डॉ. शैलेश शुक्ला
पिछले एक दशक में यूरोप जिस चुनौती से सबसे अधिक जूझ रहा है, वह केवल आर्थिक मंदी, ऊर्जा संकट, रूस-यूक्रेन युद्ध या जनसंख्या की वृद्धावस्था नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक जटिल और दूरगामी प्रभाव रखने वाला प्रश्न है—अवैध प्रवासन। यह समस्या अब केवल सीमाओं को पार करने वाले लोगों की संख्या तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक स्थिरता, सामाजिक विश्वास, कानून के शासन, राजनीतिक व्यवस्था और यूरोप की सांस्कृतिक पहचान तक पहुँच चुकी है।
यूरोप की उदार लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ लंबे समय तक मानवाधिकारों और शरणार्थियों के संरक्षण की वैश्विक प्रतीक रही हैं, किंतु जब मानवीय संवेदनाएँ और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बिगड़ने लगता है, तब सबसे विकसित लोकतंत्र भी कठिन निर्णय लेने के लिए विवश हो जाते हैं। आज यूरोप का वास्तविक संकट यही है कि वह मानवीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए अपनी सीमाओं, अपने नागरिकों और अपनी संस्थाओं की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित करे। यदि इस प्रश्न का व्यावहारिक और प्रभावी समाधान समय रहते नहीं निकाला गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या यूरोप की राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा संरचना को गहराई से प्रभावित कर सकती है।
यूरोप की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि बाहरी देशों से लोग वहाँ पहुँच रहे हैं; वास्तविक चिंता यह है कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी प्रवेश कर रहे हैं जिनकी पहचान, पृष्ठभूमि, यात्रा मार्ग और उद्देश्य का तत्काल सत्यापन संभव नहीं हो पाता। किसी भी आधुनिक राष्ट्र-राज्य की सुरक्षा इस सिद्धांत पर आधारित होती है कि सरकार को यह ज्ञात हो कि उसके क्षेत्र में कौन प्रवेश कर रहा है, कहाँ रह रहा है और किस उद्देश्य से रह रहा है। जब हजारों लोग एक साथ बिना वैध दस्तावेजों के सीमा पार करते हैं, तब यह पूरी व्यवस्था दबाव में आ जाती है। पहचान सत्यापन की प्रक्रिया लंबी हो जाती है, प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त भार पड़ता है, न्यायिक प्रणाली धीमी पड़ती है और सुरक्षा एजेंसियों को सीमित संसाधनों में अधिक जटिल कार्य करना पड़ता है। यह स्थिति किसी भी विकसित राष्ट्र के लिए गंभीर चुनौती है, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि प्रभावी सीमा प्रबंधन और विश्वसनीय पहचान प्रणाली से भी सुनिश्चित होती है।
यूरोप के सुरक्षा विशेषज्ञ वर्षों से इस संभावना की ओर ध्यान आकर्षित करते रहे हैं कि अनियंत्रित और अवैध प्रवासन का लाभ संगठित अपराधी नेटवर्क, मानव तस्कर अथवा हिंसक उग्रवादी तत्व उठाने का प्रयास कर सकते हैं। सुरक्षा नीति का आधार संभावित जोखिमों का पूर्वानुमान होता है, न कि केवल घटित घटनाओं का विश्लेषण। यदि किसी व्यक्ति की पहचान, उसके पूर्ववृत्त या उसके दस्तावेजों का सत्यापन समय पर नहीं हो पाता, तो सुरक्षा एजेंसियों के लिए जोखिम का आकलन कठिन हो जाता है। आधुनिक आतंकवाद और संगठित अपराध अक्सर खुले युद्ध के बजाय प्रशासनिक कमजोरियों का लाभ उठाते हैं। इसलिए अनियमित प्रवासन का सबसे बड़ा खतरा उसकी संख्या नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे उन सीमित किंतु संभावित सुरक्षा जोखिमों में निहित है, जिन्हें समय रहते पहचानना आवश्यक होता है।
अवैध प्रवासन के साथ मानव तस्करी का अंतरराष्ट्रीय कारोबार भी तेजी से विकसित हुआ है। भूमध्यसागर और अन्य मार्गों से लोगों को यूरोप पहुँचाने वाले गिरोह अरबों डॉलर के अवैध नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं। ये गिरोह केवल लोगों को सीमा पार नहीं कराते, बल्कि नकली दस्तावेज, धन शोधन, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध हथियारों के परिवहन और अन्य संगठित अपराधों से भी जुड़े पाए जाते हैं। इस प्रकार अवैध प्रवासन केवल मानवीय संकट नहीं रह जाता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अपराध जगत की आर्थिक शक्ति को भी बढ़ावा देता है। जब तक इन नेटवर्कों को समाप्त नहीं किया जाएगा, तब तक सीमाओं पर सुरक्षा बढ़ाने के बावजूद नए मार्ग खोज लिए जाएँगे। यही कारण है कि यूरोप की अनेक सुरक्षा एजेंसियाँ अब अवैध प्रवासन को केवल आव्रजन नीति का विषय न मानकर संगठित अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक ढाँचे में देख रही हैं।
इस समस्या का एक अन्य गंभीर आयाम सामाजिक विश्वास का क्षरण है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की स्थिरता इस भावना पर आधारित होती है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है। यदि आम नागरिकों को यह प्रतीत होने लगे कि सीमाओं का उल्लंघन करने वालों को भी अंततः वही सुविधाएँ प्राप्त हो जाती हैं जो वैध प्रक्रियाओं का पालन करने वालों को मिलती हैं, तो कानून के प्रति सम्मान कमजोर पड़ सकता है। यही कारण है कि यूरोप के अनेक देशों में प्रवासन का मुद्दा राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। कई देशों में राष्ट्रवादी और सीमा-सुरक्षा पर बल देने वाले राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ा है, जबकि दूसरी ओर उदारवादी दल मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों की रक्षा पर जोर देते हैं। परिणामस्वरूप समाज वैचारिक रूप से अधिक विभाजित दिखाई देता है। यदि यह ध्रुवीकरण लगातार बढ़ता है, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास और सामाजिक सामंजस्य दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
आर्थिक दृष्टि से भी अनियमित प्रवासन सरकारों के सामने कठिन प्रश्न खड़े करता है। सीमाओं की निगरानी, पहचान सत्यापन, शरण आवेदन, अस्थायी आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, न्यायिक प्रक्रियाएँ और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ—इन सभी पर अतिरिक्त व्यय होता है। यदि बड़ी संख्या में लोग लंबे समय तक कानूनी स्थिति प्राप्त नहीं कर पाते, तो वे औपचारिक श्रम बाजार में सम्मिलित नहीं हो पाते और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार होने लगता है। इससे कर राजस्व प्रभावित होता है, श्रमिकों का शोषण बढ़ता है और संगठित अपराध को आर्थिक आधार मिल सकता है। यह स्थिति उन वैध प्रवासियों के हितों को भी प्रभावित करती है जो नियमों का पालन करते हुए यूरोप पहुँचे हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक योगदान दे रहे हैं। इसलिए अवैध और वैध प्रवासन के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना किसी भी संतुलित नीति की अनिवार्य शर्त है।
यूरोप के सामने सबसे कठिन चुनौती यह है कि वह सुरक्षा और मानवता के बीच संतुलन कैसे बनाए। युद्ध, उत्पीड़न या मानवीय संकट से भाग रहे वास्तविक शरणार्थियों की सहायता करना अंतरराष्ट्रीय दायित्व है, किंतु इसी मानवीय व्यवस्था का दुरुपयोग करने वाले तत्वों की पहचान करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि सुरक्षा के नाम पर सभी प्रवासियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा, तो यूरोप अपने ही लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर चला जाएगा। दूसरी ओर यदि मानवीय उदारता के कारण सीमा नियंत्रण और पहचान सत्यापन कमजोर पड़ते हैं, तो उसका लाभ वे लोग उठा सकते हैं जिनका उद्देश्य केवल बेहतर जीवन नहीं, बल्कि कानून का उल्लंघन या अपराध हो सकता है। इसलिए विवेकपूर्ण नीति वही होगी जिसमें वास्तविक शरणार्थियों को संरक्षण मिले, जबकि अवैध नेटवर्कों, मानव तस्करी और सुरक्षा जोखिमों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
यूरोप के सामने समय तेजी से बदल रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल निगरानी, बायोमेट्रिक पहचान, अंतरराष्ट्रीय खुफिया सहयोग और आधुनिक सीमा प्रबंधन जैसी तकनीकों ने अनेक नए अवसर प्रदान किए हैं। इन साधनों का प्रभावी उपयोग करके यूरोप अपनी सीमाओं को अधिक सुरक्षित बना सकता है, पहचान सत्यापन को तेज कर सकता है और मानव तस्करी नेटवर्कों के विरुद्ध अधिक प्रभावी अभियान चला सकता है। साथ ही प्रवासन के मूल कारणों—क्षेत्रीय संघर्ष, आर्थिक असमानता, राजनीतिक अस्थिरता और जलवायु संकट—पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी आवश्यक होगा। केवल सीमाएँ बंद कर देने से समस्या समाप्त नहीं होगी; उसका समाधान तभी संभव है जब स्रोत देशों, पारगमन देशों और गंतव्य देशों के बीच समन्वित नीति विकसित हो।
इतिहास यह प्रमाणित करता है कि किसी भी सभ्यता का पतन केवल बाहरी आक्रमणों से नहीं होता; वह तब अधिक संकट में पड़ती है जब उसकी संस्थाएँ, कानून और सामाजिक विश्वास कमजोर होने लगते हैं। यूरोप के सामने भी आज यही परीक्षा है। यदि वह अपनी उदार लोकतांत्रिक परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए प्रभावी सीमा नियंत्रण, कानून के शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित कर लेता है, तो वह इस चुनौती से भी उबर जाएगा। किंतु यदि अनियमित प्रवासन, संगठित अपराध, राजनीतिक ध्रुवीकरण और प्रशासनिक अक्षमता एक साथ बढ़ते रहे, तो यह संकट केवल आव्रजन नीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यूरोप की दीर्घकालिक स्थिरता और वैश्विक प्रभाव को भी चुनौती दे सकता है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूरोप का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अवैध प्रवासन की समस्या को भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि तथ्यपरक, संतुलित, मानवीय और कठोर प्रशासनिक दृष्टिकोण से कितनी सफलता के साथ संभालता है।( युवराज फीचर्स )
डॉ. शैलेश शुक्ला