके बिना मुकदमा चलाये, केवल प्राथमिक स्तर पर प्रमाणीकरण के बाद ही कम से कम 10 वर्ष के लिये जेल में डाल दिया जावे ”
    3 “सार्वजनिक रूप से मांस एवं शराब की विक्री पर पूर्ण प्रतिबन्ध हो”
    4 “जनगणना जाति एवं धर्म के आधार पर की जावे,”
    5 “विभेद को बढावा देने वाले मनुस्मृति जैसे सभी धर्मग्रन्थों से असंगत एवं असंवैधानिक हिस्सों को स्वयं हिन्दुओं द्वारा एक वर्ष के अन्दर-अन्दर हटाकर फिर से सभी को अधिकृत हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित किया जावे।”
    6 “आतंकवादियों के मामलों में राष्ट्रपति या राज्यपालों को प्रदत्त क्षमा आचना की शक्तियों को समाप्त किया जावे।”
    7 “सभी स्तर की सरकारी सेवाओं, शिक्षण संस्थाओं और विधायिका में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित किया जावे।”
    8 “भ्रष्ट या अनैतिक कार्यों में लिप्त न्यायाधीशों जन प्रतिनिधियों, मंत्रियों आदि सभी को भी आम लोक सेवकों की भांति कानूनी कार्यवाही का सामना करना होगा।”
    9 “सभी समाजों के मेधावी बच्चों को उच्चतम स्तर तक पढाई करने के लिये सरकारी द्वारा खर्चा वहन करने की पुख्ता व्यवस्था हो।”
    10 “हिन्दू धर्म सभा की सिफारिशों पर भारत की संसद विचार करने के लिये संवैधानिक रूप से बाध्य हो।”
    11 “हिन्दू धर्म सभा द्वारा धर्मस्थलों के पुजारी नियुक्त किये जावे। प्रारम्भिक 50 वर्ष के लिये ब्राह्मण, वैश्य एवं क्षत्रिय वर्ग का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं हो। जिससे जन्मजातीय श्रेष्ठता एवं भू-देव जैसी मानसिक विकृतियाँ स्वत: समाप्त हो सकें।”

    aasha hai ki ye mudde vidwan lekhakon ko tippanee karne ko prerit karenge. is lekh par jaisee charcha honi chahiye vaisee ho nahin rahi. vipksh ka bina charcha ka aanand nahin aataa.

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  20. Preeti Gaurav

    श्री मीना जी आपने बेशक is lekh men आरक्षित वर्गों को समर्थन दिया है, आप पर आरक्षित वर्ग का होने के कारन पक्षपात का आरोप भी aasani se लगा सकती हूँ पर अन्दर से एक आवाज़ आ रही है की आपकी बात में सच्चाई है. आपने जिस ७० फीसदी SC, ST aur OBC ki आबादी ki बात jis tareeke se कही है, usse lagta hai ki SC, ST aur OBC के बिना भारत और हिन्दू धर्म sach men अधूरा है. maine आपको पहली बार पढ़ा है. आपने स्त्री के साथ भी har khetar men समान न्याय और समान हिस्सेदारी की बात कही है. aapne corruption par bhi vichar rakhe hain. यदि आपकी ये बात केवल दिखावे के लिए नहीं है तो भारत की नारी आप जैसों के साथ है! हमें आप जैसे आदिवासियों का नेतृत्व मंज़ूर है. BJP, RSS to is vichar men shamil hone se rahe so आप लेखन के साथ साथ संगठन बनाकर के भी आन्दोलन छेड़ें, देश की तकदीर बदल सकती है. मुझे उम्मीद है की आप जैसे सच्चे व ईमानदार विचारों के लोगों को मुस्लमान भी साथ देंगे! Thanks

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  21. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय श्री आर. सिह जी,

    सदा की भांति आपकी मौलिक टिप्पणी पढने को मिली, जो अनेक नये सवाल ख‹डे करती है, सोचने और खोजने के लिये दिशा प्रदान करती है। आपने इस आलेख पर अपने अमूल्य विचार तफ्सील से व्यक्त किये, इसके लिये आपका आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।

    आपने एक सवाल मुझसे भी पूछा है कि-

    “……….एक बात मेरी समझ में नहीं आयी की आपको अपने वर्तमान संविधान में क्या कमी नजर आ रही है?साठ वर्षों से लागू और मान्य संविधान को एकदम परे करके आप सोच भी कैसे सकते हैं की आप की विचार धारा को मूर्तिभूत किया जा सकता है?अगर हम भारत की इतिहास पर नजर डालें तो पता चलेगा की भारत पूर्ण रूप से हिन्दू राष्ट्र कभी रहा ही नहीं. हिन्दुओं की जो कमजोरियां हैं उनको भी आप इतनी आसानी से दूर नहो कर सकते.ऐसे में आपकी यह विचारधरा केवल तर्क का विषय ही रह जाती है.”

    इस सम्बन्ध में, मैं अग्रिम स्पष्ट करना जरूरी समझता हूँ कि आरदणीय मैं इस मंच पर गैर जरूरी बहस को बढावा नहीं देने के पक्ष होने के साथ-साथ सार्थक चर्चा को आगे बढाने के पवित्र उद्देश्य से आपको निवेदन कर रहा हूँ कि मुझे जहाँ तक याद है, इस लेख में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मैंने कहीं भी भारत के वर्तमान संविधान को नाकारा या कमजोर या अपूर्ण नहीं माना है।

    यदि आप मेरे निवेदन पर फिर से आलेख को पढेंगे तो आप स्वयं अवगत होंगे कि नयी व्यवस्था के सुझाव क्यों प्रस्तुत किये गये हैं। आपकी जानकारी के लिये आलेख के एक परिच्छेद को यहाँ पुन: प्रस्तुत कर रहा हूँ-

    “यदि हिन्दूवादी सोच के लोग वास्तव में ईमानदार और देशभक्त होने के साथ-साथ, यदि सच्चे समतावादी हैं तो देश के 70 प्रतिशत हिन्दुओं का विकास करने वाला हिन्दुत्व कायम करने की बात करें। जिसके लिये हिन्दु धर्म की रक्षा करने के नाम पर काम करने वालों को अपने ऐजेण्डे में कुछ ही बातें बदलनी होंगी। देखते हैं भारत में हिन्दूवादी सरकार कायम होती है या नहीं? ऐसा करने के बाद भारत के 50 करोड से अधिक लोग आपके साथ होंगे।
    आपको केवल इतना सा करना है-”

    शुभकामनाओं सहित।

    Reply
  22. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय अंकित जौहरी जी,

    आपकी बात सच है, इस ओर मेरा ध्यान नहीं गया. कोई भी पूर्ण नहीं है और न ही ये २१ सूत्र अंतिम या सम्पूर्ण हैं. केवल एक सोच है, नया विचार है! आपने महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाया है, आपका आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ.

    आशावादी हूँ सो आशा करता हूँ कि आगे भी आपका स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहेगा.
    शुभकामनाओं सहित.

    Reply
  23. आर. सिंह

    R.Singh

    श्री मीनाजी,आपके कहने का ढंग बहुत ही प्रभावशाली है.तर्क भी आपने अच्छे दियें हैं. ऐसे दूसरों की तिप्परियों से पता चला की आप अच्छे वक्ता भी हैं.आपके कथन में सचाई की झलक भी है,पर एक बात मेरी समझ में नहीं आयी की आपको अपने वर्तमान संविधान में क्या कमी नजर आ रही है?साठ वर्षों से लागू और मान्य संविधान को एकदम परे करके आप सोच भी कैसे सकते हैं की आप की विचार धारा को मूर्तिभूत किया जा सकता है?अगर हम भारत की इतिहास पर नजर डालें तो पता चलेगा की भारत पूर्ण रूप से हिन्दू राष्ट्र कभी रहा ही नहीं. हिन्दुओं की जो कमजोरियां हैं उनको भी आप इतनी आसानी से दूर नहो कर सकते.ऐसे में आपकी यह विचारधरा केवल तर्क का विषय ही रह जाती है.
    जहाँ तक मैं समझता हूँ ,अगर वर्त्तमान भारतीय संविधान की छत्रछाया में ही हम एक निष्ठ और एकजूट होकर अपने कर्तब्य का पालन करे तो हम वह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं और भारत अपने उस गौरवशाली पद पर आसीन हो सकता है,जहाँ पहुचने की आपने कल्पना की है.
    हिंदी एवंग अन्य भारतीय भाशाओं को उनके पद पर न पहुचने देने में हम सब का हाथ है. मुझे आज भी यह बात नहीं समझ में आयी की जो चक्रवर्ती राज गोपालाचारी १९३५ में दक्छिन में हिंदी प्रचारिणी सभा के प्रधान थे, वे ही आजादी के बाद कट्टर हिंदी विरोधी कैसे बन गए?१९४७ में ही हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता क्यों नहीं दी गयी?जब की कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई में पूर्ण नशाबंदी को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था,तो आजादी के बाद ही sampurna भारत में नशाबंदी का एलान क्यों नहीं किया गया?ये सब कुछ ऐसे प्रश्न हैं,जिसका उतर कम से कम मुझे तो नहीं मालूम है,अगर कोई इन प्रश्नों का उतर दे सके तो मैं उसका आभारी raahunga.

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  24. Anil Sehgal

    – इंदिरा ने नारा दिया था “गरीबी हटाओ” और सरकार बना ली थी.

    – भाजपा अपने विचारों के अनुसार देश के उद्धार के लिए एक नारा दे.
    नारा हो :

    *** देश की जनगणना जाति एवं धर्म के आधार पर – कमजोर, गरीबी रेखा से नीचे की जनता के लिए, जनसंख्या अनुसार, सरकारी साधनो का उपयोग***

    – डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश‘ जी के २१-सूत्रीय कार्यक्रम को चुनाव घोषणा में डालने पर विचार करें. नारा तो वहीँ से ही है.

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  25. Ankit Jauhari

    आदरणीय मीना जी, आपको भ्रष्ट मीडिया व्यवस्था के लिए भी कुछ सुझाव देना चाहिए था.

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  26. Mohamaad Rashid

    डॉ. पुरुषोत्तम जैसे धर्म निरपेक्ष लेखक ने यह लेख लिखा है और बिलकुल नया एवं मौलिक विचार सामने रखा है, जिस पर भुत (bahut) ही गंभीरता से सोच विचार करने की जरूरत है, pehlee nazar men मुझे ismen कुछ बातें इस्लाम के खिलफ दिख रही हैं, लिकिन अभी उन पर विस्तार स कहना जल्दबाजी होगा. बिलकुल ताजा विचार और सभी के हित की बात शामिल करके लेखक ने कट्टर लोगों को एक मार्ग दिखाया है.

    मेरा तो यही कहना है की कुछ थोड़ा ऊंचा नीचा करके यदि हम सब धर्मों के लोग मिलकर कोई समानता & aman (Shanti) स्थापित करने वाली तंजीम बना सकें तो मुल्क का भला तो होगा ही हिंद की ताकत भी बढ़ेगी. hamen dharm ke naam par ladane walon ka khel khatam karna chahiye.

    एक बार फिर से कहूँगा की ये लेख अनेक बंद दरवाजों को खोलता हुआ दिख रहा है.

    is lekh par any logon ke vichar jaanne ke bad main fir se vistar se likhne ki sochata hoon.

    Meena ji shukriya.

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  27. Vijay Dubey

    is atricle ka aim neeche likhe peras men hai :

    अजा एवं अजजा वर्गों का शिक्षण संस्थानों, सरकारी सेवाओं तथा विधायिका में आरक्षण समाप्त हो। अन्य पिछडा वर्ग का शिक्षण संस्थानों, सरकारी सेवाओं तथा पंचायत राज व्यवस्था में आरक्षण समाप्त हो। जिसके पीछे इनका तर्क है कि आरक्षण के कारण उच्च बुद्धिमता वाले लोग विदेशों में पलायन कर रहे हैं और निकृष्ट और कम योग्यता वाले लोग लाभ उठा रहे हैं। इसी कारण से देश का विकास नहीं हो रहा है। उनका तर्क है कि केवल बुद्धिमान लोग ही देश का विकास कर सकते हैं और आरक्षित वर्ग के कम योग्यता वाले लोग बुद्धिमान नहीं होते हैं।

    हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की आकांक्षा करने वाले हिन्दुवादियों के इस तर्क से देश की करीब 25 प्रतिशत अजा एवं अजजा वर्ग की आबादी एवं 45 प्रतिशत के करीब अन्य पिछडा वर्ग की आबादी कुल 70 प्रतिशत आबादी को निकृष्ट एवं हीन घोषित कर दिया गया है। इन लोगों की नजर में 15 प्रतिशत मुसलमान भी निकृष्ट होने के साथ-साथ देशभक्त भी नहीं हैं। इस प्रकार करीब 85 प्रतिशत आबादी तो तुलनात्मक रूप से कम योग्य और निकृष्ट होने के साथ-साथ इस देश के विकास में और इस देश के बुद्धिमान लोगों के अवसरों को छीनने के लिये जिम्मेदार है और बुद्धिमान लोगों के विदेशों में पलायन करने के लिये जिम्मेदार है।

    यहाँ विचारणीय सवाल यह है कि कौन हैं, वे बुद्धिमान लोग जिनके लिये इस देश के 85 प्रतिशत लोगों को लगातार हीन घोषित किया जाता रहा है। स्वाभाविक रूप से हिन्दुत्व एवं हिन्दूवादी सोच के प्रवर्तक एवं समर्थक। जिनका सदा से सभी संसाधनों एवं सत्ता पर कब्जा रहा है। जिनके कारण देश के 70 प्रतिशत लोगों को आरक्षण देने की जरूरत पडी!

    वे अभी भी देश को हिन्दुवादी बनाने और राष्ट्रवादी बनाने के नाम पर फिर से सभी संसाधनों एवं सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। इस सोच के उपरान्त भी सभी हिन्दूओं ये समर्थन हासिल करने की आकांक्षा करना कहाँ तक न्यायसंगत है? यहाँ बडी चालाकी से मुसलमानों का भय दिखाकर, धारा 370 को हटाने, राम मन्दिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता का असंवैधानिक राग अलाप कर, निकृष्ट घोषित 70 प्रतिशत हिन्दुओं को भी हिन्दूवादी सोच के राजनैतिक दल भाजपा का समर्थन करने का अविवेकपूर्ण हथियार आजमाया जाता है। जो कभी भी सफल नहीं हो सकता है।
    यदि हिन्दूवादी सोच के लोग वास्तव में ईमानदार और देशभक्त होने के साथ-साथ, यदि सच्चे समतावादी हैं तो देश के 70 प्रतिशत हिन्दुओं का विकास करने वाला हिन्दुत्व कायम करने की बात करें। जिसके लिये हिन्दु धर्म की रक्षा करने के नाम पर काम करने वालों को अपने ऐजेण्डे में कुछ ही बातें बदलनी होंगी। देखते हैं भारत में हिन्दूवादी सरकार कायम होती है या नहीं? ऐसा करने के बाद भारत के 50 करोड से अधिक लोग आपके साथ होंगे।

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  28. Rashmi K. Shah

    श्रीमान मीना जी.

    आपने केवल अच्छा ही नहीं बल्कि बहुत अच्छा लेख लिखकर हिन्दू धर्म को ताकत एवं नयी दिशा देने के लिए आपका धन्यवाद करती हूँ.

    यदि इस लेख में लिखे गए श्री मीना जी के विचारों को ठीक से और बिना पूर्वाग्रह के पढ़कर इस देश के ब्राहमण और बनिया समझ जाएँ तो भारत का भला हो सकता है.

    श्री मीना जी आपने कितना सच कहा है कि

    ——–“यदि हिन्दूवादी केवल 15 प्रतिशत उच्च जातीय आबादी के हितों को ही राष्ट्रीय हित मानते हैं तो फिर इस देश में कभी भी वो नहीं हो सकता, जो हिन्दूवादी चाहते हैं।”

    ——–“सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि हर वर्ग की महिलाओं को उनके अपने-अपने वर्ग में विधायिका में, शिक्षण संस्थानों में एवं सभी स्तर की सरकारी सेवाओं में संविधान के तहत पचास फीसदी आरक्षण दिया जाना सुनिश्चत किया जावे।”

    केवल मुसलमानों का विरोध हिन्दुओं की एकता कायम नहीं रख सकता है, हिन्दुओं को डॉ. मीना जी बताये अनुसार कुछ सकारात्मक कदम उठाने होंगे. जिनका विवरण २१ बिन्दुओं में लिखा गया है, इनमें से किसी बात पर असहमति हो तो देशभर में चर्चा करवाई जावे, लेकिन ये विचार हिंदुत्व को ताकत देने वाले सिद्ध हो सकते है.

    श्री मीना जी का धन्यवाद.

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  29. Upendra Upadhyay

    श्री मीणा जी आपने इस लेख में अपने गहरे अनुभव और बुद्धिमता का सदुपयोग किया है।

    मैंने आपको गुजरात के दंगों के ठीक बाद आपसी सद्भाव के लिये आयोजिक एक सभा में सुना था, जिसमें आपने कहा था कि-

    “अधिकतर दंगों के पीछे राजनैतिक ताकतें होती हैं, जो अपना वोट बैंक बढाने के लिये किसी भी स्तर तक गिर सकती हैं।”

    जहाँ तक मुझे याद है, आपने तब यह भी कहा था कि

    “मैं इस सभा में घोषणा करता हूँ कि अब गुजरात में कम से कम एक दशक तक भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बेदखल करना असम्भव होगा, लेकिन इससे हिन्दू धर्म मजबूत नहीं हो सकता, बल्कि हिन्दुत्व का विरोध होगा।”

    आपकी उपरोक्त बात को तब हममें से कुछेक ने हिन्दू धर्म के विरुद्ध समझा था। हालांकि आपने सधी हुई भाषा में मौलवियों, पादरियों, पुरोहितों, और दलितों-आदिवासियों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में इस बात पर भी जोर दिया था कि

    “जब तक अजा, अजजा एवं पिछडे वर्ग के लोगों को हिन्दू धर्म के ठेकेदार समान रूप से महत्व नहीं देंगे, तब तक भारत में हिन्दूवादी सरकार की स्थापना या हिन्दुत्व की सच्ची स्थापना असम्भव है।”

    जब दिल्ली में अटल सरकार को भारत उदय के नारे के साथ अस्त होते हुए देखा तो मैंने अपने अनेक मित्रों के साथ चर्चा में आपकी उपरोक्त बात को याद किया था।

    आज मैं खुले दिल से कह रहा हूँ कि आपकी उस समय की आवाज में और आज इस लेख में लिखे गये विचारों में हिन्दुत्व को ताकत प्रदान करने का दर्द साफ-साफ झलक रहा है।

    हाँ हमारे कुछ मित्र कह सकते हैं कि आपने हिन्दु धर्म तथा ब्राह्मणों के बारे मे समाज में फैली कुछ ऐसी भ्रांतियों का सहारा लिया है जो सच नहीं हैं, लेकिन आपने अपने लेख में बडी चुतराई से हिन्दुत्व और ब्राह्मणों के बारे में लिखते समय साफ लिख दिया है कि सैद्धान्तिक हकीकत कुछ भी हो, लेकिन व्यवहार में देश के अधिकतर लोग वर्तमान में हिन्दुत्व का जो मतलब समझते हैं। वो आपने प्रकट की है।

    इस दृष्टिकोण का सहारा लेकर आप उच्च तबके आक्रामक प्रतिक्रिया करने वाले तबके की सीधी आलोचना से बच गये हैं।

    आपने जो २१ सुझाव दिये हैं, उनके पीछे कम से कम मुझे तो कोई भी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करने वाली बात नहीं दिखती है। यदि आपके इन सुझावों पर अमल किया जाये तो इस देश में हिन्दूराज को कायम करने मे कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिये।

    एक बात और मैं ईमानदारी से कहना चाहता हूँ कि अभी तक हम यही समझते रहे हैं या सच कहूँ तो हमें यही समझाया जाता रहा है कि इस देश के बहुसंख्यक लोग आरक्षण के विरोधी हैं, बहुसंख्यकों को आरक्षण से नुकसान हो रहा है। जबकि आपने साफ तौर पर प्रमाणित कर दिया है कि हमारी यही गलत सोच हिन्दुत्व की एकता में सबसे बडी बाधा है। आपके इस विचार से असहमत होने का कोई कारण नहीं है कि ७० प्रतिशत लोगों को हीन अनुभव करवाकर और मुसलमानों का डर दिखाकर हिन्दुत्व को मजबूत नहीं किया जा सकता। यह नकारात्मक सोच है।

    अन्त में यह जरूर कहना चाहूँगा कि मन्दिरों में पूजा का काम या पूजा का धर्म ब्राह्मनों से छीनने की बात जची नहीं, लेकिन शायद मेरा ब्राह्मण होना इसका कारण है। यदि इससे देश और हिन्दुत्व का भला होता है, तो ये भी चलेगा।

    मीणा जी एक संग्रहणीय और देश एवं हिन्दुत्व को नयी तथा सकारात्मक दिशा देने वाला लेख लिखने के लिये आपका हृदय से आभार।

    धन्यवाद।

    Reply
    • RTyagi

      बहुत सही बात कही आपने ……

      “अन्त में यह जरूर कहना चाहूँगा कि मन्दिरों में पूजा का काम या पूजा का धर्म ब्राह्मनों से छीनने की बात जची नहीं, लेकिन शायद मेरा ब्राह्मण होना इसका कारण है। यदि इससे देश और हिन्दुत्व का भला होता है, तो ये भी चलेगा।”

      बधाई

      Reply
  30. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय तिवारी जी,
    इतनी जल्दी किस बात की थी, यह तो आप जैसे विद्वान की टिप्पणी ही नहीं लग रही। मैंने बिन्दु ३ एवं ४ में वे बातें कही/लिखी ही नहीं जो न जाने किस कारण आपने लिख दी हैं।

    कृपया एक बार फिर से पढने का कष्ट करें। प्रथम बिन्दु को छो‹डकर सभी बिन्दुओं में जो बातें कही गयी हैं, इनको हिन्दुवादी सरकार के सत्ता में आने पर देश में लागू किये जाने का प्रस्ताव है, न कि हिन्दुओं द्वारा ऐसा किया जायेगा। कम से कम मैंने यह कहीं भी नहीं लिखा कि तलाक के पश्चात की स्थिति क्या होगी इसका निर्णय हिन्दू करेंगे और मैंने हिन्दी भाषा को केवल सर्वोच्च न्यायालय, केन्द्रीय कार्यपालिका और संसद की भाषा होना लिखा गया है। जिसे आपने न्यायालय की भाषा लिखकर, इसका समान्यीकरण कर दिया। मैं फिर से कहॅूंगा कि न जाने क्यों आपकी टिप्पणी जल्दबाजी में की गयी टिप्पणी प्रतीत हो रही है। मैं दोनों बिन्दु नीचे प्रस्तुत हैं, कृपाकर इन्हें फिर से पढने का कष्ट करें :

    “3. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि धर्म के अधार पर विवाह विच्छेद या तलाक मान्य नहीं होगा और कोर्ट द्वारा विवाह विच्छेद या तलाक घोषित होने के बाद पत्नी के भरणपोषण की वर्तमान विभेदकारी व्यवस्था समाप्त की जावे और विवाह विच्छेद या तलाक की सूरत में परिवार की सम्पत्ति में से सभी की हिस्सेदारी के लिये न्यायसंगत व्यवस्था लागू की जावे, जो सभी धर्म के अनुयाईयों पर लागू हो।”

    “4. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि भारत में राजकाज के सम्पूर्ण कार्य हिन्दी एवं स्थानीय/क्षेत्रीय भाषाओं में किये जाने का प्रावधान किया जावे। कार्यपालिका, संसद एवं सर्वोच्च न्यायालय की भाषा केवल हिन्दी हो। अंग्रेजी में सरकारी काम काज पर पाबन्दी हो। विदेशों में होने वाले शोध का तत्कान हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करवाने के लिये हर तरह के तकनीकी साधनों से सम्पन्न एवं योग्यतम अनुवादकों की व्यवस्था हो। भारत में बिकने वाले किसी भी उत्पाद का विवरण अंग्रेजी में देना अपराध हो।”

    आपका धन्यवाद!

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  31. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    कुछ – कुछ नयां-नया सा विश्लेषण है .
    हिन्दू क्यों नहीं चाहते हिदुवादी सरकार ?
    हाँ यह सम्भव है यदि लागू कर दो –
    श्री मीणा जी के २१ सूत्रीय सुधार .
    मीणा जी इस देश की माटी में ही कुछ खूबी है की कोई लाख जतन कर ले ;नहीं बन पाएगी कोई साम्प्रदायिक सरकार .आपके यूटोपियाई सुझावों में से प्रतेक पर कुकरहाव मच जाएगा .सूत्र क्रमांक -३.के अनुसार क्या यह संभव है की सिर्फ हिन्दू फैसला करेंगे की तलाक के पश्चात की स्थिति क्या हो ?इसी तरह सूत्र क्रमांक -4.न्यायालय की भाषा हिदी हो ‘बाप रे बाप पूरा दक्षिण भारत धू -धू कर जल उठेगा .तमिलनाडु और महाराष्ट्र तो बाबा रे बाबा क्या गजब का सामान लाये हो .सदेश को बर्बाद करने के लिए .हिन्दुराष्ट्र बालों ने इतनी बुरी तस्वीर तो नहीं बनाई;बेशक बे हिन्दू हित की बात करते हैं ठीक वैसे ही जैसे मुस्लिम -इसाई -या अन्य धर्मों के अनुयाई अपने ही सहधर्मियों के हित की बात करते -करते समाज और राष्ट्र में साम्प्रदायिक उन्माद फैलाते रहते हैं वैसे ही हिन्दू राष्ट्रवादी भी करते रहते हैं .वे अपने आपको बहुत अच्छा -सच्चा देशभक्त मानकर आप जैसों को देश का दुश्मन कर्रार देने में माहिर हैं .जो फ़ॉर्मूला आप सुझा रहे हैं वो तो तभी क़ानून बनेगा न जब वर्तमान संविधान पूरा का पूरा -समाप्त कर दिया जाए ..यह इस देश की जनता को मंजूर नहीं .क्यों की उसी संविधान के कारण आप इतना लिख पाने में समर्थ हुए और में भी .हालांकि में aapka mantvy और aalekh gambheer vichaar yogy नहीं maanta kintu आपके vichhar prkat करने की aazaadee का samman karta hun .

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