भाजपा से क्यों नाराज हैं वरुण गाँधी ?

                      प्रभुनाथ शुक्ल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में वरुण गाँधी कभी भाजपा की बड़ी उम्मीद रहे। भाजपा कभी उनमें अपना भविष्य देख रही थी। कांग्रेस में नेहरू और गाँधी परिवार की काट के लिए भाजपा ने मेनका गाँधी को लाया गया था। बाद में इस जिम्मेदारी को वरुण गाँधी ने आगे बढ़ाया। भाजपा गांधी परिवार के खिलाफ, गाँधी परिवार को ही आगे रख काँटे से काँटा निकालने की नीति अपनायी। जब उत्तर प्रदेश में वरुण गांधी हिंदुत्व के फायर ब्रांड नेता के रूप में उभर रहे थे तो भाजपा उनमें अपनी नई जमींन तलाश रहीं थीं। वरुण गांधी को अपने विवादित बयानों की वजह से काफी चर्चित भी हो गए। वरुण गांधी को लोग उत्तर प्रदेश के भविष्य का मुख्यमंत्री भी बताने लगे थे। लेकिन भाजपा में मोदी और शाहयुग की शुरुवात के बाद गांधी परिवार हाशिए पर चला गया।

पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गाँधी पार्टी लाइन से हटकर सीधे किसानों का समर्थन कर रहे हैं। उनकी मुखरता भाजपा को पच नहीं रहीं है। वरुण गांधी हमेशा किसानों की बातें करते रहे हैं। वह एक लेखक और कवि भी हैं। कृषि की समस्याओं और नीतिगत मामलों लेकर उन्होंने कई आर्टिकल लिखें। लखीमपुर की घटना के बाद वह अपने बयानों से भाजपा की मुश्किल बढ़ा दिए हैं। भाजपा वरुण गांधी को कितना बर्दास्त कर पाएगी यह वक्त बताएगा। लेकिन वर्तमान में भाजपा में मेनका और वरुण गांधी के हैसियत हासिए पर है। मां मेनका गांधी के साथ वरुण गांधी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर निकाल दिया गया। हालांकि इसमें और राजनेता शामिल हैं। लेकिन पार्टी का तर्क है कि नए लोगों को लाने के लिए इस तरह के फैसले लेने पड़ते हैं। किसान आंदोलन को लेकर वरुण गांधी ने हमेशा पार्टी लाइन से हटकर बात की है। केंद्र सरकार और किसानों के बीच बढ़ते तकरार पर भी उन्होंने केंद्र सरकार से लचीला रुख अपनाने की बात कही थी। केंद्र सरकार से उन्होंने कई बार इस गतिरोध को दूर करने के लिए भी कहा, लेकिन उनकी बात को कभी गंभीरता से नहीं लिया। लखीमपुर हादसे को लेकर वह काफी परेशान दिखे। उन्होंने उसका घटना का वीडियो भी ट्वीट करते हुए दोषियों को सजा दिलाने की मांग रखी।

पश्चिमी यूपी की एक मंडी में किसान धमोह सिंह 15 दिन चक्कर लगाता रहा लेकिन उसकी धान की फसल नहीं खरीदी गईं।  बाद में किसान ने ऊबकर धान की फसल की उपज में खुद आग लगा दिया। जिसका वीडियो ट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा कि हमें ऐसी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस तरह की नीतियां हमें कहां लाकर खड़ी करती हैं। वरुण गांधी गन्ना मूल्य को लेकर भी उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखा था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे पत्र में गन्ने का मूल्य ₹400 प्रति कुंतल करने की मांग की थी। मुजफ्फरपुर में हुई किसान महापंचायत पर भी अपनी सरकार से उन्होंने समझौता वादी रुख अपनाने की अपील की थी। इस तरह देखा जाए तो वरुण गांधी हमेशा किसानों के पक्ष की बातें करते रहे हैं। उन्होंने इसकी चिंता कभी नहीं की कि पार्टी का रूख उनके पक्ष में है या खिलाफ। वह हमेशा एक जिम्मेदार सांसद के रूप में जमीनी मुद्दे उठाते रहे हैं। किसानों के मुद्दों को उन्होंने प्रमुखता से उठाया है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जब मजबूत स्थिति में थीं तो उस समय गाँधी परिवार की काट के लिए भाजपा ने गांधी परिवार को ही आगे रखा। भाजपा में अटल युग के दौरान मेनका गांधी भाजपा में शामिल हुई थी। लेकिन मेनका और वरुण गांधी ने कभी भी रायबरेली और अमेठी में राजनीतिक रूप से हस्तक्षेप नहीं किया। राजीव गांधी, सोनिया और राहुल एवं प्रियंका गांधी की तरफ से भी अपनी चाची मेनका और चचेरे भाई वरुण गांधी पर कभी भी सियासी हमला नहीं बोला गया। अलग-अलग पार्टी की विचारधाराओं में रहते हुए भी गांधी परिवार ने इस खासियत को बनाए रखा। दोनों परिवारों की तरफ से सियासी लड़ाई को गांधी बनाम गांधी नहीं होने दिया गया। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में दोनों परिवारों के लिए बहुत बड़ी बात रहीं है।

गांधी परिवार की संस्कृत और संस्कार को हमेशा सियासत से अलग रखा गया। एक दूसरे की मर्यादा और सम्मान के खिलाफ दोनों परिवारों की तरफ से गलत टिप्पणी बेहद कम सुनी गई। राजनीतिक दल इन्हें अपने लिहाज से मोहरा बनाना चाहे, लेकिन गांधी परिवार इसका शिकार नहीं हुआ। सामान्य बातों को छोड़ दिया जाय तो परिवारिक संबंधों को हमेशा राजनीति से अलग रखा गया। गांधी परिवार के तीन युवा चेहरे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और वरुण गांधी इस स्थिति को आज भी बनाए हैं।सोनिया गांधी और मेनका गांधी आपस में देवरानी और जेठानी होते हुए भी कभी सियासत के नीचले पायदान पर नहीं उतरी। गांधी परिवार की राजनीति एक अलग तरह की मिसाल है।

उत्तर प्रदेश के बदले राजनीतिक हालात में भाजपा के लिए वरुण और मेनका गांधी अब उतने प्रासंगिक नहीं रह गए। क्योंकि कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए उन्हें भाजपा में लाया गया था। अब खुद कांग्रेस कमजोर हो चली है जिसकी वजह से उनके सियासी मायने भी बदल गए हैं। मेनका और वरुण गांधी भाजपा को छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकते हैं। हालांकि राजनीति में कुछ कहना संभव नहीं है। लेकिन सवाल उठता है कि अगर वह भाजपा छोड़ेंगे भी तो कहां जाएंगे। कांग्रेस में जा नहीं सकते हैं। सपा और बसपा उनके राजनैतिक कैडर के लिहाज से मेल नहीं खाती। इस हालात में भाजपा में बने रहना उनकी मजबूरी है। भाजपा उन्हें कब तक ढोएगी यह देखना होगा।

वरुण गांधी भाजपा में होते हुए भी किसानों के मुद्दे को लेकर अलग नजरिया क्यों रखते हैं। वरुण वरुण गांधी जहाँ से चुनाव जीत कर आए हैं वह इलाका किसान बाहुल्य है।  पश्चिमी यूपी का पूरा बेल्ट कृषि प्रधान है। किसान आंदोलन को जमीनी धार देने वाले राकेश टिकैत भी पश्चिमी यूपी से आते हैं। पंजाब और पश्चिमी यूपी में किसानों की बड़ी तादात है। वरुण गांधी इन्हीं किसानों के बीच से चुनकर आए। वह जिस पीलीभीत से चुनकर आए हैं वह इलाका गन्ना गेहूं और धान की उपज के लिए जाना जाता है। गन्ने की खेती वहां व्यापक पैमाने पर होती है। वरुण गांधी को जीत दिलाने वाले वहां के किसान ही है। उस हालात में वरुण गांधी को किसानों का समर्थन करना ही पड़ेगा। सरकार और किसानों के बीच गतिरोध को लेकर वरुण गांधी बीच का रास्ता निकालने के लिए आग्रह भी कर चुके हैं। लेकिन सरकार ने उनकी बातों का संज्ञान नहीं लिया।

जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे उस दौरान वरुण गांधी को विशेष अहमियत मिली थी। उन्हें पश्चिम बंगाल का पार्टी प्रभारी और पार्टी का महासचिव बनाया गया था। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की कमान जब अमित शाह के हाथ आई तो वरुण गांधी का पत्ता साफ हो गया। भाजपा में मोदी और शाहयुग आने के बाद से ही गांधी परिवार हाशिए पर है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दे चुके हैं। कांग्रेस और गांधी परिवार एक दूसरे की आत्मा है। फिर भाजपा में गांधी परिवार की बेल मोदी और अमितशाह की मौजूदगी में भला कैसे पनप सकती है। मेनका गांधी को मंत्रिमंडल से भी हटा दिया गया। वैसे देखा जाए तो भाजपा के लिए अब  मेनका और वरुण गांधी की अहमियत खत्म हो चुकी है। अगर दोनों भाजपा छोड़ भी देते हैं तो उसकी सेहत पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। लेकिन वरुण गाँधी अगर इसी तरह बयानबाजी करते रहे तो राज्य विधानसभा चुनाव में भाजपा की मुश्किल बढ़ सकती है। क्योंकि किसान आंदोलन को लेकर पश्चिमी यूपी का किसान नाराज चल रहा है।

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