मोदी सरकार आखिर क्यों ढूंढ रही है दाराशिकोह जैसे मुस्लिम शासक की कब्र ?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार

आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दारा शिकोह के चरित्र में क्या खोजा की उसकी कब्र की तलाश हो रही है। कहते हैं, हीरे की कदर जौहरी ही कर सकता है। दारा शिकोह अन्य मुगलों से एकदम अलग विचारों वाला मुग़ल बादशाह था, जिसकी महानता को पाखंडी, छद्दम धर्म-निरपेक्षों, कुर्सी के भूखे और तुष्टिकरण पुजारी नेताओं ने कभी उजागर नहीं होने दिया, क्योकि उसका गुणगान करने से इन छलावा करने वालों को वोट नहीं मिलता। अगर औरंगज़ेब की बजाए दारा शिकोह बादशाह होता, भारत में हिन्दू-मुसलमानों में शायद कोई विवाद नहीं होता। कांग्रेस और वामपंथी गठजोड़ ने वास्तव में भारतीय इतिहास को अपने हिसाब से लिखा। इतने वर्षों के बाद भारत में दारा शिकोह को याद किया गया है, वह भी उस सरकार द्वारा, जिसके प्रधानमंत्री को मुस्लिम विरोधी चेहरे के रूप में उजागर किया जाता है।

दारा शिकोह वो मुगल शासक था, जिनके साथ इतिहासकारों ने छलावा किया और गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया। उस दारा शिकोह को उसका वाजिब हक दिलाने के लिए मोदी सरकार आगे आई है। जिस दारा शिकोह ने हिन्दू धर्म ग्रंथों का फारसी में अनुवाद किया था। उस दारा शिकोह को इतिहास में दफन पन्नों से बाहर निकालने का बीड़ा मोदी सरकार ने उठाया है। जिस दारा शिकोह के साथ उसके सगे भाई औरंगजेब ने क्रूरता की हदें पार कर दी थी और उसका सिर कलम करवा दिया था, उस दारा शिकोह की कब्र खोजने में मोदी सरकार जुट गई है।
दूसरे, इसका यह भी अर्थ निकाला जा सकता है कि मोदी ने कांग्रेस के साथ-साथ छद्दम इतिहासकारों को भी बेनकाब करने का भी मन बना लिया है। क्योकि इन्हीं छद्दम इतिहासकारों के कारण मुस्लिम कट्टरपंथी किसी भी निर्णय अथवा कानून को साम्प्रदायिकता दृष्टि से देख दंगे करवाने की चेष्टा कर, हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत की फसल बोकर बेगुनाहों के खून की होली खेलकर मालपुए खाने के साथ-साथ अपनी तिजोरियों को भी भरते हैं। जिस दिन सरकार इन छद्दम इतिहासकारों को बेनकाब करने में सफल हो गयी, देश से फिरकापरस्ती और तुष्टिकरण का भी जनाजा निकल जाएगा। इन छद्दम इतिहासकारों की हालत इतनी दयनीय हो जाएगी की शायद उन्हें अपने परिवार से भी सम्मान से वंचित होना पड़ सकता है। छद्दम इतिहासकार यह भूल बैठे थे, कि भगवान ने रात बनाई है तो सुबह भी जरूर बनाई होगी, और जब रात का अँधेरा छटकर सुबह होगी, तब उनकी क्या हालत होगी।
इतिहास में औरंगजेब की खूब चर्चा हुई है और दारा शिकोह को नजरअंदाज कर दिया गया है। सच्चे मायने में एक धर्मनिरपेक्ष मूर्त वाले दारा शिकोह को काफिर तक करार दिया गया था। इतिहासकारों ने भी औरंगजेब का ही महिमामंडन किया। लेकिन दारा शिकोह को वो पहचान नहीं दी, जिनके वो हकदार थे। देश भर में औरंगजेब के नाम से तमाम सड़के मिल जाएँगी। लेकिन दारा शिकोह के नाम पर एक स्मारक तक नहीं बना। हालाँकि 2017 में दिल्ली के डलहौजी मार्ग का नाम बदलकर दारा शिकोह रोड जरूर कर दिया गया था।
Dara Shikoh and the Upanishads by Satya Chaitanyaशाहजहाँ और औरंगजेब जैसे मुगल बादशाहों के बारे में तो पूरी दुनिया जानती है, लेकिन दारा शिकोह को बहुत कम ही लोग जानते होंगे। दरअसल, दारा शिकोह शाहजहाँ के बड़े बेटे और औरंगजेब के बड़े भाई थे। इतिहास में आज के दिन एक भाई ने अपने ही भाई को सत्ता के लिए मरवा दिया था। भारतीय मुगलकालीन इतिहास में 30 अगस्त 1659 को ही मुगल शासक शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह की उसके ही छोटे भाई ने हत्या करवा दी थी। भारतीय इतिहास में भुला दिया गया यह शख्स शाही मुगल परिवार में अनोखा और अद्भुत व्यक्तित्व वाला था।
पुरातत्वविद् केके मुहम्मद के मुताबिक शिकोह अपने दौर के बड़े फ्री थिंकर (स्वतंत्र विचारक) थे। उन्होंने उपनिषदों का महत्व समझा और अनुवाद किया। तब इसे पढ़ने की सुविधा सवर्ण हिंदुओं तक सीमित थी। उपनिषदों के दारा के किए फारसी अनुवाद से आज भी फ्री थिंकर्स को प्रेरणा मिलती है। यहाँ तक कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसको स्वीकार किया है।
‘सर्व संप्रदाय समभाव’ में विश्वास रखने वाला दारा
दारा शिकोह के एक हाथ में पवित्र कुरान थी और दूसरे हाथ में पवित्र उपनिषद। वो मानता था कि हिन्दू और इस्लाम धर्म की बुनियाद एक है। वो नमाज भी पढ़ता था और प्रभु नाम की अँगूठी भी पहनता था। मस्जिद भी जाता था और मंदिर में भी आस्था रखता था। लेकिन सत्ता की लड़ाई में उसे काफिर बताकर मार दिया गया। तभी से ये सवाल भी बना हुआ है कि क्या भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास अलग होता अगर औरंगजेब की जगह दारा शिकोह भारत का बादशाह बनता।
मुगल बादशाह शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह में भारतीय संस्कृति कूट-कूट कर भरी हुई थी। वो उदारवादी और बेहद नम्र मुगल शासक थे। वो एक बड़े लेखक भी थे। दारा शिकोह सूफीवाद से बेहद प्रभावित थे। उनके मन में हर धर्म के प्रति सम्मान था।
दाराशिकोह का नाम मुगल वंश के एक ऐसे नक्षत्र का नाम है जिसने विपरीत, परिस्थितियों और विपरीत परिवेश मंज जन्म लेकर भी ‘सर्व संप्रदाय समभाव’ की मानवोचित और राजोचित व्यवस्था में अपना विश्वास व्यक्त किया था और उसके विषय में यह भी सत्य है कि अपने इसी आदर्श के लिए वह बलिदान भी हो गया था। किसी महान आदर्श को लक्षित कर उसी के लिए जीवन होम कर देना ही यदि सच्ची शहादत है तो दाराशिकोह का नाम ऐसे शहीदों में सर्वोपरि रखना चाहिए क्योंकि दाराशिकोह का जीवन मानवता के लिए समर्पित रहा था और उसी के लिए होम हो गया था।
Muslim society should get out of colour of Aurangzeb and join stream of Dara Shikohअच्छे लोगों को देता है -इतिहास दंड
विश्व के ज्ञात साम्प्रदायिक इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब इतिहास नायकों का क्रूरता पूर्वक वध किया गया और उन्हें लोगों ने इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। कभी भूलवश यदि इतिहास ने इन इतिहास नायकों को झाड़ पोंछकर स्वच्छ करने का प्रयास भी किया तो क्रूर और निर्दयी सत्ता में बैठे लोगों ने इतिहास की भी हत्या करने में देर नही की। फलस्वरूप इतिहास के विषय में लोगों की धारणा बनी कि ‘जो जीतेगा वही मुकद्दर का सिकंदर होगा या जो जीत जाता है-इतिहास उसी का हो जाता है।’
वस्तुत: ऐसा है नहीं, जीतने वाला क्षणिक समय के लिए ‘मुकद्दर का सिकंदर’ हो सकता है, परंतु यह आवश्यक नहीं कि वह इतिहास का भी नायक बन जाए। क्योंकि एक यथार्थवादी और सच्चा इतिहास तो स्वयं ‘सिकंदर’ को भी अपना नायक नही मानता।
इतिहास का नायक वही होता है जो मानवतावाद के लिए संघर्ष करता है, नीति की स्थापनार्थ और अनीति के समूलोच्छेदन के लिए संघर्ष करता है, जो मानव और मानव के मध्य साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव नहीं करता, और जो केवल मानव निर्माण से राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण से विश्व निर्माण का लक्ष्य बनाकर चलता है।
जो लोग विश्व में विध्वंसात्मक शक्तियों का नेतृत्व करते हैं और अपनी विध्वंसक नीतियों से दाराशिकोह जैसी पुण्यात्माओं का जीवनांत कर देते हैं, वे सत्ता पाकर ‘आलमगीर’ हो सकते हैं, परंतु वास्तव में ‘आलमगीर’ हो गये हों-उनके विषय में यह नहीं कहा जा सकता।
पुरातत्वविद् केके मुहम्मद के मुताबिक शिकोह अपने दौर के बड़े फ्री थिंकर (स्वतंत्र विचारक) थे। उन्होंने उपनिषदों का महत्व समझा और अनुवाद किया। तब इसे पढ़ने की सुविधा सवर्ण हिंदुओं तक सीमित थी। उपनिषदों के दारा के किए फारसी अनुवाद से आज भी फ्री थिंकर्स को प्रेरणा मिलती है। यहाँ तक कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसको स्वीकार किया है।
फारसी में दारा शिकोह के ग्रंथ हैं- सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी संतों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रंथ), सिर्र-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद)। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फारसी भाषा में अनुवाद किया। ‘मज्म-उल्-बहरैन्’ फारसी में उनकी अमर कृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदांत की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बताई हैं। इसके अलावा दारा शिकोह ने ‘समुद्रसंगम’ (मज़्म-उल-बहरैन) नाम से संस्कृत में भी रचना की।
फारसी में दारा शिकोह के ग्रंथ हैं- सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी संतों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रंथ), सिर्र-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद)। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फारसी भाषा में अनुवाद किया। ‘मज्म-उल्-बहरैन्’ फारसी में उनकी अमर कृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदांत की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बताई हैं। इसके अलावा दारा शिकोह ने ‘समुद्रसंगम’ (मज़्म-उल-बहरैन) नाम से संस्कृत में भी रचना की।
बादशाह शाहजहां का उत्तराधिकारी दाराशिकोह बादशाह शाहजहां अपने जीवन काल में अपने बड़े पुत्र दाराशिकोह से असीम स्नेह करता था। संभवत: इसीलिए बादशाह दारा शिकोह को सामान्यत: अपने साथ ही रखता था। उसे अपने चार पुत्रों दारा शिकोह, शुजा मुहम्मद, औरंगजेब और मुराद बख्श में से दारा की बातों और नीतियों में ही आचरण और व्यवहार में मानवता का प्रकाश उत्कीर्ण होता दिखता था, इसलिए वह अपने इसी पुत्र को सबसे अधिक अपने निकट पाता था। कदाचित यही कारण रहा होगा कि उसने दाराशिकोह को अपना उत्तराधिकारी तक बनाने का मन बना लिया था।


बादशाह की यह योजना निश्चित रूप से उसके दूसरे पुत्रों औरंगजेब आदि को उचित नही लगी। इस पर हम पूर्व में प्रकाश डाल चुके हैं। इस आलेख में हम कुछ दूसरी बातों पर चिंतन करेंगे।
आज का सभ्य समाज और इतिहास
मानव समाज हर काल में और हर युग में कुछ स्वनिर्मित मतिभ्रमों का शिकार बना रहा है, आज भी बना हुआ है और भविष्य में भी बना रहेगा। इसी को स्वयं को स्वयं के द्वारा स्वयं के लिए छलना भी कहा जा सकता है। जैसे हम आज कल एक मतिभ्रम का शिकार है कि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं और एक सभ्य समाज के प्राणी हैं-इत्यादि। परंतु धनबल, जनबल, और गन बल ने लोकतंत्र को किस प्रकार तार-तार किया है-यह भी हमसे छिपा नहीं है।
विकास की पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े मनुष्य को आगे आने से आज भी उतनी ही क्रूरता से रोका जा रहा है, जितनी क्रूरता से मध्यकालीन इतिहास के समाज में उसे रोका जाता था। तब आज के समाज को ‘सभ्य समाज’ कैसे कहा जा सकता है? पर हमने इसे सभ्य समाज माना है और अपनी मान्यता के मतिभ्रम में जिये जा रहे हैं। हम नित्य लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं, और कहे जा रहे हैं कि हम लोकतांत्रिक हैं। यह सोच हमारे लिए अभिशाप बन गयी है।
एक अन्य सोच जो इन सबसे अधिक घातक है, वह है व्यक्ति का साम्प्रदायिक होना और अपने सम्प्रदाय की मान्यताओं को सर्वप्रमुख मानना। इस सोच के कारण व्यक्ति को संप्रदाय के कठमुल्ला या मठाधीश शासित करने की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। यह खेल सदियों से होता आ रहा है। आज भी साम्प्रदायिक मान्यताओं को या तो समाप्त करने की या सर्व समाज के अनुकूल बनाने की, या उन्हें समाप्त करने की योजना या साहस किसी भी सरकार के पास नहीं है। यहां तक कि अमेरिका जैसा सर्वशक्ति संपन्न देश और उसकी सरकार भी इस विषय में कुछ ठोस कार्य कर दिखाने में असमर्थ है।
इस्लाम निरपेक्ष राजनीति कभी संभव नहीं
कहने का अभिप्राय है कि-जैसे हम आज मतिभ्रमों में जी रहे हैं वैसे ही मध्यकाल में भी जी रहे थे। उस समय बादशाहत अपने कठमुल्लों के सामने पानी भरती थी। उन्होंने वैसे ही समाज पर अपना शिकंजा कस रखा था, जैसे आज कस रखा है। वैसे इस्लाम का रूप विकृत करने में राजनीति और कठमुल्लों दोनों का बराबर का सहयोग रहा है। राजनीति ने इस्लाम को अपने ढंग से प्रयोग किया है और कठमुल्लों ने अपने ढंग से। इसलिए राजनीति इस्लाम में इस्लाम निरपेक्ष हो ही नहीं सकती।
जब बादशाह और सुल्तान ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा केवल इसलिए देने के अभ्यासी रहे हों, या हैं कि इससे इस्लाम में आस्था रखने वाले लोगों का उन्हें समर्थन प्राप्त होगा और वह अधिक शक्तिशाली बनकर उभरेंगे, तब राजनीति के इस्लाम निरपेक्ष बनने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। राजनीति पंथनिरपेक्ष तभी बन सकती है जब राजनीतिज्ञों के मुंह से कोई एक शब्द भी संप्रदाय के विषय में नहीं सुना जाएगा।कठमुल्लावाद का शिकार हुआ दाराशिकोह
हम जिस काल की बात कर रहे हैं उस काल की राजनीति तो घृणास्पद स्वरूप तक साम्प्रदायिक थी। अत: दारा को बादशाह बनाने से रोकने के लिए इस्लाम के कठमुल्ला सक्रिय हुए और उन्हें मोहरा औरंगजेब मिल गया, या कहिए कि औरंगजेब ने कठमुल्लों को मोहरा बनाकर इस्लाम का अपने हित में प्रयोग किया और वह अपने ही परिवार को समाप्त करने पर लग गया। कठमुल्लों ने औरंगजेब को और औरंगजेब ने कठमुल्लों को अपनी आवश्यक समझा और प्रयोग किया। इसलिए 1658 ई. में शाहजहां को गद्दी से हटाने के समय ही यह निश्चित हो गया था कि अब औरंगजेब इस्लाम की व्याख्या अपने ढंग से करेगा और कठमुल्ला अपने ढंग से। परंतु यह भी निश्चित था कि दोनों की व्याख्या में समरूपता होगी, एक दिन को रात कहेगा तो दूसरा दूर से ही उसके समर्थन में चिल्लाएगा-”जी हुजूर! तारे मुझे भी दिखाई दे रहे हैं।”
हिन्दू शक्ति और दाराशिकोह
भविष्य के इस भयानक हिंदू द्रोही गठबंधन को रोकने के लिए हिंदू समाज के तत्कालीन गणमान्य लोग सतर्क और सावधान थे। अत: उनका चिंतन भी सही दिशा में कार्य कर रहा था। जब बादशाह शाहजहां बीमार हुआ और उसने अपने पुत्र दाराशिकोह को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा तो औरंगजेब ने कपटपूर्ण राग अलापा कि-”मैं हज करने मक्का चला जाऊंगा। मुझे इस समय एक ही चिंता है कि दाराशिकोह जैसा काफिर व्यक्ति बादशाह न बने। यदि वह बादशाह बन गया तो ‘इस्लाम खतरे’ में पड़ जाएगा।” उसके पश्चात औरंगजेब ने जो कुछ किया उससे देश में सर्वत्र अराजकता का वातावरण व्याप्त हो गया।
दारा शिकोह इतिहास की सबसे बड़ी सेना लेकर औरंगजेब से लड़ने गया था। लेकिन उसकी सेना में सैनिकों से ज्यादा छोटे दुकानदार, मजदूर, दस्तकार और यहाँ तक की भांडे-बर्तन बेचने वाले भी शामिल थे। उन्हें लड़ने का कोई अनुभव नहीं था, सिर्फ दारा शिकोह के आदेश पर उन्हें सेना में भर्ती कर लिया गया था। दारा शिकोह के पास 4 लाख सैनिक थे और औरंगजेब के पास सिर्फ 40 हजार।
दारा को हराने में उसके अपने ही विश्वासपात्र का हाथ था। दारा शिकोह ने कभी उसे बुरी तरह से अपमानित किया था। उसने दारा से जंग के मैदान में बदला चुकाया। दारा हाथी पर थे और वह जंग लगभग जीत चुके थे। औरंगजेब के पास गिनती के सैनिक रह गए थे। उसी वक्त उनके एक विश्वासपात्र खलीलुल्लाह ने कहा- हजरत सलामत, आपको जीत मुबारक। अब आप हाथी से उतरकर घोड़े पर बैठिए। पता नहीं कब कोई तीर आपको आकर लग जाए। अगर ऐसा हो गया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। दारा शिकोह बिना सोच विचार किए हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हो गए।
उधर जैसे ही दारा हाथी से उतरे, उनके सैनिकों के बीच दारा के मरने की अफवाह फैल गई। औरंगजेब ने इसका फायदा उठाया। दारा के सैनिक उनका साथ छोड़कर भाग गए और औरंगजेब और मुराद की मुट्ठीभर सेना ने जंग जीत लिया।
औरंगजेब ने जब साल 1659 में एक भरोसेमंद सिपाही के जरिए दारा शिकोह का सर कलम करवा दिया था तब सिर आगरा में दफनाया गया था और धड़ को दिल्ली में। शाहजहाँनामा के मुताबिक औरंगजेब से हारने के बाद दारा शिकोह को जंजीरों से जकड़कर दिल्ली लाया गया और उसके सिर को काटकर आगरा फोर्ट भेजा गया, जबकि उनके धड़ को हुमायूँ के मकबरे के परिसर में दफनाया गया था।
दारा शिकोह पहुंचा गुरू हरिराय जी की शरण में
दारा शिकोह की इमेज लिबरल मुस्लिम की मानी जाती है। वो हिंदू और इस्लामिक ट्रेडिशन को साथ लेकर चलने वाले मुगल थे। दारा शिकोह ने भगवद्गीता और 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। कहा-लिखा तो ये भी गया है कि दारा के सभी धर्मों को साथ लेकर चलने के ख्याल के कारण ही कट्टरपंथियों ने उन्हें इस्लाम-विरोधी करार दे दिया था। इन्हीं हालातों का फायदा उठाकर औरंगज़ेब ने दारा के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। एक सच्चाई यह भी है कि जहाँ एक ओर शाहजहाँ ने दारा शिकोह को सैन्य मुहिमों से दूर रखा वहीं औरंगजेब को 16 वर्ष की आयु में एक बड़ी सैन्य मुहिम की कमान सौंप दी।
दारा शिकोह एक सच्चा कर्मनिष्ठ सहृदयी व्यक्ति था, वह औरंगजेब के अत्याचारों से बचते बचाते पंजाब की गुरूभूमि पर जा पहुंचा। यहां उस समय हिन्दू धर्म रक्षक गुरू के रूप में गुरू हरिराय जी का मार्गदर्शन लोगों को मिल रहा था। दाराशिकोह ने गुरू हरिराय जी से आशीर्वाद लेना चाहा। जिसके लिए वह गुरूदेव के दर्शनों के लिए उनके निवास स्थान कीरतपुर के लिए चल दिया। तब हरिराय जी कीरतपुर में नहीं थे। उनके गोइंदवाल होने की सूचना मिली तो वह वहीं मिलने के लिए चल दिया।
औरंगजेब भी अपने भाई की हर गतिविधि की जानकारी ले रहा था कि वह कब कहां है और किन लोगों से मिलना जारी रखे हुए है, साथ ही मिलने वाले व्यक्ति उसकी ओर किस दृष्टिकोण से बढ़ रहे हैं, स्वागत सत्कार कर रहे हैं, या उसे उपेक्षित कर रहे हैं?
गुरू हरिराय ने किया दारा शिकोह का स्वागत
गुरू हरिराय ने एकसच्चे मानव का उसी रूप में स्वागत किया जिसका वह पात्र था। दाराशिकोह को अपने समक्ष उपस्थित पाकर गुरू हरिराय कृतकृत्य थे और दारा गुरूजी के समक्ष अपने आप को पाकर भाव विभोर था। ये दोनों महापुरूष भविष्य के संसार के लिए एक सुंदर सपना लेकर मिले थे, पर इनके इस मधुर मिलन पर औरंगजेब की गिद्घ दृष्टि भी लगी थी।
दारा शिकोह विद्वान था। वो भारतीय उपनिषद और भारतीय दर्शन की अच्छी जानकारी रखता था। इतिहासकार बताते हैं कि वो विनम्र और उदार ह्रिदय का था। दारा के सबसे बड़े योगदानों में उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद करना माना जाता है। इन अनुवादित किताबों को उसने ‘सिर्रेअकबर‘ यानी महान रहस्य का नाम दिया था। फारसी भाषा में अनुवाद कराए जाने का मुख्य कारण ये था कि फारसी मुगलिया कोर्ट में इस्तेमाल की जाती थी। हिंदुओं का भी विद्वान वर्ग इस भाषा के साथ बखूबी परिचित था।
इतिहासकार लिखता है :-”(गुरूजी से मिलकर) दाराशिकोह का क्षीण आत्मबल गुरूदेव का स्नेह पाकर पुन: जीवित हो उठा। किंतु वह त्यागी प्रवृत्ति का स्वामी अब सम्राट बनने की इच्छा नहीं रखता था। वह गुरूदेव के श्रीचरणों में प्रार्थना करने लगा, मुझे तो अटल साम्राज्य चाहिए। मैं इस क्षणभंगुर ऐश्वर्य से मुक्त होना चाहता हूं। गुरूदेव ने उसे सांत्वना दी और कहा-यदि तुम चाहो तो हम तुम्हें तुम्हारा खोया हुआ साम्राज्य वापस दिला सकते हैं, किंतु दारा गुरूदेव के सान्निध्य में ब्रहम ज्ञान की प्राप्ति कर चुका था। उसे बैराग्य हो गया। वह कहने लगा कि मुझे तो अटल राज्य ही चाहिए। गुरूदेव उसकी मनोकामना देख अति प्रसन्न हुए-उन्होंने उसे आशीष दिया और कहा ऐसा ही होगा।”
औरंगजेब की विध्वंसात्मक शक्तियां
समाज के जिस सौंदर्य का रस इन दो महापुरूषों के वात्र्तालाप से टपक रहा था, उसके स्रोत को बंद कर देने के लिए औरंगजेब की विध्वंसात्मक शक्तियां भी कम सक्रिय नहीं थीं। उसे जैसे ही ज्ञात हुआ कि दाराशिकोह गुरू हरिराय के पास है, तो वह भी उसका पीछा करता हुआ वहीं के लिए चल दिया। दाराशिकोह को जब औरंगजेब के आने की सूचना मिली तो वह गुरूजी से विदा लेकर लाहौर की ओर को चल दिया। साथ ही गुरूजी से विनती करने लगा कि वह जैसे भी हो सके औरंगजेब को एक दिन के लिए यहां रोक लें, जिससे कि वह पर्याप्त दूरी तक अपनी यात्रा पूर्ण कर ले और औरंगजेब के संकट से अपने आपको सुरक्षित रखने मेें सफल हो सके। गुरूजी ने दाराशिकोह को वचन दिया कि वह औरंगजेब को व्यास नदी के किनारे एक दिन का विलंब करा देंगे।
गुरूजी ने अपनी योजना और दिये वचन को पूर्ण करने के लिए व्यास नदी के तट की सभी नौकाओं को अपने नियंत्रण में ले लिया। इससे औरंगजेब के सैन्य बल को नदी पार करने के लिए नौकाओं की उपलब्धता न होने से उसे एक दिन का विलंब हो गया। जिससे दाराशिकोह तब तक पर्याप्त दूरी तक चला गया। वहां वह एक संन्यासी के रूप में रहने लगा, पर औरंगजेब के किसी गुप्तचर ने उसका पता लगा लिया और उसे छल से वह दिल्ली ले आया।
औरंगजेब की दुष्टता और दारा शिकोह
औरंगजेब की दुष्टता अब नंगा नाच करने लगी, उसे भाई क्या मिला, मानो कई दिन के भूखे किसी नरभक्षी को उसका मनचाहा शिकार ही मिल गया था। अत: वह अपने संत जैसे भाई दाराशिकोह को अपने मध्य पाकर उसी प्रकार झूम उठा जिस प्रकार की ऐसे समय में उस जैसे नरभक्षी से आशा की जा सकती है।
सिर काटकर भेज दिया शाहजहां के पास
जंग हारने के बाद दारा शिकोह यहाँ-वहाँ भटकते रहे। कभी वो मुल्तान तो कभी थट्‌टा और कभी अजमेर भागे। आखिरकार औरंगजेब के एक सैनिक के हाथों वो पकड़े गए। दिल्ली में उन्हें बुरी तरह से अपमानित किया गया। उन्हें बीमार और गंदे हाथी पर घुमाया गया। दारा शिकोह को भिखमंगों जैसे कपड़े पहनाए गए थे।
दारा शिकोह को औरंगजेब ने कैदखाने में डाल दिया। बाद में एक रात जब दारा और उनका बेटा कैदखाने में ही अपने लिए खाना बना रहे थे तो औरंगजेब के एक गुलाम नजीर ने उनका सिर काट डाला।
औरंगजेब ने बड़ी क्रूरता से दाराशिकोह की हत्या दिल्ली के चांदनी चौक में करायी और उसकी नीचता तब कहीं अधिक स्पष्ट हुई जब उसने अपने संत सम भाई दारा का कटा हुआ सिर अपनी जेल में बंद अपने पिता शाहजहां के पास एक थाली में रखकर ‘ईद मुबारक’ कहकर भेजने की धृष्टता की। शाहजहां ने जब अपने प्रिय पुत्र का सिर इस प्रकार देखा तो वह मारे वेदना के करूण चीत्कार कर उठा था। पर अब वह इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकता था।
अवीक चंदा की किताब ‘दारा शिकोह, द मैन हू वुड बी किंग’ के मुताबिक, औरंगजेब ने दारा शिकोह के कटे हुए सिर को शाहजहाँ के पास तोहफे के तौर पर भिजवाया और उनके धड़ को दिल्ली में ही हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया। वहीं इटैलियन इतिहासकार निकोलाओ मनूची ने अपनी किताब ‘स्टोरिया दो मोगोर’ में लिखा है कि औरंगजेब के आदेश पर दारा के सिर को ताजमहल के प्रांगण में गाड़ दिया गया, क्योंकि उसका मानना था कि शाहजहाँ जब भी अपनी बेगम के मकबरे को देखेंगे तो उन्हें बार-बार ये ख्याल आएगा कि उनके सबसे प्रिय और बड़े बेटे दारा का सिर वहाँ सड़ रहा है।
दारा के परिवार का भी बुरा हाल हुआ। उनके एक बेटे को मार दिया गया। दूसरे को ग्वालियर के किले में कैद कर लिया गया। दारा की बेगम अपनी जान बचाने के लिए लाहौर भाग गई। बाद में उन्होंने जहर खाकर जान दे दी।
औरंगजेब ने दारा शिकोह की हत्या करने वाले गुलाम को भी नहीं छोड़ा। दारा को अपमानित कर हाथी पर घुमाने वाले जीवन खाँ और उनका सिर काटने वाले गुलाम नजीर को पहले उसने इनाम देकर विदा किया। फिर रास्ते में दोनों के सिर कटवा दिए।
औरंगज़ेब एक धोखेबाज़
औरंगजेब ने दारा शिकोह की हत्या करने वाले गुलाम को भी नहीं छोड़ा। दारा को अपमानित कर हाथी पर घुमाने वाले जीवन खाँ और उनका सिर काटने वाले गुलाम नजीर को पहले उसने इनाम देकर विदा किया। फिर रास्ते में दोनों के सिर कटवा दिए।
ये एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जहाँ औरंगजेब ने हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं, मान्यताओं को नष्ट करने का काम किया, वहीं उसके भाई दारा शिकोह ने हमेशा सर्वधर्म समभाव की बात कही। दारा शिकोह धार्मिक सहिष्णुता और धर्म निरपेक्षता का हिमायती रहा। दारा शिकोह के लिए दूसरे धर्मों की आस्था के बारे में जानकारी हासिल करना राजनीति से प्रेरित नहीं था। इसमें किसी राज्य विस्तार या राज्य संभालने जैसी कोई कवायद नहीं शामिल थी।
अब गुरू हरिराय जी की बारी थी
अपने शत्रु दाराशिकोह से अब औरंगजेब पूर्णत: निश्चिंत हो गया। पर उसे गुरू हरिराय का वह कृत्य बार-बार स्मरण आता था कि उसने किस प्रकार दाराशिकोह की सहायता की थी उसे आशीर्वाद दिया था, और उसे एक दिन विलंब से नदी पार करने के लिए विवश कर दिया था। अब मानवता राजनीति के दण्ड की पात्र बनने लगी। सियासत से लोगों को घृणा ही इसलिए हुई है कि इसने अनेकों बार मानवता को दंडित कर अपने धर्म को कलंकित और लज्जित किया है। आज पुन: राजनीति का धर्म ही उसके समक्ष अपराधी की मुद्रा में सिर झुकाये खड़ा था, तब उससे नैतिकता और मानवता की अपेक्षा कैसे की जा सकती थी? जो लोग गुरूजी से किसी कारण से भी ईष्र्या करते थे उन्होंने भी बादशाह को उनके प्रति भडक़ाने का काम किया।
औरंगजेब ने दाराशिकोह से गुरू हरिराय के मिलने को विद्रोह का नाम देना आरंभ किया। जिससे कि उन्हें कैद करने की दिशा में कार्य किया जा सके, अपनी योजना को श्रेय चढ़ाने के लिए औरंगजेब ने एक पत्र गुरूदेव को लिखा। जिसमें उनके और दाराशिकोह के मिलने का उसने यह कहकर उपहास किया कि आपने तो दारा को दिल्ली का सिंहासन दिलाना चाहा था पर मैंने उसे मृत्युदंड दे दिया है। अत: आप झूठे गुरू हुए जो कि अपना वचनपूर्ण न कर सके।
इतिहासकार भाई जसवीरसिंह ‘श्री गुरू प्रताप ग्रंथ’ में लिखते हैं-”इस पत्र के उत्तर में श्री हरिराय जी ने लिखा-हमने तो दाराशिकोह को कहा था-तुम्हें सत्ता वापिस दिलवा देते हैं , किंतु वह अटल सिंहासन चाहता था। अत: हमने उसे अटल सिंहासन उसकी अपनी इच्छा के अनुसार दे दिया है। यदि तुम्हें हमारी बात पर विश्वास न हो तो रात को सोते समय तुम दारा का ध्यान करके सोना तो वह प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो जाएगा।”
औरंगजेब ने गुरू की बात को अनुभव करके देखा
”इस पत्र के मिलते ही औरंगजेब ने वैसा ही किया। सपने में औरंगजेब ने देखा कि एक अद्भुत दरबार सजा हुआ है, जिसमें बहुत से ओहदेदार शाही पोशाक में दारा शिकोह का स्वागत कर रहे हैं। फिर उसने अपनी ओर देखा तो उसके हाथ में झाडू है जिससे सजे हुए दरबार के बाहर वह सफाई कर रहा है। इतने में एक संतरी आता है और उसे लात मारकर कहता है कि यह तेरी सफाई का समय है, देखता नहीं महाराजा दाराशिकोह का दरबार सज चुका है। लात पडऩे की पीड़ा ने औरंगजेब की निद्रा भंग कर दी, और उसे उसका बहुत कष्ट हो रहा था। बाकी की रात औरंगजेब ने बहुत बेचैनी से काटी। सुबह होते ही उसने एक विशाल सैन्यबल श्री गुरू हरिराय को गिरफ्तार करने के लिए जालिम खान के नेतृत्व में भेजा।”
अब शंका की जा सकती है कि क्या ऐसा संभव है कि औरंगजेब को दाराशिकोह इस प्रकार सपने में दिखाई दिया हो? इस शंका समाधान यह है कि महापुरूष किसी भी व्यक्ति के मनोविज्ञान को पढऩे-समझने में बड़े प्रवीण होते हैं। उस समय चाहे औरंगजेब गुरू हरिराय जी पर व्यंग्य कस रहा था, परंतु यह भी सच होगा कि एक दारा जैसे संत को समाप्त करके उसकी आत्मा उसे अवश्य कचोटती होगी। उसका मन उस समय उसे धिक्कारता होगा, इसलिए दारा का चित्र बार-बार उसके मन में आता-जाता होगा।
गुरू हरिराय के कहने पर चित्र की यह आवृत्ति और भी अधिक तीव्रता से बनी होगी, उस दिन उसका चिंतन भी दारा के विषय में यही रहा होगा कि वह कैसे अटल साम्राज्य का भोग कर रहा होगा। बस, इसी चिंतन से उसे उक्त सपना दिख गया होगा।
मारा गया जालिमखां
जालिम जिस जुल्म को ढहाने चला था, उसमें उसे सफलता नही मिली। कारण कि जब वह गुरू हरिराय को गिरफ्तार करने के लिए सैन्य बल के साथ पंजाब की ओर बढ़ा तो मार्ग में ही उसकी सेना हैजा की शिकार हो गयी, और वह स्वयं भी हैजा का शिकार होकर मार्ग में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। इस प्रकार एक महापुरूष का उत्पीडऩ करने चले एक आततायी को प्रकृति ने भी क्षमा नही किया और वह अपने गंतव्य पर पहुंचने से तथा मंतव्य को पूर्ण करने से पूर्व ही इस असार संसार से चल बसा।
औरंगजेब की धृष्टता और दुष्टता निरंतर जारी रही
इसके पश्चात भी औरंगजेब शांत नही बैठा, उसे तो हठ थी कि जैसे भी हो गुरू हरिराय का अंत किया जाए। अत: जालिम खां के देहांत के उपरांत उसने फिर गुरू हरिराय जी की गिरफ्तारी के लिए कंधार के रहने वाले एक अधिकारी को भेजा। इसका नाम दूंदे था। ईश्वर की अनुकंपा देखिये कि गुरूजी पुन: इस अधिकारी की पकड़ में नहीं आ सके, उसकी सेना में परस्पर वेतन आदि के वितरण को लेकर ठन गयी, यह पारस्परिक कलह इतनी बढ़ी कि शत्रु की सेना में परस्पर ही मारकाट फैल गयी। इसी मारकाट में सेनापति दूंदे भी मारा गया। फलस्वरूप गुरूजी की पुन: रक्षा हो गयी। इसके उपरांत भी औरंगजेब ने सहारनपुर के नाहर खान को एक विशाल सेना के साथ कीरतपुर भेजने का आदेश दिया। इस बार इस नायक को औरंगजेब ने यह भी आदेश दिया कि हरिराय को तो कैद करना ही है, साथ ही उसकी नगरी कीरतपुर का भी सर्वनाश करके आना है।
गुरूजी पर रही ईश्वर की अनुकंपा
ईश्वर जिनकी सहायता करता है उनके लिए अदभुत घटनाएं होती हैं, और वह किसी भी व्यक्ति के प्रकोप से बड़ी सहजता से बचने में सफल हो जाते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब नाहर खां की सेना यमुना नदी को पार करने के लिए उसके तट पर शिविर लगाये बैठी थी तभी नदी में अचानक बाढ़ आ गयी, जिस कारण नाहर खां की सेना के अधिकांश सैनिक उस बाढ़ में बह गये। नाहरखां को भारी क्षति, उठानी पड़ी। इस घटना का शेष बचे सैनिकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा और उन्होंने सोचा कि बार-बार के आक्रमण यदि प्राकृतिक प्रकोपों के कारण असफल हो रहे हैं तो इसमें निश्चय ही गुरू हरिराय की किसी सिद्घि का योगदान है। अत: उन्होंने अपनी मृत्यु को अवश्यम्भावी जानकर आगे बढऩे से इनकार कर दिया और वह युद्ध से पूर्व ही भाग गये। इस प्रकार तीन बार के आक्रमणों में असफल रहे मुगल अधिकारी शांत हो गये। गुरूजी का सचमुच ईश्वर की विशेष अनुकंपा रही।
औरंगजेब ने लिया छल का सहारा
अब औरंगजेब के पास केवल छल-कपट का मार्ग ही शेष बचा था इसलिए उसने गुरू हरिराय को अपने जाल में फंसाने के लिए उनको एक पत्र लिखा और बड़े सम्मानभाव का प्रदर्शन करते हुए संबंधों को प्रेमपूर्ण बनाने का वचन देते हुए उनसे भेंट करने की इच्छा व्यक्त की।

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